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    मिज़ोरम सांसद का आरोप: राज्यसभा में रक्षा भूमि घोटाले का मुद्दा उठाने की नहीं मिली अनुमति

    नई दिल्ली | 06/02/2026 मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के राज्यसभा सांसद के. वानलालवेना ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्हें बीते एक सप्ताह से राज्यसभा में मिज़ोरम के लेंगपुई हवाई अड्डे के पास भारतीय वायुसेना (आईएएफ) के लिए निजी भूमि अधिग्रहण में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। सांसद का दावा है कि इस भूमि अधिग्रहण में लगभग ₹187.90 करोड़ की अनियमितताएं हुई हैं और इससे जुड़े अहम सवालों को सदन में रखने से उन्हें रोका जा रहा है। के. वानलालवेना, जो मिज़ोरम से राज्यसभा के एकमात्र सांसद हैं, ने कहा कि बजट सत्र की शुरुआत से ही वे इस मामले को उठाने के लिए लगातार ज़ीरो आवर नोटिस दे रहे हैं, लेकिन अब तक उनके किसी भी नोटिस को स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने इसे न केवल संसदीय प्रक्रियाओं के लिए चिंताजनक बताया, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े करने वाला कदम बताया। क्या है पूरा मामला सांसद के अनुसार, मिज़ोरम के एकमात्र हवाई अड्डे लेंगपुई एयरपोर्ट और उसके पास स्थित सिफ्फिर गांव के आसपास की निजी भूमि को भारतीय वायुसेना के लिए वायु रक्षा प्रणालियों की स्थापना हेतु अधिग्रहित किया गया। आरोप है कि इस भूमि को राज्य सरकार ने अत्यधिक दरों पर खरीदा, जो भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनों और नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। के. वानलालवेना ने दावा किया कि भूमि अधिग्रहण की यह प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013) के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों के खिलाफ है। कानूनों के उल्लंघन का आरोप सांसद ने अपने आरोपों में कहा कि इस अधिग्रहण के दौरान कई अनिवार्य प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया, जिनमें शामिल हैं: स्थानीय समाचार पत्रों में भूमि अधिग्रहण से संबंधित अधिसूचनाओं का प्रकाशन संबंधित ग्राम परिषदों से परामर्श सामाजिक प्रभाव आकलन अध्ययन (Social Impact Assessment) उनका कहना है कि इन प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया गया और यह पूरा मामला संदिग्ध बिचौलियों के माध्यम से धन के ग़लत इस्तेमाल की ओर इशारा करता है। केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग के. वानलालवेना ने इस मुद्दे को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया में न केवल राज्य स्तर पर बल्कि केंद्र के धन का भी दुरुपयोग हुआ है। उन्होंने मांग की कि इस गंभीर मामले की जांच किसी उपयुक्त केंद्रीय जांच एजेंसी से कराई जाए। उन्होंने कहा,“इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है। कानून और जनता के विश्वास का इतना बड़ा उल्लंघन करने वालों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए।” राज्य स्तर पर भी शिकायत दर्ज सांसद ने यह भी बताया कि उनकी पार्टी मिज़ो नेशनल फ्रंट ने मिज़ोरम सरकार के मुख्य सतर्कता अधिकारी (Chief Vigilance Officer) के पास इस मामले को लेकर एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है। इसमें केंद्रीय जांच एजेंसियों से विस्तृत जांच की मांग की गई है। उल्लेखनीय है कि एमएनएफ फिलहाल मिज़ोरम में विपक्ष की भूमिका में है। सत्ता पक्ष का पलटवार वहीं, मिज़ोरम में सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) ने इन आरोपों को लेकर अलग रुख अपनाया है। पार्टी ने कहा है कि इस पूरे मामले में पूर्ववर्ती एमएनएफ और कांग्रेस सरकारों के मंत्रियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। ZPM नेताओं का कहना है कि यदि सीबीआई जांच होती है, तो भारतीय वायुसेना से जुड़े भूमि हस्तांतरण के मामले में “वास्तविक तथ्य” सामने आ जाएंगे। पार्टी ने यह भी दावा किया कि मौजूदा सरकार ने भूमि हस्तांतरण के दौरान पूरी सावधानी और कानूनी प्रक्रिया का पालन किया है। सरकार का पक्ष ZPM ने 31 जनवरी को आइज़ोल में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि भारतीय वायुसेना को भूमि सौंपने के लिए “कानूनी रूप से मजबूत और सावधानीपूर्वक प्रक्रिया” अपनाई गई। पार्टी का कहना है कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े सभी कदम प्रचलित कानूनों के अनुरूप थे और किसी भी तरह की अनियमितता नहीं की गई। संसद में मुद्दा न उठने पर सवाल के. वानलालवेना द्वारा बार-बार यह मुद्दा उठाने की कोशिश और इसके बावजूद राज्यसभा में चर्चा की अनुमति न मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि आरोप निराधार हैं, तो सरकार को खुली बहस से क्यों डरना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मामला केवल एक कथित भूमि घोटाले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसद में विपक्ष की आवाज़ और लोकतांत्रिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। ज़ीरो आवर के दौरान किसी सांसद को मुद्दा उठाने से रोकना असाधारण स्थिति मानी जाती है, खासकर तब जब मामला सार्वजनिक धन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो। आगे क्या? अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या केंद्र सरकार इस मामले में किसी केंद्रीय एजेंसी से जांच के आदेश देती है या नहीं। साथ ही यह भी देखना होगा कि राज्यसभा में के. वानलालवेना को अपने आरोपों को औपचारिक रूप से रखने का अवसर मिलता है या नहीं।   फिलहाल, मिज़ोरम की राजनीति में यह मुद्दा गरमाता जा रहा है और आने वाले दिनों में यह राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है।

