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    सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज की, 2030 तक जेल में रहने का रास्ता साफ

    Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। सलेम ने अदालत के सामने दलील दी थी कि पुर्तगाल से उसके प्रत्यर्पण के समय भारत की ओर से दिए गए आश्वासन के तहत तय 25 वर्ष की अधिकतम कैद की अवधि की गणना में जेल में अर्जित रिमिशन और विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई गई अवधि को भी शामिल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल सलेम को राहत नहीं मिली है और उसकी रिहाई का रास्ता 2030 तक टल गया है। यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। अदालत ने इससे पहले मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद संकेत दिया था कि याचिका खारिज की जा सकती है। हालांकि, उस समय अदालत ने अंतिम आदेश सुरक्षित रखते हुए पक्षकारों को लिखित दलीलें और संबंधित न्यायिक फैसले दाखिल करने का अवसर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने सलेम की उस मांग को स्वीकार नहीं किया, जिसके जरिए वह अपनी सजा की गणना में विभिन्न प्रकार की रियायतों को जोड़कर तत्काल रिहाई का दावा कर रहा था। अबू सलेम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने अदालत के समक्ष मुख्य रूप से जेल में बिताई गई अवधि और अर्जित रिमिशन से जुड़े कानूनी पहलुओं पर जोर दिया था। उनका तर्क था कि जिस अवधि में सलेम विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में रहा, उसे उसकी सजा की अवधि में समायोजित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, अच्छे आचरण के कारण उसे जो अर्जित रिमिशन मिला, उसे भी वास्तविक कारावास की अवधि की गणना में शामिल किया जाना चाहिए। सलेम की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया था कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत मिलने वाली सामान्य या वैधानिक रिमिशन की मांग नहीं कर रहा है। उसका दावा विशेष रूप से उस रिमिशन को लेकर था, जो कैदी को अच्छे व्यवहार, निर्धारित कार्यों के पालन और जेल नियमों के तहत उपलब्ध कराया जाता है। सलेम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले स्वामी श्रद्धानंद उर्फ मुरली मनोहर बनाम कर्नाटक राज्य का हवाला देते हुए कहा था कि अच्छे आचरण के आधार पर मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक रूप से मिलने वाली रिमिशन को वास्तविक कारावास की अवधि का हिस्सा माना जा सकता है। उनके अनुसार, सलेम ने जेल में अच्छे आचरण के आधार पर करीब तीन वर्ष और दो महीने की रिमिशन अर्जित की थी। उनका यह भी दावा था कि अन्य मामलों में दोषियों की रिहाई के समय ऐसी रिमिशन को ध्यान में रखा गया है। सलेम ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को भी चुनौती दी थी, जिसमें अदालत ने कहा था कि पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के दौरान भारत द्वारा दिए गए आश्वासन के आधार पर तय 25 वर्ष की अवधि को सामान्य जेल रिमिशन के जरिए और कम नहीं किया जा सकता। सलेम की ओर से दलील थी कि 25 वर्ष की अवधि को वास्तविक कारावास की गणना के दौरान इस तरह देखा जाना चाहिए कि विचाराधीन कैदी के रूप में बिताया समय और अर्जित रिमिशन दोनों उसमें समायोजित हों। इस पूरे विवाद की जड़ वर्ष 2002 में हुए अबू सलेम के प्रत्यर्पण से जुड़ी है। भारत ने 17 दिसंबर 2002 को पुर्तगाल को आश्वासन दिया था कि सलेम को भारत में मौत की सजा नहीं दी जाएगी और प्रत्यर्पण की शर्तों के तहत उसे 25 वर्ष से अधिक समय तक जेल में नहीं रखा जाएगा। बाद में यही आश्वासन सलेम की कानूनी लड़ाई का प्रमुख आधार बन गया। जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रत्यर्पण व्यवस्था पर विचार किया था। अदालत ने कहा था कि पुर्तगाल को दिए गए भारत के आश्वासन और संबंधित प्रत्यर्पण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सलेम को 25 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद रिहा करना होगा। इसके बाद सलेम ने दावा किया कि उसकी हिरासत की अलग-अलग अवधियों को जोड़ने और जेल में अर्जित रिमिशन को समायोजित करने पर 25 वर्ष की अवधि लगभग पूरी हो चुकी है। सलेम के अनुसार, वह नवंबर 2005 से सितंबर 2017 तक करीब 11 वर्ष, 9 महीने और 26 दिन विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में रहा था। इसके बाद दोषी ठहराए जाने के बाद उसने लगभग 9 वर्ष, 10 महीने और 4 दिन जेल में बिताए। उसने अच्छे आचरण के आधार पर करीब तीन वर्ष और 16 दिन की रिमिशन का भी दावा किया था। इसके अलावा पुर्तगाल में विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई गई अवधि के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई करीब एक महीने की अतिरिक्त राहत को भी उसने अपनी गणना में शामिल किया। इन सभी अवधियों को जोड़कर सलेम का दावा था कि उसने लगभग 25 वर्ष की प्रभावी कारावास अवधि पूरी कर ली है। इसी आधार पर उसने अपनी तत्काल रिहाई की मांग की थी। उसने यह भी कहा था कि लगातार हिरासत में रखा जाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित सवाल पैदा करता है। उसने अदालत से अधिकारियों को उसकी रिहाई की सटीक तारीख निर्धारित करने का निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने अप्रैल 2025 में उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि भारत द्वारा पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन के तहत 25 वर्ष की अवधि अभी पूरी नहीं हुई है और इसकी समाप्ति नवंबर 2030 में होगी। अदालत ने सलेम की उस मांग को समय से पहले और कानूनी रूप से गलत बताया था, जिसमें उसने अर्जित रिमिशन को 25 वर्ष की अधिकतम सीमा से घटाने की कोशिश की थी। हाई कोर्ट के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या जेल में अच्छे आचरण के आधार पर मिलने वाली सामान्य रिमिशन का इस्तेमाल उस 25 वर्ष की अवधि को और कम करने के लिए किया जा सकता है, जिसे प्रत्यर्पण की अंतरराष्ट्रीय शर्तों के तहत लागू किया गया था। अदालत ने इसका जवाब नकारात्मक दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि 25 वर्ष की सीमा स्वयं एक विशेष व्यवस्था है, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में उम्रकैद का अर्थ केवल निश्चित संख्या में वर्षों की सजा नहीं होता। सलेम के मामले में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के कारण एक विशेष अधिकतम अवधि सामने आई थी। ऐसे में यदि जेल नियमों के तहत मिलने वाली सामान्य रिमिशन को भी इसमें घटा दिया जाए, तो इससे उस व्यवस्था का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं था कि महाराष्ट्र जेल नियमों के तहत मिलने वाली अर्जित रिमिशन को 25 वर्ष की प्रत्यर्पण-आधारित अवधि को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाना था। हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र प्रिजन्स (रिमिशन सिस्टम) रूल्स, 1962 के तहत मिलने वाली रियायतों और सीआरपीसी की धारा 432 के तहत मिलने वाली रिमिशन के बीच भी अंतर को ध्यान में रखा था। हाई कोर्ट ने सलेम की गिरफ्तारी की तारीख 11 नवंबर 2005 को आधार मानते हुए कहा था कि 25 वर्ष की अवधि की साधारण गणना करने पर यह नवंबर 2030 में पूरी होगी। इस निष्कर्ष के बाद सलेम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सलेम की ओर से इस बात पर जोर दिया गया कि उसकी जेल में वास्तविक मौजूदगी और विचाराधीन कैदी के रूप में बिताया समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बचाव पक्ष ने यह समझाने की कोशिश की कि वास्तविक कारावास और रिमिशन के कानूनी प्रभावों को अलग-अलग तरीके से देखने के बजाय सजा की कुल अवधि निर्धारित करते समय उन्हें समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि इस चरण पर अदालत ने सलेम के पक्ष में ऐसा कोई आदेश देने से इनकार कर दिया है, जिससे 25 वर्ष की अवधि पहले पूरी मानी जाए। इसका सीधा अर्थ यह है कि सलेम की समयपूर्व रिहाई की मौजूदा मांग सफल नहीं हुई। अबू सलेम का नाम भारत के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में लंबे समय से जुड़ा रहा है। 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों ने देश को झकझोर कर रख दिया था और इस मामले की जांच तथा सुनवाई कई वर्षों तक चली। सलेम को इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा मिली। पुर्तगाल से उसका प्रत्यर्पण भी लंबे समय तक कानूनी और कूटनीतिक चर्चा का विषय रहा। मौजूदा विवाद केवल सलेम की व्यक्तिगत रिहाई से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह इस व्यापक कानूनी प्रश्न से भी जुड़ा है कि किसी आरोपी या दोषी के प्रत्यर्पण के दौरान भारत द्वारा दूसरे देश को दिए गए आश्वासन का घरेलू आपराधिक न्याय व्यवस्था में किस तरह प्रभाव पड़ता है। साथ ही, यह मामला जेल रिमिशन, विचाराधीन हिरासत और उम्रकैद की सजा के बीच संबंध को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी बहस सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सलेम की ओर से उठाया गया 25 वर्ष की गणना और अर्जित रिमिशन का मुद्दा फिलहाल उसके पक्ष में नहीं गया है। अदालत के निर्णय ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस दृष्टिकोण को प्रभावी रूप से बरकरार रखा है कि सामान्य जेल रिमिशन को भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण प्रतिबद्धता के तहत तय 25 वर्ष की अवधि को कम करने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। फिलहाल सलेम की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज हो चुकी है और नवंबर 2030 की अवधि इस मामले में महत्वपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलू और भविष्य में उठने वाली कोई नई चुनौती अलग न्यायिक प्रक्रिया का विषय हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण आश्वासन और घरेलू जेल नियमों के बीच टकराव की स्थिति में अदालतें संबंधित प्रतिबद्धताओं और उनके मूल उद्देश्य को गंभीरता से देखती हैं।

    स्टालिन का विजय पर पलटवार, बोले- आपातकाल में जेल में पुलिस ने तोड़े थे मेरे जबड़े; विधानसभा बयान पर मचा सियासी घमासान

