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    आशीष दुसाद के चोमू के सभापति बनने पर अशोक विहार मे खुशी की लहर

    आशीष दुसाद ने चोमू के सभापति बनने पर मन्दिर मे ईश्वर से आशीर्वाद लिया एवं अपने पिता गोविंद दुसाद एवं परिजनों तथा चोमू की देव तुल्य जनता से भी आशीर्वाद लिया! ​आशीष दुसाद को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा चोमू नगर परिषद के प्रथम पूर्ण कालिक नगर परिषद सभापति बनाए जाने पर अशोक विहार वार्ड नंबर 22 के निवासियों ने हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं दी है! सभी ने आशा जताई है कि जिस प्रकार से आशीष दुसाद ने पूर्व मे चोमू नगरपालिका का अध्यक्ष रहते हुए ​आपका पूर्व कार्यकाल विकास और जनसेवा की दृष्टि से अत्यंत सराहनीय व ऐतिहासिक रहा। आपने सदैव शोषित, पीड़ित, वंचित और गरीब वर्ग के अधिकारों व कल्याण के लिए आगे आकर कार्य किया है। समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक विकास और सहायता पहुँचाना ही आपकी प्राथमिक कार्यशैली रही है। उसी क्रम मे ​आपके उसी सेवाभाव, अटूट निष्ठा और कुशल नेतृत्व पर पार्टी और जनता ने एक बार फिर विश्वास जताया है और आप को सभापति बनाया है! साथ ही वार्ड 22 एवं चोमू की जनता को आप पर पूर्ण विश्वास है कि आपके नेतृत्व में नगर परिषद क्षेत्र में विकास की गति और भी तीव्र होगी तथा हर वर्ग को मान-सम्मान मिलेगा। आशीष दुसाद के चोमू के सभापति बनने पर ​राजस्थाय प्रदेश के मुख्य प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक रामलाल शर्मा, सभी बीजेपी के पार्षद, चोमू के सभी व्यापार मंडल, धर्म एवं समाज के संस्थान के पदाधिकारी एवं सदस्य इसके साथ ही डॉ ओम प्रकाश धमोड, राजेन्द्र अग्रवाल, राधेश्याम अग्रवाल, श्रवण कामदार, सांवरमल बजाज, शंकरलाल अग्रवाल KD, राम कृष्ण दुसाद, नवल किशोर रावत, अशोक बंसल, दामोदर प्रसाद रावत, महेश कासलीवाल, भुवनेश तिवाड़ी, बनवारी लाल शर्मा, मनीष शर्मा, मनीष जांगिड़, नारायण महेश्वरी, प्रोफेसर रमेश रावत, कैलाश झलानी, नेनेश प्रधान, दिनेश खेमावाला, मनीष दीक्षित, सुरेश रावत, विशन रावत, देवकी नंदन अगरवाल, किशन रावत, नितिन अगरवाल, हरि रावत, राजेंद्र ताम्बी, नरोत्तम कामदार, राजेंद्र धमोड, कैलाश चंद्र खुटेटा, डॉ विनोद अगरवाल, अशोक अगरवाल, अशोक अगरवाल अनंतपपुरा वाले, मनोज शर्मा, ओम प्रकाश कासलीवाल, हेमंत खंडेलवाल, मेहुल् अगरवाल, गोविंद विजय वर्गीय, केशव रावत, राजेंद्र अगरवाल, चंद्र प्रकाश ताम्बि, सुनील अगरवाल, मूल चंद्र दुसाद, राम मनोहर दुसाद, पपू जी दुसाद, राम अवतार दुसाद एवं विनोद दुसाद, निलेश सर्राफ, प्रवीण शर्मा, विनेश अग्रवाल, राम अवतार महाजन, अनिल जैन, सुधीर अग्रवाल, प्रोफेसर हरिनारायण अग्रवाल, पप्पू माधाणी, गोविंद झालानी, विनोद झालानी, संजय खटोड़, चिरंजी लाल महेश्वरी, रमेश बजाज, राजू हलवाई, मनीष अग्रवाल, मुकेश के डी, दामोदर अग्रवाल, हरि नारायण शर्मा, कुंज बिहारी तांबी, अमर चंद्र रावत, विमल शर्मा, शिव प्रसाद पालीवाल, श्याम बजाज, दामोदर खांडल, नटवर अगीवाल, विनोद खटोड़, सुरेश तांबी, योगेश खटोड़, राधेश्याम नाणका, रामबाबू नायक, सुरेश महरिया, डॉ मदन लाल कुमावत, डॉ सीताराम शर्मा, श्याम सुंदर अग्रवाल, गोपाल अग्रवाल, लाखन बागोरिया, संजय बजाज, अरुण पटवारी, राजकुमार पटवारी, ने भदाई दी है!  

    ज्ञान से नेतृत्व तक… ‘स्पार्क’ ने जगाई नई सोच की लौ

    जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के जयपुर स्कूल ऑफ बिज़नेस की ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ में उद्योग जगत के दिग्गजों से रूबरू हुए विद्यार्थी, अनुभवात्मक गतिविधियों से निखरे नेतृत्व और प्रबंधन कौशल जयपुर। जब शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न रहकर अनुभव, संवाद और वास्तविक दुनिया से जुड़ती है, तब सीखने की प्रक्रिया एक नई दिशा लेती है। इसी सोच को साकार करते हुए जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के जयपुर स्कूल ऑफ बिज़नेस के बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग द्वारा ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ का सफल आयोजन किया गया। यह पहल विद्यार्थियों को उद्योग जगत के अनुभवी विशेषज्ञों, कॉर्पोरेट लीडर्स और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों से जोड़ने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व, नेतृत्व क्षमता और प्रबंधन कौशल को विकसित करने की दिशा में एक प्रभावी प्रयास रही। उद्योग जगत से सीधा संवाद, करियर की नई समझ ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ के दौरान विद्यार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित उद्योग विशेषज्ञों एवं कॉर्पोरेट लीडर्स के साथ संवाद करने का अवसर मिला। विशेषज्ञों ने अपने व्यावसायिक अनुभव, करियर यात्रा और उद्योग जगत की चुनौतियों से जुड़े वास्तविक अनुभव विद्यार्थियों के साथ साझा किए। इन संवादात्मक सत्रों के माध्यम से विद्यार्थियों को करियर निर्माण, नेतृत्व, व्यक्तिगत विकास, निर्णय लेने की क्षमता, प्रबंधन, कार्यस्थल की चुनौतियों और बदलते कॉर्पोरेट परिदृश्य को समझने का अवसर मिला। विशेषज्ञों के साथ खुला संवाद विद्यार्थियों के लिए कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया को समझने का माध्यम बना। सीख जो किताबों से आगे बढ़कर अनुभव बनी कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण विभाग के विभिन्न छात्र क्लबों द्वारा आयोजित संवादात्मक एवं अनुभवात्मक गतिविधियां रहीं। इन गतिविधियों में विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए टीमवर्क, नेतृत्व, रचनात्मक सोच, संचार, समस्या-समाधान और प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कौशलों को व्यवहारिक रूप से समझा। इन गतिविधियों ने विद्यार्थियों को केवल अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में सोचने, निर्णय लेने और चुनौतियों का समाधान तलाशने का अनुभव भी प्रदान किया। इससे विद्यार्थियों के आत्मविश्वास, रचनात्मकता और निर्णय क्षमता को नई मजबूती मिली। ‘स्पार्क’ से सशक्त हुआ विद्यार्थियों का आत्मविश्वास ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों में केवल शैक्षणिक ज्ञान का विस्तार करना नहीं, बल्कि उन्हें भविष्य के जिम्मेदार, आत्मविश्वासी और कुशल पेशेवरों एवं प्रभावी नेतृत्वकर्ताओं के रूप में तैयार करना रहा। उद्योग विशेषज्ञों के अनुभव, कॉर्पोरेट जगत की वास्तविक समझ और अनुभवात्मक गतिविधियों के संयोजन ने विद्यार्थियों को अपने भविष्य और करियर को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में सीखने की जिज्ञासा को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अपनी क्षमताओं को पहचानने और निरंतर बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया। समग्र विकास की दिशा में एक और सार्थक पहल कार्यक्रम डॉ. रेनू पारीक, डीन, जयपुर स्कूल ऑफ बिज़नेस के मार्गदर्शन में तथा डॉ. रुचि गोयल, विभागाध्यक्ष, बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग एवं विभाग के समर्पित फैकल्टी सदस्यों के समन्वय में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। कार्यक्रम की सफलता में जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के प्रबंधन, फैकल्टी सदस्यों, उद्योग विशेषज्ञों, कॉर्पोरेट लीडर्स और छात्र स्वयंसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ ने विद्यार्थियों को ज्ञान से अनुभव, अनुभव से आत्मविश्वास और आत्मविश्वास से नेतृत्व की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान किया। यह पहल जेईसीआरसी विश्वविद्यालय की उस प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करती है, जिसमें विद्यार्थियों को अकादमिक शिक्षा के साथ-साथ उद्योग-उन्मुख कौशल, व्यावहारिक अनुभव और नेतृत्व क्षमता से सशक्त बनाने पर निरंतर जोर दिया जाता है।  

    "युवाओं के लिए रोजगार क्षमता संवर्धन’’ विषय पर 10 दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ

    कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर में सेंटर फॉर करियर गाइडेंस, ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट द्वारा नांदी फाउंडेशन- महिंद्रा प्राइड क्लासरूम के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘युवाओं के लिए रोजगार क्षमता संवर्धन’’ विषय पर 10 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का आयोजन 22 सितंबर से 01 अक्टूबर 2026 तक विशेष रूप से अंतिम वर्ष की छात्राओं को रोजगार के लिए आवश्यक कौशल एवं दक्षताओं से सुसज्जित करने के उद्देश्य से किया गया है। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने प्रशिक्षक का स्वागत कर कार्यशाला के औपचारिक रूप से शुभारंभ की घोषणा की। उन्होंने छात्राओं को कार्यशाला का अधिकतम लाभ उठाने और अपने रोजगार कौशल को सुदृढ़ करने के लिए प्रोत्साहित किया। प्राचार्य ने कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक रोजगार परिवेश में विषयगत ज्ञान के साथ संचार कौशल, आत्मविश्वास, टीमवर्क एवं समस्या-समाधान जैसी क्षमताएँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में नांदी फाउंडेशन के प्रशिक्षक, संजय शर्मा ने छात्राओं को कार्यशाला की रूपरेखा, उद्देश्यों एवं प्रशिक्षण के विभिन्न आयामों से परिचित कराया। उन्होंने रोजगार के बदलते परिदृश्य में तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ प्रभावी संचार, व्यक्तित्व विकास, जीवन कौशल, आत्मविश्वास तथा साक्षात्कार कौशल के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने छात्राओं को प्रशिक्षण के प्रत्येक सत्र में सक्रिय सहभागिता करने तथा प्राप्त ज्ञान एवं कौशल को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। कार्यशाला के प्रथम दिन लगभग 80 छात्राएं उपस्थित रहीं। आगामी सत्रों में छात्राओं को प्रभावी संचार कौशल, जीवन कौशल, व्यक्तित्व विकास, साक्षात्कार कौशल तथा रोजगार से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण दक्षताओं का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कार्यशाला का उद्देश्य छात्राओं को रोजगार के लिए अधिक आत्मविश्वासी, सक्षम एवं तैयार बनाना तथा उन्हें बदलते कार्यक्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक कौशल प्रदान करना है।

