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    अदाणी पोर्ट्स का Q3FY26 में मजबूत प्रदर्शन, शुद्ध लाभ 21% बढ़कर ₹3,043 करोड़, पूरे वर्ष का अनुमान बढ़ाया

      अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड (APSEZ) ने वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी ने दिसंबर तिमाही (Q3FY26) में ₹3,043 करोड़ का समेकित शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही की तुलना में 21 प्रतिशत अधिक है। एक साल पहले इसी अवधि में कंपनी का शुद्ध लाभ ₹2,518 करोड़ रहा था। राजस्व और EBITDA में दो अंकों की वृद्धि कंपनी के तिमाही नतीजों के अनुसार, Q3FY26 में अदाणी पोर्ट्स का कुल राजस्व 22 प्रतिशत बढ़कर ₹9,705 करोड़ हो गया, जबकि Q3FY25 में यह ₹7,964 करोड़ था। इसी तरह, ब्याज, कर, मूल्यह्रास और परिशोधन से पहले की आय (EBITDA) भी 20 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ₹5,786 करोड़ पर पहुंच गई, जो पिछले साल इसी तिमाही में ₹4,802 करोड़ थी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रदर्शन बंदरगाह संचालन, लॉजिस्टिक्स सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में निरंतर विस्तार का परिणाम है। FY26 के लिए अनुमान बढ़ाया मजबूत तिमाही नतीजों के बाद कंपनी ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपने अनुमान (गाइडेंस) को भी ऊपर की ओर संशोधित किया है। अदाणी पोर्ट्स ने FY26 के लिए राजस्व अनुमान को पहले के ₹36,000–38,000 करोड़ के दायरे से बढ़ाकर ₹38,000 करोड़ कर दिया है। इसके साथ ही, EBITDA का अनुमान भी बढ़ाकर ₹22,800 करोड़ कर दिया गया है, जो पहले की अधिकतम सीमा ₹22,000 करोड़ से ₹800 करोड़ अधिक है। कंपनी के अनुसार, यह बढ़ोतरी मौजूदा परिचालनों से अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन और ऑस्ट्रेलिया स्थित NQXT के आंशिक समेकन से मिलने वाले योगदान के कारण की गई है। प्रबंधन की प्रतिक्रिया कंपनी के पूर्णकालिक निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कहा कि अदाणी पोर्ट्स ने चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद स्थिर और संतुलित प्रदर्शन किया है। उन्होंने बताया कि कंपनी के चार प्रमुख व्यावसायिक स्तंभों—घरेलू बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, समुद्री सेवाएं और अंतरराष्ट्रीय परिचालन—में लगातार मजबूती देखी गई है। प्रबंधन के अनुसार, नए अधिग्रहण के बाद भी कंपनी का वित्तीय ढांचा संतुलित बना हुआ है और कर्ज स्तर में कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई है। इससे पूंजी प्रबंधन और दीर्घकालिक रणनीति पर कंपनी के अनुशासित दृष्टिकोण की पुष्टि होती है। नौ महीनों का प्रदर्शन दिसंबर 2025 को समाप्त नौ महीनों (9MFY26) की बात करें तो अदाणी पोर्ट्स का शुद्ध लाभ 10 प्रतिशत बढ़कर ₹9,474 करोड़ हो गया, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह ₹8,038 करोड़ था। इसी अवधि में कंपनी का कुल राजस्व 24 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ₹27,998 करोड़ पहुंच गया, जो एक साल पहले ₹22,590 करोड़ था। लॉजिस्टिक्स और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में तेजी कंपनी ने बताया कि उसकी एसेट-लाइट सर्विस रणनीति का असर Q3FY26 में साफ तौर पर देखने को मिला। लॉजिस्टिक्स कारोबार से होने वाला राजस्व साल-दर-साल 62 प्रतिशत बढ़कर ₹1,121 करोड़ हो गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय फ्रेट नेटवर्क सेवाओं से होने वाली EBITDA में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। समुद्री सेवाओं (मरीन सेगमेंट) में नए जहाजों के जुड़ने से राजस्व 91 प्रतिशत बढ़कर ₹773 करोड़ पहुंच गया, जबकि इस खंड की EBITDA में 135 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों का योगदान अदाणी पोर्ट्स के अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों से तिमाही राजस्व पहली बार ₹1,000 करोड़ के आंकड़े को पार कर गया। Q3FY26 में यह ₹1,067 करोड़ रहा, जो सालाना आधार पर 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। कंपनी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय परिचालनों की EBITDA भी लगभग दोगुनी हो गई है। भारत में कंटेनर बाजार में कंपनी की हिस्सेदारी इस तिमाही में 45.8 प्रतिशत रही, जबकि घरेलू बंदरगाहों से होने वाला राजस्व 15 प्रतिशत बढ़ा। इससे घरेलू परिचालन की EBITDA अब तक के उच्चतम स्तर ₹4,877 करोड़ पर पहुंच गई। दीर्घकालिक लक्ष्य और बाजार प्रतिक्रिया कंपनी ने दोहराया कि वह 2030 तक 1 अरब टन कार्गो हैंडलिंग के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रही है। साथ ही, FY29 तक राजस्व और EBITDA को लगभग दोगुना करने की दीर्घकालिक योजना पर काम जारी है। तिमाही नतीजों के बाद शेयर बाजार में भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिला। कारोबार के दौरान अदाणी पोर्ट्स का शेयर तेज़ी के साथ ऊपर गया, जिससे निवेशकों की धारणा में मजबूती झलकी। कुल मिलाकर, Q3FY26 के नतीजे यह संकेत देते हैं कि अदाणी पोर्ट्स न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने परिचालनों को मजबूत करते हुए सतत वृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ रही है।    

    फरवरी 2026 में दिल्ली-एनसीआर और लखनऊ के स्कूलों में सीमित छुट्टियां, बोर्ड परीक्षाओं के कारण बढ़ेगा अकादमिक दबाव