    Yugcharan News / 10-09-2026 चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में आपातकाल के दौर की घटनाओं को लेकर एक बार फिर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने गुरुवार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के विधानसभा में दिए गए बयान और कथित इशारे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। स्टालिन ने सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो के माध्यम से अपने पुराने अनुभव को सामने रखते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान जेल में उनके साथ पुलिस ने बर्बर व्यवहार किया था और उनके जबड़े की हड्डियां तक तोड़ दी गई थीं। स्टालिन ने कहा कि विधानसभा में उनके बारे में कथित तौर पर किया गया शारीरिक इशारा केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं था, बल्कि वह उनके जीवन में घट चुकी एक गंभीर घटना की याद दिलाता है। उन्होंने अपने वीडियो में उस दौर की परिस्थितियों का जिक्र किया और बताया कि आपातकाल के दौरान उन्हें और उनके साथ मौजूद अन्य लोगों को जेल में एक ऐसे वार्ड में रखा गया था, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर कुष्ठ रोगियों के लिए किया जाता था। यह बयान ऐसे समय आया है जब तमिलनाडु की राजनीति में आगामी राजनीतिक मुकाबलों को लेकर पहले से ही तीखी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री विजय और स्टालिन के बीच राजनीतिक मतभेद लगातार सार्वजनिक मंचों पर सामने आते रहे हैं। विधानसभा में दिए गए विजय के कथित बयान के बाद स्टालिन ने अपने सोशल मीडिया वीडियो के जरिये सीधे जवाब देकर इस विवाद को और व्यापक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। स्टालिन ने अपने बयान में आपातकाल के दौरान जेल में बिताए गए दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि उस समय उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई थी और उनके जबड़ों पर गंभीर चोटें आई थीं। उनका कहना है कि जेल में पुलिस की कार्रवाई के दौरान उनके जबड़े टूट गए थे। स्टालिन ने इस घटना को अपने राजनीतिक जीवन के बेहद कठिन दौर के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि उस समय उन्होंने तथा अन्य लोगों ने जेल के भीतर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना किया। आपातकाल भारतीय राजनीतिक इतिहास का एक बेहद संवेदनशील अध्याय रहा है। 1975 से 1977 के बीच देश में आपातकाल लागू रहा था, जिसके दौरान विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और सरकार की आलोचना करने वाले कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं और राजनीतिक अधिकारों को लेकर देशभर में व्यापक बहस हुई थी। तमिलनाडु भी इससे अछूता नहीं रहा और राज्य के कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने उस समय गिरफ्तारी तथा जेल से जुड़े अनुभवों का सामना किया। स्टालिन का मौजूदा बयान इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ले आया है। डीएमके अध्यक्ष ने अपने वीडियो में यह बताने की कोशिश की कि आपातकाल के दौरान उनके साथ क्या हुआ था और क्यों विधानसभा में किया गया कथित इशारा उनके लिए विशेष रूप से गंभीर है। उन्होंने अपने पुराने अनुभव को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री विजय पर निशाना साधा। स्टालिन के मुताबिक, उन्हें और उनके साथ गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों को जिस स्थान पर रखा गया था, वह सामान्य जेल वार्ड से अलग था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें एक ऐसे वार्ड में रखा गया था जिसे कुष्ठ रोगियों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उनके अनुसार, उस समय की परिस्थितियां बेहद कठिन थीं और जेल के भीतर उनके साथ कथित तौर पर हिंसक व्यवहार किया गया। स्टालिन की ओर से यह बयान जारी किए जाने के बाद तमिलनाडु की राजनीतिक बहस में आपातकाल का मुद्दा फिर से महत्वपूर्ण हो गया है। इस विवाद में एक तरफ स्टालिन अपने व्यक्तिगत अनुभव और आपातकाल के दौरान कथित पुलिस ज्यादती का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री विजय के विधानसभा भाषण को लेकर राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ रही हैं। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके लंबे समय से राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में शामिल रही है। स्टालिन स्वयं पार्टी के अध्यक्ष के रूप में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं और उनका राजनीतिक जीवन कई दशकों में फैला हुआ है। इसलिए आपातकाल से जुड़े उनके व्यक्तिगत अनुभव का राजनीतिक महत्व भी काफी अधिक माना जाता है। किसी भी सार्वजनिक बयान में उस दौर की घटनाओं का उल्लेख डीएमके के समर्थकों और पार्टी के राजनीतिक इतिहास से जुड़े लोगों के बीच विशेष प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है। विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि विधानसभा जैसे संवैधानिक मंच पर नेताओं द्वारा किए गए बयान और इशारे अक्सर व्यापक राजनीतिक संदेश के रूप में देखे जाते हैं। यदि किसी नेता के बारे में व्यक्तिगत या शारीरिक संदर्भ दिया जाता है, तो उसका जवाब भी उसी स्तर पर सामने आ सकता है। स्टालिन ने इसी संदर्भ में सोशल मीडिया का सहारा लेकर अपना पक्ष जनता के सामने रखा। उन्होंने अपने वीडियो में केवल मौजूदा विवाद पर प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि लोगों को यह भी याद दिलाने की कोशिश की कि उनके राजनीतिक जीवन में जेल और दमन का अनुभव नया नहीं है। उनका कहना है कि आपातकाल के दौरान हुई कथित पुलिस हिंसा उनके जीवन की वास्तविक घटना है और इसे किसी राजनीतिक मजाक या इशारे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखें तो यह विवाद तमिलनाडु में व्यक्तिगत राजनीतिक इतिहास और वर्तमान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संबंध को भी सामने लाता है। राज्य की राजनीति में नेताओं के पुराने संघर्ष, आंदोलनों और राजनीतिक घटनाओं का प्रभाव आज भी दिखाई देता है। ऐसे में आपातकाल जैसे ऐतिहासिक मुद्दे का इस्तेमाल मौजूदा राजनीतिक बहस में होना असामान्य नहीं है। स्टालिन के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि डीएमके नेतृत्व मुख्यमंत्री विजय के बयानों को लेकर आक्रामक राजनीतिक रुख अपना सकता है। विधानसभा में हुई किसी भी घटना को लेकर दोनों पक्षों के बीच आने वाले दिनों में और बयान सामने आ सकते हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण ऐसे विवाद अब केवल सदन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कुछ ही घंटों में व्यापक सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि स्टालिन ने अपने दावे सोशल मीडिया पर जारी वीडियो के माध्यम से रखे हैं। उनके द्वारा बताए गए जेल अनुभव और पुलिस कार्रवाई के विवरण उनके व्यक्तिगत दावे के रूप में सामने आए हैं। ऐसे ऐतिहासिक दावों को समझने के लिए उस दौर के उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य स्वतंत्र स्रोतों का संदर्भ भी महत्वपूर्ण होगा। तमिलनाडु की राजनीति में मुख्यमंत्री विजय का उभरना भी मौजूदा समीकरणों को नया रूप दे रहा है। एक ओर पारंपरिक द्रविड़ राजनीति की मजबूत विरासत रखने वाली डीएमके है, तो दूसरी ओर विजय की राजनीतिक उपस्थिति राज्य की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नए समीकरण पैदा कर रही है। ऐसे माहौल में नेताओं के बीच तीखे बयान और पुराने राजनीतिक मुद्दों का फिर से सामने आना आने वाले समय में चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है। स्टालिन ने जिस तरह अपने पुराने जेल अनुभव को मौजूदा विधानसभा विवाद से जोड़ा है, उससे यह स्पष्ट है कि वह इस मुद्दे को केवल व्यक्तिगत टिप्पणी के रूप में नहीं देख रहे हैं। उन्होंने इसे अपने राजनीतिक संघर्ष और आपातकाल के दौरान झेली गई कथित ज्यादती से जोड़कर जनता के सामने रखा है। इससे विवाद का दायरा भी बढ़ गया है और अब चर्चा केवल विधानसभा में हुए कथित इशारे तक सीमित नहीं रह गई है। आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री विजय या उनकी पार्टी की ओर से इस पर प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। यदि विजय इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देते हैं या स्टालिन के आरोपों का जवाब देते हैं, तो राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है। वहीं यदि दोनों पक्ष इस विवाद को आगे नहीं बढ़ाते हैं, तो मामला धीरे-धीरे अन्य राजनीतिक मुद्दों के बीच दब सकता है। फिलहाल, स्टालिन का बयान तमिलनाडु की राजनीति में एक पुराने ऐतिहासिक अध्याय को वर्तमान राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है। आपातकाल के दौरान उनके कथित जेल उत्पीड़न और जबड़े की चोटों का जिक्र कर उन्होंने मुख्यमंत्री विजय के विधानसभा बयान पर तीखा पलटवार किया है। इस घटनाक्रम ने न केवल दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि तमिलनाडु की राजनीति में दशकों पुराने संघर्ष आज भी मौजूदा राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

    कर्नाटक SIR सूची में नंदन नीलेकणी और परिवार के नाम, 43.81 लाख मतदाताओं को नोटिस; जानिए क्या है पूरा मामला

        Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली: कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया के बीच कई प्रमुख नामों के चुनावी रिकॉर्ड में विसंगतियां सामने आने से चर्चा तेज हो गई है। इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी, उनकी पत्नी रोहिणी नीलेकणी और उनके बच्चों जाह्नवी नंदन नीलेकणी तथा निहार नीलेकणी के नाम भी उन मतदाताओं की सूची में शामिल हैं, जिनके मौजूदा चुनावी रिकॉर्ड को 2002 की पुरानी मतदाता सूची से मैप नहीं किया जा सका है। कर्नाटक में चल रही इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची में दर्ज नामों और पुराने चुनावी रिकॉर्ड के बीच सत्यापन करना है। इसी क्रम में बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड में नाम, अभिभावक का विवरण या अन्य जानकारियों में अंतर सामने आया है। ऐसे मामलों को विसंगति सूची में शामिल किया जा रहा है। हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम इस सूची में आना अपने आप में उसका नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का संकेत नहीं है। संबंधित मतदाता को दस्तावेजों के माध्यम से अपना रिकॉर्ड सत्यापित करने का अवसर दिया जा रहा है। नंदन नीलेकणी और परिवार का नाम क्यों आया? रिपोर्ट के मुताबिक, नंदन नीलेकणी और उनके परिवार के सदस्यों को “Unmapped with last SIR” श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि मौजूदा चुनावी रिकॉर्ड को 2002 की मतदाता सूची के साथ निर्धारित प्रक्रिया के तहत जोड़ा या मैप नहीं किया जा सका। नंदन नीलेकणी, रोहिणी नीलेकणी, जाह्नवी नंदन नीलेकणी और निहार नीलेकणी के नाम बेंगलुरु के BTM Layout विधानसभा क्षेत्र की ड्राफ्ट मतदाता सूची में दर्ज बताए गए हैं। परिवार मतदान के लिए कोरमंगला के थर्ड ब्लॉक स्थित रेड्डी जनसंघ हाई स्कूल में बने मतदान केंद्र का इस्तेमाल करता है। अब दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान परिवार को नोटिस जारी किए जाने की संभावना है। इसके बाद संबंधित मतदाताओं को निर्वाचन आयोग द्वारा स्वीकार किए गए दस्तावेजों में से किसी एक के माध्यम से अपना विवरण सत्यापित करना होगा। अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को प्रकाशित होने वाली है। यहां यह समझना जरूरी है कि “Unmapped” का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है या वह मतदान करने के अधिकार से वंचित हो गया है। यह मुख्य रूप से मौजूदा रिकॉर्ड और पुराने रिकॉर्ड के बीच मैपिंग से जुड़ी प्रशासनिक स्थिति है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जाएगी। 43.81 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगति कर्नाटक में SIR प्रक्रिया के दौरान कुल 43.81 लाख मतदाताओं के संबंध में नोटिस तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। इन मतदाताओं से संबंधित दस्तावेज बूथ लेवल अधिकारियों यानी BLO के समक्ष प्रस्तुत किए जाने हैं। नोटिस चरण 22 अक्टूबर तक जारी रहने की बात कही गई है। इसके बाद रिकॉर्ड के सत्यापन और आवश्यक सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। राज्य की अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को जारी होने की योजना है। यह पूरी प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कर्नाटक में करीब 4.46 करोड़ मतदाताओं का रिकॉर्ड अंतिम सूची में शामिल किया जाना है। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड के सत्यापन के कारण चुनावी प्रशासन के सामने भी व्यापक स्तर पर काम का दबाव है। निखिल कामथ और अभिनेता शिवराजकुमार भी सूची में SIR के दौरान केवल नीलेकणी परिवार ही नहीं, बल्कि कई अन्य चर्चित लोगों के चुनावी रिकॉर्ड में भी विसंगतियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जेरोधा के सह-संस्थापक निखिल कामथ और कन्नड़ अभिनेता शिवराजकुमार के नाम भी ऐसे मामलों में सामने आए हैं, जहां चुनावी रिकॉर्ड के सत्यापन की जरूरत बताई गई। शिवराजकुमार के मामले में प्रक्रिया को अलग तरीके से पूरा किया गया। उन्हें चुनाव कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अधिकारियों ने उनके आवास पर जाकर रिकॉर्ड का सत्यापन किया। निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, प्रमुख या विशेष श्रेणी के मतदाताओं के लिए ऐसी व्यवस्था उपलब्ध है। संबंधित बूथ लेवल अधिकारी मतदाता के घर जाकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्यापन की प्रक्रिया प्रशासनिक रूप से सुविधाजनक तरीके से पूरी हो और किसी मतदाता को केवल औपचारिक सुनवाई के लिए अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े। वैज्ञानिक CNR राव के मामले में अलग स्थिति भारत रत्न से सम्मानित प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर सीएनआर राव का नाम भी कर्नाटक की विसंगति सूची में सामने आने के बाद भ्रम की स्थिति पैदा हुई थी। हालांकि, निर्वाचन अधिकारियों ने बाद में स्पष्ट किया कि राव को SIR के संबंध में कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था। बेंगलुरु अर्बन डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर और ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के मुख्य आयुक्त एम. महेश्वर राव के अनुसार, राव के चुनावी रिकॉर्ड में एक विसंगति जरूर पाई गई थी। मौजूदा रिकॉर्ड और 2002 की पुरानी मतदाता सूची में उनके नाम के अलग-अलग रूप दर्ज थे। लेकिन संबंधित बूथ लेवल अधिकारी ने रिकॉर्ड की जांच के बाद उनके नाम को अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने की सिफारिश कर दी। इसलिए उन्हें अलग से नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह मामला बताता है कि SIR प्रक्रिया में सामने आने वाली हर विसंगति का परिणाम नोटिस या नाम हटाए जाने के रूप में नहीं होता। अधिकारियों द्वारा उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के आधार पर अलग-अलग मामलों में निर्णय लिया जा सकता है। पद्मश्री हरेकला हजब्बा को नोटिस पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हरेकला हजब्बा का नाम भी कर्नाटक की विसंगति सूची में शामिल बताया गया है। हालांकि, उनके मामले में नाम से संबंधित अंतर के कारण नोटिस जारी किया गया। मतदाता सूची में नामों की वर्तनी और अलग-अलग भाषाओं में उनके लिप्यंतरण से जुड़ी समस्याएं SIR प्रक्रिया के दौरान सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों में से एक हैं। अंग्रेजी और कन्नड़ में दर्ज नामों में मामूली अंतर होने पर भी रिकॉर्ड का मिलान प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा माता-पिता के नाम, उपनाम और अन्य व्यक्तिगत विवरणों में छोटे अंतर भी कई मामलों में रिकॉर्ड को पुराने डेटा से जोड़ने में समस्या पैदा कर रहे हैं। आम मतदाताओं को भी परेशानी SIR की प्रक्रिया केवल चर्चित या प्रमुख लोगों तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में आम मतदाताओं को भी अपने रिकॉर्ड से संबंधित विसंगतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ मतदाताओं ने कथित तौर पर शिकायत की है कि उन्हें यह पता लगाने में कठिनाई हो रही है कि उनके मामले से संबंधित बूथ लेवल अधिकारी या Electoral Registration Officer कौन है। कुछ मामलों में नोटिस की पूरी जानकारी, सुनवाई की तारीख और स्थान तक पहुंचने में भी दिक्कत की बात सामने आई है। नामों की स्पेलिंग में मामूली अंतर, अंग्रेजी और कन्नड़ के बीच लिप्यंतरण में बदलाव तथा माता-पिता के नामों में अंतर जैसे कारण रिकॉर्ड के मिलान को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे मामलों में मतदाताओं के लिए समय पर सही दस्तावेज उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा। अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को कर्नाटक में SIR की मौजूदा प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण चरण दस्तावेज सत्यापन है। जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगति पाई गई है, उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। संबंधित अधिकारी रिकॉर्ड की जांच के बाद आवश्यक निर्णय लेंगे। अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को प्रकाशित होने की निर्धारित योजना है। तब यह अधिक स्पष्ट होगा कि कितने नाम बिना बदलाव के बरकरार रहे, कितने रिकॉर्ड में सुधार किया गया और किन मामलों में अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत पड़ी। नंदन नीलेकणी और उनके परिवार का नाम विसंगति सूची में आना इसलिए विशेष चर्चा का विषय बना है क्योंकि यह प्रक्रिया देश के प्रमुख उद्योगपतियों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों तक भी पहुंची है। लेकिन चुनावी प्रशासन के लिहाज से इसका व्यापक महत्व इससे कहीं अधिक है। 43.81 लाख मतदाताओं से जुड़े मामलों का सत्यापन कर्नाटक में मतदाता सूची को अद्यतन और अधिक सटीक बनाने की एक बड़ी प्रशासनिक कवायद है। फिलहाल नंदन नीलेकणी और उनके परिवार के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में दर्ज हैं और “Unmapped with last SIR” की स्थिति का सामना कर रहे हैं। आगे दस्तावेज सत्यापन के बाद ही उनके रिकॉर्ड की अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी। इसी तरह अन्य प्रमुख और आम मतदाताओं के मामलों में भी अंतिम निर्णय संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद लिया जाएगा।