    NHAI ने हाई-स्पीड एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे के लिए जारी किए एक समान डिजाइन मानक, जानिए क्या बदलेगा

    Yugcharan News / 22-09-2026 भारत में हाई-स्पीड सड़क नेटवर्क के विस्तार के बीच भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड नेशनल हाईवे के लिए एक समान डिजाइन फ्रेमवर्क पेश किया है। नए दिशानिर्देशों का उद्देश्य देश में ऐसे हाईवे की योजना, डिजाइन, यातायात आकलन, लेन व्यवस्था, इंटरचेंज और सुरक्षा प्रावधानों को एक समान बनाना है। NHAI के अनुसार, नए मानक आगामी चार और छह लेन वाले एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड राष्ट्रीय राजमार्गों पर लागू होंगे। हालांकि, एक्सप्रेसवे इन दिशानिर्देशों के दायरे से बाहर रहेंगे। यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत में हाई-स्पीड और नियंत्रित प्रवेश वाले सड़क गलियारों का नेटवर्क तेजी से विस्तार करने की योजना पर काम हो रहा है। सरकार के Viksit Bharat 2047 रोडमैप के तहत करीब 50,000 किलोमीटर एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड कॉरिडोर विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक अलग मानकों के कारण थी असमानता NHAI के मुताबिक, अब तक एक्सप्रेसवे के अलावा एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड राष्ट्रीय राजमार्गों की योजना और डिजाइन के लिए अलग से व्यापक मानक मौजूद नहीं थे। इसके चलते अलग-अलग कॉरिडोर के लिए Detailed Project Report (DPR) तैयार करते समय तकनीकी मानकों में अंतर देखने को मिलता था। नए फ्रेमवर्क का उद्देश्य इस स्थिति में एकरूपता लाना है। इसके तहत परियोजनाओं की योजना बनाते समय यातायात की मात्रा, लेन की संख्या, सड़क की ज्यामिति, संरचनाओं, इंटरचेंज और प्रवेश नियंत्रण जैसे पहलुओं के लिए साझा मानक अपनाए जाएंगे। इससे अलग-अलग राज्यों और परियोजनाओं में तैयार होने वाले हाई-स्पीड कॉरिडोर की डिजाइन प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है। यातायात के आधार पर तय होगी लेन की संख्या नए दिशानिर्देशों में हाईवे की संरचना को अपेक्षित यातायात के आधार पर तय करने का प्रावधान किया गया है। इसका मतलब है कि जिस कॉरिडोर पर वाहनों की संख्या जितनी अधिक होगी, वहां सड़क और संबंधित संरचनाओं की क्षमता उसी हिसाब से निर्धारित की जाएगी। दिशानिर्देशों के अनुसार, जिन कॉरिडोर पर प्रतिदिन 15,000 तक वाहनों का यातायात अनुमानित है, वहां चार लेन का हाईवे और चार लेन की संरचनाएं बनाई जाएंगी। ऐसे कॉरिडोर के लिए प्रस्तावित चौड़ाई 60 मीटर होगी। यदि यातायात 15,000 से 25,000 वाहनों के बीच है, तो चार लेन का हाईवे और छह लेन की संरचनाओं का प्रावधान होगा। इस श्रेणी के कॉरिडोर की प्रस्तावित चौड़ाई 70 मीटर रखी गई है। वहीं, 25,000 से 40,000 वाहनों वाले कॉरिडोर के लिए छह लेन का हाईवे और छह लेन की संरचनाएं प्रस्तावित की गई हैं। इस श्रेणी में भी कॉरिडोर की चौड़ाई 70 मीटर निर्धारित की गई है। इस व्यवस्था के जरिए सड़क की क्षमता को वास्तविक और अनुमानित यातायात मांग से जोड़ने की कोशिश की गई है। हाईवे के प्रवेश और निकास पर ज्यादा ध्यान नए डिजाइन फ्रेमवर्क में हाई-स्पीड यातायात की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रवेश और निकास बिंदुओं के बारे में भी नए प्रावधान शामिल किए गए हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, हाईवे पर एंट्री और एग्जिट की पहले से सूचना देने के लिए पर्याप्त संकेत और अग्रिम सूचना व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। इसका उद्देश्य वाहन चालकों को निकास या प्रवेश बिंदु के बारे में पहले से जानकारी देना है, ताकि वे अचानक लेन बदलने या तेज ब्रेक लगाने जैसी परिस्थितियों से बच सकें। हाई-स्पीड सड़कों पर अचानक किसी इंटरचेंज या निकास के सामने आने से दुर्घटना का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए नए मानकों में ड्राइवर को पहले से पर्याप्त जानकारी देने पर विशेष जोर दिया गया है। महत्वपूर्ण सड़कों पर इंटरचेंज और रैंप NHAI के नए मानकों में हाई-स्पीड कॉरिडोर पर सीधे प्रवेश को सीमित करने की व्यवस्था भी की गई है। महत्वपूर्ण सड़क क्रॉसिंग पर इंटरचेंज और रैंप विकसित किए जाएंगे। इनका प्रावधान एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और ऐसे महत्वपूर्ण आर्टेरियल रोड के साथ क्रॉसिंग पर किया जाएगा, जहां पर्याप्त मात्रा में यातायात उत्पन्न होता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य हाई-स्पीड कॉरिडोर पर अनियंत्रित या सीधे प्रवेश को कम करना है। इससे मुख्य राजमार्ग पर चल रहे तेज यातायात और स्थानीय या दूसरे मार्गों से आने वाले वाहनों के बीच संभावित टकराव की स्थितियों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। एयरपोर्ट, पोर्ट और लॉजिस्टिक्स हब से बेहतर कनेक्टिविटी नए दिशानिर्देशों में प्रमुख यातायात पैदा करने वाले स्थानों को हाई-स्पीड हाईवे से जोड़ने पर भी ध्यान दिया गया है। पोर्ट, एयरपोर्ट, मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क, औद्योगिक क्षेत्र और बड़े पर्यटन स्थलों जैसे प्रमुख गंतव्यों तक पहुंच के लिए आवश्यक स्थानों पर इंटरचेंज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। इससे हाई-स्पीड हाईवे केवल लंबी दूरी के यातायात के लिए ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण आर्थिक और लॉजिस्टिक केंद्रों से कनेक्टिविटी के लिए भी उपयोगी बनाए जा सकेंगे। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों और लॉजिस्टिक्स पार्कों के साथ बेहतर कनेक्टिविटी माल परिवहन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी तरह एयरपोर्ट और बंदरगाहों से सीधी और नियंत्रित पहुंच यात्रियों तथा माल की आवाजाही को अधिक व्यवस्थित करने में मदद कर सकती है। हाईवे के किनारे एक मीटर ऊंची बाउंड्री वॉल एक्सेस कंट्रोल को मजबूत करने के लिए NHAI ने हाईवे के बाहरी किनारे पर एक मीटर ऊंची बाउंड्री वॉल बनाने का प्रावधान भी किया है। इस दीवार का उद्देश्य हाईवे पर अनधिकृत प्रवेश, अतिक्रमण और आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकना है। हाई-स्पीड कॉरिडोर पर अचानक पैदल यात्रियों, स्थानीय वाहनों या पशुओं के पहुंचने से गंभीर दुर्घटना का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए भौतिक अवरोध को नए डिजाइन फ्रेमवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। इससे सड़क के प्रवेश बिंदुओं को अधिक नियंत्रित रखने और हाई-स्पीड यातायात के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की कोशिश की गई है। ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों परियोजनाओं पर लागू नए मानक केवल नई सड़कों तक सीमित नहीं रहेंगे। NHAI के अनुसार, इनका इस्तेमाल ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के साथ-साथ मौजूदा हाईवे को एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर में अपग्रेड करने वाली ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में भी किया जाएगा। ग्रीनफील्ड परियोजनाएं ऐसे नए सड़क कॉरिडोर हैं जिन्हें नए सिरे से विकसित किया जाता है, जबकि ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में मौजूदा सड़क ढांचे को अपग्रेड या पुनर्विकसित किया जाता है। दोनों प्रकार की परियोजनाओं के लिए समान आधारभूत मानक निर्धारित करने से डिजाइन और योजना प्रक्रिया में अंतर कम करने की कोशिश की गई है। DPR तैयार करने में आएगी एकरूपता NHAI के नए फ्रेमवर्क का एक प्रमुख उद्देश्य Detailed Project Report यानी DPR तैयार करने की प्रक्रिया में एकरूपता लाना है। किसी बड़े हाईवे प्रोजेक्ट की DPR में यातायात अनुमान, लेन की जरूरत, सड़क की ज्यामिति, पुल और अन्य संरचनाएं, इंटरचेंज, प्रवेश नियंत्रण और सुरक्षा उपायों जैसे पहलुओं का आकलन किया जाता है। अब इन पहलुओं के लिए साझा मानक होने से अलग-अलग परियोजनाओं की योजना तैयार करने में अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है। NHAI का मानना है कि एक समान डिजाइन व्यवस्था से हाई-स्पीड कॉरिडोर की योजना और निर्माण में तकनीकी अंतर कम होंगे तथा सड़क नेटवर्क के संचालन में भी अधिक एकरूपता लाई जा सकेगी। भारत के हाई-स्पीड रोड नेटवर्क के विस्तार की दिशा में कदम भारत में आर्थिक गतिविधियों, औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, एयरपोर्ट और बड़े शहरों के बीच तेज कनेक्टिविटी की जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड हाईवे का नेटवर्क विस्तार बुनियादी ढांचे की योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। NHAI का नया डिजाइन फ्रेमवर्क इसी विस्तार को एक समान तकनीकी और सुरक्षा मानकों के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है। यातायात के आधार पर लेन की संख्या तय करने, महत्वपूर्ण स्थानों पर इंटरचेंज उपलब्ध कराने, प्रवेश और निकास की अग्रिम सूचना देने तथा हाईवे के किनारे भौतिक अवरोध बनाने जैसे प्रावधानों के जरिए परियोजनाओं की योजना को अधिक व्यवस्थित बनाने पर जोर दिया गया है। नए दिशानिर्देशों का प्रभाव आने वाले समय में उन चार और छह लेन वाले एक्सेस-कंट्रोल्ड राष्ट्रीय राजमार्गों की डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया में दिखाई देगा, जिन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में विकसित या अपग्रेड किया जाना है। सरकार के Viksit Bharat 2047 के तहत प्रस्तावित बड़े हाई-स्पीड कॉरिडोर नेटवर्क के संदर्भ में इन मानकों को एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जा रहा है।

    महाराष्ट्र UCC समिति से पूर्व बॉम्बे हाईकोर्ट जज आरसी चव्हाण का इस्तीफा, जानिए क्या थी वजह