      फरवरी का महीना देशभर के स्कूली छात्रों के लिए आमतौर पर सबसे व्यस्त और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में भी यही स्थिति रहने की संभावना है, खासकर दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और लखनऊ जैसे प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में। इस महीने स्कूलों में छुट्टियों की संख्या काफी सीमित रहेगी, क्योंकि इसी अवधि में कक्षा 10 और 12 की बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो जाती हैं और अधिकांश स्कूल आंतरिक मूल्यांकन, प्रैक्टिकल परीक्षा और प्री-बोर्ड टेस्ट आयोजित करते हैं। शिक्षा अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार, फरवरी 2026 में छात्रों को लंबे अवकाश या अतिरिक्त ब्रेक की बहुत कम गुंजाइश मिलेगी। शैक्षणिक सत्र को समय पर पूरा करने और परीक्षा कार्यक्रम के अनुसार पाठ्यक्रम समेटने के लिए स्कूलों ने अपनी अकादमिक गतिविधियों को सघन कर दिया है। बोर्ड परीक्षाओं का दबाव दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और अन्य बोर्डों की परीक्षाएं फरवरी के मध्य से शुरू होती हैं। इसके साथ-साथ स्कूलों में प्रैक्टिकल परीक्षाएं, आंतरिक असेसमेंट और प्री-बोर्ड टेस्ट भी इसी महीने आयोजित होते हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थानों के लिए अतिरिक्त छुट्टियां देना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि फरवरी अकादमिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण महीना होता है। छात्रों को न केवल पाठ्यक्रम पूरा करना होता है, बल्कि परीक्षा की तैयारी को अंतिम रूप भी देना होता है। इसी कारण अधिकांश स्कूल सामान्य कार्यदिवसों के अनुसार ही कक्षाएं संचालित करते हैं। फरवरी 2026 की प्रमुख छुट्टियां हालांकि छुट्टियों की संख्या सीमित है, फिर भी कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर अवकाश निर्धारित हैं। नीचे फरवरी 2026 में संभावित स्कूल छुट्टियों की सूची दी जा रही है, जिनका प्रभाव अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है: संत रविदास जयंती – 1 फरवरी 2026संत रविदास जयंती 1 फरवरी को मनाई जाएगी। यह पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में सार्वजनिक अवकाश के रूप में मान्य है। हालांकि वर्ष 2026 में यह तिथि रविवार को पड़ रही है, इसलिए अधिकांश स्कूलों के लिए यह अतिरिक्त छुट्टी के रूप में नहीं गिनी जाएगी। महाशिवरात्रि – 15 फरवरी 2026महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा। कई स्कूलों में सामान्यतः इस दिन अवकाश रहता है, लेकिन 2026 में यह भी रविवार को पड़ रहा है। ऐसे में दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में स्कूलों को अलग से छुट्टी मिलने की संभावना कम है। लोसार (तिब्बती नववर्ष) – 18 फरवरी 2026लोसार तिब्बती नववर्ष के रूप में 18 फरवरी को मनाया जाएगा। यह पर्व मुख्य रूप से सिक्किम और कुछ हिमालयी क्षेत्रों में मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में स्कूल बंद रह सकते हैं या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। हालांकि दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित अधिकांश राज्यों में यह अवकाश लागू नहीं होगा। छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती – 19 फरवरी 202619 फरवरी को महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती मनाई जाएगी। इस अवसर पर राज्य के स्कूल और कॉलेज बंद रहेंगे। लेकिन दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य अधिकांश राज्यों में इस दिन शैक्षणिक गतिविधियां सामान्य रूप से जारी रहेंगी। छात्रों और अभिभावकों के लिए क्या है संदेश शिक्षाविदों का मानना है कि फरवरी में सीमित छुट्टियों को देखते हुए छात्रों को समय प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पढ़ाई, प्रैक्टिकल और परीक्षा की तैयारी के बीच संतुलन बनाए रखना इस महीने की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अभिभावकों को भी सलाह दी जा रही है कि वे बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें और नियमित दिनचर्या बनाए रखने में उनकी मदद करें। स्कूल प्रशासन का कहना है कि परीक्षा से पहले छात्रों को पर्याप्त मार्गदर्शन और सहयोग देने के लिए अतिरिक्त कक्षाएं, रिवीजन सेशन और परामर्श कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सीमित छुट्टियों के बावजूद छात्रों की तैयारी प्रभावित न हो। कुल मिलाकर तस्वीर फरवरी 2026 में दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और लखनऊ सहित कई शहरों के स्कूलों में छुट्टियां कम और शैक्षणिक गतिविधियां अधिक रहेंगी। अधिकांश प्रमुख पर्व रविवार को पड़ने के कारण छात्रों को अतिरिक्त अवकाश का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में यह महीना छात्रों के लिए मेहनत और अनुशासन का इम्तिहान साबित हो सकता है, जहां सही योजना और निरंतर अध्ययन ही सफलता की कुंजी होगी।    

    AIIMS टीम ने दिल्ली से अंटार्कटिका तक सबसे लंबी दूरी पर टेलिरोबोटिक अल्ट्रासाउंड डेमो दिखाया

    अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के चिकित्सकों और शोधकर्ताओं ने एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीकी उपलब्धि हासिल की है, जिसमें उन्होंने दिल्ली से अंटार्कटिका तक सबसे लंबी दूरी पर टेलिरोबोटिक अल्ट्रासाउंड की लाइव डेमो प्रदर्शित की। यह परीक्षण AIIMS-IIT सहयोग से विकसित उन्नत तकनीक का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य दूरदराज और कठिन पहुंच वाले इलाकों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराना है। यह तकनीकी सुविधाजनक पेशकश AIIMS Research Day 2026 कार्यक्रम के दौरान दिखायी गई, जहाँ उन्नत दूरसंचार आधारित चिकित्सा समाधान को वास्तविक समय परीक्षण के साथ पेश किया गया। इस प्रणाली के ज़रिए एक रिमोट चिकित्सक राष्ट्रीय राजधानी से ही अंटार्कटिका स्थित रोबोटिक यूनिट को नियंत्रित कर सकता है और रोगियों के अल्ट्रासाउंड स्कैन कर सकता है – यह क्षमता तकनीकी और भौगोलिक दोनों तरह की चुनौतियों को पार करती है। क्या है टेलिरोबोटिक अल्ट्रासाउंड? यह प्रणाली एक विशेष रोबोटिक आर्म और उच्च-गुणवत्ता वाले अल्ट्रासाउंड प्रोब से लैस है, जिसे रिमोट लोकेशन (जैसे अंटार्कटिका) पर स्थापित किया जाता है। दिल्ली में चिकित्सक एक हैप्टिक कंट्रोल डिवाइस के माध्यम से उस रोबोटिक आर्म को संचालित करते हैं, जिससे वास्तविक समय में इमेजिंग और निदान संभव हो पाता है। इस प्रक्रिया के दौरान स्कैन की तस्वीरें लगातार डॉक्टर की स्क्रीन पर भेजी जाती हैं, जिससे तुरंत चिकित्सीय निर्णय लिए जा सकते हैं। आईआईटी दिल्ली और AIIMS के शोधकर्ताओं ने मिलकर इस तकनीक को विकसित किया है, जिसमें विश्वसनीय रिमोट ऑपरेशन, सटीक नियंत्रण और मजबूती पर विशेष फोकस रहा। इस परियोजना में राष्ट्रीय ध्रुव और महासागर अनुसंधान केंद्र (NCPOR), भारतीय हिमालयन फाइबर केबल (IHFC), तथा राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल जैसे संस्थान भी शामिल हैं, जिन्होंने तकनीकी, लॉजिस्टिक और संस्थागत सहयोग प्रदान किया है। चिकित्सा सेवाओं में संभावित बदलाव अंटार्कटिका में चिकित्सा देखभाल कई वजहों से चुनौतीपूर्ण रही है – अत्यधिक ठंड, सीमित सुविधाएं और विशेषज्ञों का अभाव मुख्य हैं। नटकीय और जटिल मामलों जैसे- गहन पेट दर्द, छाती के लक्षण, संदेहास्पद आंतरिक चोटें या आकस्मिक आपात स्थिति में तत्काल निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस तकनीक से इन स्थितियों में निदान की गहराई बढ़ेगी और संभवतः अस्पताल से पहले रोगी का इलाज सटीक रूप से शुरू हो सकेगा। डेमो दौरान टीम ने पेट, हृदय (इकोकार्डियोग्राफी), फोकस्ड अस्सेसमेंट विद सोनोग्राफी फॉर ट्रॉमा (FAST), डॉपलर और गर्दन के स्कैन जैसे कई महत्वपूर्ण अल्ट्रासाउंड प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक प्रदर्शित कीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि यह तकनीक लाइव, उच्च गुणवत्ता वाली इमेजिंग और सटीक निदान के स्तर तक पहुंचने में सक्षम है। AIIMS के वरिष्ठ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह नवाचार सिर्फ अंटार्कटिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका उपयोग आपदा प्रभावित क्षेत्रों, ऊँची पहाड़ी चोटियों, समुद्र के विस्तृत हिस्सों, और दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में भी किया जा सकता है, जहाँ विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता अक्सर जीवन-धमकाने वाली स्थिति पैदा करती है। आगे की चुनौतियाँ और संभावनाएँ हालांकि यह तकनीक अब तक के सबसे लंबी दूरी पर टेस्ट की गई रिमोट अल्ट्रासाउंड प्रक्रियाओं में से एक है, शोधकर्ताओं ने कहा है कि व्यावसायिक उपयोग और रोगी सेवाओं में लागू करने से पहले और तकनीकी परिष्करण, नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर सुदृढ़ीकरण और नियामक मंजूरी की दिशा में काम जारी है। इसके बावजूद, यह प्रोटोटाइप स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के तरीके में एक बड़ा परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है।   यह उपलब्धि चिकित्सा और तकनीक के मिलन की एक मिसाल है, जिसमें उच्च अंत रोबोटिक प्रणालियों को वास्तविक-समय स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़कर दुनिया के सबसे दूरस्थ और कठिन इलाकों में भी विशेषज्ञ देखभाल पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। भविष्य में इसके विस्तार से भारत की दूरस्थ स्वास्थ्य सेवा रणनीति को और मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। 

