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    पिंक फेस्ट के मंच पर ‘भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन’ का विमोचन एवं विचारोत्तेजक समीक्षा सत्र संपन्न

    1 month ago

    जयपुर। पिंक सिटी इंटरनेशनल आर्ट, हेरिटेज, लिटरेचर एवं कल्चर फेस्टिवल (Pink Fest 2026) के अंतर्गत आज Authors Corner पर पुस्तक ‘भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन’ का भव्य विमोचन एवं समीक्षा सत्र आयोजित किया गया। यह सत्र भारतीय स्त्री चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और समन्वयवादी दृष्टिकोण पर गंभीर विमर्श का साक्षी बना।

     

    कार्यक्रम में मुख्य वक्ता पद्मश्री भरत गुप्त, वाइस चेयरमैन, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) ने भारतीय शास्त्रीय दृष्टि से नारी की प्रतिष्ठा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते…” जैसे सूत्र केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि व्यवहारिक सामाजिक दर्शन हैं, जिन्हें भारतीय समाज ने दीर्घकाल तक जीवन में उतारा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नारी चिंतन किसी भी प्रकार से पुरुष-विरोधी नहीं, बल्कि समन्वय, सहअस्तित्व और संतुलन की दृष्टि प्रस्तुत करता है।

     

    पुस्तक के संपादक बिरेन्द्र पाण्डेय ने अपनी प्रस्तावना में कहा कि भारतीय परंपरा में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि-तत्त्व के रूप में देखा गया है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक नारी को भारतीय बोध, दर्शन और संस्कृति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास है, न कि आयातित वैचारिक चश्मे से।

     

    डॉ. नीरजा सारस्वत, सहायक आचार्य मानविकी विभाग, एमएनआईटी जयपुर ने पश्चिमी फेमिनिज़्म और भारतीय स्त्री चिंतन के मूल वैचारिक अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि जहाँ पश्चिमी विमर्श संघर्ष और प्रतिरोध पर आधारित है, वहीं भारतीय चिंतन समता के साथ-साथ विशिष्टता को भी स्वीकार करता है। उन्होंने जोर दिया कि “समानता” को समझते समय “समता” और “भिन्न भूमिकाओं की गरिमा” को भी दृष्टि में रखना आवश्यक है।

     

    डॉ. शुचि चौहान, प्रसिद्ध लेखिका एवं विचारक ने भारतीय दृष्टि में नारी की स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के संतुलन पर विचार रखते हुए कहा कि भारतीय परंपरा ने नारी को अधिकारों के साथ कर्तव्यों से भी जोड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि नारी को केवल पीड़िता के रूप में देखने की प्रवृत्ति भारतीय स्त्री चेतना की व्यापकता और सशक्तता को सीमित कर देती है।

     

    इस सत्र का संचालन प्रसिद्ध कला समीक्षक अमित कल्ला ने किया। कार्यक्रम में कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े प्रबुद्ध जनों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। सत्र ने यह स्पष्ट किया कि ‘भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक आत्मबोध से जुड़ा हुआ एक वैचारिक संवाद है, जो समकालीन स्त्री विमर्श को नई दिशा प्रदान करता है।

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