    Yugcharan News / 22-09-2026 महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) तैयार करने के लिए गठित समिति को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा 19 सितंबर को समिति की दूसरी बैठक के कुछ घंटे बाद सामने आया। राज्य सरकार ने सोमवार को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। जस्टिस चव्हाण के इस्तीफे की वजह समिति में आम जनता से राय लेने के लिए तैयार किए जा रहे प्रश्नावली (Questionnaire) के तरीके और समिति की कार्यप्रणाली से जुड़ी उनकी असहमति बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने समिति को भेजे अपने ईमेल में कहा कि उन्हें लगा था कि UCC की कवायद का उद्देश्य महाराष्ट्र के लोगों के विचार जानना और विभिन्न सामाजिक एवं कानूनी मुद्दों पर व्यापक सहमति विकसित करना है। हालांकि, बाद में उन्हें लगा कि प्रस्तावित प्रक्रिया मुख्य रूप से लोगों से हां या ना में जवाब लेने और उन जवाबों के आंकड़ों का विश्लेषण करने तक सीमित हो सकती है। जुलाई में गठित हुई थी सात सदस्यीय समिति महाराष्ट्र सरकार ने जुलाई 2026 में राज्य के लिए समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के उद्देश्य से सात सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। समिति में जस्टिस आरसी चव्हाण के अलावा बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एसजी मेहरे भी सदस्य हैं। इसके अन्य सदस्यों में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव डीके जैन, महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता वीरेंद्र सराफ, संविधान विशेषज्ञ और पद्मश्री सम्मानित रमेश पतंगे तथा शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सुवर्णा रावल शामिल हैं। समिति का उद्देश्य महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करना और राज्य के लिए प्रस्तावित UCC के मसौदे की दिशा में काम करना है। इसी प्रक्रिया के तहत जनता से राय और सुझाव लेने के लिए एक वेबसाइट तथा प्रश्नावली तैयार की जा रही थी। 19 सितंबर की बैठक के बाद आया इस्तीफा समिति की दूसरी बैठक 19 सितंबर को ऑनलाइन आयोजित की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, बैठक का एजेंडा तीन प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित था। इनमें पिछली बैठक की कार्यवाही की पुष्टि, UCC पर लोगों से राय लेने के लिए तैयार की जा रही वेबसाइट पर चर्चा और सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए प्रश्नावली से संबंधित मुद्दे शामिल थे। इसी बैठक के बाद जस्टिस चव्हाण ने समिति से इस्तीफा देने का फैसला किया। अपने ईमेल में उन्होंने प्रश्नावली को लेकर हुई चर्चा का उल्लेख किया। रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया था कि लोगों से ऐसे सवाल पूछे जाएं जिनके जवाब केवल “हां” या “नहीं” में दिए जा सकें। वहीं, प्रश्नावली की पेशेवर समीक्षा कराए जाने की बात भी सामने आई। जस्टिस चव्हाण ने अपने संदेश में कहा कि समिति की अध्यक्ष पहले ही अपनी ओर से अंतिम रूप दी गई प्रश्नावली सदस्यों के साथ साझा कर चुकी थीं और वेबसाइट तैयार होने के बाद उसे अपलोड किया जाना था। उन्होंने बताया कि इस बिंदु पर उन्होंने बैठक से लॉग आउट कर दिया, क्योंकि उनके अनुसार एजेंडे का संबंधित हिस्सा समाप्त हो चुका था। जनता की राय और प्रश्नावली को लेकर क्या था मतभेद जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में कहा कि प्रश्नावली को लेकर अपनी बात रखने का उनका प्रयास इस समझ पर आधारित था कि समिति का मुख्य उद्देश्य महाराष्ट्र की जनता के विचार जानना और विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक सहमति बनाने की कोशिश करना है। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अपने संदेश में देर से होने वाली शादियों, वैवाहिक अस्थिरता, बांझपन, वैवाहिक विवादों और विवादों के समाधान में लगने वाले अधिक समय जैसे मुद्दों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि उन्हें लगा था कि लोगों से इन विषयों पर व्यापक विचार और राय हासिल करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। लेकिन समिति की प्रस्तावित प्रश्नावली को देखने के बाद उन्हें लगा कि प्रक्रिया का स्वरूप अलग है। उनके अनुसार, लोगों को निर्धारित सवालों पर हां या ना में जवाब देने का अवसर मिलेगा और इसके बाद प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। जस्टिस चव्हाण ने इसी अंतर को अपने इस्तीफे के प्रमुख कारणों में शामिल किया। बैठक में गैर-सदस्य की मौजूदगी का भी किया उल्लेख जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में बैठक में एक ऐसे व्यक्ति की मौजूदगी का भी उल्लेख किया जो समिति का सदस्य नहीं था। उनके अनुसार, इस व्यक्ति ने राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा तैयार की गई वेबसाइट में कुछ और बदलावों की आवश्यकता बताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, समिति की अध्यक्ष ने अधिकारियों को वेबसाइट में आवश्यक बदलाव एक सप्ताह के भीतर करने का निर्देश दिया। जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में कहा कि उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि समिति की बैठक में उस गैर-सदस्य की भूमिका क्या थी। उन्होंने यह भी लिखा कि उस व्यक्ति के सुझावों के बाद उनके मन में यह सवाल उठा कि क्या राज्य के अधिकारी वेबसाइट तैयार करने के काम में स्वयं को सक्षम नहीं मानते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि वह समिति से अपनी सीट खाली कर रहे हैं, ताकि सरकार उस स्थान को जल्द भर सके। जस्टिस आरसी चव्हाण कौन हैं? जस्टिस आरसी चव्हाण का न्यायिक करियर कई दशकों तक फैला रहा है। उनका जन्म 12 अप्रैल 1952 को हुआ था। उन्होंने 1 मार्च 1976 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के रूप में न्यायिक सेवा शुरू की। जुलाई 1985 में उन्हें सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर पदोन्नत किया गया। इसके बाद मार्च 1987 में वह अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने। अपने न्यायिक करियर के दौरान उन्होंने जलगांव और ठाणे में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा नासिक में संयुक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में काम किया। 1990 से 1994 के बीच उन्होंने नागपुर स्थित Judicial Officers Training Institute में संयुक्त निदेशक के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद वह नांदेड़, औरंगाबाद, दमन एवं दीव तथा पुणे में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर रहे। बॉम्बे हाईकोर्ट में उन्होंने अतिरिक्त रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रार सहित कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। वह बॉम्बे हाईकोर्ट के पहले रजिस्ट्रार जनरल भी रहे। 2005 में बने थे बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चव्हाण को 22 जून 2005 को बॉम्बे हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। उन्होंने 2013 तक हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। उनके न्यायिक और प्रशासनिक करियर के अलावा तकनीक के क्षेत्र में उनके योगदान का भी उल्लेख किया जाता है। उन्हें भारत में ई-कोर्ट प्रणाली को आगे बढ़ाने वाले न्यायिक अधिकारियों में गिना जाता है। 19 नवंबर 2012 को उन्हें मुंबई की विशेष अदालत (TORTS) का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। बाद में उन्होंने महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन की ओर बढ़े हाईकोर्ट से सेवानिवृत्ति के बाद जस्टिस चव्हाण ने साहित्य और लेखन के क्षेत्र में भी काम किया। उन्होंने न्यायपालिका और कानून से जुड़े अपने अनुभवों तथा विचारों को पुस्तकों के माध्यम से सामने रखा। उन्होंने Cries in Wilderness और More Cries in Wilderness नामक किताबें लिखीं। इसके अलावा उन्होंने Yes My Lords, It’s You In The Mirror नामक उपन्यास भी लिखा, जिसमें न्यायपालिका की पृष्ठभूमि में चार दोस्तों की यात्रा को केंद्र में रखा गया है। वह Who Killed Rule of Law नामक अपनी अगली साहित्यिक कृति पर भी काम कर रहे हैं। इस्तीफे के बाद क्या होगा? जस्टिस चव्हाण के इस्तीफे के बाद अब महाराष्ट्र सरकार को समिति में खाली हुई सदस्य की जगह पर नई नियुक्ति करनी होगी। समिति की ओर से UCC से जुड़े सार्वजनिक सुझाव लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी है। जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में यह भी संकेत दिया कि समिति में काम करना उनके लिए एक महत्वपूर्ण सीखने का अनुभव रहा। उन्होंने कहा कि यह विषय उनके लिए व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण रहा है और समिति से अलग होने के बाद भी एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में वह अपने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे। फिलहाल उनके इस्तीफे को लेकर सामने आई जानकारी मुख्य रूप से उनके द्वारा समिति को भेजे गए ईमेल और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। समिति की आगे की कार्यवाही और सार्वजनिक प्रतिक्रिया जुटाने की प्रक्रिया पर अब नजर रहेगी, क्योंकि महाराष्ट्र में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार की ओर से आगे की प्रक्रिया इसी समिति के काम से जुड़ी होगी।

    मलेशिया में नौकरी के लिए वीजा-फ्री एंट्री का इस्तेमाल न करें, भारतीय दूतावास ने जारी की चेतावनी