    ईरान–अमेरिका तनाव के बीच वार्ता की पहल, इस्तांबुल में होने वाली बैठक पर टिकी निगाहें

      ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव में संभावित नरमी के संकेत मिल रहे हैं। दोनों देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के बीच इस सप्ताह तुर्किये के इस्तांबुल में बातचीत होने की संभावना है। यह पहल ऐसे समय सामने आई है, जब हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों, कड़े राजनीतिक बयानों और कूटनीतिक टकराव ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने हाल ही में अमेरिका के साथ परमाणु मुद्दे पर वार्ता शुरू करने के निर्देश दिए हैं। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यह बातचीत परमाणु कार्यक्रम के दायरे तक सीमित रहेगी और इसका उद्देश्य कूटनीतिक समाधान तलाशना है। हालांकि, वार्ता की रूपरेखा और विस्तृत एजेंडा को अंतिम रूप दिया जाना अभी बाकी है। सुप्रीम लीडर की चेतावनी और कूटनीतिक संतुलन वार्ता की इस पहल से कुछ दिन पहले ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने अमेरिका को कड़ा संदेश देते हुए कहा था कि किसी भी सैन्य कार्रवाई के गंभीर क्षेत्रीय परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि ईरान दबाव या धमकी के आधार पर बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा। इसके बावजूद, ईरानी नेतृत्व का यह मानना है कि कूटनीति का रास्ता खुला रखना आवश्यक है, ताकि बड़े टकराव से बचा जा सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि उनका देश संवाद के लिए तैयार है, लेकिन यह प्रक्रिया आपसी सम्मान और बिना दबाव के होनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिए कि क्षेत्रीय देश भी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। इस्तांबुल बैठक और क्षेत्रीय भागीदारी सूत्रों के अनुसार, इस्तांबुल में होने वाली बैठक में अमेरिका के विशेष दूत और ईरान के शीर्ष राजनयिक शामिल हो सकते हैं। इस बैठक में कुछ क्षेत्रीय देशों की भागीदारी की भी संभावना जताई जा रही है, जो पहले भी ईरान-अमेरिका के बीच संदेशों के आदान-प्रदान में भूमिका निभा चुके हैं। माना जा रहा है कि खाड़ी क्षेत्र के कुछ देश और अन्य पश्चिम एशियाई राष्ट्र इस प्रक्रिया में सहायक की भूमिका में रह सकते हैं। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि यह बैठक सफल रहती है, तो यह पिछले कई वर्षों में दोनों देशों के बीच सबसे ठोस संवाद प्रयासों में से एक हो सकता है। हालांकि, दोनों पक्षों के बीच अविश्वास का स्तर अभी भी काफी ऊंचा बना हुआ है। सैन्य तैयारियां और सुरक्षा चिंताएं कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर, क्षेत्र में सैन्य तैयारियों की खबरें भी सामने आ रही हैं। इज़राइल और अमेरिका दोनों ही अपनी सुरक्षा तैयारियों को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। इज़राइली सैन्य नेतृत्व ने हाल के दिनों में यह संकेत दिया है कि वह किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अपनी तैयारियों की समीक्षा कर रहा है। वहीं, अमेरिका ने भी पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति दर्शाती है कि बातचीत के साथ-साथ रणनीतिक दबाव भी बना हुआ है, जिससे वार्ता की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। आंतरिक हालात और विरोध प्रदर्शनों की आशंका ईरान के भीतर भी स्थिति पूरी तरह शांत नहीं है। हाल के महीनों में हुए विरोध प्रदर्शनों और सख्त सरकारी कार्रवाई के बाद, ईरानी नेतृत्व को आंतरिक असंतोष की चिंता सता रही है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, किसी भी बाहरी सैन्य दबाव या हमले से देश के भीतर फिर से विरोध तेज हो सकता है। इसी कारण, ईरान के लिए यह कूटनीतिक पहल केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि घरेलू स्थिरता के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। यूरोप, रूस और अन्य देशों की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में यूरोपीय देशों, रूस और अन्य वैश्विक शक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। रूस ने संकेत दिए हैं कि वह ईरान से जुड़े परमाणु विवाद को सुलझाने में सहयोग देने को तैयार है। वहीं, कुछ यूरोपीय देशों ने ईरान के आंतरिक हालात को लेकर सख्त रुख अपनाया है, जिससे कूटनीतिक समीकरण और जटिल हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि इस्तांबुल की प्रस्तावित बैठक केवल औपचारिक संवाद तक सीमित रहती है या वास्तव में किसी ठोस समझौते की दिशा में आगे बढ़ती है। आगे की राह फिलहाल, ईरान और अमेरिका दोनों ही सार्वजनिक रूप से यह कह रहे हैं कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन अपनी-अपनी शर्तों से पीछे हटने को भी तैयार नहीं दिखते। ऐसे में वार्ता की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष कितनी लचीलापन दिखाते हैं और क्षेत्रीय मध्यस्थ किस हद तक विश्वास बहाली में मदद कर पाते हैं। दुनिया की निगाहें अब इस्तांबुल में होने वाली संभावित बैठक पर टिकी हैं, जिसे पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।    