    दिल्ली मौसम ताज़ा अपडेट: दिन में खिली धूप, सुबह-शाम ठंड बरकरार, राजधानी में मौसम का संक्रमणकाल जारी

      नई दिल्ली | 08/02/2026 दिल्ली में मौसम धीरे-धीरे सर्दियों से बाहर निकलकर शुरुआती गर्मी की ओर बढ़ रहा है। फरवरी के दूसरे सप्ताह में राजधानी के मौसम में स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां एक ओर दिन के समय तेज और साफ धूप तापमान को ऊपर की ओर धकेल रही है, वहीं दूसरी ओर सुबह और शाम के समय हल्की ठंड अभी भी लोगों को सर्दी का अहसास करा रही है। मौसम विशेषज्ञ इसे ‘संक्रमणकाल’ (ट्रांजिशन फेज) मान रहे हैं, जो आमतौर पर फरवरी के महीने में देखने को मिलता है। बीते कुछ हफ्तों तक दिल्ली और एनसीआर के इलाकों में घना कोहरा और शीतलहर जैसी स्थिति बनी हुई थी, लेकिन अब कोहरे का असर काफी हद तक कम हो गया है। तड़के सुबह कुछ इलाकों में हल्की धुंध जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन दिन चढ़ते ही आसमान साफ हो जाता है और तेज धूप निकल आती है। इससे दिन के तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मौजूदा मौसम की स्थिति रविवार को दिल्ली के अधिकांश हिस्सों में मौसम शुष्क और साफ रहा। सुबह के समय हल्की ठंडक महसूस की गई, लेकिन सूरज निकलते ही मौसम सुहावना हो गया। दोपहर के समय धूप इतनी तेज रही कि लोगों ने हल्के ऊनी कपड़ों की जगह सूती कपड़े पहनना शुरू कर दिया। हालांकि, सूरज ढलते ही तापमान में गिरावट आ जाती है और शाम के बाद फिर से हल्की ठंड लौट आती है। दिल्ली की हवा की गुणवत्ता (एयर क्वालिटी) हालांकि अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। शनिवार को राजधानी का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 227 दर्ज किया गया, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। रविवार सुबह इसमें हल्का सुधार देखा गया और AQI घटकर 196 पर पहुंच गया, जिसे ‘मध्यम’ श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि धूप बढ़ने और हवाओं की गति में हल्का इजाफा होने से प्रदूषण में कुछ राहत मिल रही है, लेकिन स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती। 08 फरवरी 2026 का मौसम पूर्वानुमान मौसम विभाग के अनुसार, 08 फरवरी 2026 को दिल्ली में पूरे दिन मौसम साफ रहने की संभावना है। सुबह के समय कुछ इलाकों में हल्का कोहरा या धुंध देखने को मिल सकती है, लेकिन इसका असर ज्यादा देर तक नहीं रहेगा। दिन के समय तेज धूप निकलने से तापमान में बढ़ोतरी होगी और गर्माहट महसूस की जाएगी। अधिकतम तापमान करीब 23 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने की संभावना है, जबकि न्यूनतम तापमान लगभग 10 डिग्री सेल्सियस रह सकता है। शाम के बाद तापमान में गिरावट आएगी और हल्की ठंड फिर से महसूस होगी। मौसम विभाग ने फिलहाल किसी तरह की चेतावनी या अलर्ट जारी नहीं किया है। अगले सात दिनों का मौसम मिजाज आने वाले एक सप्ताह में दिल्ली के मौसम में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। 9 और 10 फरवरी को आंशिक बादल छाए रह सकते हैं और सुबह के समय कुछ इलाकों में हल्का कोहरा देखने को मिल सकता है। 11 फरवरी के बाद एक बार फिर आसमान साफ रहने की संभावना है। मौसम विभाग के अनुसार, 13 फरवरी तक दिल्ली में किसी भी तरह का मौसम अलर्ट जारी नहीं किया गया है। इस दौरान तापमान में एक से दो डिग्री तक का उतार-चढ़ाव हो सकता है। अधिकतम तापमान 24 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रह सकता है, जबकि न्यूनतम तापमान 9 से 12 डिग्री सेल्सियस के दायरे में रह सकता है। स्वास्थ्य और दैनिक जीवन पर असर मौसम के इस बदलते मिजाज का असर लोगों की सेहत पर भी पड़ सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, सुबह-शाम की ठंड और दिन की गर्माहट के कारण सर्दी-खांसी, गले में खराश और वायरल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मौसम में हल्के लेकिन परतदार कपड़े पहनना बेहतर होता है, ताकि दिन और रात के तापमान के अनुसार खुद को ढाला जा सके। इसके अलावा, पर्याप्त पानी पीना और प्रदूषण के स्तर को देखते हुए सुबह-शाम बाहर निकलते समय सावधानी बरतना जरूरी है। किसानों और यात्रियों के लिए राहत दिल्ली और आसपास के इलाकों में मौसम साफ रहने से यात्रियों को भी राहत मिल रही है। कोहरे की तीव्रता कम होने से रेल और हवाई यातायात पर असर घटा है। वहीं, किसानों के लिए भी यह मौसम अनुकूल माना जा रहा है, क्योंकि धूप और हल्की ठंड फसलों के लिए फायदेमंद होती है। निष्कर्ष कुल मिलाकर, दिल्ली का मौसम इस समय सर्दी से गर्मी की ओर बढ़ते संक्रमणकाल में है। दिन में बढ़ती धूप और गर्माहट जहां लोगों को सर्दी से राहत दे रही है, वहीं सुबह और शाम की ठंड यह याद दिला रही है कि सर्दी पूरी तरह विदा नहीं हुई है। आने वाले दिनों में तापमान में धीरे-धीरे और बढ़ोतरी की संभावना है, लेकिन फिलहाल राजधानी के लोगों को मौसम के इस उतार-चढ़ाव के साथ तालमेल बैठाकर चलने की जरूरत है।