    लाल किले ब्लास्ट केस में NIA की चार्जशीट का बड़ा खुलासा, ‘Lone Mujahid’ मैनुअल और जिहादी साहित्य बरामद होने का दावा

        Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली: नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार विस्फोट की जांच में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपनी चार्जशीट में कई गंभीर दावे किए हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों से कथित तौर पर ऐसा चरमपंथी साहित्य बरामद हुआ, जिसमें आतंकवादी गतिविधियों, गुप्त तरीके से आवाजाही, निगरानी, हथियारों और विस्फोटकों से संबंधित सामग्री शामिल थी। एजेंसी ने यह भी दावा किया है कि आरोपियों के बीच इस तरह की सामग्री साझा की जाती थी और इसका इस्तेमाल कथित तौर पर कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया गया। 10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास हुए कार विस्फोट में 11 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 29 लोग घायल हुए थे। शाम करीब 6:50 बजे हुए इस विस्फोट ने दिल्ली के एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक इलाके में सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। विस्फोट से आसपास की संपत्तियों और कई वाहनों को भी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद मामले की जांच NIA को सौंपी गई और एजेंसी ने कथित आतंकी साजिश के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल शुरू की। ‘Lone Mujahid’ मैनुअल का जिक्र NIA की चार्जशीट में कथित तौर पर ‘Lone Mujahid’ Pocket Book और ‘How to Become an Assassin’ नामक सामग्री का उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसी के अनुसार, इस साहित्य को अल-कायदा इन द अरबियन पेनिनसुला (AQAP) से जोड़ा गया है। चार्जशीट में दावा किया गया है कि इसमें आतंकवादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विभिन्न तकनीकों से संबंधित जानकारी मौजूद थी। जांच के मुताबिक, इस सामग्री में विस्फोटकों और हथियारों के बारे में परिचालन संबंधी जानकारी के अलावा निगरानी, छिपने, गुप्त तरीके से स्थान बदलने और सुरक्षा एजेंसियों से बचने जैसी गतिविधियों से जुड़ी बातें शामिल थीं। एजेंसी ने कथित तौर पर यह भी कहा है कि दस्तावेज में TATP जैसे विस्फोटकों और रिमोट-कंट्रोल आधारित विस्फोट से संबंधित जानकारी का उल्लेख था। हालांकि, चार्जशीट में दर्ज आरोप जांच एजेंसी का पक्ष हैं और इन दावों का अंतिम न्यायिक परीक्षण अभी होना बाकी है। अदालत में मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को अपने आरोपों और साक्ष्यों को स्थापित करना होगा। कई अन्य दस्तावेज भी जांच के दायरे में NIA ने चार्जशीट में कथित तौर पर कई अन्य दस्तावेजों और प्रकाशनों का भी उल्लेख किया है। इनमें “Definition of Jihad”, “The Requirements of Jihad”, “The 21 Aims and Objectives of Jihad”, “39 Ways to Serve and Participate in Jihad” और “44 Ways to Support Jihad” जैसे शीर्षक वाली सामग्री शामिल बताई गई है। जांच एजेंसी का आरोप है कि यह साहित्य केवल वैचारिक सामग्री तक सीमित नहीं था, बल्कि कथित तौर पर हिंसक गतिविधियों को उचित ठहराने और लोगों को चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करता था। NIA के अनुसार, यह साहित्य उस व्यापक सामग्री का हिस्सा था जिसे कथित आतंकी मॉड्यूल से जुड़े लोगों के बीच प्रसारित किया जा रहा था। जांच एजेंसी का दावा है कि आरोपियों ने कथित तौर पर इस सामग्री के जरिए कट्टरपंथी विचारों का प्रचार किया और कुछ लोगों को संगठनात्मक गतिविधियों की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। उमर उन नबी पर NIA के गंभीर आरोप चार्जशीट में उमर उन नबी को इस कथित साजिश का प्रमुख व्यक्ति बताया गया है। नबी की मौत 10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास हुए विस्फोट में ही हो गई थी। NIA के अनुसार, वह कथित रूप से पुनर्जीवित किए गए Ansar Ghazwat-ul-Hind (AGuH) मॉड्यूल का “ऑपरेशनल इन-चार्ज” था। जांच एजेंसी के मुताबिक, नबी को पिंडा और राहुल भट के नामों से भी जाना जाता था और वह उस वाहन में मौजूद था जिसमें विस्फोट हुआ। NIA का आरोप है कि इस पूरे मामले के पीछे एक व्यापक साजिश थी, जिसमें कथित तौर पर निष्क्रिय हो चुके AGuH नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करना, नए लोगों का कट्टरपंथीकरण, चरमपंथी साहित्य का प्रसार और आतंकी हमले की तैयारी शामिल थी। चार्जशीट के अनुसार, इस मॉड्यूल को फिर से सक्रिय करने की कथित प्रक्रिया वर्ष 2022 की शुरुआत में शुरू हुई थी। जांच एजेंसी का दावा है कि नबी ने अन्य लोगों को प्रभावित करने और कट्टरपंथी विचारधारा का प्रचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। NIA ने यह भी आरोप लगाया है कि नबी कथित तौर पर “शहादत” या “martyrdom” की अवधारणा से जुड़ी प्रचार सामग्री का इस्तेमाल करता था। एजेंसी के मुताबिक, उसने कुछ लोगों को प्रभावित करने और कथित मॉड्यूल से जोड़ने के लिए ऐसी सामग्री का सहारा लिया। अफगानिस्तान जाने की कथित योजना जांच में NIA ने नबी की कथित गतिविधियों के एक अन्य पहलू का भी उल्लेख किया है। एजेंसी के अनुसार, उसके पास अफगानिस्तान जाने और “हिजरत” करने की योजना से संबंधित जानकारी भी सामने आई थी। चार्जशीट में दावा किया गया है कि कथित मॉड्यूल से जुड़े लोगों ने जम्मू-कश्मीर और दिल्ली-NCR में गुप्त बैठकें की थीं। एजेंसी का आरोप है कि इन बैठकों का उद्देश्य संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाना और कथित आतंकी साजिश को अंजाम देने की दिशा में काम करना था। हालांकि, इन सभी आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत को करना है। किसी आरोपी के खिलाफ चार्जशीट में लगाए गए आरोप अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं होते। Signal जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का कथित इस्तेमाल NIA ने कथित मॉड्यूल के सदस्यों के बीच संचार के तरीके को लेकर भी जानकारी दी है। एजेंसी के अनुसार, आरोपी एक-दूसरे के संपर्क में रहने के लिए Signal जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते थे। जांच एजेंसी का दावा है कि एन्क्रिप्टेड संचार का इस्तेमाल कथित तौर पर सदस्यों के बीच समन्वय बनाए रखने के लिए किया जाता था। इसके अलावा NIA ने आरोप लगाया है कि मॉड्यूल से जुड़े लोगों ने कथित रूप से वित्तीय संसाधन जुटाने, अवैध हथियारों की व्यवस्था करने और संभावित गतिविधियों के लिए स्थान तलाशने जैसे काम भी किए। जांच का यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे एजेंसी कथित साजिश को केवल एक व्यक्ति की गतिविधि के बजाय एक संगठित नेटवर्क के रूप में पेश कर रही है। वाहन को VBIED के रूप में इस्तेमाल करने का दावा NIA ने चार्जशीट में 10 नवंबर के विस्फोट में इस्तेमाल वाहन को कथित तौर पर Vehicle-Borne Improvised Explosive Device (VBIED) बताया है। एजेंसी के अनुसार, वाहन के अंदर विस्फोटक उपकरण मौजूद था और विस्फोट के समय नबी भी उसी वाहन में था। विस्फोट के बाद घटनास्थल से बरामद जैविक सामग्री की DNA जांच के जरिए नबी की पहचान की पुष्टि होने का दावा भी चार्जशीट में किया गया है। इसके अलावा फॉरेंसिक जांच में कथित तौर पर TATP और अमोनियम नाइट्रेट सहित विस्फोटक अवशेष पाए गए। NIA ने वाहन के मलबे और घटनास्थल से मिले अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष सामने रखा है कि कार का इस्तेमाल विस्फोटक उपकरण ले जाने और विस्फोट करने के लिए किया गया था। एजेंसी का दावा है कि फॉरेंसिक साक्ष्यों से यह संकेत मिला कि विस्फोटक उपकरण को वाहन के भीतर से एक कमांड मैकेनिज्म के जरिए सक्रिय किया गया। नबी की मौत के बाद भी जांच जारी क्योंकि उमर उन नबी की मौत विस्फोट में ही हो गई थी, इसलिए उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही उनकी मृत्यु के कारण समाप्त हो गई है। हालांकि, NIA ने चार्जशीट में कथित साजिश और उसमें उनकी भूमिका से जुड़े अपने निष्कर्ष दर्ज किए हैं। पूरे मामले में जांच एजेंसी का फोकस कथित नेटवर्क, उसके सदस्यों के बीच संपर्क, कट्टरपंथी साहित्य के प्रसार, वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता तथा विस्फोट की तैयारी के बीच संबंध स्थापित करने पर है। लाल किले जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाके में हुआ यह विस्फोट सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती रहा है। अब चार्जशीट में सामने आए दावों से मामले की जांच की दिशा और कथित साजिश का एक विस्तृत खाका सामने आया है। हालांकि, अदालत में इन आरोपों की पुष्टि साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर होगी। NIA की चार्जशीट में दर्ज दावे फिलहाल जांच एजेंसी के आरोप हैं। मामले में शामिल आरोपियों की कानूनी स्थिति और दोष या निर्दोषता का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किया जाएगा।

    दिल्ली हाईकोर्ट में CJP नेताओं की सहमति, 24 घंटे में गौरव भाटिया के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का निर्देश

        Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया से जुड़े कथित मानहानिकारक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशीष रंका ने विवादित पोस्ट हटाने पर सहमति जताई है। दोनों नेताओं की ओर से अदालत में पेश वकीलों ने कहा कि संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट को हटाया जाएगा। इसके बाद अदालत ने उनके बयानों को रिकॉर्ड करते हुए विवादित पोस्ट को 24 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश दिया। यह मामला गौरव भाटिया द्वारा दायर 2 करोड़ रुपये की मानहानि याचिका से जुड़ा है। भाटिया ने आरोप लगाया है कि सोशल मीडिया पर उनके नाम और तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए एक कथित रूप से फर्जी और AI-जनरेटेड ग्राफिक प्रसारित किया गया। इस सामग्री में उनके हवाले से स्वातंत्र भारद्वाज के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। भाटिया ने स्पष्ट रूप से इन टिप्पणियों से इनकार किया है और दावा किया है कि उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही। मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला कर रहे हैं। सुनवाई के दौरान गौरव भाटिया स्वयं अदालत में उपस्थित हुए। अदालत ने विवादित पोस्ट और सोशल मीडिया पर प्रकाशित अन्य संबंधित सामग्री को लेकर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। 24 घंटे में पोस्ट हटाने की सहमति सुनवाई के दौरान अदालत ने सौरव दास और आशीष रंका से अपने-अपने स्तर पर विवादित पोस्ट हटाने के संबंध में निर्देश लेने को कहा था। इसके बाद जब मामला दोबारा अदालत के सामने आया तो दास की ओर से पेश वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया के खिलाफ किए गए पोस्ट हटाने के लिए तैयार हैं। रंका की ओर से भी इसी तरह की सहमति अदालत के सामने रखी गई। अदालत ने दोनों पक्षों के वकीलों के बयानों को रिकॉर्ड किया और स्पष्ट निर्देश दिया कि विवादित पोस्ट 24 घंटे के भीतर हटा दिए जाएं। सौरव दास ने सोशल मीडिया पर भी इस घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत की ओर से पोस्ट हटाने का सुझाव दिए जाने के बाद उन्होंने और आशीष रंका ने विवादित सामग्री हटाने का स्वेच्छा से निर्णय लिया। उनके अनुसार, अदालत ने यह भी संकेत दिया था कि विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हो सकते हैं और हर विरोध को सोशल मीडिया पर विवादित या आपत्तिजनक सामग्री के माध्यम से व्यक्त करना आवश्यक नहीं है। अदालत ने अभिव्यक्ति के तरीके पर भी टिप्पणी की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने और विरोध जताने का अधिकार है, लेकिन कई बार अभिव्यक्ति को अधिक स्पष्ट और संतुलित तरीके से प्रस्तुत करना आवश्यक होता है ताकि उसका वास्तविक संदेश सही ढंग से लोगों तक पहुंचे। अदालत की टिप्पणी सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सार्वजनिक विवादों के बदलते स्वरूप के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर किसी व्यक्ति के खिलाफ पोस्ट या ग्राफिक कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच संतुलन अदालतों के सामने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बन जाता है। गौरव भाटिया ने अदालत के सामने दावा किया कि विवादित सामग्री ने उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना था कि कथित रूप से फर्जी बयान को उनकी तस्वीर के साथ प्रकाशित किया गया, जिससे देखने वालों के बीच यह गलत धारणा बन सकती थी कि वास्तव में उन्होंने ही उक्त बयान दिया है। AI-जनरेटेड ग्राफिक को लेकर विवाद मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू कथित AI-जनरेटेड ग्राफिक है। भाटिया के अनुसार, उनके फोटो के साथ एक ऐसा बयान प्रसारित किया गया, जो उन्होंने कभी नहीं दिया। ग्राफिक में एक समाचार संगठन के लोगो का भी कथित रूप से इस्तेमाल किया गया था। भाटिया का आरोप है कि इस तरह की प्रस्तुति से सामग्री को विश्वसनीय दिखाने की कोशिश हुई और लोगों के बीच यह भ्रम पैदा हो सकता था कि कथित बयान किसी वास्तविक समाचार स्रोत से आया है। सोशल मीडिया पर AI की मदद से तैयार की जाने वाली नकली तस्वीरों, वीडियो और ग्राफिक्स की बढ़ती संख्या के बीच यह मामला डिजिटल मानहानि के बदलते स्वरूप को भी सामने लाता है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति की तस्वीर के साथ फर्जी बयान जोड़कर उसे तेजी से प्रसारित किया जाना उसकी सार्वजनिक छवि को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मामलों में अदालतों के सामने यह तय करना चुनौतीपूर्ण होता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा कहां समाप्त होती है और मानहानि या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री की शुरुआत कहां होती है। भाटिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और मेटा से भी कथित रूप से फर्जी तस्वीर और इसी तरह की अन्य सामग्री हटाने के लिए निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि, मेटा की ओर से अदालत में पेश वकील ने कहा कि प्लेटफॉर्म किसी तस्वीर या सामग्री को बिना किसी विशिष्ट आधार या कानूनी निर्देश के स्वतः नहीं हटा सकता। अदालत ने इस मामले में भाटिया को यह स्वतंत्रता दी कि यदि उन्हें इसी तरह की अन्य सामग्री सोशल मीडिया पर दिखाई देती है तो वह संबंधित प्लेटफॉर्म के समक्ष उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर सकते हैं। विवादित पोस्ट पर कितने व्यूज आए? भाटिया की याचिका के अनुसार, विवादित पोस्ट 5 सितंबर को प्रकाशित किया गया था और इसे बड़ी संख्या में लोगों ने देखा। याचिका में दावा किया गया कि पोस्ट को 1.32 लाख से अधिक व्यूज मिले। भाटिया ने पोस्ट हटाने के साथ-साथ बिना शर्त माफी की मांग भी की थी। जब उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली, तब उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी याचिका में 2 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की गई है। इसके अलावा उन्होंने स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा की मांग भी की है, ताकि कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री को दोबारा प्रकाशित या प्रसारित करने से संबंधित पक्षों को रोका जा सके। हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों पर अभी अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं आया है। अदालत फिलहाल मामले से जुड़े पक्षों की दलीलों और विवादित सामग्री के संबंध में कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही है। सौरव दास और आशीष रंका की भूमिका इस मामले में CJP से जुड़े सौरव दास और आशीष रंका प्रमुख प्रतिवादियों में शामिल हैं। अदालत के सामने दोनों की ओर से यह सहमति रखी गई कि संबंधित पोस्ट हटाए जाएंगे। अदालत द्वारा 24 घंटे की समयसीमा निर्धारित किए जाने के बाद अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि संबंधित सामग्री वास्तव में निर्धारित समय के भीतर हटाई जाती है या नहीं। सुनवाई के दौरान एक अन्य प्रतिवादी अभिजीत दिपके की भूमिका पर भी अदालत ने सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि उनके द्वारा ऐसी कौन-सी सामग्री प्रकाशित की गई थी, जिसे विवाद का हिस्सा बनाया गया है। दिपके की ओर से पेश वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल की ओर से ऐसा कोई ट्वीट नहीं किया गया था जो मौजूदा विवाद का हिस्सा हो। इससे यह संकेत मिलता है कि अदालत प्रत्येक प्रतिवादी की व्यक्तिगत भूमिका को अलग-अलग देख रही है। मानहानि के मामलों में यह महत्वपूर्ण होता है कि कथित आपत्तिजनक सामग्री किस व्यक्ति ने तैयार की, किसने प्रकाशित की, किसने उसे आगे साझा किया और किसकी भूमिका केवल किसी अन्य गतिविधि तक सीमित थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम प्रतिष्ठा का अधिकार मामला एक व्यापक संवैधानिक और कानूनी बहस से भी जुड़ता है। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली झूठी या मनगढ़ंत सामग्री के प्रसार पर कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। सोशल मीडिया ने इस संतुलन को और जटिल बना दिया है। पहले किसी कथित मानहानिकारक सामग्री का प्रसार सीमित माध्यमों तक रह सकता था, लेकिन अब एक पोस्ट कुछ ही घंटों में हजारों या लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। यदि किसी सार्वजनिक व्यक्ति की तस्वीर के साथ ऐसा बयान जोड़ दिया जाए जो उसने दिया ही नहीं, तो उस सामग्री के प्रभाव को नियंत्रित करना और बाद में उसे पूरी तरह हटाना मुश्किल हो सकता है। गौरव भाटिया का कहना है कि विवादित सामग्री इसी प्रकार उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली थी। दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से अदालत में पोस्ट हटाने की सहमति व्यक्त की गई है। अब अदालत को आगे यह तय करना होगा कि मामले में अन्य मांगी गई राहतों, विशेष रूप से हर्जाने और स्थायी निषेधाज्ञा के दावों पर किस तरह आगे बढ़ा जाए। राजनीतिक विरोध और सोशल मीडिया की भूमिका CJP नेताओं और BJP नेता गौरव भाटिया के बीच यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राजनीतिक गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों में सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है। राजनीतिक दल और समूह अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस माध्यम की तेज गति के कारण गलत सूचना, संपादित सामग्री और AI से तैयार किए गए फर्जी ग्राफिक्स का जोखिम भी बढ़ गया है। अदालत की टिप्पणी कि विरोध के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं, इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन किसी व्यक्ति के नाम से ऐसा बयान प्रसारित करना जो उसने दिया ही नहीं, अलग कानूनी प्रश्न खड़ा कर सकता है। इस मामले में अदालत ने फिलहाल विवादित पोस्ट हटाने की दिशा में स्पष्ट कदम उठाया है। दास और रंका की ओर से 24 घंटे में पोस्ट हटाने की सहमति दर्ज हो चुकी है। वहीं, गौरव भाटिया की 2 करोड़ रुपये की मानहानि याचिका पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। आगे की सुनवाई में अदालत को यह देखना होगा कि कथित AI-जनरेटेड सामग्री किस प्रकार तैयार हुई, उसे किसने प्रकाशित किया, उसके प्रसार की जिम्मेदारी किसकी थी और क्या इससे वास्तव में कानूनी रूप से मानहानि का मामला बनता है। इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत के निर्णय के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश सोशल मीडिया पर सार्वजनिक व्यक्तियों के खिलाफ सामग्री प्रकाशित करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा सकता है। अभिव्यक्ति और विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि सार्वजनिक बहस में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और सामग्री को जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना जरूरी है। दूसरी ओर, AI तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यह मामला आने वाले समय में डिजिटल मानहानि, फर्जी ग्राफिक्स और ऑनलाइन प्रतिष्ठा की सुरक्षा से जुड़े बड़े कानूनी सवालों का आधार भी बन सकता है।

    GST संग्रह पर सरकार का बचाव, 11% वृद्धि के आंकड़े को लेकर छिड़ी बहस; मुआवजा उपकर हटने से गणना पर सवाल

        Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली: वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह में मजबूत वृद्धि के सरकारी दावे को लेकर केंद्र सरकार और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बीच आंकड़ों की व्याख्या को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार के अनुसार अगस्त 2026 में सकल GST संग्रह सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर करीब 1.99 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि अप्रैल से अगस्त के बीच कुल संग्रह में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह 10.43 लाख करोड़ रुपये रहा। दूसरी ओर, गर्ग ने तर्क दिया है कि यदि पिछले वर्ष की अवधि में वसूले गए मुआवजा उपकर को भी तुलना में शामिल किया जाए, तो GST से संबंधित राजस्व वृद्धि काफी कम दिखाई देती है। इस विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि मौजूदा GST संग्रह की तुलना पिछले वर्ष के किस राजस्व आधार से की जानी चाहिए। केंद्र सरकार और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) का कहना है कि किसी भी वृद्धि दर की सही गणना के लिए दोनों अवधियों में समान करों और उपकरों को आधार बनाना जरूरी है। चूंकि मुआवजा उपकर अब लागू नहीं है, इसलिए सरकार ने मौजूदा वृद्धि की गणना में इसे दोनों अवधियों से बाहर रखा है। वहीं, पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि मुआवजा उपकर को हटाए जाने का आर्थिक प्रभाव अलग से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, यदि पिछले वर्ष के संग्रह में शामिल इस उपकर को तुलना के आधार में रखा जाए, तो अगस्त में GST वृद्धि 14.8 प्रतिशत के बजाय करीब 7.51 प्रतिशत और अप्रैल-अगस्त की पांच महीने की अवधि में वृद्धि लगभग 4.08 प्रतिशत रह जाती है। उन्होंने शुद्ध राजस्व वृद्धि को करीब 1.3 प्रतिशत बताया है। यह बहस ऐसे समय में सामने आई है जब GST संग्रह को भारतीय अर्थव्यवस्था की गतिविधियों, उपभोग और कर अनुपालन के प्रमुख संकेतकों में से एक माना जाता है। अगस्त के आंकड़ों में कुल सकल GST संग्रह 1.99 लाख करोड़ रुपये रहा। इसमें केंद्रीय GST (CGST) से 38,413 करोड़ रुपये, राज्य GST (SGST) से 46,316 करोड़ रुपये और एकीकृत GST (IGST) से लगभग 1.15 लाख करोड़ रुपये शामिल रहे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में घरेलू स्रोतों से GST राजस्व में करीब 9.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि आयात से जुड़े GST संग्रह में लगभग 29 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इससे कुल GST संग्रह में तेज बढ़ोतरी दिखाई दी। हालांकि, इस वृद्धि की वास्तविक मजबूती को लेकर अब अलग-अलग आधारों पर आंकड़ों की व्याख्या की जा रही है। CBIC ने गर्ग की आपत्ति का कड़ा जवाब देते हुए कहा कि अलग-अलग कर आधारों को मिलाकर तुलना करना भ्रामक हो सकता है। बोर्ड के अनुसार, मौजूदा वृद्धि दर की गणना CGST, SGST और IGST के आधार पर दोनों संबंधित अवधियों के लिए समान तरीके से की गई है। सरकार का तर्क है कि यदि कोई ऐसा कर या उपकर वर्तमान अवधि में मौजूद ही नहीं है, तो उसे वर्तमान और पिछले वर्ष के बीच समान आधार वाली तुलना में शामिल करना सांख्यिकीय रूप से उचित नहीं होगा। सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि मुआवजा उपकर के आंकड़ों को पूरी तरह छिपाया नहीं गया है, बल्कि उसे अलग से प्रदर्शित किया गया है। इसलिए केंद्र का कहना है कि 11 प्रतिशत की वृद्धि दर को गलत या कृत्रिम आंकड़ा बताना उचित नहीं है। पूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी संजय कुमार ने भी इस मामले में CBIC के रुख का समर्थन किया। उनके अनुसार, अगस्त 2026 का लगभग 1.998 लाख करोड़ रुपये का GST संग्रह CGST, SGST और IGST से बना है और इसमें मुआवजा उपकर शामिल नहीं है। अगस्त 2025 में इसी आधार पर संग्रह करीब 1.741 लाख करोड़ रुपये था। इस तरह दोनों वर्षों में समान कर घटकों की तुलना करने पर 14.8 प्रतिशत की वृद्धि निकलती है। अप्रैल से अगस्त की अवधि में भी यही तर्क लागू होता है। हालांकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में मुआवजा उपकर वसूला जा रहा था, लेकिन सरकार द्वारा इस्तेमाल किया गया करीब 9.40 लाख करोड़ रुपये का तुलनीय आधार इस उपकर को अलग रखता है। इस आधार पर अप्रैल-अगस्त 2026 में 11 प्रतिशत वृद्धि दर्ज होती है। संजय कुमार ने हालांकि यह भी माना कि गर्ग का सवाल पूरी तरह निरर्थक नहीं है। उनका कहना है कि यदि उद्देश्य केवल समान कर संरचना के आधार पर GST की वृद्धि मापना है, तो CBIC का तरीका उचित है। लेकिन यदि सवाल यह हो कि सरकार से जुड़े कुल GST-संबंधित राजस्व में वास्तविक आर्थिक बदलाव कितना आया, तो मुआवजा उपकर के खत्म होने का प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है। यही अंतर मौजूदा विवाद को अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। एक ओर सरकार कर संग्रह की वृद्धि को समान आधार पर मापने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर आलोचक यह जानना चाहते हैं कि GST व्यवस्था से सरकार को कुल मिलाकर कितना अतिरिक्त राजस्व मिल रहा है और कर संरचना में हुए बदलावों का उस वृद्धि पर कितना प्रभाव पड़ा है। मुआवजा उपकर का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले वर्ष तक यह कुछ विशेष वस्तुओं पर लागू था। GST व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से इस उपकर की व्यवस्था की गई थी। बाद में GST परिषद के निर्णयों और कर संरचना में बदलाव के साथ इसकी भूमिका समाप्त हुई। सितंबर 2025 में GST दरों में व्यापक बदलाव किए गए, जिसके बाद अधिकांश वस्तुओं पर संशोधित GST दरें 22 सितंबर 2025 से प्रभावी हुईं। इसके बाद निर्दिष्ट तंबाकू और पान मसाला उत्पादों पर मुआवजा उपकर को भी 1 फरवरी 2026 से हटा दिया गया। इस बदलाव के कारण 2026 के GST आंकड़ों की तुलना पिछले वर्ष के आंकड़ों से करना कुछ हद तक जटिल हो गया है। पिछले साल के आंकड़ों में ऐसा राजस्व शामिल था जो अब वर्तमान कर ढांचे का हिस्सा नहीं है। इसलिए सामान्य सालाना वृद्धि दर और व्यापक राजस्व तस्वीर दोनों अलग-अलग कहानी पेश कर सकती हैं। गर्ग की गणना इसी अंतर पर आधारित है। यदि पिछले साल प्राप्त मुआवजा उपकर को भी कर संग्रह का हिस्सा माना जाए और इस साल उससे तुलना की जाए, तो वृद्धि दर काफी कम हो जाती है। अगस्त के लिए उनकी गणना में वृद्धि 7.51 प्रतिशत और अप्रैल-अगस्त के लिए 4.08 प्रतिशत आती है। उनका कहना है कि इससे GST राजस्व की वास्तविक स्थिति का अलग आकलन सामने आता है। हालांकि, सरकार का मानना है कि इस तरह की गणना दो अलग कर व्यवस्थाओं को एक ही आधार पर रखने के बराबर होगी। CBIC ने इसीलिए समान कर घटकों के आधार पर तुलना करने को अधिक उपयुक्त माना है। बोर्ड का कहना है कि किसी वृद्धि दर का अर्थ तभी स्पष्ट होता है जब दोनों पक्षों में समान करों या लेवी को शामिल किया जाए। यह विवाद केवल आंकड़ों की तकनीकी बहस तक सीमित नहीं है। GST संग्रह को सरकार की वित्तीय स्थिति और अर्थव्यवस्था में औपचारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यदि संग्रह लगातार तेजी से बढ़ रहा है, तो इसे बेहतर कर अनुपालन, आर्थिक गतिविधियों में विस्तार और डिजिटल टैक्स सिस्टम की प्रभावशीलता से जोड़ा जा सकता है। लेकिन यदि कर ढांचे में बदलाव के कारण पुराने और नए आंकड़ों की तुलना सीधे नहीं की जा सकती, तो वृद्धि दर की व्याख्या सावधानी से करना जरूरी हो जाता है। अगस्त में आयात से जुड़े GST संग्रह में 29 प्रतिशत की वृद्धि भी ध्यान देने योग्य है। इसके विपरीत घरेलू GST राजस्व में वृद्धि 9.3 प्रतिशत रही। इससे संकेत मिलता है कि कुल संग्रह की वृद्धि में आयात आधारित राजस्व ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे में GST वृद्धि का मूल्यांकन करते समय घरेलू आर्थिक गतिविधियों और आयात से मिलने वाले राजस्व को अलग-अलग देखना भी उपयोगी हो सकता है। विशेषज्ञों के बीच इस बात पर सहमति बनती दिखाई देती है कि दोनों पक्ष अपने-अपने संदर्भ में सही सवाल उठा रहे हैं। सरकार का 11 प्रतिशत का आंकड़ा तुलनीय GST घटकों पर आधारित है और इसलिए सांख्यिकीय रूप से एक समान आधार वाली तुलना प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर, मुआवजा उपकर के समाप्त होने से सरकार के कुल कर-संबंधी राजस्व पर जो प्रभाव पड़ा है, उसे आर्थिक विश्लेषण से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता। इसलिए मौजूदा विवाद को केवल इस सवाल तक सीमित करना कि 11 प्रतिशत का आंकड़ा सही है या 4.08 प्रतिशत, शायद पूरी तस्वीर नहीं दिखाएगा। वास्तविक तस्वीर समझने के लिए यह देखना होगा कि किस उद्देश्य से वृद्धि मापी जा रही है। यदि लक्ष्य वर्तमान GST प्रणाली के उन्हीं घटकों की तुलना करना है जो आज भी लागू हैं, तो सरकार का तरीका अधिक उपयुक्त है। लेकिन यदि लक्ष्य सरकार के कुल GST-संबंधित राजस्व की वास्तविक आर्थिक वृद्धि का आकलन करना है, तो समाप्त हो चुके मुआवजा उपकर का प्रभाव भी विश्लेषण में शामिल करना आवश्यक हो सकता है। GST व्यवस्था के आगे बढ़ने के साथ ऐसी तुलनाएं और भी महत्वपूर्ण होंगी। कर दरों में बदलाव, नए अनुपालन नियम, रिफंड, आयात संरचना और विभिन्न उपकरों के समाप्त होने जैसे कारक हर साल तुलना के आधार को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में केवल एक headline growth figure के आधार पर GST व्यवस्था की मजबूती या कमजोरी का निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। फिलहाल केंद्र सरकार 11 प्रतिशत की अप्रैल-अगस्त GST वृद्धि को समान कर आधार पर सही आंकड़ा बता रही है, जबकि सुभाष चंद्र गर्ग की गणना मुआवजा उपकर को शामिल करने पर कहीं कम वृद्धि की तस्वीर पेश करती है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि GST संग्रह की वृद्धि केवल सांख्यिकीय आधार पर मजबूत दिखाई देती है या घरेलू अर्थव्यवस्था और सरकार के कुल राजस्व में भी उसी अनुपात में सुधार देखने को मिलता है। यही अंतर इस बहस को महज आंकड़ों की लड़ाई के बजाय भारतीय कर व्यवस्था और राजस्व प्रदर्शन के व्यापक मूल्यांकन का विषय बनाता है।

    BRICS शिखर सम्मेलन पर पी. चिदंबरम का सवाल, BJP ने साधा निशाना; ‘ठोस लाभ’ को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस

        Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली: भारत में 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत से ठीक पहले इस अंतरराष्ट्रीय समूह को लेकर देश की राजनीति में तीखी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद पी. चिदंबरम ने BRICS समेत विभिन्न बहुपक्षीय मंचों में भारत की भागीदारी के वास्तविक और ठोस लाभों पर सवाल उठाए हैं। उनके बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर विदेश नीति और कूटनीति को केवल लेन-देन के नजरिए से देखने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया है। भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी नई दिल्ली के भारत मंडपम में कर रहा है। सम्मेलन शुक्रवार शाम से शुरू होकर रविवार तक चलेगा। इस वर्ष सम्मेलन की थीम ‘Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability’ यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता रखी गई है। ऐसे समय में जब दुनिया पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, व्यापार तनाव और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों से जूझ रही है, BRICS बैठक को भारत की कूटनीतिक सक्रियता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, सम्मेलन से पहले कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम की टिप्पणी ने इसके राजनीतिक और व्यावहारिक महत्व को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। चिदंबरम ने कहा कि भारत BRICS के अलावा शंघाई सहयोग संगठन (SCO), G20 और QUAD जैसे कई महत्वपूर्ण बहुपक्षीय समूहों का हिस्सा है, लेकिन पिछले कुछ सम्मेलनों से भारत को क्या ठोस लाभ मिला, यह स्पष्ट नहीं है। चिदंबरम ने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कहा कि उन्हें नहीं पता कि इस बार कितने राष्ट्रपति और कितने प्रधानमंत्री भारत आ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो-तीन BRICS शिखर सम्मेलनों से उन्हें कोई महत्वपूर्ण और ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिया। उनके मुताबिक, पहले के BRICS सम्मेलनों में ऐसे फैसले हुए थे जिन्हें स्पष्ट लाभ या परिणाम के तौर पर देखा जा सकता था, लेकिन हाल के वर्षों में तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं रही है। कांग्रेस नेता की इस टिप्पणी को BJP ने तुरंत राजनीतिक मुद्दा बना लिया। भाजपा नेता नलिन कोहली ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या किसी देश की कूटनीति को केवल इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि उससे तत्काल कितना प्रत्यक्ष लाभ मिला। उन्होंने कहा कि BRICS जैसा मंच भारत को कई देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ सीधे संवाद का अवसर देता है और ऐसे संपर्कों को केवल आर्थिक लेन-देन की कसौटी पर नहीं देखा जा सकता। नलिन कोहली ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि विपक्ष की सोच कुछ ऐसी है जैसे कूटनीति में हर बातचीत के बाद यह पूछा जाए कि भारत को बदले में क्या मिला। उन्होंने कहा कि BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय मुलाकातें होंगी। उनके अनुसार, इस तरह की बैठकें लंबे समय में रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। BJP ने यह भी सवाल उठाया कि अगर कूटनीति के हर प्रयास को केवल तत्काल और दिखाई देने वाले लाभ से मापा जाए, तो भारत की दशकों पुरानी विदेश नीति के कई हिस्सों पर भी सवाल खड़े किए जा सकते हैं। नलिन कोहली ने कांग्रेस से कहा कि उसे अपनी विदेश नीति के पुराने दृष्टिकोण पर भी जवाब देना चाहिए। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पर और तीखा हमला किया। उन्होंने विपक्ष की प्रतिक्रिया की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से की जो किसी उपलब्धि से नाराज होकर उसे स्वीकार नहीं करना चाहता। भंडारी ने दावा किया कि भारत में BRICS सम्मेलन का आयोजन देश के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का संकेत है और कांग्रेस इस वजह से असहज है। भंडारी ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस को इस बात का डर है कि मौजूदा सरकार को मिलने वाली ऐसी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों का राजनीतिक लाभ उसके पास नहीं होगा। उन्होंने इसे ‘FOMO’ यानी ‘Fear Of Missing Out’ से जोड़ते हुए कहा कि विपक्ष BRICS सम्मेलन की उपलब्धियों को लेकर सवाल उठा रहा है क्योंकि वह खुद इस तरह के आयोजन की मेजबानी नहीं कर पाएगा। BRICS की मौजूदा भूमिका को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समूह पिछले दो दशकों में तेजी से विस्तारित हुआ है। भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है और इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में समूह की अध्यक्षता कर चुका है। 1 जनवरी 2026 को भारत ने चौथी बार BRICS की अध्यक्षता संभाली। यह समय समूह के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS अपनी स्थापना के 20 वर्ष पूरे कर रहा है। इस बार भारत की मेजबानी ऐसे दौर में हो रही है जब वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। पश्चिमी देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक और रणनीतिक मतभेद, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव, व्यापार प्रतिबंध, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। ऐसे में BRICS के भीतर विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग को लेकर चर्चा का महत्व बढ़ गया है। शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया के संकट से पैदा हुए आर्थिक प्रभावों पर भी व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है। ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक महंगाई जैसे मुद्दे BRICS देशों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। भारत के लिए यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वह एक साथ कई रणनीतिक समूहों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। भारत की विदेश नीति में BRICS की भूमिका केवल शिखर सम्मेलनों तक सीमित नहीं है। समूह के माध्यम से आर्थिक सहयोग, विकास वित्त, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, स्वास्थ्य और वैश्विक शासन व्यवस्था जैसे विषयों पर सदस्य देशों के बीच संवाद होता है। इसके अतिरिक्त, BRICS को वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने के एक माध्यम के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि, चिदंबरम का सवाल इस व्यापक बहस को सामने लाता है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की सक्रिय भागीदारी का मूल्यांकन किस तरह किया जाना चाहिए। क्या किसी सम्मेलन की सफलता को केवल तत्काल व्यापारिक समझौतों, निवेश घोषणाओं या संयुक्त बयानों से मापा जाना चाहिए, या फिर राजनीतिक संवाद, रणनीतिक संपर्क और भविष्य की साझेदारियों को भी उसका हिस्सा माना जाना चाहिए? यह सवाल भारत की बहुपक्षीय कूटनीति को लेकर लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। BRICS सम्मेलन में कई देशों के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की संभावना के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी यह आयोजन महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर माना जा रहा है। खासकर भारत और चीन के संबंधों के संदर्भ में इस सम्मेलन पर विशेष नजर है। सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित बैठक को लेकर भी काफी चर्चा है। यदि ऐसी द्विपक्षीय वार्ता होती है, तो सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के संबंधों में आई जटिलताओं के बीच यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दे सकती है। इसी तरह, रूस समेत अन्य प्रमुख BRICS देशों के नेताओं के साथ भारत की बातचीत वैश्विक मुद्दों पर नई समझ विकसित करने का अवसर दे सकती है। भारत लंबे समय से अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता रहा है और BRICS, QUAD, SCO तथा G20 जैसे अलग-अलग मंचों में उसकी भागीदारी इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। BRICS सम्मेलन को लेकर कांग्रेस और BJP के बीच शुरू हुई बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन पर मतभेद नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि भारत की विदेश नीति की सफलता को किस पैमाने पर मापा जाए। कांग्रेस तत्काल और ठोस परिणामों पर जोर दे रही है, जबकि भाजपा का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रभाव, संवाद और रणनीतिक अवसरों का मूल्यांकन लंबे समय में किया जाना चाहिए। आने वाले दिनों में सम्मेलन में होने वाली द्विपक्षीय बैठकों, संयुक्त घोषणाओं और आर्थिक तथा रणनीतिक पहलों से यह स्पष्ट हो सकता है कि भारत की BRICS अध्यक्षता से कौन से व्यावहारिक परिणाम सामने आते हैं। फिलहाल, शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले ही इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो चुकी है। BRICS की बैठक जहां भारत को वैश्विक मंच पर अपनी प्राथमिकताओं को रखने का अवसर दे रही है, वहीं घरेलू राजनीति में विपक्ष और सरकार के बीच विदेश नीति की दिशा और उपलब्धियों को लेकर बहस भी तेज हो गई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सम्मेलन के दौरान लिए जाने वाले फैसले और नेताओं के बीच होने वाली बातचीत चिदंबरम द्वारा उठाए गए ‘ठोस लाभ’ के सवाल का कितना स्पष्ट जवाब दे पाती है।

    कानपुर में ससुर की हत्या का सनसनीखेज मामला: पार्टी में पति संग डांस करती रही बहू, घर में हमलावरों ने किए 26 चाकू के वार

        Yugcharan News / 10-09-2026 कानपुर में 63 वर्षीय कारोबारी विनीत मीनोचा की हत्या के मामले ने पुलिस जांच के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है। पुलिस का दावा है कि इस हत्या की साजिश कथित तौर पर उनकी बहू शालू मीनोचा ने रची थी। जिस समय घर में विनीत पर जानलेवा हमला किया जा रहा था, उसी दौरान शालू अपने पति सुब्रत के साथ कानपुर के तिलक नगर स्थित एक लाउंज में पार्टी कर रही थी और वहां डांस करती नजर आई। मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब लाउंज में बनाए गए वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए। इन वीडियो में शालू को अपने पति के साथ बॉलीवुड गानों पर डांस करते देखा गया। पुलिस के मुताबिक, हत्या के दौरान भी वह कथित तौर पर उन लोगों के संपर्क में थी, जिन्हें उसके ससुर की हत्या के लिए सुपारी दिए जाने का आरोप है। पुलिस जांच में सामने आया है कि शालू और उसके पति सुब्रत 5 सितंबर की रात एक पार्टी में गए थे। इसी दौरान विनीत अपने चार कमरों वाले फ्लैट में अकेले थे। पुलिस के अनुसार, इसी अवसर का फायदा उठाते हुए कथित हमलावर घर में दाखिल हुए और विनीत पर हमला किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर चाकू के 26 घाव मिलने की बात सामने आई है। पार्टी में डांस करती दिखाई दी आरोपी बहू हत्या के मामले में गिरफ्तार शालू मीनोचा से जुड़ा एक वीडियो बुधवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। पुलिस के अनुसार, यह वीडियो तिलक नगर के कॉस्मोजिन लाउंज में मौजूद कर्मचारियों द्वारा बनाया गया था। फुटेज में करीब 20 से 25 लोग दिखाई दे रहे हैं, जिनमें अधिकांश जोड़े बताए गए हैं। वीडियो में शालू गहरे बैंगनी रंग के गाउन में नजर आती है, जबकि उसके पति सुब्रत ने ग्रे रंग की शर्ट पहनी हुई थी। एक वीडियो में दोनों ‘तुम तो धोखेबाज हो, वादा करके भूल जाते हो’ गाने पर डांस करते दिखाई देते हैं। पुलिस का कहना है कि लाउंज में मौजूद लोगों को कथित तौर पर इस बात का अंदाजा नहीं था कि उसी समय शालू के घर में एक गंभीर आपराधिक घटना घट रही थी। जांचकर्ताओं के मुताबिक, शालू का व्यवहार वहां सामान्य दिखाई दे रहा था। लाउंज का सीसीटीवी डीवीआर भी जांच का हिस्सा बनाया गया है। हालांकि पुलिस के अनुसार, डीवीआर में उस रात की रिकॉर्डिंग सुरक्षित नहीं मिली। ऐसे में कर्मचारियों द्वारा बनाए गए मोबाइल वीडियो जांच के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। CCTV कैमरों को लेकर शुरू हुआ था विवाद पुलिस के मुताबिक, हत्या के पीछे की कथित साजिश का संबंध परिवार के घर में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों से जुड़ा हो सकता है। जांचकर्ताओं का कहना है कि विनीत ने हत्या से करीब 15 से 20 दिन पहले अपार्टमेंट के अंदर कैमरे लगवाए थे। पुलिस का दावा है कि शालू इन कैमरों से परेशान थी और उसने अपनी निजता प्रभावित होने की शिकायत की थी। जांच में यह भी सामने आया कि कथित तौर पर इसी विवाद के बाद उसने विनीत की हत्या की योजना बनाई। पुलिस के अनुसार, शालू ने विनीत की दवा दुकान में पहले काम कर चुके कर्मचारी विशाल गौतम से कथित संपर्क किया। आरोप है कि उसने विशाल को हत्या के बदले छह लाख रुपये देने की पेशकश की थी। जांच एजेंसियों के मुताबिक, शालू ने परिवार के फ्लैट की मूल चाबी भी विशाल को दी, ताकि उसकी डुप्लीकेट चाबी तैयार कराई जा सके। विशाल ने कथित तौर पर अपने बेरोजगार परिचित 30 वर्षीय राज किशोर को योजना में शामिल किया और उसे अग्रिम राशि के तौर पर 30 हजार रुपये देने की बात कही। आरोपियों ने दवा पहुंचाने का बनाया बहाना पुलिस के मुताबिक, 5 सितंबर को शालू ने कथित तौर पर विशाल और राज को बताया कि वह, उसका पति और उनका बेटा पार्टी के लिए बाहर जा रहे हैं। इसके बाद दोनों आरोपी डुप्लीकेट चाबी के जरिए रतन ऑर्बिट अपार्टमेंट में पहुंचने की कोशिश करने लगे। शुरुआत में सुरक्षा गार्ड ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस के अनुसार दोनों ने खुद को दवा पहुंचाने वाला बताया। विशाल ने कथित तौर पर रजिस्टर में अपना नाम ‘शिवम’ दर्ज कराया। इसके बाद दोनों फ्लैट के अंदर पहुंच गए। जांचकर्ताओं का कहना है कि दोनों ने घर के एक कमरे में छिपकर विनीत के लौटने का इंतजार किया। पुलिस के मुताबिक, शुरुआती योजना विनीत की हत्या को स्वाभाविक मौत, विशेष रूप से हार्ट अटैक जैसा दिखाने की थी। हत्या को हार्ट अटैक दिखाने की थी कथित योजना पुलिस के अनुसार, शालू ने कथित तौर पर आरोपियों को निर्देश दिया था कि वे तकिये से विनीत का मुंह दबाकर उन्हें दम घोंटकर मार दें, ताकि मौत संदिग्ध न लगे और इसे दिल का दौरा माना जा सके। लेकिन जांच के अनुसार यह योजना उस समय बिगड़ गई जब विनीत रात करीब 11 बजे कमरे में पहुंचे और उन्हें वहां कुछ असामान्य नजर आया। पुलिस का कहना है कि इसके बाद दोनों हमलावर घबरा गए और उन्होंने चाकुओं से विनीत पर हमला कर दिया। हमले के बाद दोनों कथित आरोपी अपार्टमेंट से निकलकर पीछे की दीवार फांदकर फरार हो गए। पुलिस के मुताबिक, घटना का समय शनिवार रात करीब 10:30 बजे से रविवार तड़के 3 बजे के बीच का माना जा रहा है। बाद में शालू और सुब्रत पार्टी से घर लौटे। पुलिस के अनुसार, दोनों ने वहां विनीत को खून से लथपथ हालत में पाया और इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। शरीर पर मिले 26 चाकू के घाव पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने हत्या की भयावहता को सामने ला दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, विनीत के शरीर पर चाकू के 26 घाव पाए गए। इससे स्पष्ट हुआ कि उनकी मौत किसी सामान्य या प्राकृतिक कारण से नहीं हुई थी। पुलिस ने मामले की जांच के दौरान अपार्टमेंट के आसपास लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग खंगाली। अधिकारियों के अनुसार, संदिग्ध हमलावरों को हत्या के बाद परिसर से निकलते हुए देखा गया। जांच आगे बढ़ने के बाद पुलिस ने विशाल और राज किशोर को गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तारी के दौरान हुई मुठभेड़ के बाद विशाल को उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। पूछताछ में उसने कथित तौर पर विनीत की हत्या में अपनी भूमिका स्वीकार की और दावा किया कि उसने यह काम शालू के निर्देश पर किया था। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत में होने वाली न्यायिक प्रक्रिया और आगे की जांच पर निर्भर करेगी। घर से कोई सामान चोरी नहीं हुआ जांच में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि हत्या के बाद घर से कोई कीमती सामान चोरी नहीं हुआ। पुलिस का कहना है कि इससे लूट के इरादे की संभावना कमजोर होती है और जांच व्यक्तिगत विवाद तथा कथित साजिश की दिशा में आगे बढ़ी। अधिकारियों ने मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2), जो आपराधिक साजिश से संबंधित है, भी जोड़ी है। पुलिस का दावा है कि शालू से पूछताछ के दौरान महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में उससे मामले के संबंध में जानकारी हासिल की गई। पुलिस अब कथित तौर पर शालू और हमलावरों के बीच हुई बातचीत की जांच कर रही है। व्हाट्सऐप कॉल, संदेश और वॉयस कॉल समेत डिजिटल साक्ष्यों को खंगाला जा रहा है। जांचकर्ताओं को उम्मीद है कि इन रिकॉर्ड से कथित साजिश की पूरी कड़ी को समझने में मदद मिल सकती है। जांच में सामने आएंगे कई और सवाल इस मामले में पुलिस के सामने अब कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हत्या की योजना कब बनाई गई और इसमें कितने लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे। इसके अलावा पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित तौर पर छह लाख रुपये की सुपारी की बात कितनी वास्तविक थी और रकम के लेन-देन से जुड़े कोई प्रमाण मौजूद हैं या नहीं। इसके साथ ही घर में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर परिवार के भीतर कितना विवाद था, यह भी जांच का अहम हिस्सा है। पुलिस कथित तौर पर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या हत्या का मुख्य कारण निजता को लेकर विवाद था या इसके पीछे कोई अन्य पारिवारिक अथवा आर्थिक वजह भी मौजूद थी। विनीत मीनोचा की हत्या ने कानपुर में भी लोगों को झकझोर दिया है। एक तरफ जहां पुलिस मामले को सुलझाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर वायरल पार्टी वीडियो ने घटना को लेकर लोगों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के समय आरोपी महिला का कथित तौर पर पार्टी में मौजूद होना और हमलावरों से संपर्क में रहने का पुलिस दावा इस केस को और अधिक पेचीदा बनाता है। फिलहाल पुलिस डिजिटल साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज और आरोपियों से पूछताछ के आधार पर मामले की कड़ियां जोड़ रही है। अदालत में आरोपों की पुष्टि और दोष तय होने से पहले सभी आरोपों को जांच के दावों के रूप में ही देखा जाना जरूरी है। आने वाले दिनों में पुलिस की विस्तृत जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि 63 वर्षीय कारोबारी की हत्या के पीछे वास्तविक कारण क्या था और इस कथित साजिश में किस-किस की भूमिका रही।