    कनाडा में उगाही से जुड़े फायरिंग मामले में तीन भारतीय गिरफ्तार, एक नाबालिग भी शामिल

    ओटावा/सरे (कनाडा)। कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के सरे शहर में उगाही के उद्देश्य से एक आवास पर गोलीबारी के मामले में तीन भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें एक किशोर भी शामिल है। पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें हिरासत में भेज दिया है। पुलिस के अनुसार, रविवार तड़के करीब चार बजे सरे इलाके में गश्त के दौरान एक घर के बाहर गोली चलने और हल्की आग लगने की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंची पुलिस टीमों ने आसपास संदिग्ध वाहन को देखा, जिसके सवार मौके से पैदल फरार हो गए। कुछ ही देर बाद तीनों संदिग्धों को एक राइडशेयर वाहन में सवार होने के दौरान हिरासत में ले लिया गया। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान 21 वर्षीय हरजोत सिंह, 19 वर्षीय तरनवीर सिंह और 21 वर्षीय दयाजीत सिंह बिलिंग के रूप में हुई है। तीनों पर एक आवासीय स्थान पर गोली चलाने का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने बताया कि सभी आरोपियों को शुक्रवार तक न्यायिक हिरासत में रखा गया है। विदेशी नागरिक होने के कारण इस मामले में कनाडा बॉर्डर सर्विसेज एजेंसी (CBSA) को भी सूचित किया गया है। पुलिस ने बताया कि फायरिंग की घटना के दौरान घर में लोग मौजूद थे, हालांकि किसी के घायल होने की सूचना नहीं है। आग को समय रहते बुझा लिया गया, लेकिन गोलीबारी से आवास को नुकसान पहुंचा है। मामले की जांच अब सरे पुलिस सेवा की मेजर क्राइम शाखा कर रही है। यह कार्रवाई ‘प्रोजेक्ट एश्योरेंस’ के तहत की जा रही गश्त का हिस्सा थी, जिसे हाल के महीनों में सरे और लोअर मेनलैंड क्षेत्र में उगाही से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी के बाद शुरू किया गया है। उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह भी इसी इलाके में उगाही से जुड़े एक अन्य गोलीबारी मामले में दो भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया था।   कनाडाई पुलिस का कहना है कि उगाही और संगठित अपराध से जुड़े मामलों पर सख्ती से कार्रवाई जारी रहेगी और ऐसे अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया जाएगा।

    दिल्ली की दमघोंटू हवा पर टकराते सरकारी दावे: क्या वायु प्रदूषण से हो रही हैं मौतें?

      दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। हर सर्दी में बढ़ता स्मॉग, सांस की बीमारियां और अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या आम तस्वीर बन चुकी है। लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल फिर से चर्चा में है—क्या भारत में वायु प्रदूषण सीधे तौर पर लोगों की मौत का कारण बन रहा है? इस सवाल पर केंद्र सरकार और देश की शीर्ष चिकित्सा अनुसंधान संस्था के बयानों में स्पष्ट अंतर सामने आया है। संसद में सरकार का रुख हाल ही में संसद में दिए गए एक लिखित जवाब में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कहा कि देश में ऐसा कोई निर्णायक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो वायु प्रदूषण और मौतों के बीच सीधा संबंध स्थापित करता हो। यह जवाब राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP), पुरानी श्वसन बीमारियों और प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट मानने से जुड़े सवालों के संदर्भ में दिया गया। मंत्रालय ने यह भी कहा कि स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लागू होने के बाद कई शहरों में पीएम10 जैसे कणों के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे वायु गुणवत्ता में कुछ सुधार का संकेत मिलता है। ICMR के आंकड़े कुछ और कहते हैं हालांकि, सरकार का यह रुख स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के आंकड़ों से मेल नहीं खाता। हाल ही में एक सूचना के अधिकार (RTI) के तहत ICMR ने बताया कि 2017 में भारत में लगभग 12.4 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं, जो उस वर्ष हुई कुल मौतों का करीब 12.5 प्रतिशत है। ICMR के अनुसार, यह अनुमान देशव्यापी वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय शोध संगठनों के सहयोग से किया गया था। परिषद ने स्पष्ट किया कि ये आंकड़े अनुमान मात्र नहीं, बल्कि मॉडलिंग आधारित वैज्ञानिक शोध से निकाले गए हैं। वैश्विक अध्ययनों की चेतावनी इन निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिलता है। वैश्विक रोग भार अध्ययन (Global Burden of Disease Study) के तहत प्रकाशित शोध में कहा गया है कि भारत में वायु प्रदूषण—चाहे वह बाहरी वातावरण का हो या घरों के भीतर का—कम उम्र में होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण है। इस अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण से जुड़ी आधे से अधिक मौतें 70 वर्ष से कम आयु के लोगों में हुईं। दिल्ली के आंकड़े भी चिंताजनक दिल्ली के स्थानीय आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, राजधानी में श्वसन रोगों से होने वाली मौतों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। जहां 2022 में यह संख्या 7,432 थी, वहीं 2024 में बढ़कर 9,211 तक पहुंच गई। हालांकि, हृदय और रक्त संचार से जुड़ी बीमारियां अब भी मौतों का सबसे बड़ा कारण बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की राय वैश्विक मंचों पर भी भारत की प्रदूषण समस्या पर चिंता जताई जा रही है। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सम्मेलन में कहा गया कि वायु प्रदूषण भारत के लिए व्यापारिक चुनौतियों से भी बड़ा संकट है। विश्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया गया कि भारत में हर साल लगभग 17 लाख मौतें प्रदूषण से जुड़ी मानी जाती हैं। नीति और स्वास्थ्य के बीच दूरी विशेषज्ञों का मानना है कि नीति-निर्माण और स्वास्थ्य शोध के बीच यह अंतर चिंताजनक है। एक ओर जहां सरकारी स्तर पर सीधा संबंध स्थापित न होने की बात कही जा रही है, वहीं स्वास्थ्य संस्थानों और वैश्विक अध्ययनों में वायु प्रदूषण को एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम माना जा रहा है। आगे की राह जैसे-जैसे देश के बड़े शहरों में वायु गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, यह बहस और तेज होती जा रही है कि प्रदूषण को किस स्तर की प्राथमिकता दी जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि आंकड़ों और नीतियों के बीच बेहतर तालमेल, पारदर्शी शोध और ठोस कदमों के बिना इस समस्या से निपटना मुश्किल होगा। वायु प्रदूषण को लेकर बढ़ती बीमारियां और मौतों के अनुमान यह संकेत देते हैं कि यह सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य का मुद्दा बन चुका है—जिस पर स्पष्ट और एकजुट रुख की आवश्यकता है।    