    सोना-चांदी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिला सहारा लेकिन अस्थिरता बरकरार

    Yugcharan / 08/02/2026 अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में बीते कुछ दिनों से सोना और चांदी की कीमतों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने के बाद अचानक आई तेज गिरावट और फिर आंशिक रिकवरी ने निवेशकों और कारोबारियों दोनों को सतर्क कर दिया है। वैश्विक घटनाक्रम, अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर अनिश्चितता और भू-राजनीतिक हालात के चलते कीमती धातुओं में अस्थिरता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में शुक्रवार को सोने की कीमतों में एक बार फिर मजबूती देखने को मिली। स्पॉट गोल्ड एक प्रतिशत से अधिक की तेजी के साथ ऊपर बंद हुआ, जिससे पिछले सत्रों की गिरावट के बाद कुछ राहत मिली। हालांकि, चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव कहीं अधिक तीव्र रहा। एक समय 10 से 15 प्रतिशत तक फिसलने के बाद चांदी ने आंशिक रिकवरी दर्ज की, लेकिन साप्ताहिक आधार पर इसमें अब भी कमजोरी बनी हुई है। घरेलू बाजार में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी यही रुझान देखने को मिला। सोने और चांदी के वायदा कारोबार में तेज गिरावट के बाद कुछ सत्रों में कीमतें संभलती नजर आईं। बाजार सहभागियों के अनुसार, अचानक बढ़ी अस्थिरता को देखते हुए एक्सचेंज ने मार्जिन आवश्यकताओं में बढ़ोतरी की है, जिससे सट्टेबाजी पर कुछ हद तक अंकुश लगे और अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया गिरावट मुख्य रूप से मुनाफावसूली का नतीजा है। बीते एक साल में सोना और चांदी दोनों ने असाधारण तेजी दिखाई थी। जनवरी के अंत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना ऐतिहासिक ऊंचाई के करीब पहुंच गया था, जबकि चांदी ने भी कई वर्षों का उच्च स्तर छू लिया था। इतनी तेज बढ़त के बाद निवेशकों द्वारा लाभ सुरक्षित करने की प्रवृत्ति स्वाभाविक मानी जा रही है। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी कीमती धातुओं पर दबाव बना रही है। डॉलर में तेजी आने से डॉलर में मूल्यांकित सोना और चांदी अन्य मुद्राओं के निवेशकों के लिए महंगे हो जाते हैं, जिससे मांग पर असर पड़ता है। इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की भावी ब्याज दर नीति को लेकर भी बाजार में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ब्याज दरों में कटौती की गति धीमी रहने की आशंका से गैर-ब्याज देने वाली परिसंपत्तियों, जैसे सोना और चांदी, पर दबाव देखा जा रहा है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर हालांकि अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया से लेकर अन्य क्षेत्रों में जारी तनाव और कूटनीतिक बातचीत की खबरें बाजार की दिशा को प्रभावित कर रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव में कमी आती है, तो सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग अस्थायी रूप से कमजोर पड़ सकती है। वहीं, किसी भी नए तनाव या अनिश्चितता की स्थिति में निवेशक एक बार फिर सोने-चांदी की ओर रुख कर सकते हैं। घरेलू सर्राफा बाजार में भी कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया है। प्रमुख शहरों में सोने और चांदी के दामों में एक ही दिन में हजारों रुपये का अंतर आया। व्यापारियों के अनुसार, ऊंचे स्तरों पर मांग कुछ कमजोर हुई है, लेकिन गिरावट के दौरान खरीदारी का रुझान भी दिखाई दे रहा है। खासकर आभूषण कारोबार से जुड़े लोग कीमतों में स्थिरता का इंतजार कर रहे हैं। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा दौर को पूर्ण गिरावट के बजाय ‘कंसॉलिडेशन फेज’ के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, दीर्घकालिक आधार पर सोने के पक्ष में कई संरचनात्मक कारक अभी भी मजबूत हैं। इनमें वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की निरंतर खरीद, बढ़ता सरकारी कर्ज, मुद्रा अवमूल्यन की चिंताएं और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को लेकर बढ़ती अनिश्चितता शामिल हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सहित कई केंद्रीय बैंक बीते कुछ वर्षों से अपने स्वर्ण भंडार में इजाफा कर रहे हैं। भारत के पास दुनिया के प्रमुख स्वर्ण भंडारों में से एक है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘डी-डॉलराइजेशन’ की वैश्विक प्रवृत्ति के चलते भी सोने की मांग को दीर्घकाल में समर्थन मिल सकता है। चांदी के मामले में तस्वीर कुछ अलग है। चांदी न केवल एक कीमती धातु है, बल्कि औद्योगिक उपयोग भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में मांग बढ़ने की संभावनाओं के बावजूद, अल्पकाल में इसमें उतार-चढ़ाव अधिक रहने की आशंका जताई जा रही है। तेज रैलियों के बाद चांदी में करेक्शन आम बात मानी जाती है। निवेशकों को लेकर विशेषज्ञों की राय फिलहाल सतर्क रहने की है। अत्यधिक अस्थिरता के चलते अल्पकालिक ट्रेडिंग जोखिम भरी हो सकती है। दीर्घकालिक निवेशक कीमतों में गिरावट के दौरान चरणबद्ध तरीके से निवेश पर विचार कर सकते हैं, लेकिन बिना जोखिम प्रबंधन के बड़े दांव लगाने से बचने की सलाह दी जा रही है।   कुल मिलाकर, सोना और चांदी दोनों ही इस समय वैश्विक घटनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। हालिया रिकवरी के बावजूद बाजार में स्थिरता के संकेत अभी स्पष्ट नहीं हैं। आने वाले दिनों में अमेरिकी आर्थिक आंकड़े, केंद्रीय बैंकों के संकेत और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम कीमती धातुओं की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। ऐसे में निवेशकों के लिए संयम और सतर्कता ही सबसे बड़ी रणनीति मानी जा रही है।

    भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत डीडीजीएस आयात पर सीमित शुल्क रियायत, केवल 5 लाख टन को मंजूरी

      Yugcharan / 08/02/2026 भारत सरकार ने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के अंतर्गत अमेरिका से सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स (डीडीजीएस) के सीमित आयात को मंजूरी दी है। इस निर्णय के तहत केवल 5 लाख टन डीडीजीएस पर शुल्क रियायत दी जाएगी, जो देश में कुल पशु आहार खपत का लगभग एक प्रतिशत है। सरकार का कहना है कि यह कदम घरेलू पशु आहार आपूर्ति को सहारा देने, बढ़ती मांग को संतुलित करने और खाद्यान्न सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, देश में पशु आहार की कुल वार्षिक खपत करीब 500 लाख टन है। इसके मुकाबले अमेरिका से आयात की अनुमति दी गई मात्रा बेहद सीमित है। अधिकारियों का कहना है कि इस आयात से घरेलू बाजार पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही मानव उपभोग के लिए इस्तेमाल होने वाले खाद्यान्नों की उपलब्धता प्रभावित होगी। डीडीजीएस मुख्य रूप से एथनॉल उत्पादन के बाद बचा हुआ उप-उत्पाद होता है, जिसका उपयोग पशु आहार में प्रोटीन स्रोत के रूप में किया जाता है। भारत में पोल्ट्री, डेयरी, मत्स्य पालन और पशुपालन क्षेत्रों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित मात्रा में डीडीजीएस आयात से पशु आहार की लागत में उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत नियंत्रित रह सकेगी। सरकारी स्तर पर यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस कदम का उद्देश्य मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख फीड अनाजों पर दबाव कम करना है। वर्तमान में पशु आहार के लिए मक्का, गेहूं और सोयाबीन मील का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। अनुमान के अनुसार, मक्का की खपत लगभग 200 लाख टन, गेहूं की 65 लाख टन और सोयाबीन मील की करीब 62 लाख टन है। ये तीनों मिलकर कुल पशु आहार खपत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं। देश में बढ़ती जनसंख्या, आय में वृद्धि और शहरीकरण के कारण दूध, मांस, अंडे और मत्स्य उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही पशु आहार की जरूरत भी बढ़ रही है। हालांकि, सीमित कृषि भूमि, उत्पादन क्षमता में अंतर और जलवायु संबंधी चुनौतियों के चलते घरेलू स्तर पर पशु आहार की आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में सरकार का मानना है कि नियंत्रित आयात एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है। आधिकारिक आकलन के अनुसार, यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2030 के शुरुआती वर्षों तक पशु आहार की मांग घरेलू आपूर्ति से अधिक हो सकती है। सभी यथार्थवादी विकास परिदृश्यों में कुछ मात्रा में आयात की आवश्यकता सामने आ रही है। इससे पहले भी देश को घरेलू कीमतों में दबाव के चलते 2021 में सोयाबीन मील का आयात करना पड़ा था। वर्तमान स्थिति में भारत विभिन्न देशों से पशु आहार और उससे जुड़े कच्चे माल का आयात करता है। आंकड़ों के मुताबिक, देश हर साल 6 लाख टन से अधिक पशु आहार, लगभग 6 लाख टन सोयाबीन और करीब 9 लाख टन मक्का आयात करता है। इन आयातों के प्रमुख स्रोतों में एशिया और अफ्रीका के कई देश शामिल हैं। ऐसे में अमेरिका से सीमित मात्रा में डीडीजीएस आयात को आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण के रूप में भी देखा जा रहा है। नीति निर्माताओं का कहना है कि यह निर्णय खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने में भी सहायक हो सकता है। पशु आहार की लागत में वृद्धि का सीधा असर दूध, अंडे और मांस जैसे उत्पादों की कीमतों पर पड़ता है। यदि आहार लागत स्थिर रहती है, तो उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है। सरकार ने यह भी रेखांकित किया है कि डीडीजीएस आयात से घरेलू मक्का और सोयाबीन बाजारों पर दबाव कम होगा, जिससे इन फसलों की उपलब्धता मानव उपभोग और अन्य प्राथमिक जरूरतों के लिए बनी रहेगी। इसके अलावा, यह कदम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और कृषि निर्यात लक्ष्यों के अनुरूप बताया जा रहा है। व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, केवल एक प्रतिशत आयात कोटा तय करना एक संतुलित और कम जोखिम वाला फैसला है। इससे न तो घरेलू किसानों के हितों को नुकसान होगा और न ही बाजार में अस्थिरता आएगी। साथ ही, यह भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में विश्वास निर्माण की दिशा में एक सीमित लेकिन व्यावहारिक कदम माना जा रहा है। कुल मिलाकर, डीडीजीएस पर दी गई यह सीमित शुल्क रियायत सरकार की उस रणनीति को दर्शाती है, जिसमें घरेलू जरूरतों, किसानों के हितों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया गया है। आने वाले समय में पशु आहार की मांग और आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए इस नीति की समीक्षा की जा सकती है, लेकिन फिलहाल इसे एक सावधानीपूर्वक और नियंत्रित पहल के रूप में देखा जा रहा है।    