    Yugcharan News / 22-09-2026 मलेशिया में नौकरी की तलाश कर रहे भारतीय नागरिकों के लिए भारतीय उच्चायोग ने महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है। कुआलालंपुर स्थित भारतीय उच्चायोग ने भारतीय पासपोर्ट धारकों से कहा है कि वे मलेशिया की 30 दिनों की वीजा-मुक्त प्रवेश सुविधा का इस्तेमाल नौकरी तलाशने या रोजगार हासिल करने के उद्देश्य से न करें। उच्चायोग के मुताबिक, इस सुविधा का उद्देश्य पर्यटन और सामाजिक यात्राओं तक सीमित है और इसके तहत मलेशिया में रोजगार करना अधिकृत नहीं है। उच्चायोग ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी एक सलाह में कहा कि हाल के समय में ऐसे भारतीय नागरिकों की संख्या में “उल्लेखनीय वृद्धि” देखी गई है, जो वीजा-मुक्त प्रवेश के जरिए मलेशिया पहुंचकर नौकरी तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। मिशन ने यह भी चेतावनी दी कि कुछ यात्रियों को ऐसे एजेंटों द्वारा गुमराह किया जा रहा है, जो विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर झूठे वादे कर रहे हैं। 30 दिन की वीजा-मुक्त सुविधा नौकरी के लिए नहीं मलेशिया फिलहाल भारतीय पासपोर्ट धारकों को अधिकतम 30 दिनों तक वीजा-मुक्त प्रवेश की सुविधा देता है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारतीय नागरिकों के लिए यह छूट 31 दिसंबर 2026 तक प्रभावी है। हालांकि, भारतीय उच्चायोग ने स्पष्ट किया है कि इस सुविधा को रोजगार हासिल करने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। 30 दिनों की वीजा-मुक्त व्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन और सामाजिक यात्राओं के लिए है। यदि कोई भारतीय नागरिक मलेशिया में कानूनी रूप से काम करना चाहता है, तो उसे संबंधित रोजगार अनुमति और आवश्यक वीजा दस्तावेज हासिल करने होंगे। मलेशियाई आव्रजन व्यवस्था में काम के लिए आवश्यक दस्तावेजों में वैध वर्क परमिट या Visa With Reference (VDR) शामिल हो सकता है। संबंधित अनुमति न होने की स्थिति में केवल वीजा-मुक्त प्रवेश के आधार पर मलेशिया में नौकरी करना कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा। एजेंटों के झूठे नौकरी के वादों से सावधान रहने की सलाह भारतीय उच्चायोग ने अपनी सलाह में विशेष रूप से उन एजेंटों से सावधान रहने को कहा है, जो मलेशिया में आसानी से नौकरी दिलाने का दावा करते हैं। मिशन के अनुसार, कुछ भारतीय नागरिकों को रोजगार का झांसा देकर वीजा-मुक्त मार्ग से मलेशिया भेजा जा रहा है। ऐसे मामलों में यात्रियों को बाद में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उच्चायोग ने संभावित जोखिमों में वीजा अवधि से अधिक समय तक रुकना, अवैध स्थिति में पहुंच जाना, शोषण, हिरासत और कानूनी कार्रवाई जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया है। विदेश में नौकरी के नाम पर एजेंटों को भुगतान करने से पहले रोजगार की वास्तविकता और नियोक्ता की जानकारी की जांच करना महत्वपूर्ण है। केवल एजेंट के मौखिक आश्वासन के आधार पर दूसरे देश की यात्रा करना जोखिमपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब यात्रा का इस्तेमाल ऐसे उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो जिसके लिए संबंधित प्रवेश सुविधा मान्य नहीं है। मलेशिया में नौकरी के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत भारतीय नागरिक यदि मलेशिया में रोजगार के उद्देश्य से यात्रा करना चाहते हैं, तो उन्हें उचित रोजगार प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही यात्रा करने की सलाह दी गई है। भारतीय उच्चायोग के अनुसार, कानूनी रूप से काम करने के इच्छुक लोगों के पास संबंधित मलेशियाई वीजा और रोजगार से जुड़े जरूरी दस्तावेज होने चाहिए। इनमें वैध वर्क परमिट या आवश्यक स्वीकृति, रोजगार अनुबंध और नियोक्ता से संबंधित विवरण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यात्रा से पहले नौकरी देने वाली कंपनी, पद, वेतन, काम की शर्तों और आव्रजन अनुमति की पुष्टि करना भी जरूरी है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मलेशिया पहुंचने के बाद व्यक्ति की स्थिति कानूनी और दस्तावेजों के अनुरूप हो। यदि कोई व्यक्ति पर्यटन के नाम पर प्रवेश करता है लेकिन वहां पहुंचकर नौकरी तलाशता है, तो उसे आव्रजन अधिकारियों के सवालों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है। असली पर्यटकों के लिए भी जरूरी दस्तावेज भारतीय उच्चायोग ने यह स्पष्ट किया है कि वीजा-मुक्त प्रवेश का इस्तेमाल करने वाले वास्तविक पर्यटकों को भी मलेशिया पहुंचने से पहले अपने जरूरी दस्तावेज तैयार रखने चाहिए। आव्रजन अधिकारियों द्वारा मांगे जाने पर यात्रियों को अपनी यात्रा का उद्देश्य और रहने की व्यवस्था साबित करने में सक्षम होना चाहिए। पर्यटकों को आम तौर पर कन्फर्म रिटर्न टिकट, होटल बुकिंग और कम से कम छह महीने की वैधता वाला पासपोर्ट साथ रखने की सलाह दी गई है। इसके अलावा, भारतीय पासपोर्ट धारकों को मलेशिया पहुंचने से पहले Malaysia Digital Arrival Card यानी MDAC भी ऑनलाइन जमा करना होता है। मलेशिया की आधिकारिक प्रवेश व्यवस्था में भारतीय यात्रियों के लिए इन आवश्यकताओं का उल्लेख किया गया है। इसलिए केवल वीजा-मुक्त सुविधा उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं है कि यात्री बिना अन्य दस्तावेजों के प्रवेश का दावा कर सकता है। पहले भी सामने आ चुकी हैं प्रवेश से जुड़ी समस्याएं भारतीय मिशन की ताजा चेतावनी ऐसे समय में आई है जब मलेशिया की यात्रा करने वाले कुछ भारतीय नागरिकों को प्रवेश से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। रिपोर्ट किए गए मामलों में कथित नौकरी तलाशने की कोशिश, पर्याप्त होटल या रहने की जानकारी उपलब्ध न होना, पर्याप्त धनराशि का प्रमाण नहीं होना और रिटर्न टिकट नहीं होना जैसे कारणों से यात्रियों से पूछताछ या अन्य कार्रवाई की स्थिति सामने आई है। ऐसे मामलों में आव्रजन अधिकारी यात्रा के उद्देश्य, रहने की व्यवस्था और वापसी की योजना से संबंधित दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं। इसलिए पर्यटकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे यात्रा से पहले सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार रखें और प्रवेश नियमों का पालन करें। नौकरी के लिए जाने वालों के लिए अलग प्रक्रिया मलेशिया में काम करने की योजना बना रहे भारतीय नागरिकों को पर्यटक के रूप में प्रवेश करके नौकरी तलाशने के बजाय निर्धारित रोजगार प्रक्रिया का पालन करने की सलाह दी गई है। भारतीय उच्चायोग की मौजूदा सलाह के अनुसार, रोजगार के लिए यात्रा करने वालों को उचित मलेशियाई वीजा, रोजगार अनुबंध और नियोक्ता की पूरी जानकारी हासिल करने के बाद ही यात्रा करनी चाहिए। इस प्रक्रिया से यात्री को यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि उसकी यात्रा और रोजगार दोनों संबंधित नियमों के अनुरूप हैं। दूसरी ओर, अनधिकृत तरीके से नौकरी तलाशने पर व्यक्ति की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है और उसे आव्रजन कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। भारतीय यात्रियों के लिए क्या है मुख्य संदेश भारतीय उच्चायोग की चेतावनी का मुख्य संदेश यह है कि मलेशिया की 30 दिनों की वीजा-मुक्त प्रवेश सुविधा को रोजगार के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पर्यटकों के लिए उपलब्ध प्रवेश सुविधा और विदेशी नागरिकों के लिए रोजगार की अनुमति दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। मलेशिया में नौकरी करने के इच्छुक भारतीय नागरिकों को यात्रा से पहले वैध रोजगार प्रस्ताव, नियोक्ता की जानकारी और आवश्यक वीजा व वर्क परमिट संबंधी मंजूरी सुनिश्चित करनी चाहिए। वहीं, केवल पर्यटन के लिए जाने वाले यात्रियों को रिटर्न टिकट, होटल बुकिंग, वैध पासपोर्ट और Malaysia Digital Arrival Card जैसे आवश्यक दस्तावेज पूरे रखने चाहिए। उच्चायोग की सलाह ऐसे भारतीय नागरिकों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर एजेंटों के संपर्क में हैं। किसी भी प्रस्ताव पर भरोसा करने से पहले नियोक्ता और रोजगार संबंधी दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है। वीजा-मुक्त प्रवेश का उद्देश्य समझना और उसी के अनुरूप यात्रा करना यात्रियों को संभावित कानूनी, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी परेशानियों से बचाने में मदद कर सकता है।

    राज्यसभा की 12 सीटों पर चुनाव का ऐलान, यूपी की 10 और उत्तराखंड की 1 सीट पर 16 अक्टूबर को मतदान

    Yugcharan News / 22-09-2026 नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 12 सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया है। उत्तर प्रदेश की 10, उत्तराखंड की एक और पश्चिम बंगाल की एक सीट पर 16 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा। इनमें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की 11 सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है, जबकि पश्चिम बंगाल की सीट पर उपचुनाव कराया जाएगा। चुनाव आयोग के मुताबिक, इन चुनावों के लिए अधिसूचना 29 सितंबर को जारी होगी। उम्मीदवार 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 9 अक्टूबर तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे। मतदान 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा। उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी। चुनाव प्रक्रिया 19 अक्टूबर 2026 तक पूरी कर ली जाएगी। राज्यसभा चुनाव का पूरा कार्यक्रम चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार: अधिसूचना जारी होने की तारीख: 29 सितंबर 2026 नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख: 6 अक्टूबर 2026 नामांकन पत्रों की जांच: 7 अक्टूबर 2026 नाम वापसी की अंतिम तारीख: 9 अक्टूबर 2026 मतदान की तारीख: 16 अक्टूबर 2026 मतदान का समय: सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतगणना: 16 अक्टूबर 2026 को शाम 5 बजे से चुनाव प्रक्रिया पूरी करने की अंतिम तारीख: 19 अक्टूबर 2026 उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव उत्तर प्रदेश में 10 राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक इन सभी सीटों पर 16 अक्टूबर को मतदान होगा। सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों में अरुण सिंह, गीता उर्फ चंद्रप्रभा, नीरजा शेखर, बृजलाल, प्रो. राम गोपाल यादव, रामजी गौतम, बीएल वर्मा, सीमल, डॉ. दिनेश शर्मा और हरदीप सिंह पुरी शामिल हैं। डॉ. दिनेश शर्मा की सीट 11 सितंबर 2026 से रिक्त बताई गई है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के आधार पर उत्तर प्रदेश की इन सीटों का चुनाव आगामी विधानसभा चुनावों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, इसलिए राज्यसभा चुनाव में दलों की संख्या बल और गठबंधन की स्थिति पर विशेष नजर रहेगी। मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर चुनावी गणित में सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्षी दलों के बीच सीटों के संभावित बंटवारे को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार, भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को आठ सीटों पर समर्थन मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में दो सीटें जाने का अनुमान है। हालांकि, अंतिम परिणाम उम्मीदवारों के नामांकन, दलों के आधिकारिक प्रत्याशियों और मतदान के समय विधायकों के समर्थन पर निर्भर करेगा। BSP के लिए राज्यसभा प्रतिनिधित्व की चुनौती उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा संख्या बहुजन समाज पार्टी के लिए राज्यसभा में अपनी सीट बनाए रखने की चुनौती पेश करती है। राज्य विधानसभा में अब पार्टी का कोई विधायक नहीं है। पार्टी के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह का अगस्त 2026 में निधन हो गया था। पिछले राज्यसभा चुनाव में भी BSP के पास अपने दम पर सदस्य निर्वाचित कराने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं थी। उस समय भाजपा ने 10 सीटों के लिए केवल आठ उम्मीदवार उतारे थे, जिससे BSP के रामजी गौतम के निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता बना था। उस चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने एक निर्दलीय उम्मीदवार के नामांकन को खारिज किए जाने के बाद भाजपा और BSP के बीच समझ का आरोप लगाया था। मौजूदा चुनाव में BSP की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि पार्टी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक नहीं है। उत्तराखंड की एक सीट पर भी चुनाव उत्तराखंड में राज्यसभा सदस्य नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। राज्य की एक राज्यसभा सीट के लिए भी 16 अक्टूबर को मतदान होगा। उत्तराखंड विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के आधार पर इस सीट का चुनाव भी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। चुनाव प्रक्रिया उत्तर प्रदेश की सीटों के साथ ही पूरी होगी। पश्चिम बंगाल में उपचुनाव क्यों? पश्चिम बंगाल में राज्यसभा की एक सीट के लिए उपचुनाव कराया जा रहा है। यह सीट रुक्मिणी मल्लिक, जिन्हें अभिनेत्री कोयल मल्लिक के नाम से भी जाना जाता है, के 16 जुलाई 2026 को इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थी। इस सीट से चुने जाने वाले नए सदस्य का कार्यकाल 2 अप्रैल 2032 तक रहेगा। यानी यह सामान्य चुनाव के बजाय रिक्त सीट को भरने के लिए होने वाला उपचुनाव है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में दलों की मौजूदा संख्या इस उपचुनाव के परिणाम के लिए महत्वपूर्ण होगी। राजनीतिक दल अब उम्मीदवार चयन और विधायकों के समर्थन को लेकर अपनी रणनीति तैयार करेंगे। राज्यसभा चुनाव में विधानसभा का संख्या बल क्यों महत्वपूर्ण? राज्यसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते। राज्यों के प्रतिनिधियों का चुनाव संबंधित विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं। इसलिए किसी राज्य में विधानसभा की मौजूदा संख्या और विभिन्न दलों के विधायकों की संख्या राज्यसभा चुनाव के नतीजे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उत्तर प्रदेश में 10 सीटों के लिए एक साथ चुनाव होने के कारण अलग-अलग दलों के पास मौजूद विधायकों की संख्या के आधार पर सीटों का गणित तय होगा। उम्मीदवारों की संख्या, पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी और यदि जरूरत पड़ी तो मतदान प्रक्रिया चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकती है। यदि किसी सीट पर उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से अधिक होती है, तो मतदान कराया जाता है। राज्यसभा चुनाव में विधायकों के मतों की प्राथमिकता के आधार पर गणना की जाती है। विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ेगी राजनीतिक गतिविधि उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब राज्य अगले विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव से राजनीतिक दलों के बीच रणनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है। राज्यसभा में किसी दल की संख्या उसके केंद्रीय कानून निर्माण और संसदीय रणनीति के लिए महत्वपूर्ण होती है। इसलिए राज्यसभा चुनाव केवल खाली हो रही सीटों को भरने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि संसद के उच्च सदन में दलों की स्थिति पर भी इसका असर पड़ता है। उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव भी राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में चर्चा का विषय रहेंगे। 16 अक्टूबर को मतदान और परिणाम चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार सभी संबंधित सीटों के लिए मतदान 16 अक्टूबर को होगा। मतदान सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक चलेगा और मतगणना उसी दिन शाम 5 बजे से शुरू होगी। चुनाव प्रक्रिया 19 अक्टूबर तक पूरी होनी है। फिलहाल राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने की तैयारी में जुटेंगे। राज्यसभा चुनाव के लिए अधिसूचना 29 सितंबर को जारी होने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी। 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल होने और 7 अक्टूबर को उनकी जांच के बाद यह पता चलेगा कि कितनी सीटों पर मुकाबला सीधे निर्विरोध निर्वाचन की ओर जाता है और किन सीटों पर मतदान की आवश्यकता होगी। उत्तर प्रदेश की 10 सीटें, उत्तराखंड की एक सीट और पश्चिम बंगाल की एक रिक्त सीट मिलाकर अक्टूबर में होने वाला यह चुनाव राज्यसभा की आगामी संरचना के लिए महत्वपूर्ण होगा। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में बदलते विधानसभा समीकरण और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में इन चुनावों पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ पर्यवेक्षकों की भी नजर रहेगी।

    UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत की 30 साल पुरानी कोशिश को यूरोपीय समर्थन, लेकिन सुधार की राह अब भी अटकी

    Yugcharan News / 22-09-2026 भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता हासिल करने की करीब तीन दशक पुरानी कोशिश को 22 सितंबर 2026 को यूरोप के चार देशों के समूह से महत्वपूर्ण समर्थन मिला। न्यूयॉर्क में पहली V4+India विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद स्लोवाकिया के विदेश मंत्री युराज ब्लानार ने कहा कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में जगह मिलनी चाहिए। हालांकि, भारत की दावेदारी को लगातार मिल रहे अंतरराष्ट्रीय समर्थन के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया अभी भी किसी औपचारिक बातचीत के दस्तावेज तक नहीं पहुंच पाई है। V4 समूह में पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेकिया शामिल हैं। स्लोवाक विदेश मंत्री ने भारत को ग्लोबल साउथ का प्रमुख देश और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती शक्ति बताते हुए सुरक्षा परिषद में स्थायी भूमिका दिए जाने का समर्थन किया। यह समर्थन ऐसे समय आया है जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग को लगातार उठा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं की बैठक के दौरान कहा था कि सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता। भारत का जोर इस बात पर है कि सुधार को लेकर होने वाली बातचीत के लिए स्पष्ट समयसीमा और ठोस परिणाम तय किए जाएं। भारत की दावेदारी के सामने केवल समर्थन ही नहीं, कई सवाल भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि कितने देश भारत का समर्थन करते हैं। रक्षा और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ राजीश कुमार के मुताबिक, सुरक्षा परिषद के संभावित विस्तार से जुड़े कई बुनियादी सवाल अभी अनसुलझे हैं। इनमें यह तय करना शामिल है कि नए स्थायी सदस्य कौन होंगे, कितनी नई सीटें बनाई जाएंगी, उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में किस तरह बांटा जाएगा और एक ही क्षेत्र के अलग-अलग देशों की दावेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। भारत फिलहाल 2028-29 के लिए सुरक्षा परिषद की एक और दो वर्षीय गैर-स्थायी सीट के लिए भी अभियान चला रहा है। इस अभियान के लिए भारत ने ‘SHANTI’ थीम पेश की है। इस सीट के लिए चुनाव जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में होना है। सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना क्या है? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन। इन्हें P5 कहा जाता है। इन पांचों देशों के पास वीटो अधिकार है। इसका अर्थ है कि परिषद में किसी प्रस्ताव को रोकने की क्षमता प्रत्येक स्थायी सदस्य के पास होती है। बाकी 10 सदस्य महासभा के चुनाव के जरिए चुने जाते हैं और उनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इन गैर-स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 के तहत सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी और दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा इसकी पुष्टि जरूरी है। इसमें पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी अनिवार्य है। सुरक्षा परिषद का पिछला बड़ा विस्तार 1965 में हुआ था। उस समय निर्वाचित सदस्यों की संख्या छह से बढ़ाकर 10 की गई थी। सुधार प्रक्रिया 2009 से चल रही है भारत सुरक्षा परिषद में अधिक समान प्रतिनिधित्व की मांग लंबे समय से करता रहा है। 1992 में भारत उन गुटनिरपेक्ष देशों में शामिल था, जिन्होंने सुरक्षा परिषद में समान प्रतिनिधित्व से संबंधित महासभा के मसौदा प्रस्ताव की पहल की थी। सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ता यानी Intergovernmental Negotiations (IGN) की शुरुआत 2009 में हुई थी। हालांकि, इस प्रक्रिया में अभी तक ऐसा सहमत दस्तावेज तैयार नहीं हो सका है, जिसे सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए आधार बनाया जा सके। 2015 में महासभा ने सदस्य देशों की अलग-अलग राय को एकत्र करने वाले ढांचे संबंधी दस्तावेज को रिकॉर्ड में लिया था। इसे इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया, लेकिन इसके बाद भी वास्तविक टेक्स्ट-आधारित बातचीत शुरू नहीं हो सकी। भारत और G4 के उसके साझेदार—ब्राजील, जर्मनी और जापान—लगातार टेक्स्ट-आधारित वार्ता शुरू करने की मांग करते रहे हैं। P5 देशों का भारत को लेकर रुख सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस सार्वजनिक रूप से भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं। चीन का रुख अपेक्षाकृत अलग है। चीन ने विभिन्न मौकों पर संयुक्त राष्ट्र में भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षा को समर्थन देने की बात कही है। 12 सितंबर 2026 की ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणा में भी संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार का समर्थन किया गया था तथा ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात कही गई थी। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार किसी देश की स्थायी सदस्यता का समर्थन और किसी विशेष सुधार मॉडल का समर्थन दो अलग-अलग बातें हैं। भारत के पक्ष में पश्चिमी देशों का समर्थन होने के बावजूद वे जापान, जर्मनी और व्यापक सुरक्षा परिषद विस्तार के भी समर्थक हैं। सुरक्षा परिषद में वीटो का मुद्दा सबसे जटिल प्रश्नों में से एक बना हुआ है। पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा के अनुसार, P5 देशों के बीच वीटो को लेकर अपने हित हैं और नए स्थायी सदस्यों को समान वीटो अधिकार देने पर सहमति बनाना आसान नहीं रहा है। ‘कॉफी क्लब’ भी सुधार के रास्ते में बड़ी चुनौती सुरक्षा परिषद सुधार की बातचीत में ‘Uniting for Consensus’ नामक समूह भी सक्रिय है, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘कॉफी क्लब’ कहा जाता है। यह समूह नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने के बजाय लंबे कार्यकाल वाली निर्वाचित सीटों के विस्तार का समर्थन करता है। इस समूह के भीतर कई क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएं भी दिखाई देती हैं। भारत के स्थायी सदस्य बनने के दावे का पाकिस्तान विरोध करता रहा है, जबकि जापान, जर्मनी और ब्राजील की दावेदारियों के सामने क्रमशः दक्षिण कोरिया, इटली-स्पेन और अर्जेंटीना जैसे क्षेत्रीय हित जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया केवल भारत और चीन के बीच मतभेद का मामला नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों की अपनी-अपनी दावेदारियां भी प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं। पूर्व भारतीय स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति के अनुसार, इस समूह की स्थिति यह है कि सुधार पर तब तक औपचारिक बातचीत आगे नहीं बढ़नी चाहिए, जब तक सुधार के व्यापक मॉडल पर सहमति न बन जाए। इससे पहले बातचीत के लिए कोई दस्तावेज तैयार करना भी मुश्किल हो जाता है। G4 का छह स्थायी सीटों का प्रस्ताव भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान का G4 समूह लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग करता रहा है। G4 का मौजूदा प्रस्ताव 2005 के मसौदा प्रस्ताव से जुड़ा है। इस प्रस्ताव में छह नई स्थायी सीटें बनाने की बात कही गई थी। इनमें एशिया और अफ्रीका के लिए दो-दो तथा पश्चिमी यूरोप और लैटिन अमेरिका के लिए एक-एक सीट शामिल थी। इसके अलावा चार नई गैर-स्थायी सीटों का भी प्रस्ताव था। नए स्थायी सदस्यों को शुरुआत में वीटो का इस्तेमाल नहीं करने और 15 वर्ष बाद इसकी समीक्षा करने का प्रस्ताव रखा गया था। भारत ने अप्रैल 2026 में हुई अंतर-सरकारी वार्ता में इस प्रस्ताव के प्रति अपना समर्थन दोहराया। भारत का तर्क रहा है कि नए स्थायी सदस्यों को वीटो से पूरी तरह अलग रखना सुरक्षा परिषद में वास्तविक सुधार के उद्देश्य को सीमित कर सकता है। अफ्रीकी देशों की भूमिका निर्णायक अफ्रीकी देशों की स्थिति भी सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है। महासभा में अफ्रीकी समूह के 54 सदस्य हैं और किसी भी बड़े सुधार के लिए महासभा के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होने के कारण अफ्रीकी देशों की सामूहिक स्थिति का महत्व बढ़ जाता है। अफ्रीकी संघ का 2005 का ‘एजुलविनी कंसेंसस’ कम से कम दो नई स्थायी अफ्रीकी सीटों की मांग करता है। इसके साथ अफ्रीका के लिए पांच गैर-स्थायी सीटों की भी मांग की गई है। अफ्रीकी समूह के भीतर भी यह तय करने की चुनौती है कि स्थायी सीट मिलने की स्थिति में किन देशों को उसका प्रतिनिधित्व करना चाहिए। यही मुद्दा G4 की पुरानी पहल के लिए भी एक बड़ी बाधा रहा है। गैर-स्थायी सदस्य के रूप में भारत का रिकॉर्ड स्थायी सीट की मांग के समानांतर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गैर-स्थायी सदस्य के रूप में भी सक्रिय रहा है। भारत 2021-22 में सुरक्षा परिषद का सदस्य चुना गया था और उसे 193 सदस्यीय महासभा में 184 वोट मिले थे। भारत 1950-51 से अब तक आठ बार सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार, इन कार्यकालों के दौरान भारत ने सर्वसम्मति से अपनाए गए 90 प्रतिशत से अधिक प्रस्तावों के पक्ष में मतदान किया। संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत का योगदान भी उसकी दावेदारी का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। मई 2026 तक भारत नेपाल के बाद संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सैनिकों और पुलिसकर्मियों का दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता था। केवल सैन्य कर्मियों की संख्या के मामले में भारत सबसे बड़ा योगदानकर्ता बताया गया है। भारत पिछले छह दशकों में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के लिए 2.6 लाख से अधिक कर्मियों को भेज चुका है। इनमें 177 भारतीय शांति सैनिकों की ड्यूटी के दौरान मौत हुई है। आगे की राह क्या है? भारत को मिल रहा अंतरराष्ट्रीय समर्थन उसकी स्थायी सदस्यता की मांग को वैश्विक मंच पर बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन केवल समर्थन जुटाना पर्याप्त नहीं है। मुख्य चुनौती संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया को महासभा की सामान्य बहस से आगे ले जाकर एक ऐसे सहमत बातचीत दस्तावेज तक पहुंचाना है, जिस पर वास्तविक वार्ता शुरू हो सके। भारत और उसके G4 साझेदार टेक्स्ट-आधारित बातचीत की मांग कर रहे हैं, जबकि सुधार के मॉडल, स्थायी सीटों की संख्या, वीटो अधिकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भारत को अपनी स्थायी सदस्यता की मुहिम जारी रखते हुए विभिन्न क्षेत्रीय समूहों के साथ समर्थन और सहमति का दायरा बढ़ाना होगा। सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने की संभावना भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। फिलहाल स्थिति यह है कि भारत की दावेदारी को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और कई अन्य देशों से समर्थन मिल चुका है तथा अब V4 देशों ने भी इसके पक्ष में अपना रुख व्यक्त किया है। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का रास्ता तब तक औपचारिक रूप से आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक व्यापक सुधार मॉडल पर सदस्य देशों के बीच बातचीत और सहमति के लिए आवश्यक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।