    दिल्ली मौसम अपडेट: चार साल की सबसे ठंडी फरवरी, घने कोहरे पर IMD का येलो अलर्ट

      दिल्ली में मंगलवार (3 फरवरी) को लगातार दूसरे दिन घना कोहरा छाया रहा, जिससे राजधानी के कई इलाकों में दृश्यता बेहद कम हो गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने दिल्ली-एनसीआर के लिए घने से बहुत घने कोहरे का येलो अलर्ट जारी किया है। ठंड, तेज हवाओं और हल्की बारिश की संभावना ने ठिठुरन और बढ़ा दी है। सोमवार को दिल्ली ने पिछले चार वर्षों की सबसे ठंडी फरवरी दर्ज की। सफदरजंग मौसम केंद्र पर अधिकतम तापमान 17.5 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से 4.8 डिग्री कम है और 3 फरवरी 2022 के बाद फरवरी का सबसे कम अधिकतम तापमान है। दृश्यता बेहद कम सुबह के समय पालम और सफदरजंग जैसे इलाकों में दृश्यता सिर्फ 100 मीटर तक गिर गई, जिससे सड़क यातायात प्रभावित हुआ और आवागमन धीमा रहा। शुरुआती घंटों में उड़ानों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है। बारिश और बादल IMD के अनुसार, सुबह के समय हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है और दिनभर आसमान में बादल छाए रहने की संभावना है। बारिश और बादलों के कारण ठंड का असर और तेज महसूस होगा। तापमान की बात करें तो अधिकतम 19–21 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 7–9 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने का अनुमान है। नमी बढ़ने और धूप कम रहने से दिनभर ठंड बनी रह सकती है। तेज हवाओं की चेतावनी मौसम विभाग ने उत्तर-पश्चिम दिशा से 55–60 किमी/घंटा की रफ्तार से चलने वाली तेज सतही हवाओं की भी चेतावनी दी है, जिससे वास्तविक तापमान से अधिक ठंड महसूस हो सकती है। वायु गुणवत्ता ‘खराब’ मौसम की मार के साथ-साथ दिल्ली की हवा की गुणवत्ता (AQI) भी चिंता का विषय बनी हुई है। सोमवार को औसत AQI 210 रहा, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। प्रदूषण में स्थानीय स्रोतों की बड़ी भूमिका बताई गई है—जिसमें परिवहन क्षेत्र का योगदान 12.2% रहा। औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण गतिविधियों ने भी प्रदूषण बढ़ाया। पड़ोसी जिलों झज्जर, सोनीपत और गाजियाबाद से आने वाले प्रदूषकों ने स्थिति को और बिगाड़ा है। अनुमान है कि 4 फरवरी तक AQI ‘खराब’ रहेगा, जबकि 5 फरवरी से ‘मध्यम’ श्रेणी में सुधार की संभावना है। सावधानी की सलाह घने कोहरे और कम दृश्यता को देखते हुए प्रशासन ने यात्रियों से सावधानी बरतने, खासकर वाहन चलाते समय अतिरिक्त सतर्कता रखने की अपील की है।    

    भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से शेयर बाजार में जोरदार तेजी, रिलायंस और निर्यात क्षेत्र चमके

      भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते के बाद मंगलवार को घरेलू शेयर बाजार में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। निवेशकों के भरोसे में सुधार और वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होने के संकेतों के बीच प्रमुख सूचकांक रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब पहुंच गए। शुरुआती कारोबार में बाजार में आई इस तेजी को बीते पांच वर्षों की सबसे बड़ी इंट्रा-डे छलांग के रूप में देखा जा रहा है। सुबह के सत्र में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 करीब तीन प्रतिशत की बढ़त के साथ 25,800 के स्तर के आसपास कारोबार करता दिखा, जबकि बीएसई सेंसेक्स भी लगभग इतने ही प्रतिशत उछलकर 84,000 के करीब पहुंच गया। बाजार खुलते ही खरीदारी का जोर देखने को मिला, जिससे सभी प्रमुख सेक्टर हरे निशान में चले गए। रिलायंस और निर्यात आधारित शेयरों में मजबूत उछाल इस तेजी का नेतृत्व रिलायंस इंडस्ट्रीज ने किया, जो दोनों प्रमुख सूचकांकों में सबसे ज्यादा बढ़ने वाला शेयर रहा। कंपनी के शेयरों में करीब चार प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई। इसके अलावा ऑटो कंपोनेंट्स, टेक्सटाइल, परिधान, सीफूड, इंजीनियरिंग गुड्स और स्पेशियलिटी केमिकल्स जैसे निर्यात से जुड़े क्षेत्रों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते ने लंबे समय से बने एक बड़े अनिश्चितता के बादल को हटा दिया है, जिसका असर सीधे तौर पर निर्यात-उन्मुख कंपनियों की आय संभावनाओं पर पड़ता है। सभी सेक्टरों में बढ़त, मिडकैप और स्मॉलकैप भी मजबूत कारोबार के शुरुआती घंटों में बाजार के सभी 16 प्रमुख सेक्टरों में बढ़त दर्ज की गई। न केवल बड़े शेयरों में, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी लगभग तीन प्रतिशत तक की तेजी देखी गई। निफ्टी 50 के 50 में से 46 शेयरों में मजबूती दर्ज की गई, जो बाजार की व्यापक सकारात्मक धारणा को दर्शाता है। विश्लेषकों के अनुसार, यह तेजी केवल कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बाजार में व्यापक आधार पर खरीदारी देखने को मिली। रुपये में मजबूती, विदेशी निवेश की उम्मीद शेयर बाजार की तेजी के साथ-साथ भारतीय रुपये में भी मजबूती आई। शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक प्रतिशत से अधिक मजबूत होकर 90.34 के स्तर तक पहुंच गया। माना जा रहा है कि व्यापार समझौते के बाद विदेशी निवेशकों का भरोसा लौट सकता है और भारत में पूंजी प्रवाह बढ़ने की संभावना है। पिछले एक साल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा लगातार बिकवाली के कारण बाजार पर दबाव बना हुआ था। आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की शुरुआत से अब तक विदेशी निवेशकों ने करीब 23 अरब डॉलर के शेयरों की बिक्री की थी, जिससे भारतीय बाजार एशियाई और अन्य उभरते बाजारों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन कर रहा था। व्यापार समझौते के प्रमुख संकेत इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत और अमेरिका के बीच घोषित व्यापार समझौता है। इस समझौते के तहत अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर लगने वाले शुल्क में बड़ी कटौती की गई है। बदले में भारत ने कुछ रणनीतिक और व्यापारिक कदम उठाने पर सहमति जताई है। हालांकि, सरकार की ओर से इस समझौते के सभी ब्योरे अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। बाजार जानकारों का कहना है कि शुल्क में कटौती से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी, जिससे आने वाले समय में उनकी आय और मुनाफे की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। निवेशकों का भरोसा और वैल्यूएशन में सुधार की उम्मीद एक प्रमुख ब्रोकरेज फर्म के रिसर्च प्रमुख के अनुसार, यह व्यापार समझौता शेयर बाजार के लिए कई मायनों में सकारात्मक है। इससे न केवल कंपनियों की कमाई को लेकर स्पष्टता बढ़ेगी, बल्कि खासतौर पर निर्यात और पूंजीगत खर्च से जुड़े क्षेत्रों में वैल्यूएशन में सुधार की संभावना बनेगी। साथ ही, उभरते बाजारों के बीच भारत को अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश गंतव्य के रूप में देखा जा सकता है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अब तक विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे व्यापार समझौते में देरी, नई तकनीकी थीम्स में सीमित हिस्सेदारी और कमजोर तिमाही नतीजे जैसे कारण रहे हैं। मौजूदा समझौता इन चिंताओं को काफी हद तक कम कर सकता है। आगे की राह हालांकि बाजार की मौजूदा तेजी ने निवेशकों को राहत दी है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक संकेत, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी ब्याज दरों की दिशा और घरेलू आर्थिक आंकड़े बाजार की चाल तय करेंगे। इसके बावजूद, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बनी सकारात्मक धारणा ने फिलहाल बाजार का रुख मजबूती की ओर मोड़ दिया है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि क्या यह तेजी टिकाऊ साबित होती है और क्या विदेशी निवेश वाकई भारतीय बाजार में वापस लौटता है। फिलहाल, बाजार ने साफ संकेत दिया है कि किसी बड़े वैश्विक समझौते का भरोसे पर कितना गहरा असर पड़ सकता है।    