    ट्रंप का बड़ा ऐलान: रिपब्लिकन जीतने पर हर वयस्क अमेरिकी नागरिक को मिलेगा 5,000 डॉलर का ‘डिविडेंड’

    Yugcharan News / 10-09-2026 वॉशिंगटन। अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। इसी बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों के सामने एक बड़ा आर्थिक वादा किया है। ट्रंप ने कहा है कि यदि नवंबर में रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों सदनों में जीत हासिल करती है, तो अमेरिका के हर वयस्क नागरिक को 5,000 डॉलर का भुगतान किया जाएगा। राष्ट्रपति ने इस प्रस्तावित रकम को ‘डिविडेंड’ यानी लाभांश का नाम दिया है और कहा कि यह भुगतान देश की मजबूत आर्थिक स्थिति तथा सरकार की बढ़ती आय के आधार पर किया जाएगा। ट्रंप ने यह घोषणा बुधवार को डलास में आयोजित रिपब्लिकन पार्टी के मध्यावधि सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान की। लगभग दो घंटे चले भाषण में उन्होंने आगामी चुनाव को अपने प्रशासन की नीतियों के लिए महत्वपूर्ण बताया और पार्टी समर्थकों से बड़ी संख्या में मतदान करने की अपील की। ट्रंप ने अपने समर्थकों से यहां तक कहा कि वे ऐसे मतदान करें जैसे वह स्वयं चुनावी मतपत्र पर मौजूद हों। राष्ट्रपति के अनुसार, प्रस्तावित 5,000 डॉलर का भुगतान अमेरिका के प्रत्येक वयस्क नागरिक को दिया जाएगा। हालांकि, इस योजना को लागू करने का विस्तृत तरीका अभी सामने नहीं आया है। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि भुगतान के लिए सरकारी स्तर पर किस तरह की व्यवस्था बनाई जाएगी, इसके लिए धन कहां से आएगा और पात्र नागरिकों की पहचान किस प्रक्रिया से की जाएगी। ट्रंप ने अपने भाषण में इस भुगतान की तुलना किसी सफल कंपनी द्वारा अपने शेयरधारकों को दिए जाने वाले नकद वितरण से की। उनका तर्क था कि जिस तरह किसी कंपनी को अच्छा प्रदर्शन करने पर अपने शेयरधारकों के साथ लाभ साझा करने का अवसर मिलता है, उसी तरह अमेरिका की आर्थिक सफलता का लाभ उसके नागरिकों तक पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि देश ने अच्छा प्रदर्शन किया है और सरकार के पास पर्याप्त धन आ रहा है, इसलिए नागरिकों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। हालांकि, राष्ट्रपति के बयान में योजना को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल अभी अनुत्तरित हैं। उन्होंने यह नहीं बताया कि 5,000 डॉलर का भुगतान किस सरकारी कार्यक्रम के तहत किया जाएगा या इसके लिए किस कानून की जरूरत होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने इस भुगतान को नवंबर के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की जीत से जोड़ दिया है। ट्रंप ने कहा कि यदि रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों पर नियंत्रण हासिल करती है, तभी यह ‘ट्रंप डिविडेंड’ लागू किया जाएगा। इस घोषणा के बाद इस योजना की वित्तीय लागत को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। उपलब्ध अमेरिकी जनगणना आंकड़ों के अनुसार देश में वयस्क आबादी करीब 26 करोड़ है। हालांकि इस आंकड़े में अमेरिकी नागरिकों के साथ गैर-नागरिक वयस्क निवासी भी शामिल हैं। एक अनुमान के मुताबिक यदि लगभग 27 करोड़ पात्र लोगों को 5,000 डॉलर का भुगतान किया जाए, तो कुल खर्च करीब 1.35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यह राशि अमेरिकी संघीय बजट के लिहाज से बेहद बड़ी मानी जाएगी। यही वजह है कि ट्रंप की घोषणा को केवल चुनावी वादे के रूप में नहीं बल्कि संभावित रूप से बड़े वित्तीय कार्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है। यदि इसे वास्तव में लागू किया जाता है, तो सरकार को इसके लिए विशाल संसाधनों की व्यवस्था करनी होगी। इसके साथ ही यह भी तय करना होगा कि कौन लोग भुगतान के पात्र होंगे और किन परिस्थितियों में उन्हें यह राशि दी जाएगी। ट्रंप ने यह भी कहा कि प्रस्तावित भुगतान का इस्तेमाल अमेरिका के भीतर ही किया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस शर्त को किस तरह लागू किया जाएगा। यदि नागरिकों को सीधे नकद भुगतान किया जाता है, तो उस रकम के इस्तेमाल पर सरकार किस स्तर तक निगरानी रख सकेगी, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न है। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में यह भी स्वीकार किया कि रिपब्लिकन पार्टी चुनाव हार सकती है। इसके बाद उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा कि वह इस तरह का भुगतान नहीं कर सकती क्योंकि उनकी नीतियां टैरिफ और सरकारी राजस्व बढ़ाने पर आधारित नहीं हैं। ट्रंप ने अपनी आर्थिक नीतियों, विशेष रूप से टैरिफ से मिलने वाली आय को इस संभावित डिविडेंड से जोड़ने की कोशिश की। इस घोषणा का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 2026 के मध्यावधि चुनाव ट्रंप प्रशासन के लिए एक अहम परीक्षा माने जा रहे हैं। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट के लिए बड़ी संख्या में सीटों पर मतदान होता है। राष्ट्रपति आम तौर पर सीधे इन चुनावों में उम्मीदवार नहीं होते, लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति की लोकप्रियता और नीतियों का असर पार्टी के उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है। ट्रंप ने अपने भाषण में खुद को रिपब्लिकन अभियान के केंद्र में रखा। उन्होंने समर्थकों से कहा कि वे यह मानकर चुनाव लड़ें कि वह स्वयं मतपत्र पर मौजूद हैं। राष्ट्रपति के मुताबिक, लगभग 35 सीटें ऐसी हो सकती हैं जो प्रतिनिधि सभा और सीनेट में बहुमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। उन्होंने संकेत दिया कि वह इन महत्वपूर्ण राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगे। ट्रंप के सामने हालांकि राजनीतिक चुनौतियां भी हैं। हाल के कुछ सर्वेक्षणों में उनकी अप्रूवल रेटिंग में गिरावट की बात सामने आई है और रिपब्लिकन मतदाताओं के बीच भी समर्थन में कुछ कमजोरी के संकेत मिले हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में 5,000 डॉलर के सीधे आर्थिक लाभ का वादा मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। लेकिन इस योजना की व्यवहारिकता और कानूनी स्थिति पर भी सवाल उठ सकते हैं। किसी राष्ट्रपति द्वारा सीधे यह तय करना कि नागरिकों को इतनी बड़ी रकम दी जाएगी, पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कांग्रेस की भूमिका, बजटीय प्रावधान और संघीय कानूनों की आवश्यकता हो सकती है। इसके अलावा किसी राजनीतिक दल की चुनावी जीत को नागरिकों को सरकारी भुगतान मिलने की शर्त से जोड़ने का कानूनी आधार भी स्पष्ट नहीं है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इस तरह के बड़े भुगतान के संभावित प्रभाव को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच बहस हो सकती है। एक तरफ, यदि करोड़ों नागरिकों के हाथ में अचानक 5,000 डॉलर पहुंचते हैं, तो उपभोक्ता खर्च बढ़ सकता है। इससे खुदरा कारोबार, सेवाओं और अन्य घरेलू आर्थिक गतिविधियों को अस्थायी बढ़ावा मिल सकता है। दूसरी तरफ, इतनी बड़ी रकम अर्थव्यवस्था में डालने से महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है, खासकर यदि उत्पादन उसी अनुपात में न बढ़े। इसके अलावा, सरकार के लिए इतना बड़ा खर्च राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक ऋण को लेकर भी नई चिंताएं पैदा कर सकता है। यदि इस भुगतान की पूरी राशि टैरिफ या अन्य राजस्व से हासिल नहीं होती, तो सरकार को अतिरिक्त उधारी या बजट के दूसरे हिस्सों में कटौती जैसे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। ट्रंप ने अपने भाषण में ईरान के साथ जारी युद्ध का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने से केवल दो या तीन सप्ताह दूर हो सकता है और कहा कि अमेरिका इस युद्ध में जीत हासिल करेगा। इस बयान से स्पष्ट है कि ट्रंप का संबोधन केवल घरेलू चुनावी मुद्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी अपने राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनाया। फिलहाल 5,000 डॉलर का ‘ट्रंप डिविडेंड’ एक घोषित राजनीतिक प्रस्ताव है, न कि ऐसा भुगतान जिसकी आधिकारिक वितरण प्रक्रिया तय हो चुकी हो। योजना की वास्तविक लागत, पात्रता, वित्तीय स्रोत और कानूनी आधार को लेकर विस्तृत जानकारी अभी सामने आना बाकी है। इसलिए अमेरिकी नागरिकों के लिए इस घोषणा को तत्काल मिलने वाली आर्थिक सहायता के बजाय चुनावी वादे के रूप में देखना अधिक उचित होगा। आने वाले महीनों में यदि रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में बहुमत हासिल करती है, तो इस प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस में गंभीर बहस शुरू हो सकती है। उस स्थिति में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप प्रशासन इस वादे को किस कानूनी और वित्तीय ढांचे में लागू करने की कोशिश करता है। दूसरी ओर, यदि रिपब्लिकन पार्टी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाती है, तो ‘ट्रंप डिविडेंड’ का भविष्य और भी अनिश्चित हो जाएगा।   कुल मिलाकर, ट्रंप का 5,000 डॉलर का वादा अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में एक बड़ा आर्थिक और राजनीतिक मुद्दा बनने की क्षमता रखता है। करोड़ों नागरिकों को सीधे आर्थिक लाभ देने का विचार निश्चित रूप से मतदाताओं का ध्यान आकर्षित कर सकता है, लेकिन इसके साथ जुड़ी भारी वित्तीय लागत, कानूनी चुनौतियां और भुगतान की निगरानी से जुड़े सवालों के जवाब अभी बाकी हैं। अब सबकी नजर नवंबर के चुनाव परिणामों और उसके बाद इस प्रस्ताव को लेकर रिपब्लिकन नेतृत्व की अगली रणनीति पर रहेगी।