    वंदे मातरम सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ‘नक्सली’ टिप्पणी पर वरिष्ठ वकील एस. मुरलीधर ने जताई आपत्ति

    Yugcharan News / 22-09-2026 नई दिल्ली: वंदे मातरम से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में उस समय तीखी बहस देखने को मिली, जब वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। संविधान और कानून बनाने की प्रक्रिया पर बहस के दौरान मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिस पर मुरलीधर ने इसे वापस लेने की मांग की और कहा कि इस तरह की अभिव्यक्ति किसी कानून अधिकारी के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही थी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों को विवाद के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं तक सीमित रहने को कहा। वंदे मातरम मामले में किस मुद्दे पर सुनवाई यह मामला वंदे मातरम को लेकर हाल में किए गए कानूनी बदलाव और केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों से संबंधित है। वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर याचिकाकर्ता टीएम कृष्णा की ओर से पेश हुए। याचिका में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम से जुड़े कानून में किए गए उस संशोधन को चुनौती दी गई है, जिसके तहत ‘राष्ट्रीय गीत’ को ‘राष्ट्रीय गान’ के समान कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार के उन परिपत्रों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के छह अंतरों के गायन से संबंधित निर्देश दिए गए हैं। मुरलीधर ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि इस तरह का संशोधन पर्याप्त राष्ट्रीय सहमति और व्यापक सार्वजनिक विमर्श के बिना जल्दबाजी में किया गया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि संबंधित संशोधन में ‘राष्ट्रीय गीत’ की स्पष्ट परिभाषा तक नहीं दी गई है। उनका कहना था कि ऐसे विषयों पर कानून बनाने से पहले व्यापक जनमत और सार्वजनिक चर्चा विकसित होना बेहतर होता है। उन्होंने कानून बनाने की ‘टॉप-डाउन’ प्रक्रिया को लेकर भी अपनी आपत्ति अदालत के सामने रखी। बहस के दौरान ‘नक्सली’ टिप्पणी इसी दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कानून बनाना संविधान के अनुसार होता है और यह ‘नक्सलियों के विचार’ के अनुसार नहीं हो सकता। मेहता की इस टिप्पणी पर मुरलीधर ने तुरंत आपत्ति जताई। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से इस्तेमाल किए गए शब्द को वापस लेने का आग्रह किया और कहा कि वह इस अभिव्यक्ति का कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहते हैं। मुरलीधर ने यह भी कहा कि कानून अधिकारी से इस प्रकार की भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती। उन्होंने अदालत के समक्ष अपनी आपत्ति दोहराते हुए कहा कि इस टिप्पणी को वापस लिया जाना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने हालांकि टिप्पणी पर माफी मांगने से इनकार किया। उनका तर्क था कि मुरलीधर संसद द्वारा किए गए निर्णय पर सवाल उठा रहे थे और वह केवल यह कह रहे थे कि कानून बनाने की प्रक्रिया संविधान के अनुरूप होनी चाहिए, न कि किसी कथित नक्सली विचारधारा के अनुसार। पीठ ने कहा—कानूनी मुद्दे तक सीमित रहें बहस के बीच न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्थिति को शांत करने का प्रयास करते हुए इसे अनावश्यक तनाव और भावनात्मकता बताया। मुरलीधर ने जवाब में कहा कि टिप्पणी की शुरुआत सॉलिसिटर जनरल की ओर से हुई और उन्होंने सवाल उठाया कि कानून अधिकारी द्वारा इस तरह की अभिव्यक्ति का इस्तेमाल क्यों किया गया। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि पीठ इस मामले में केवल संवैधानिक व्याख्या से जुड़े कानूनी सवाल की जांच कर रही है और सुनवाई को उसी मुद्दे तक सीमित रखा जाना चाहिए। मुरलीधर ने इसके बावजूद कानून अधिकारियों से अपेक्षित अदालती मर्यादा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अदालत में इस तरह के पदाधिकारियों से गरिमा और संयम की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने टिप्पणी को आदेश का हिस्सा नहीं बनाया सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा और इस संबंध में आदेश दर्ज किया। आदेश सुनाए जाने के बाद भी मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी का मुद्दा उठाया और उनसे इसे वापस लेने की मांग की। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि पीठ ने संबंधित टिप्पणियों को अपने आदेश में दर्ज नहीं किया है और वह संवैधानिक मुद्दे पर ही ध्यान केंद्रित कर रही है। मुरलीधर ने कहा कि वह कानून अधिकारी की ओर से इस्तेमाल किए गए शब्द के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने माफी से किया इनकार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि वह अपनी टिप्पणी के लिए माफी नहीं मांगेंगे। उन्होंने कहा कि उनका आशय यह था कि भारत में निर्णय लेने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के माध्यम से होती है और उन्होंने इसी संदर्भ में टिप्पणी की थी। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी कही बात को दोहरा सकते हैं और उन्हें इसके लिए खेद नहीं है। मुरलीधर ने इस पर आरोप लगाया कि टिप्पणी को अनावश्यक रूप से दोहराया जा रहा है और उन्होंने एक बार फिर अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने अदालत से कहा कि इस तरह की अभिव्यक्ति को कानून अधिकारी की ओर से प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने इस दौरान मुरलीधर से कहा कि वह अपने तर्क अगली तारीख की सुनवाई के लिए सुरक्षित रखें। संजय हेगड़े ने भी रखी अपनी बात सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े, जो किसी अन्य मामले के लिए अदालत में मौजूद थे, ने भी इस बहस के बीच अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का स्वतंत्र रूप से विचार रखना उसे नक्सली नहीं बनाता। न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि किसी व्यक्ति को ‘नक्सली’ कहे जाने से उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। सॉलिसिटर जनरल ने इस पर स्पष्टीकरण दिया कि वह किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं कह रहे थे, बल्कि एक विचारधारा के संदर्भ में बात कर रहे थे। हेगड़े ने दोबारा कहा कि केवल सोचना या किसी मुद्दे पर अपनी राय रखना किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं बना देता। संवैधानिक अदालतों की भूमिका पर न्यायमूर्ति बागची की टिप्पणी मुरलीधर के अदालत से चले जाने और अगला मामला शुरू होने के बाद भी न्यायमूर्ति बागची ने सॉलिसिटर जनरल से इस मुद्दे पर कुछ टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तिगत अनुभव में बार और बेंच दोनों स्तरों पर न्याय व्यवस्था ने असंवैधानिक ताकतों के खिलाफ लगातार काम किया है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक अदालतों के प्रति लोगों का भरोसा इसलिए बना रहता है क्योंकि अदालतें कानून के अनुसार सभी व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास करती हैं। न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि गंभीर आरोपों का सामना करने वाले लोगों को भी कानून के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने इस संदर्भ में कहा कि अदालतों ने ऐसे लोगों के मामलों की सुनवाई भी कानून के अनुसार की है, जिन पर गंभीर हिंसक अपराधों के आरोप लगे थे। सॉलिसिटर जनरल ने जवाब में कहा कि उनका आशय ऐसे व्यक्तियों से था जो संवैधानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में विश्वास नहीं रखते। हालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने फिर स्पष्ट किया कि पीठ ने इन टिप्पणियों को अपने आदेश का हिस्सा नहीं बनाया है। मामले की अगली सुनवाई में कानूनी मुद्दों पर रहेगा फोकस सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान हुई इस बहस के बावजूद पीठ ने मामले को मुख्य संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों तक सीमित रखने का संकेत दिया है। केंद्र से जवाब मांगा गया है और मामले की आगे की सुनवाई में वंदे मातरम से जुड़े कानूनी प्रावधानों, संशोधन की संवैधानिक वैधता तथा आधिकारिक कार्यक्रमों में इसके गायन से संबंधित निर्देशों पर दलीलें सुनी जाएंगी। इस सुनवाई ने अदालत में बहस के दौरान भाषा, पेशेवर मर्यादा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवालों को भी सामने ला दिया। हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि संबंधित टिप्पणियों को वह अपने आदेश में शामिल नहीं कर रही है और उसका ध्यान मुख्य रूप से मामले में उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों पर रहेगा।

    आईआईटी बॉम्बे ने छात्र की मौत पर पुराने बयान के लिए मांगी माफी, प्रोफेसर की डीन पद से छुट्टी