    भारत को तेल खरीदने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: अमेरिकी दबाव के दावों पर पी. चिदंबरम

      कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सोमवार को कहा कि भारत को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए किसी भी देश से तेल खरीदने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों के बाद भारत के कच्चे तेल आयात को लेकर नई बहस छिड़ गई है। पी. चिदंबरम ने संकेत दिया कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीद में आई तेज गिरावट के पीछे अमेरिका की ओर से दबाव एक प्रमुख कारण हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच इस विषय पर किसी भी प्रकार की आपसी समझ या कूटनीतिक बातचीत की पूरी जानकारी केवल विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को ही होगी। रूस से तेल आयात में गिरावट पर सवाल मीडिया से बातचीत के दौरान चिदंबरम ने कहा कि भारत जैसे बड़े और उभरते हुए देश को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ऊर्जा संसाधनों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए।उन्होंने कहा, “भारत को जहां भी उचित कीमत और शर्तों पर तेल उपलब्ध हो, वहां से खरीदने में सक्षम होना चाहिए। वह रूस हो, वेनेजुएला हो या कोई और देश।” पूर्व वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में रूस से भारत के तेल आयात में जो कमी देखी गई है, वह सामान्य बाजार कारणों से अधिक राजनीतिक दबाव का परिणाम प्रतीत होती है।“हमने देखा कि अमेरिका की धमकी या दबाव के बाद रूस से तेल की खरीद में तेज गिरावट आई,” उन्होंने कहा। वेनेजुएला से तेल खरीदने की संभावना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यह दावा किए जाने के बाद कि भारत ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चिदंबरम ने कहा कि यदि वेनेजुएला से उचित कीमत पर तेल मिल सकता है, तो उस विकल्प पर विचार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि वेनेजुएला से तेल खरीदना कूटनीतिक और व्यावहारिक दृष्टि से जटिल हो सकता है।“इसमें कोई अड़चन या अंतरराष्ट्रीय जटिलता है या नहीं, यह केवल विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री ही बेहतर तरीके से जानते होंगे,” उन्होंने कहा। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों पर प्रतिक्रिया डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अमेरिका में संवाददाताओं से बातचीत में कहा था कि भारत ईरान से तेल खरीदने के बजाय वेनेजुएला की ओर रुख कर रहा है और इसे एक तरह की ‘डील’ का हिस्सा बताया था। भारत सरकार की ओर से अब तक इन बयानों की कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं किया गया है। इससे पहले, बजट के बाद एक प्रेस वार्ता में जब चिदंबरम से पूछा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की ओर से ऐसे बयान क्यों दे रहे हैं, तो उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति के प्रवक्ता नहीं हैं और उनसे भारतीय बजट से जुड़े सवाल पूछे जाने चाहिए। सरकार की चुप्पी और बढ़ती अटकलें फिलहाल, केंद्र सरकार की ओर से इस पूरे मामले पर कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। न तो रूस से तेल आयात में कमी के कारणों पर और न ही वेनेजुएला से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दावों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया दी गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है और उसकी नीति हमेशा विविध स्रोतों से तेल खरीदने की रही है, ताकि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न बने। तेल खरीद के फैसले आमतौर पर कीमत, आपूर्ति की स्थिरता, परिवहन लागत और दीर्घकालिक समझौतों पर आधारित होते हैं। रणनीतिक स्वायत्तता पर बहस पी. चिदंबरम के बयान के बाद एक बार फिर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष का कहना है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने आर्थिक और ऊर्जा संबंधी फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए। वहीं, सरकार समर्थक विश्लेषकों का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में भारत को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है, जहां कूटनीति, व्यापार और सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में यदि सरकार इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट करती है, तो कई अटकलों पर विराम लग सकता है। फिलहाल, भारत की तेल आयात नीति और अमेरिका के साथ उसके ऊर्जा संबंधों पर सभी की नजर बनी हुई है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक तेल बाजार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है।    

    पाकिस्तान का दावा: 48 घंटे में 177 Baloch militant ढेर, दशकों का सबसे बड़ा सुरक्षा अभियान

      पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने दावा किया है कि बलूचिस्तान में चलाए गए व्यापक सैन्य अभियान के दौरान महज़ 48 घंटों में 177 Baloch militant को मार गिराया गया। अधिकारियों के मुताबिक, यह पिछले कई दशकों में किसी एक चरण में मारे गए बलूच उग्रवादियों की सबसे बड़ी संख्या है। यह कार्रवाई ऐसे समय पर सामने आई है जब हाल के महीनों में सुरक्षा बलों, चीनी परियोजनाओं, सैन्य काफ़िलों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर हमलों में तेज़ी देखी गई थी। सरकारी बयान में कहा गया है कि अभियान का उद्देश्य Baloch militant नेटवर्क को निर्णायक झटका देना और क्षेत्र में बढ़ती हिंसा पर काबू पाना था। हालांकि, स्वतंत्र स्रोतों से इन आंकड़ों की पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है, और यही बात इस बड़े दावे को लेकर सवाल भी खड़े कर रही है।   बलूचिस्तान में Baloch militant के खिलाफ कार्रवाई क्यों तेज़ हुई सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यह ऑपरेशन पाकिस्तानी सेना, फ्रंटियर कोर और अन्य अर्धसैनिक बलों की संयुक्त कार्रवाई के तहत किया गया। खुफिया सूचनाओं के आधार पर एक साथ कई इलाकों में छापेमारी की गई, जिसमें ड्रोन निगरानी, हवाई सहायता और ज़मीनी घेराबंदी की रणनीति अपनाई गई। अधिकारियों का दावा है कि इस दौरान Baloch militant के ठिकानों, हथियार डिपो, संचार नेटवर्क और कथित प्रशिक्षण शिविरों को निशाना बनाया गया। Balochistan लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन और सुरक्षा अभियानों का केंद्र रहा है। प्राकृतिक गैस, खनिज संसाधनों और रणनीतिक महत्व के बावजूद यह प्रांत विकास, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे को लेकर असंतोष से जूझता रहा है। बलूच समूह इन्हीं मुद्दों को लेकर दशकों से संघर्ष का दावा करते आए हैं, जबकि पाकिस्तान सरकार का कहना है कि ये समूह हिंसा के ज़रिये राज्य की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं।   बड़े ऑपरेशन के बाद सुरक्षा, मानवाधिकार और राजनीति की चुनौती इतनी बड़ी संख्या में Baloch militant के मारे जाने के दावे के बाद मानवाधिकार संगठनों ने अभियान की पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की मांग दोहराई है। उनका तर्क है कि बड़े सैन्य अभियानों में अक्सर नागरिक हताहतों, जबरन ग़ायब किए जाने और सामूहिक सज़ा जैसी चिंताओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वहीं, सरकार का कहना है कि कार्रवाई पूरी तरह लक्षित थी और आम नागरिकों को नुकसान से बचाने के लिए विशेष सावधानियाँ बरती गईं। विश्लेषकों का मानना है कि यह ऑपरेशन अल्पकाल में Baloch militant नेटवर्क को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है और सुरक्षा बलों को रणनीतिक बढ़त दिला सकता है। लेकिन वे यह भी चेतावनी देते हैं कि केवल सैन्य कार्रवाई से बलूचिस्तान में स्थायी शांति संभव नहीं है। राजनीतिक संवाद, आर्थिक विकास, स्थानीय नेतृत्व की भागीदारी और भरोसे की बहाली के बिना यह आशंका बनी रहेगी कि हिंसा किसी नए रूप में दोबारा उभर सकती है। आगे की रणनीति को लेकर अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि सुरक्षा अभियान के बाद प्रभावित इलाकों में प्रशासनिक मौजूदगी बढ़ाई जाएगी और विकास कार्यों को तेज़ करने की कोशिश की जाएगी। सवाल यह है कि क्या यह बड़ा सैन्य ऑपरेशन वास्तव में Baloch militant आंदोलन की दिशा बदल पाएगा, या फिर यह लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के एक और अध्याय के रूप में दर्ज होकर रह जाएगा।   Frequently Asked Questions 1 पाकिस्तानी सेना क्या है? उत्तर: पाकिस्तानी सेना पाकिस्तान की थल सेना है, जो देश की सीमाओं की रक्षा, आंतरिक सुरक्षा और आपदा राहत जैसे कार्यों की ज़िम्मेदारी निभाती है। 2 पाकिस्तानी सेना की स्थापना कब हुई? उत्तर: पाकिस्तानी सेना की स्थापना 14 अगस्त 1947 को हुई, जब भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश बना। 3 पाकिस्तानी सेना का सर्वोच्च कमांडर कौन होता है? उत्तर: संवैधानिक रूप से पाकिस्तान के राष्ट्रपति पाकिस्तानी सेना के सर्वोच्च कमांडर होते हैं, जबकि सेना का संचालन सेना प्रमुख (चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ) करते हैं। 4 पाकिस्तानी सेना की भूमिका राजनीति में क्यों चर्चा में रहती है? उत्तर: पाकिस्तान के इतिहास में सेना ने कई बार राजनीतिक हस्तक्षेप किया है, जिसके कारण वह देश की राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में देखी जाती है। 5 पाकिस्तानी सेना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किन अभियानों में शामिल रही है?   उत्तर: पाकिस्तानी सेना संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भाग लेती रही है और सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों तथा आपदा राहत कार्यों में भी सक्रिय रही है।