    देश को हिंसा आधारित माओवादी विचारधारा से मुक्त होना होगा: अमित शाह

    Yugcharan / 08/02/2026 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि देश को ऐसी विचारधाराओं से आगे बढ़ना होगा जो हिंसा के रास्ते पर चलकर समस्याओं का समाधान तलाशती हैं। उन्होंने माओवादी विचारधारा को विकास विरोधी बताते हुए कहा कि इससे न तो आदिवासी क्षेत्रों में स्थायी प्रगति हुई और न ही सामाजिक स्थिरता आई। श्री शाह ने माओवादियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील करते हुए कहा कि जो लोग हिंसा का मार्ग छोड़कर समाज के साथ जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए सरकार के दरवाजे खुले हैं। रविवार को रायपुर में छत्तीसगढ़ के गठन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि माओवाद का संबंध न तो विकास की कमी से है और न ही केवल कानून-व्यवस्था से, बल्कि यह एक ऐसी सोच है जो समस्याओं के समाधान के लिए संवाद और लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय हथियारों पर भरोसा करती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में हिंसा आधारित विचारधाराओं के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। आत्मसमर्पण की अपील और पुनर्वास का भरोसा अमित शाह ने कहा कि सरकार का उद्देश्य संघर्ष को लंबा खींचना नहीं है, बल्कि स्थायी शांति और विकास सुनिश्चित करना है। इसी संदर्भ में उन्होंने माओवादी संगठनों से जुड़े लोगों से आत्मसमर्पण की अपील की। उन्होंने कहा कि जो लोग हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उनके पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था की जाएगी। गृह मंत्री ने कहा कि सरकार की आत्मसमर्पण नीति का मकसद केवल सुरक्षा कार्रवाई नहीं, बल्कि उन लोगों को नया अवसर देना है, जो किसी कारणवश हिंसा के रास्ते पर चले गए। उन्होंने यह भी कहा कि कई पूर्व उग्रवादी अब सामान्य जीवन जी रहे हैं और विकास से जुड़े कार्यों में योगदान दे रहे हैं। विकास बनाम विचारधारा पर जोर अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि किसी भी राज्य या देश के संचालन में विचारधारा की अहम भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि प्रशासन केवल फाइलों और आदेशों से नहीं चलता, बल्कि उसे एक स्पष्ट दृष्टि और दिशा की आवश्यकता होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने महात्मा गांधी के उस विचार का उल्लेख किया, जिसमें राजनीति को विचारधारा से अलग करने को अनुचित बताया गया था। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में माओवादी प्रभाव रहा है, वहां विकास की गति बाधित हुई। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे पीछे रह गए। गृह मंत्री के अनुसार, जहां लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होती हैं, वहां संवाद और सहमति से समाधान निकलते हैं, जबकि हिंसा केवल भय और अस्थिरता को जन्म देती है। माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों की स्थिति अमित शाह ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों से माओवादी प्रभावित इलाकों में स्थिति में सुधार आया है। उन्होंने बताया कि कई क्षेत्रों में सुरक्षा हालात बेहतर हुए हैं, जिससे विकास परियोजनाओं को गति मिली है। स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सड़कें बनने से स्थानीय लोगों के जीवन में बदलाव देखने को मिला है। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल सुरक्षा अभियान चलाना नहीं, बल्कि उन इलाकों में भरोसे का माहौल बनाना है, ताकि लोग बिना डर के अपने भविष्य के बारे में सोच सकें। इसके लिए केंद्र और राज्य स्तर पर समन्वय के साथ योजनाएं लागू की जा रही हैं। राजनीतिक संदर्भ और वैचारिक बहस गृह मंत्री ने अपने भाषण में व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी विचारधारा की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा कि देश में विभिन्न राजनीतिक दल अपनी-अपनी सोच के साथ काम करते हैं, लेकिन हिंसा को किसी भी रूप में वैध नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में बदलाव का रास्ता चुनाव और संवाद से होकर गुजरता है, न कि भय और दबाव से। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कुछ राज्यों में लंबे समय तक एक विशेष विचारधारा के शासन के बावजूद अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी का उद्देश्य किसी राज्य या समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विचारधारात्मक बहस के माध्यम से विकास के मॉडल पर चर्चा करना है। छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष और भविष्य की दिशा छत्तीसगढ़ के गठन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अमित शाह ने राज्य की उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों पर बात की। उन्होंने कहा कि राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है, लेकिन कुछ इलाकों में अब भी विकास की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में राज्य माओवादी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होकर तेज विकास की राह पर आगे बढ़ेगा। गृह मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ को हर संभव सहायता देगी, चाहे वह सुरक्षा के क्षेत्र में हो या विकास योजनाओं के माध्यम से। उन्होंने राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल से ही स्थायी समाधान संभव है। संतुलन और संवाद की जरूरत अपने संबोधन के अंत में अमित शाह ने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए हिंसा के बजाय संवाद, विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि सरकार की नीति सख्ती और संवेदनशीलता दोनों का संतुलन बनाए रखने की है। जहां आवश्यक हो वहां कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी, लेकिन साथ ही समाज की मुख्यधारा में लौटने के इच्छुक लोगों को अवसर भी दिया जाएगा।   उन्होंने कहा कि देश का भविष्य शांति, समावेशन और विकास में है, न कि टकराव और भय में। इसी सोच के साथ सरकार माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी समाधान की दिशा में काम कर रही है, ताकि वहां के नागरिक भी देश की प्रगति में बराबरी के साथ भागीदार बन सकें।

    भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर कोई भ्रम नहीं, हर मंत्री अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है: पीयूष गोयल