        Yugcharan News / 22-09-2026 मुंबई: आईआईटी बॉम्बे ने बीटेक छात्र साहिल वाकोड़े की मौत को लेकर अपने पहले के बयान पर माफी मांगी है। संस्थान ने कहा कि छात्र की मौत से पहले की परिस्थितियों के बारे में उसके शुरुआती बयान में की गई टिप्पणियां उचित जांच पूरी होने से पहले की गई थीं। इसी बीच, परिसर में छात्रों का विरोध जारी है और छात्र मामले की स्वतंत्र जांच तथा संस्थान की प्रक्रियाओं में बदलाव की मांग कर रहे हैं। दूसरे वर्ष के बीटेक छात्र साहिल वाकोड़े की शुक्रवार को छात्रावास के कमरे में मौत हो गई थी। इसके बाद आईआईटी बॉम्बे में छात्रों के बीच विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। छात्र की मौत को लेकर उसके परिवार ने जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। पुलिस ने परिवार की शिकायत के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित प्रावधानों और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। पुराने बयान पर संस्थान ने जताया खेद आईआईटी बॉम्बे ने सोमवार को जारी अपने नए बयान में कहा कि साहिल की मौत से संबंधित परिस्थितियों पर पहले जारी की गई जानकारी के लिए वह माफी मांगता है। संस्थान ने यह भी कहा कि मामले की जांच जारी है और जांच पूरी होने से पहले घटना से जुड़े विवरणों को तय तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं है। संस्थान के अनुसार, जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही छात्र की मौत से पहले हुई घटनाओं के बारे में स्पष्ट निष्कर्ष सामने आ सकेंगे। आईआईटी बॉम्बे ने यह भी स्पष्ट किया कि संस्थान के निदेशक शिरीष केदारे ने इस्तीफा नहीं दिया है। उनके इस्तीफे से संबंधित खबरों को संस्थान ने गलत बताया। हालांकि, विरोध कर रहे छात्रों से बातचीत के दौरान केदारे ने सोमवार को इस्तीफा देने की बात कही थी। परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन का मामला साहिल की मौत के बाद संस्थान ने शनिवार को एक बयान जारी किया था। इसमें कहा गया था कि छात्र ने एक मध्यावधि परीक्षा का प्रश्नपत्र अपने मोबाइल फोन से ChatGPT पर अपलोड कर उत्तर हासिल करने का प्रयास किया था। आईआईटी बॉम्बे के अनुसार, इसके बाद छात्र से संबंधित शिक्षक और विभागाध्यक्ष ने बातचीत की थी। संस्थान ने कहा था कि छात्र को समझाया गया और उसे आश्वस्त किया गया कि इस घटना का उसके अकादमिक करियर पर असर नहीं पड़ेगा। संस्थान ने यह भी कहा था कि उसके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। इस शुरुआती बयान की छात्रों ने आलोचना की। छात्रों का कहना था कि छात्र की मौत के तुरंत बाद परीक्षा और मोबाइल फोन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करना मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उचित नहीं था। संस्थान के सोशल मीडिया अकाउंट पर पुराना बयान बाद में जारी किए गए स्पष्टीकरण के बावजूद मौजूद रहा। छात्रों ने की स्वतंत्र जांच की मांग साहिल की मौत के बाद आईआईटी बॉम्बे परिसर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन तेज हुआ। प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने मामले की स्वतंत्र जांच कराने, संस्थान की अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं में बदलाव करने और छात्रों के लिए बेहतर सुरक्षा एवं सहायता व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की। विरोध के बीच संस्थान के निदेशक ने छात्रों के साथ बैठक की और 18 मांगों वाले एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए। संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की एक आपात बैठक भी प्रस्तावित है। इसके बाद निदेशक द्वारा छात्रों के साथ ओपन हाउस आयोजित किए जाने की बात कही गई है। परिवार ने लगाए जातिगत भेदभाव के आरोप साहिल वाकोड़े के माता-पिता ने आरोप लगाया है कि उनके बेटे को आईआईटी बॉम्बे में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। परिवार की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया है। हालांकि, ये आरोप अभी जांच के अधीन हैं और किसी जांच या न्यायिक प्रक्रिया में अभी स्थापित तथ्य के रूप में सामने नहीं आए हैं। आईआईटी बॉम्बे ने जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया है। संस्थान का कहना है कि साहिल ने उसके एससी/एसटी छात्र एवं कर्मचारी प्रकोष्ठ में ऐसी कोई शिकायत नहीं की थी। मामले में प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला का नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया है। इसके बाद उन्होंने आईआईटी बॉम्बे में अपने पद से हटने की घोषणा की है। फैकल्टी फोरम ने प्रोफेसर का समर्थन किया इस बीच आईआईटी बॉम्बे के फैकल्टी फोरम ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के समर्थन में बयान जारी किया है। फोरम के अनुसार, परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन के कथित अनधिकृत इस्तेमाल की स्थिति में प्रोफेसर संस्थान द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। फैकल्टी फोरम ने कहा कि उसके सहयोगी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली कार्रवाई को लेकर वह चिंतित है और उसके अनुसार प्रोफेसर ने परीक्षा संबंधी निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था। इस मामले पर कुछ राजनीतिक नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों की ओर से भी प्रतिक्रियाएं आई हैं। भाजपा के तेनकासी जिला अध्यक्ष अनंतन अय्यासामी ने सोशल मीडिया पर प्रोफेसर के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मामले का विरोध किया। उन्होंने मामले में कानून के कथित दुरुपयोग का आरोप भी लगाया। ज़ोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने अय्यासामी की पोस्ट को साझा करते हुए प्रोफेसर डूला के समर्थन में अपनी प्रतिक्रिया दी। शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि परीक्षा में कथित नकल की रिपोर्टिंग करने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई को छात्र की मौत के पूरे विवाद का समाधान मानना पर्याप्त नहीं होगा। इन राजनीतिक और सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं के बावजूद, साहिल की मौत तथा जातिगत भेदभाव से जुड़े आरोपों की जांच अभी जारी है। सात महीनों में तीसरी अप्राकृतिक मौत साहिल वाकोड़े की मौत इस वर्ष आईआईटी बॉम्बे परिसर में अप्राकृतिक मौत की तीसरी घटना बताई जा रही है। फरवरी में 21 वर्षीय बीटेक सिविल इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष के छात्र नमन अग्रवाल की छात्रावास की इमारत की छत से गिरने के बाद मौत हुई थी। पुलिस ने उस समय आकस्मिक मृत्यु रिपोर्ट दर्ज की थी और कहा था कि कोई सुसाइड नोट नहीं मिला। जुलाई में 20 वर्षीय मटेरियल साइंस के दूसरे वर्ष के छात्र सोहिल राजकुमार संगवान छात्रावास के कमरे में मृत मिले थे। पुलिस की प्रारंभिक जांच में पारिवारिक परिस्थितियों और निजी संबंधों से जुड़ी परेशानियों की ओर संकेत किया गया था और उस समय किसी साजिश की आशंका नहीं जताई गई थी। देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में छात्रों की मौत की घटनाओं ने अकादमिक दबाव, मानसिक स्वास्थ्य और कैंपस सहायता व्यवस्था को लेकर भी चर्चा तेज की है। अन्य आईआईटी में भी सामने आईं चिंताएं आईआईटी दिल्ली में मार्च में प्रथम वर्ष के बीटेक सिविल इंजीनियरिंग छात्र हर्षित स्वामी की परिसर में मौत हुई थी। संस्थान के सुरक्षा अधिकारी की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित मामला दर्ज किया था। संस्थान ने उस समय घटना पर दुख जताते हुए छात्रों और शिक्षकों के लिए सहायता तथा काउंसलिंग की व्यवस्था उपलब्ध कराने की बात कही थी। आईआईटी बॉम्बे में 2023 में 18 वर्षीय प्रथम वर्ष के बीटेक छात्र दर्शन सोलंकी की आत्महत्या से भी कैंपस में जातिगत भेदभाव को लेकर गंभीर बहस हुई थी। उनके परिवार ने जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। पुलिस की चार्जशीट में भी उनके परिवार के सामने जाति का पता चलने के बाद छात्रों के व्यवहार में बदलाव की बात दर्ज की गई थी। इन घटनाओं के बीच विभिन्न आईआईटी संस्थानों ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और परीक्षा संबंधी दबाव को लेकर सहायता उपायों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं। आईआईटी खड़गपुर के निदेशक सुमन चक्रवर्ती ने भी परीक्षाओं से पहले छात्रों के लिए संदेश जारी करते हुए उन्हें अकादमिक परिणामों को अपनी पूरी पहचान से जोड़कर नहीं देखने की सलाह दी थी। उन्होंने छात्रों को यह भरोसा दिलाने पर जोर दिया कि कठिन समय में संस्थान की सहायता उनके साथ है। फिलहाल आईआईटी बॉम्बे में साहिल वाकोड़े की मौत से जुड़ी जांच जारी है। संस्थान ने अपने शुरुआती बयान पर माफी मांगते हुए कहा है कि जांच पूरी होने से पहले घटना की परिस्थितियों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। छात्रों की मांग, परिवार के आरोप और संस्थान के पक्ष के बीच अब पुलिस जांच तथा प्रस्तावित संस्थागत बैठकों के नतीजे इस मामले की आगे की दिशा तय करेंगे।

    दिल्ली के कालकाजी पार्क में पुलिसकर्मी बनकर पहुंचे तीन लोगों पर 17 वर्षीय किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म का आरोप, तीनों गिरफ्तार

    Yugcharan News / 22-09-2026 नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराध का एक और मामला सामने आया है। दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास स्थित एक पार्क में 17 वर्षीय किशोरी से कथित तौर पर तीन लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया। पुलिस के अनुसार, आरोपी खुद को पुलिसकर्मी बताकर किशोरी और उसके 17 वर्षीय पुरुष मित्र के पास पहुंचे थे। घटना के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, घटना सोमवार शाम की है। किशोरी अपने 17 वर्षीय दोस्त के साथ करीब शाम 7 बजे कालकाजी मंदिर गई थी। मंदिर में प्रार्थना करने के बाद दोनों करीब 7:30 बजे मंदिर के पास स्थित एक पार्क में चले गए। आरोप है कि इसी दौरान करीब 25 से 30 वर्ष की उम्र के तीन लोगों ने उन्हें रोका और खुद को पुलिसकर्मी बताया। पुलिसकर्मी बताकर धमकाने का आरोप शिकायत के आधार पर पुलिस ने बताया कि तीनों आरोपियों ने किशोरी और उसके दोस्त को धमकाया। आरोप है कि एक आरोपी ने किशोरी को हथियार और चाकू दिखाकर डराया तथा उसके साथ यौन हिंसा की। इसके बाद दो अन्य आरोपियों ने भी कथित तौर पर किशोरी का यौन उत्पीड़न किया। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने घटना के बाद किशोरी और उसके दोस्त को धमकी भी दी। घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने तत्काल जांच शुरू की। पार्क से संबंधित कथित दुष्कर्म की सूचना रात करीब 8:45 बजे पुलिस कंट्रोल रूम को दी गई। यह पार्क कालकाजी मंदिर और इस्कॉन मंदिर को जोड़ने वाले क्षेत्र में स्थित बताया गया है। सूचना मिलने के बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची। मेडिकल जांच और बयान दर्ज पुलिस ने किशोरी को चिकित्सकीय जांच के लिए भेजा। अधिकारियों के अनुसार, मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई किशोरी के बयान और जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है। चूंकि पीड़िता नाबालिग है, इसलिए उसकी पहचान से जुड़ी किसी भी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया है। पुलिस ने मामले में बाल यौन अपराधों से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू की है। जांच के दौरान पुलिस ने पार्क और उसके आसपास के इलाकों के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली। अधिकारियों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि घटना के समय पार्क और आसपास कौन-कौन लोग मौजूद थे। सीसीटीवी फुटेज के अलावा पुलिस ने इलाके में मौजूद लोगों से भी जानकारी जुटाई। एक आरोपी मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार जांच के दौरान आरोपियों की तलाश के लिए पुलिस की कई टीमें बनाई गईं। पुलिस के अनुसार, एक टीम को आरोपियों में से एक के अमर कॉलोनी स्थित डीएम ऑफिस रोड के पास होने की सूचना मिली। इसके बाद पुलिस ने वहां उसे पकड़ने के लिए घेराबंदी की। पुलिस का दावा है कि आरोपी को रोकने के बाद उसने पुलिस टीम पर गोली चला दी। अधिकारियों के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने उसे आत्मसमर्पण करने के लिए कहा, लेकिन उसने तीन राउंड फायर किए। इसके बाद पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें आरोपी के दाहिने पैर में गोली लगी। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और उसे उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। उसकी पहचान आसिफ के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, वह ओखला मंडी में काम करता है। मुठभेड़ स्थल पर फोरेंसिक टीम ने भी जांच की। घटनास्थल से संबंधित साक्ष्यों को सुरक्षित करने और गोलीबारी की परिस्थितियों की जांच के लिए आवश्यक प्रक्रिया अपनाई जा रही है। दो अन्य आरोपी भी गिरफ्तार पुलिस ने मामले में फरार चल रहे दो अन्य आरोपियों को भी मंगलवार को गिरफ्तार कर लिया। उनकी पहचान हेमंत और मुकेश के रूप में हुई है। इस तरह कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले में तीनों आरोपी अब पुलिस की गिरफ्त में हैं। पुलिस ने बताया कि मामले में भारतीय कानून की संबंधित धाराओं के साथ-साथ पॉक्सो यानी बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई है। आगे की जांच में आरोपियों की भूमिका और घटना से जुड़े अन्य साक्ष्यों की जांच की जाएगी। दस दिनों में नाबालिगों से जुड़े कई मामले कालकाजी की यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब दिल्ली में पिछले कुछ दिनों में नाबालिग लड़कियों के खिलाफ यौन अपराधों के कई मामले सामने आए हैं। 13 सितंबर को उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के स्वरूप नगर इलाके में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का मामला सामने आया था। इस मामले में चार लोगों पर आरोप लगाए गए थे, जिनमें तीन नाबालिग बताए गए थे। इसके बाद 16 सितंबर को उत्तर दिल्ली के सदर बाजार इलाके में छठी कक्षा में पढ़ने वाली 10 वर्षीय छात्रा के साथ कथित यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया। आरोप था कि एक दुकान के भीतर बच्ची के हाथ-पैर बांधकर उसके साथ यौन अपराध किया गया। 21 सितंबर को मध्य दिल्ली के किशनगंज इलाके में छह वर्षीय बच्ची के साथ कथित यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया। पुलिस के अनुसार, इस मामले में 34 वर्षीय एक व्यक्ति पर आरोप लगाया गया था। इन घटनाओं के बीच कालकाजी पार्क में 17 वर्षीय किशोरी से कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला राजधानी में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करता है। जांच जारी पुलिस फिलहाल मामले से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, घटनास्थल से मिले साक्ष्य और आरोपियों से पूछताछ के आधार पर जांच आगे बढ़ा रही है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि आरोपियों ने कथित तौर पर खुद को पुलिसकर्मी बताकर किशोरी और उसके दोस्त को किस तरह रोका और घटना को अंजाम दिया। पुलिस की ओर से मुठभेड़ के दौरान गोली चलने की घटना को लेकर भी जांच की प्रक्रिया जारी है। आरोपी आसिफ के घायल होने के बाद उसका उपचार कराया जा रहा है, जबकि हेमंत और मुकेश को भी गिरफ्तार कर पुलिस मामले की आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है।   फिलहाल पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की जांच जारी है। नाबालिग पीड़िता से जुड़े संवेदनशील मामले में आगे की कार्रवाई उसके बयान, चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।