    तस्वीरों में नहीं, मीम्स में दिखा बजट 2026 का असली असर

        रविवार को जैसे ही वित्त मंत्री ने बजट 2026 पेश करने के लिए बोलना शुरू किया, वैसे ही सोशल मीडिया खासतौर पर X (पूर्व ट्विटर) पर मीम्स की बाढ़ आ गई। बजट के भाषण से पहले जो उम्मीदें थीं, वे मिनटों में मिडिल क्लास की निराशा, ट्रेडर्स की हताशा और आम आदमी की व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया में बदल गईं। इस बार बजट सिर्फ़ एक आर्थिक दस्तावेज़ नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा डिजिटल इवेंट बन गया, जिसे लोगों ने मीम्स और फिल्मी डायलॉग्स के ज़रिये समझा और साझा किया।    मिडिल क्लास का दर्द, फिल्मी डायलॉग्स में तब्दील बजट 2026 मीम्स का सबसे बड़ा निशाना बना सैलरीड मिडिल क्लास। टैक्स में बड़ी राहत न मिलने पर इंटरनेट यूज़र्स ने सीधे-सादे शब्दों के बजाय सटीक व्यंग्य चुना।वेब सीरीज़ पंचायत का दृश्य “आपके फंड से थोड़ा पैसा मिल जाता तो बढ़िया हो जाता” इस बार मिडिल क्लास की सामूहिक भावना बन गया। इसी तरह, कौन बनेगा करोड़पति का मशहूर डायलॉग “मेरी तरफ मत देखिए, मैं आपकी कोई सहायता नहीं कर पाऊंगा” मीम्स के ज़रिये टैक्सपेयर्स पर चस्पा कर दिया गया।इन मीम्स ने यह साफ कर दिया कि बजट 2026 पर सोशल मीडिया मीम्स केवल मज़ाक नहीं, बल्कि आम लोगों की हताश उम्मीदों की आवाज़ हैं।   उम्मीद बनाम हकीकत: सोशल मीडिया का पसंदीदा थी कई मिडिल क्लास परिवारों के लिए बजट 2026 इसलिए भी सबसे निराशाजनक माना जा रहा है क्योंकि इसमें उनकी रोज़मर्रा की तीन बड़ी उम्मीदों पर कोई ठोस राहत नहीं दिखी।   पहला, सैलरीड टैक्सपेयर्स के लिए आयकर स्लैब या स्टैंडर्ड डिडक्शन में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया, जबकि महँगाई लगातार बढ़ रही है।   दूसरा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे ज़रूरी खर्चों पर कोई नई टैक्स छूट या सब्सिडी नहीं दी गई, जबकि यही दो मदें मिडिल क्लास के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा होती हैं।   तीसरा, ट्रेडिंग और निवेश से जुड़े टैक्स बढ़ने से वह वर्ग भी प्रभावित हुआ है जो अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए बाज़ार पर निर्भर करता है। इन तीन वजहों ने मिलकर मिडिल क्लास के बीच यह धारणा मजबूत कर दी है कि बजट 2026 उनकी आर्थिक हकीकत से कटा हुआ है।     ट्रेडर्स और निवेशक: “बजट ने सबको बराबर कर दिया” बजट में फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर बढ़े टैक्स ने ट्रेडिंग कम्युनिटी को भी नाराज़ कर दिया।डे-ट्रेडर्स के दर्द को दिखाने वाले मीम्स में इसे “चार गुना लगान” कहा गया, तो कहीं पुष्पा के डायलॉग के साथ यह जताया गया कि अब कई रिटेल निवेशक बाज़ार से बाहर होने का मन बना रहे हैं।   एक वायरल स्प्लिट-स्क्रीन मीम में इंट्राडे ट्रेडर, लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर और नए निवेशक तीनों के चेहरे पर एक-सी मायूसी थी। कैप्शन था: “बजट 2026 ने सबको बराबर कर दिया।” यही मीम्स बता रहे थे कि बजट 2026 पर ट्रेडर्स की प्रतिक्रिया कितनी तीखी और भावनात्मक रही।     जब बजट बना सांस्कृतिक पल सिर्फ़ टैक्स ही नहीं, सिगरेट की कीमतों से लेकर घरेलू बचत तक हर मुद्दा मीम्स में बदल गया। किसी ने बजट भाषणों की लंबाई की तुलना सेविंग्स से कर दी, तो किसी ने जटिल शब्दावली पर पैरोडी एक्सप्लेनर बना डाले। #Budget2026 और #MiddleClassMeme जैसे हैशटैग्स ट्रेंड करते रहे और सोशल मीडिया ने अपना फैसला सुना दिया  यह बजट लोगों ने चार्ट्स में नहीं, मीम्स में समझा।    निष्कर्ष: मीम्स बने जनता की भाषा बजट 2026 ने एक बार फिर साबित किया कि आज के भारत में आर्थिक फैसलों की असली प्रतिक्रिया सिर्फ़ टीवी डिबेट्स में नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखती है।मीम्स ने इस बार आर्थिक शब्दावली को आम भाषा में बदला और निराशा को सामूहिक हास्य में ढाल दिया। शायद यही वजह है कि बजट 2026 को लोग आंकड़ों से कम, और मीम्स से ज़्यादा याद रखेंगे।   Frequently Asked Questions 1 बजट मिडिल क्लास को सबसे ज़्यादा क्यों प्रभावित करता है? उत्तर: मिडिल क्लास की आमदनी का बड़ा हिस्सा सैलरी से आता है और उस पर सीधा टैक्स लगता है। जब बजट में आयकर छूट, टैक्स स्लैब या महँगाई से राहत नहीं मिलती, तो इसका सीधा असर मिडिल क्लास की जेब पर पड़ता है। 2 बजट में टैक्स राहत न मिलने से मिडिल क्लास क्यों नाराज़ होती है? उत्तर: मिडिल क्लास पहले से ही महँगाई, ईएमआई, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्चों से जूझ रही होती है। ऐसे में बजट से टैक्स राहत की उम्मीद रहती है। जब यह उम्मीद पूरी नहीं होती, तो असंतोष और निराशा स्वाभाविक है। 3 ट्रेडिंग और निवेश से जुड़े फैसले मिडिल क्लास को कैसे प्रभावित करते हैं? उत्तर: आज बड़ी संख्या में मिडिल क्लास लोग शेयर बाज़ार और ट्रेडिंग से अतिरिक्त आमदनी की कोशिश करते हैं। जब बजट में ट्रेडिंग टैक्स बढ़ते हैं या नियम सख़्त होते हैं, तो मिडिल क्लास की निवेश क्षमता प्रभावित होती है। 4 महँगाई और रोज़मर्रा की चीज़ों पर बजट का क्या असर पड़ता है? उत्तर: बजट में अप्रत्यक्ष टैक्स और सब्सिडी से जुड़े फैसले रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमत तय करते हैं। अगर इन पर राहत नहीं मिलती, तो मिडिल क्लास का मासिक बजट बिगड़ जाता है। 5 बजट पर मिडिल क्लास अपनी नाराज़गी मीम्स के ज़रिये क्यों दिखाती है? उत्तर: मीम्स मिडिल क्लास के लिए अपनी बात कहने का सबसे तेज़ और आसान तरीका बन चुके हैं। ये मीम्स निराशा, उम्मीद और व्यंग्य को एक साथ दिखाते हैं, जिससे बजट की प्रतिक्रिया सामूहिक और सांस्कृतिक रूप ले लेती है।

    नए वर्गीकरण से अरावली पर्वतमाला का 31.8% हिस्सा पारिस्थितिक खतरे में: संरक्षण समूह

    जयपुर। केंद्र सरकार द्वारा पहाड़ियों की कानूनी परिभाषा में हालिया बदलाव के बाद अरावली पर्वतमाला का एक बड़ा हिस्सा पारिस्थितिक जोखिम में आ गया है। एक जन-आधारित संरक्षण समूह ने उपग्रह आधारित अध्ययन का हवाला देते हुए दावा किया है कि अरावली क्षेत्र का लगभग 31.8 प्रतिशत हिस्सा पर्यावरणीय खतरे की श्रेणी में आ चुका है। यह जानकारी सोमवार को जयपुर में सामने रखी गई। संरक्षण समूह ‘वी आर अरावली’ (We Are Aravalli) के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर तय किए जाने के बाद बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्र कानूनी संरक्षण से बाहर हो गए हैं, जो भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक रूप से अरावली श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा हैं। समूह का कहना है कि इस वर्गीकरण ने न केवल पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर किया है, बल्कि खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों के लिए रास्ता भी खोल दिया है। समूह ने अरावली पर्वतमाला में खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनका तर्क है कि अरावली न केवल उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करती है, बल्कि यह भूजल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन में भी अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में इसके किसी भी हिस्से को कानूनी सुरक्षा से बाहर करना दूरगामी नुकसान पहुंचा सकता है। संरक्षण समूह ने केंद्र सरकार के उस आकलन पर भी सवाल उठाए हैं, जिसमें प्रभावित क्षेत्र को केवल 0.19 प्रतिशत बताया गया है। ‘वी आर अरावली’ का कहना है कि यह आंकड़ा अरावली पर्वतमाला की वास्तविक भूवैज्ञानिक संरचना को सही ढंग से नहीं दर्शाता। समूह के अनुसार, उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक मानकों पर आधारित विश्लेषण स्पष्ट रूप से बताता है कि जोखिम का दायरा सरकारी आकलन से कहीं अधिक व्यापक है। इस बीच, अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपने पूर्व निर्देशों को स्थगित कर दिया है। अदालत के इस कदम को लेकर भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं की नजर बनी हुई है। उनका मानना है कि जब तक स्पष्ट और व्यापक परिभाषा तय नहीं होती, तब तक अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और भूमि उपयोग में बदलाव जैसी गतिविधियों को रोकना मुश्किल रहेगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और इसका पारिस्थितिक महत्व बेहद संवेदनशील है। राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक फैली यह श्रृंखला रेगिस्तान के विस्तार को रोकने में भी सहायक मानी जाती है। इसके कमजोर होने से न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी, बल्कि क्षेत्रीय जलवायु पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। संरक्षण समूह ने मांग की है कि अरावली पर्वतमाला को पूरी तरह “संरक्षित क्षेत्र” घोषित किया जाए और पहाड़ियों व पर्वतों के बीच ऊंचाई के आधार पर किए गए किसी भी तरह के भेद को समाप्त किया जाए। समूह का कहना है कि प्रकृति को मानव-निर्धारित मापदंडों में बांधना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।   फिलहाल, यह मुद्दा नीति निर्धारकों, न्यायपालिका और पर्यावरण संगठनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह अरावली पर्वतमाला के भविष्य और उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।