    Yugcharan / 08/02/2026 केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर सरकार के भीतर मतभेद या असमंजस की अटकलों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार के भीतर सभी मंत्रालय अपने-अपने दायित्वों के अनुसार काम कर रहे हैं और किसी भी स्तर पर आपसी टकराव या संवाद की कमी नहीं है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब समझौते के कुछ पहलुओं और रूस से तेल आयात जैसे मुद्दों को लेकर सार्वजनिक चर्चा तेज हो गई है। रविवार को राजधानी में एक बातचीत के दौरान पीयूष गोयल ने कहा कि हाल के दिनों में दो अलग-अलग विषयों को आपस में जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। उनके अनुसार, व्यापार समझौते से जुड़े मुद्दे और विदेश नीति से संबंधित सवाल अलग-अलग मंत्रालयों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और इसी आधार पर उत्तर दिए जा रहे हैं। मंत्रियों के बीच तालमेल पर जोर पीयूष गोयल ने इस धारणा को भी खारिज किया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की रूपरेखा केवल एक मंत्रालय तक सीमित है या अन्य मंत्री इससे अनभिज्ञ हैं। उन्होंने कहा कि सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर काम करती है और सभी संबंधित मंत्रालयों को आवश्यक जानकारी दी जाती है। उनके अनुसार, “हर मंत्री अपनी जिम्मेदारी समझता है और उसी के अनुसार फैसले लिए जाते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर बातचीत एक सतत प्रक्रिया होती है, जिसमें कई चरण होते हैं। ऐसे में हर चरण की जानकारी सार्वजनिक करना या एक ही समय पर सभी विवरण साझा करना व्यवहारिक नहीं होता। हालांकि, सरकार पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और समय आने पर आवश्यक जानकारी संसद और जनता के सामने रखी जाएगी। रूस से तेल आयात पर स्थिति स्पष्ट रूस से तेल आयात को लेकर उठ रहे सवालों पर पीयूष गोयल ने कहा कि यह विषय सीधे तौर पर विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़ा है। इस संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह के प्रश्नों का उत्तर विदेश मंत्रालय द्वारा दिया जाना उचित है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है। मंत्री ने संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति स्पष्ट और संतुलित रही है। भारत ने हमेशा वैश्विक नियमों और अपने घरेलू हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। रूस से तेल आयात को लेकर भी निर्णय इसी व्यापक दृष्टिकोण के तहत लिए जा रहे हैं। किसानों की चिंताओं पर भरोसा व्यापार समझौते को लेकर किसानों और किसान संगठनों की आशंकाओं पर भी पीयूष गोयल ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से देश के किसानों को नुकसान न पहुंचे। उनके अनुसार, कृषि से जुड़े संवेदनशील उत्पादों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है और सरकार उनके हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्री के मुताबिक, पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए ही समझौते की शर्तों पर बातचीत की जा रही है, ताकि घरेलू कृषि बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। व्यापार समझौते की पृष्ठभूमि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंध पिछले कुछ वर्षों में लगातार विकसित हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई स्तरों पर बातचीत चल रही है। प्रस्तावित व्यापार समझौते को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य बाजार पहुंच, शुल्क संरचना और व्यापार प्रक्रियाओं को सरल बनाना है। हालांकि, इस तरह के समझौतों को लेकर आमतौर पर उद्योग जगत, कृषि क्षेत्र और नीति विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग मत सामने आते हैं। कुछ वर्ग इसे आर्थिक अवसर के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसके संभावित प्रभावों को लेकर सतर्क रहते हैं। सरकार का कहना है कि सभी हितधारकों से विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सार्वजनिक बहस व्यापार समझौते और रूस से तेल आयात जैसे मुद्दों पर विपक्षी दलों की ओर से भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार को इन मामलों में अधिक स्पष्टता दिखानी चाहिए। वहीं, सरकार का कहना है कि संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में गोपनीयता और कूटनीतिक संतुलन आवश्यक होता है। पीयूष गोयल ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना स्वाभाविक है, लेकिन तथ्यों के बिना अटकलें लगाना सही नहीं है। उन्होंने विश्वास जताया कि जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ेगी, तस्वीर और स्पष्ट होती जाएगी। आगे की दिशा फिलहाल, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है और सरकार इसे राष्ट्रीय हितों के अनुरूप आगे बढ़ाने की बात कह रही है। पीयूष गोयल के बयान से यह संकेत मिलता है कि सरकार आंतरिक समन्वय को लेकर आश्वस्त है और किसी भी तरह के मतभेद की बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।   आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि व्यापार समझौते के ठोस प्रावधान क्या होते हैं और वे भारतीय अर्थव्यवस्था, उद्योग और कृषि क्षेत्र को किस तरह प्रभावित करते हैं। सरकार का दावा है कि हर कदम सोच-समझकर और व्यापक परामर्श के बाद उठाया जा रहा है, ताकि देश के दीर्घकालिक हित सुरक्षित रह सकें।

    असम में SIT रिपोर्ट के बाद सियासी टकराव तेज, केंद्र से जांच की मांग पर आमने-सामने आए हिमंत बिस्वा सरमा और गौरव गोगोई