    ट्रंप का CNN, Politico और MS NOW पर हमला, व्हाइट हाउस पहुंच को लेकर कानूनी लड़ाई तेज

        Yugcharan News / 22-09-2026 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने CNN, Politico और MS NOW पर तीखा हमला बोला है। यह विवाद तब बढ़ गया जब इन तीनों समाचार संगठनों ने व्हाइट हाउस से अपने पत्रकारों की पहुंच रोके जाने के खिलाफ संघीय अदालत में मुकदमा दायर किया। मीडिया संगठनों का कहना है कि प्रशासन का यह कदम उनके संवैधानिक प्रेस अधिकारों का उल्लंघन करता है और पत्रकारों को प्रतिबंध लगाने के फैसले को चुनौती देने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। तीनों संगठनों ने वॉशिंगटन की संघीय अदालत में याचिका दाखिल करते हुए व्हाइट हाउस में अपनी प्रेस पहुंच बहाल करने की मांग की है। विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि क्या प्रशासन किसी समाचार संगठन की रिपोर्टिंग से असहमति के आधार पर उसके पत्रकारों की व्हाइट हाउस तक पहुंच सीमित कर सकता है। ट्रंप ने मीडिया संगठनों पर लगाए आरोप ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर CNN, Politico और MS NOW की आलोचना करते हुए उन्हें “फेक न्यूज” संगठन बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संस्थानों की रिपोर्टिंग उनके और उनके प्रशासन के बारे में लगातार नकारात्मक रही है और कुछ रिपोर्टों को उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदेह बताया। राष्ट्रपति ने अपने पोस्ट में व्हाइट हाउस तक मीडिया की पहुंच को लेकर प्रशासन के अधिकार का बचाव किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के कार्यालय को गरिमा और सम्मान के साथ देखा जाना चाहिए और ऐसे मीडिया संस्थानों को पहुंच देने पर सवाल उठाया जो, उनके अनुसार, उनके बारे में नकारात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि तीनों मीडिया संगठनों द्वारा दायर मुकदमा उस न्यायाधीश के समक्ष गया है जिसे उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान नियुक्त किया था। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अदालत का फैसला उनके प्रशासन के खिलाफ आता है तो मामला अपील में जा सकता है। पत्रकारों की प्रेस क्रेडेंशियल वापस लेने का दावा मीडिया संगठनों के अनुसार, प्रशासन द्वारा उनकी पहुंच पर रोक लगाए जाने के बाद शनिवार को उनके पत्रकारों को व्हाइट हाउस परिसर में प्रवेश से रोका गया और उनके प्रेस क्रेडेंशियल वापस ले लिए गए। CNN को राष्ट्रपति के कार्यक्रमों के लिए निर्धारित टेलीविजन पूल ड्यूटी से भी हटाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति के सार्वजनिक कार्यक्रमों की टेलीविजन कवरेज के लिए प्रमुख समाचार नेटवर्क साझा पूल व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं, जिसके जरिए विभिन्न नेटवर्क राष्ट्रपति के कार्यक्रमों को कवर करते हैं। CNN को पूल से हटाए जाने के बाद ABC, CBS, Fox News और NBC ने भी संबंधित निर्धारित राष्ट्रपति कार्यक्रमों की टेलीविजन पूल कवरेज बंद करने की घोषणा की। इस घटनाक्रम ने प्रेस और व्हाइट हाउस के बीच चल रहे विवाद को और व्यापक बना दिया। प्रथम संशोधन के अधिकारों का हवाला CNN, MS NOW और Politico ने अदालत से तत्काल राहत देने और मामले की सुनवाई के दौरान अपनी व्हाइट हाउस पहुंच बहाल करने का अनुरोध किया है। तीनों संगठनों ने संयुक्त बयान में कहा कि मुकदमे का उद्देश्य उनके प्रथम संशोधन अधिकारों की रक्षा करना है। उनका तर्क है कि सरकार को यह तय नहीं करना चाहिए कि प्रेस क्या रिपोर्ट करेगा या क्या प्रकाशित करेगा। अमेरिकी संविधान का प्रथम संशोधन प्रेस की स्वतंत्रता सहित कई महत्वपूर्ण स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करता है। इसी संवैधानिक प्रावधान का हवाला देते हुए मीडिया संगठनों ने प्रशासन की कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी है। जज टिमोथी केली के सामने मामला मामले की सुनवाई अमेरिकी जिला न्यायाधीश टिमोथी केली कर रहे हैं। केली की नियुक्ति ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी। कैली इससे पहले 2018 में CNN के पत्रकार जिम एकोस्टा से जुड़े प्रेस-एक्सेस विवाद की सुनवाई भी कर चुके हैं। उस समय व्हाइट हाउस ने एकोस्टा की प्रेस पहुंच रद्द कर दी थी। केली ने प्रशासन को अस्थायी तौर पर एकोस्टा का प्रेस पास बहाल करने का आदेश दिया था। वर्तमान मामले में CNN, MS NOW और Politico ने अदालत से जल्द हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। उनकी मांग पर सुनवाई बुधवार को निर्धारित की गई थी। विवाद का केंद्र बना व्हाइट हाउस प्रेस एक्सेस मामले की कानूनी बहस में कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ सकते हैं। इनमें यह सवाल शामिल है कि क्या सरकार किसी समाचार संगठन की रिपोर्टिंग से असंतुष्ट होने के आधार पर उसके पत्रकारों की सरकारी परिसर तक पहुंच प्रतिबंधित कर सकती है। इसके अलावा, यह भी सवाल है कि पत्रकारों और समाचार संगठनों को ऐसे प्रतिबंध के खिलाफ अपना पक्ष रखने तथा प्रशासन के फैसले को चुनौती देने के लिए उचित प्रक्रिया उपलब्ध कराई गई थी या नहीं। मीडिया संगठनों का कहना है कि सरकार को प्रेस की रिपोर्टिंग की सामग्री के आधार पर उसके साथ अलग व्यवहार नहीं करना चाहिए। दूसरी ओर, प्रशासन व्हाइट हाउस में मीडिया पहुंच को लेकर अपने अधिकारों का हवाला दे रहा है। अदालत के सामने अब यह तय करना होगा कि मामले की सुनवाई के दौरान पत्रकारों की पहुंच तत्काल बहाल की जानी चाहिए या नहीं। अंतिम कानूनी विवाद में प्रेस की स्वतंत्रता, सरकारी परिसर तक पहुंच और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े संवैधानिक तथा प्रक्रियात्मक मुद्दे सामने आ सकते हैं। पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे विवाद ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी समाचार संगठनों के बीच प्रेस पहुंच को लेकर यह पहला कानूनी विवाद नहीं है। इससे पहले Associated Press भी व्हाइट हाउस के कुछ कार्यक्रमों में अपनी पहुंच को लेकर कानूनी कार्रवाई कर चुका है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी कई पत्रकारों और समाचार संगठनों की प्रेस पहुंच को लेकर विवाद सामने आए थे। जिम एकोस्टा से जुड़ा 2018 का मामला इसी तरह के विवादों में प्रमुख रहा था। वर्तमान मामले में तीन समाचार संगठनों की संयुक्त कानूनी चुनौती और टेलीविजन पूल से जुड़ी अन्य प्रमुख अमेरिकी नेटवर्क की प्रतिक्रिया ने विवाद को व्यापक बना दिया है। आगे अदालत की सुनवाई पर नजर CNN, Politico और MS NOW की याचिका पर होने वाली सुनवाई अब इस विवाद की अगली महत्वपूर्ण कड़ी होगी। तीनों संगठन चाहते हैं कि मामले की अंतिम सुनवाई तक उनकी व्हाइट हाउस प्रेस पहुंच बहाल की जाए। वहीं, प्रशासन की ओर से यह रुख सामने आया है कि व्हाइट हाउस में मीडिया पहुंच को लेकर उसके पास अधिकार हैं। ऐसे में अदालत को प्रेस की संवैधानिक स्वतंत्रता और सरकारी परिसर में प्रवेश से जुड़े प्रशासनिक अधिकारों के बीच कानूनी प्रश्नों पर विचार करना होगा। फिलहाल मामला अदालत के समक्ष विचाराधीन है और बुधवार की सुनवाई के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि पत्रकारों की व्हाइट हाउस पहुंच को लेकर तत्काल क्या व्यवस्था लागू होती है। विवाद का अंतिम परिणाम आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही पर निर्भर करेगा।