    शी जिनपिंग की भारत यात्रा से रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने की उम्मीद, लेकिन व्यापारिक संबंधों में भरोसे की कमी बनी बड़ी चुनौती

    Yugcharan News / 10-09-2026 नई दिल्ली/बीजिंग। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को दोनों एशियाई शक्तियों के बीच पिछले कुछ वर्षों से तनावपूर्ण रहे संबंधों को सामान्य दिशा में ले जाने की एक महत्वपूर्ण कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सात साल बाद शी जिनपिंग की नई दिल्ली यात्रा की संभावना ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत और चीन के बीच कूटनीतिक स्तर पर संवाद में सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच आर्थिक और कारोबारी रिश्तों की तस्वीर अभी भी उतनी सहज नहीं है। निवेश संबंधी अड़चनें, वीजा में देरी, तकनीकी उपकरणों की आपूर्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों पर अब भी भारी पड़ रहे हैं। शी जिनपिंग के इस सप्ताह नई दिल्ली में होने वाले वार्षिक ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने की व्यापक उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, चीन की ओर से उनकी यात्रा की औपचारिक पुष्टि अभी नहीं की गई है। इसी तरह यह भी स्पष्ट नहीं है कि शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय मुलाकात होगी या नहीं। दोनों नेताओं के बीच संभावित बैठक को इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों की राजनीतिक और आर्थिक दिशा को लेकर संकेत मिल सकते हैं। भारत और चीन के रिश्ते लंबे समय से जटिल रहे हैं। वर्ष 1962 के युद्ध ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की गहरी नींव रखी थी। इसके बाद कई दशकों तक सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा। वर्ष 2020 में सीमा पर हुई हिंसक झड़प ने रिश्तों को एक बार फिर गंभीर संकट में डाल दिया। उस घटना में 20 भारतीय और चार चीनी सैनिकों की मौत हुई थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंधों के साथ-साथ व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी कई प्रतिबंध और अतिरिक्त जांच देखने को मिली। हालांकि, हाल के वर्षों में दोनों देशों ने तनाव कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछले वर्ष चीन यात्रा और उसके बाद उच्चस्तरीय संपर्कों में वृद्धि ने संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को गति दी। भारत और चीन दोनों इस समय अमेरिका के साथ अपने-अपने संबंधों में कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के साथ संवाद बनाए रखना रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है। चीन के दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ और फुदान विश्वविद्यालय से जुड़े लिन मिनवांग के अनुसार, बीजिंग निश्चित रूप से भारत के साथ संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन चीन यह भी देखना चाहता है कि नई दिल्ली इस दिशा में कितनी दूर तक जाने के लिए तैयार है। उनके आकलन से संकेत मिलता है कि दोनों देशों के संबंधों में अचानक किसी बड़े बदलाव की संभावना कम है और सुधार की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ सकती है। भारत में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े हर्ष पंत ने भी दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी को एक बड़ी समस्या बताया है। उनके मुताबिक चीन के पास बड़ी आर्थिक क्षमता है और वह भारत के लिए एक भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है। खासकर उस समय जब भारत और चीन दोनों अमेरिकी व्यापार नीतियों से प्रभावित हो रहे हैं, दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। भारत ने भी चीन से जुड़े निवेश नियमों में कुछ नरमी के संकेत दिए हैं। मार्च में नई दिल्ली ने 2020 के सीमा विवाद के बाद लगाए गए कुछ निवेश प्रतिबंधों में ढील दी। इलेक्ट्रॉनिक्स, पूंजीगत सामान और सौर सेल जैसे क्षेत्रों में चीनी निवेश को लेकर प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया गया। इसके अलावा कुछ उद्योगों में भारतीय और चीनी कंपनियों के संयुक्त उपक्रमों को तेजी से मंजूरी देने पर भी विचार किया जा रहा है। इस दिशा में एक उल्लेखनीय कदम भारतीय कंपनी डिक्सन टेक्नोलॉजीज और चीनी स्मार्टफोन निर्माता वीवो के बीच विनिर्माण संयुक्त उपक्रम को मंजूरी देना रहा। यह फैसला इस बात का संकेत माना जा सकता है कि भारत चुनिंदा क्षेत्रों में चीनी कंपनियों के साथ आर्थिक सहयोग को पूरी तरह बंद करने के बजाय नियंत्रित और निगरानी वाली व्यवस्था में आगे बढ़ाना चाहता है। फिर भी, इन कदमों का असर अभी तक चीन की बड़ी कंपनियों के भारत में निवेश पर व्यापक रूप से दिखाई नहीं दिया है। वाहन क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां बीवाईडी और ग्रेट वॉल मोटर भारत में अपने निवेश को लेकर पहले से अधिक सतर्क रही हैं। भारतीय अधिकारियों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली की ओर से बढ़ी हुई जांच और नियामकीय सतर्कता के कारण कुछ प्रस्तावित निवेश योजनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ने के बावजूद कारोबारी समुदाय अभी भी जोखिमों को लेकर सावधान है। भारत की ओर से चीन से जुड़ी कुछ डिजिटल और तकनीकी कंपनियों पर भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं। हाल ही में चीन के एंट ग्रुप से जुड़े अलिपे की उस योजना को मंजूरी नहीं दी गई, जिसके तहत उसे भारत की तत्काल भुगतान प्रणाली से जोड़े जाने का प्रस्ताव था। इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण रहे। इसी तरह भारतीय अधिकारियों द्वारा चीन की स्मार्टफोन कंपनी श्याओमी के भारत में कारोबार से जुड़े मामलों की जांच को लेकर भी चर्चा चल रही है। भारत के गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ने कथित अनियमितताओं और विदेशी निवेश कानूनों के संभावित उल्लंघन को लेकर विस्तृत जांच की सिफारिश की है। हालांकि, कंपनी ने कहा है कि वह भारत के सभी लागू कानूनों का पालन करती है और उसे जांच एजेंसी की ओर से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। व्यापारिक संबंधों में केवल भारत की चिंताएं ही समस्या नहीं हैं। चीन की ओर से भी संवेदनशील तकनीक और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों को भारत के साथ कुछ प्रकार के कारोबार को लेकर सतर्क रहने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक बंदरगाह उपकरण, सौर ऊर्जा से जुड़े उत्पाद और मोबाइल विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाले उपकरण जैसे क्षेत्रों में चीन की कंपनियों पर सावधानी बरतने का दबाव है। यह स्थिति भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में चीन से आने वाले उपकरण और घटक अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कारोबारी सूत्रों के मुताबिक इस वर्ष चीन से आने वाले कुछ उपकरण और कंपोनेंट चीनी सीमा शुल्क प्रक्रिया में अटक गए हैं। इनमें भारत के बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल होने वाली बड़ी सुरंग निर्माण मशीनें भी शामिल हैं। एक भारतीय सरकारी अधिकारी के अनुसार कुछ ऐसी मशीनें एक वर्ष से अधिक समय तक अटकी रही हैं। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रुकावटें केवल सामान्य प्रशासनिक समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, वीजा और उपकरणों की आपूर्ति में आ रही परेशानियां यह संकेत दे सकती हैं कि चीन भारत की व्यापार और तकनीकी निर्भरता को एक रणनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। फिर भी दोनों देशों के बीच संपर्क पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है। पिछले वर्ष भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानों को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और चीनी कारोबारी पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया में भी कुछ राहत दी गई। हालांकि, हाल के महीनों में चीन में कारोबारी हित रखने वाले कुछ भारतीय व्यापारियों को वीजा हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जिन भारतीय नागरिकों को चीन की यात्रा की वास्तविक आवश्यकता है, उन्हें कानून और नियमों के अनुसार वीजा जारी किया जाता है। ऐसे में शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच संभावित मुलाकात का महत्व केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रहेगा। यदि दोनों नेता व्यापार, निवेश, वीजा, तकनीकी उपकरणों और सीमा से जुड़े मुद्दों पर ठोस बातचीत करते हैं, तो कारोबारी संबंधों में मौजूद कुछ बाधाओं को दूर करने का रास्ता खुल सकता है। पूर्व भारतीय वरिष्ठ व्यापार अधिकारी अनूप वाधवान का मानना है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की बैठक राजनीतिक और आर्थिक हितों के बीच बेहतर तालमेल बनाने का अवसर प्रदान कर सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अंततः व्यापारिक संबंध दोनों देशों के नागरिकों और कंपनियों के वास्तविक आर्थिक हितों पर निर्भर करेंगे। भारत और चीन के बीच मौजूदा स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा रिश्तों में सकारात्मक माहौल बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन केवल एक बैठक से वर्षों से जमा अविश्वास खत्म नहीं होगा। सीमा विवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी निर्भरता और निवेश की जांच जैसे मुद्दे अभी भी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करेंगे।   आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या दोनों देश राजनीतिक स्तर पर बढ़ते संवाद को वास्तविक आर्थिक सहयोग में बदल पाते हैं। यदि नई दिल्ली और बीजिंग भरोसा बढ़ाने वाले कदम उठाते हैं और कारोबारी बाधाओं को धीरे-धीरे कम करते हैं, तो दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक संबंधों में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। लेकिन यदि सुरक्षा चिंताओं और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रभाव जारी रहा, तो कूटनीतिक गर्मजोशी के बावजूद कारोबारी रिश्तों में सावधानी और संदेह बना रह सकता है।

    नगर निकाय चुनाव को लेकर मतदाता जागरूकता अभियान

    जयपुर। जयपुर में नगर निकाय चुनाव को लेकर मतदाता जागरूकता अभियान के माध्यम से कुश शर्मा और राष्ट्रपति अवार्डी शुभम ने मानसरोवर के क्षेत्र,दुर्गापुरा महारानी फ़ार्म और सिविल लाइन सहित कई बस्तियों में पहुंचकर लोगों को मतदान के लिए जागरूक किया। अभियान के दौरान लोगों से लोकतंत्र के इस पर्व में बढ़-चढ़कर भाग लेने और अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अपील की गई। कुश शर्मा और शुभम ने स्थानीय लोगों से कहा कि एक-एक वोट लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने पात्र मतदाताओं से बिना किसी दबाव के अपने विवेक से मतदान करने का आह्वान किया। कुश शर्मा ने कहा नगर निकाय चुनाव लोकतंत्र की जमीनी व्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर है। हमारा प्रयास है कि कोई भी पात्र मतदाता मतदान से वंचित न रहे। मानसरोवर, सिविल लाइन सहित विभिन्न बस्तियों में जाकर लोगों को मतदान के महत्व के बारे में जागरूक किया किया। राष्ट्रपति अवार्डी शुभम ने भी लोगों से मतदान के दिन अपने घरों से निकलकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी निभाने की अपील की।  

    अभिव्यक्ति क्लब ने आयोजित की ‘जस्ट ए मिनट’ प्रतियोगिता’

    कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर के अभिव्यक्ति क्लब (हिंदी एवं अंग्रेज़ी) द्वारा हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में ’जस्ट ए मिनट’ (JAM) प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने अभिव्यक्ति कौशल का महत्व बताते हुए सभी छात्राओं का उत्साहवर्धन किया। प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार- वालिनी ओझा, बीसीए सेमेस्टर प्रथम, द्वितीय पुरस्कार- जानवी बगोरिया, बीबीए सेमेस्टर प्रथम और वृतिका, बी.एस.सी. बायोलॉजी सेमेस्टर पंचम, तृतीय पुरस्कार- टिया कुमारी, बी.ए. सेमेस्टर प्रथम और हर्षिका शर्मा- बी.ए. ऑनर्स को मिला। प्रतियोगिता में कुल 30 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रत्येक प्रतिभागी ने दिए गए विषय पर एक मिनट में अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रतियोगिता का निर्णयन डॉ. टीना सिंह एवं ऋषिता शर्मा ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों के प्रदर्शन का विभिन्न मानदंडों पर मूल्यांकन किया तथा उनके प्रयासों और उत्साह की सराहना की। यह कार्यक्रम छात्राओं के लिए एक ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक अनुभव रहा। प्रतियोगिता ने छात्राओं को झिझक दूर करने तथा प्रभावी सार्वजनिक भाषण और संचार कौशल विकसित करने के लिए एक उत्कृष्ट मंच प्रदान किया।