      Yugcharan / 08/02/2026 असम की राजनीति में एक बार फिर तीखा टकराव देखने को मिला है। विशेष जांच दल (SIT) की एक रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को गंभीर बताते हुए मामले की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से कराने की आवश्यकता जताई है, वहीं कांग्रेस सांसद ने इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए खारिज किया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को गुवाहाटी में आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि SIT की रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दे संवेदनशील प्रकृति के हैं और इनका दायरा राज्य की सीमाओं से आगे तक जाता है। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में पारदर्शिता और व्यापक जांच सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार की भूमिका आवश्यक हो जाती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय से संपर्क करेगी और उसकी सहमति के बाद जांच सौंपने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। SIT रिपोर्ट में क्या है सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह जांच कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई से जुड़े कुछ कथित संपर्कों और गतिविधियों के संदर्भ में शुरू की गई थी। SIT का गठन प्रारंभिक शिकायतों के आधार पर किया गया था और रिपोर्ट हाल ही में राज्य सरकार को सौंपी गई। मुख्यमंत्री का दावा है कि रिपोर्ट में कुछ ऐसे बिंदु सामने आए हैं, जिनका संबंध अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से जोड़ा जा रहा है, और इसलिए राज्य स्तर पर इसकी जांच सीमित हो सकती है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि असम सरकार अपनी संवैधानिक सीमाओं को समझती है और इसी कारण से एक व्यापक और निष्पक्ष जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने दोहराया कि यह कदम किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और प्रशासनिक पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है। मुख्यमंत्री के आरोप और स्पष्टीकरण प्रेस वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि SIT रिपोर्ट में कुछ ऐसे लेनदेन और यात्राओं का उल्लेख है, जिनकी जांच आवश्यक है। उन्होंने दावा किया कि रिपोर्ट में संबंधित पक्षों के विदेश संपर्कों, कार्य अनुभव और कुछ दस्तावेजी विवरणों का उल्लेख किया गया है, जिनकी पुष्टि स्वतंत्र एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे और तब तक किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। मुख्यमंत्री ने यह भी जोड़ा कि राज्य सरकार किसी भी प्रकार की अटकलों या अफवाहों को बढ़ावा नहीं देना चाहती, बल्कि तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है। उन्होंने विपक्ष से भी अपील की कि जांच प्रक्रिया में सहयोग किया जाए और इसे राजनीतिक रंग न दिया जाए। गौरव गोगोई की प्रतिक्रिया कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता और आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि सरकार द्वारा लगाए जा रहे आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं है और यह पूरी कवायद राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास है। गोगोई का कहना है कि वह सभी सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं, लेकिन किसी भी प्रकार की पूर्वाग्रहपूर्ण जांच का विरोध करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की बयानबाजी से न तो जनहित सधता है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती मिलती है। कांग्रेस सांसद के अनुसार, जनता से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय राजनीतिक विवाद खड़े किए जा रहे हैं। सियासी बयानबाजी का दौर मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद के बीच यह टकराव केवल एक प्रेस वार्ता तक सीमित नहीं रहा। दोनों पक्षों की ओर से लगातार बयान सामने आ रहे हैं, जिनमें एक-दूसरे के आरोपों को खारिज किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि आरोप निराधार साबित होते हैं तो उन्हें इससे अधिक खुशी किसी और बात की नहीं होगी, क्योंकि उनका उद्देश्य केवल सच्चाई सामने लाना है। वहीं, कांग्रेस नेतृत्व ने भी इस मुद्दे पर संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि किसी भी जांच का स्वागत किया जाना चाहिए, बशर्ते वह निष्पक्ष और कानून के दायरे में हो। पार्टी नेताओं का कहना है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। केंद्र की भूमिका पर नजर अब इस पूरे मामले में सबकी निगाहें केंद्रीय गृह मंत्रालय पर टिकी हैं। यदि मंत्रालय राज्य सरकार के अनुरोध को स्वीकार करता है, तो जांच किसी केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जा सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि जांच का स्वरूप क्या होगा और इसकी समयसीमा कैसे तय की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला न केवल असम, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है। एक ओर जहां राज्य सरकार इसे प्रशासनिक और सुरक्षा से जुड़ा विषय बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देख रहा है। आगे की राह फिलहाल SIT रिपोर्ट और उसके आधार पर उठाए गए कदमों ने असम की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जांच की दिशा और उसके निष्कर्ष इस बात पर निर्भर करेंगे कि केंद्र सरकार किस प्रकार का निर्णय लेती है। तब तक, दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी जारी रहने की संभावना है। राज्य में आम जनता और राजनीतिक हलकों की नजर इस बात पर है कि क्या यह मामला निष्पक्ष जांच के जरिए किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगा या फिर यह सियासी आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रह जाएगा। आने वाले समय में जांच की प्रक्रिया और उससे जुड़े तथ्य इस विवाद की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट करेंगे।    

    असम में राजनीतिक बयानबाज़ी तेज, गोगोई से जुड़े आरोपों की केंद्रीय जांच की मांग पर घमासान

    Yugcharan / 08/02/2026 असम की राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाज़ी देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला उस समय और तेज हो गया, जब राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की एक रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद मुख्यमंत्री ने मामले की केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की। मुख्यमंत्री का कहना है कि रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों की प्रकृति संवेदनशील है और इसकी निष्पक्ष तथा व्यापक जांच आवश्यक है। रविवार को गुवाहाटी में आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट में जिन बिंदुओं का उल्लेख किया गया है, उन्हें देखते हुए राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया है कि मामले को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के समक्ष रखा जाए, ताकि किसी केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा इसकी जांच कराई जा सके। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय केंद्रीय गृह मंत्रालय की सहमति के बाद ही लिया जाएगा। क्या है मामला यह मामला कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिज़ाबेथ कोलबर्न से जुड़े कुछ कथित संपर्कों और गतिविधियों को लेकर सामने आया है। राज्य सरकार के अनुसार, प्रारंभिक जांच में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनकी व्यापक स्तर पर पड़ताल आवश्यक मानी जा रही है। सरकार का कहना है कि एसआईटी का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था, ताकि आरोपों की निष्पक्ष जांच की जा सके। मुख्यमंत्री सरमा ने प्रेस वार्ता में कहा कि एसआईटी रिपोर्ट के आधार पर राज्य मंत्रिमंडल ने यह राय बनाई है कि मामले की संवेदनशीलता और इसके संभावित व्यापक प्रभावों को देखते हुए केंद्रीय एजेंसी से जांच कराना अधिक उपयुक्त होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कदम किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है। मुख्यमंत्री का पक्ष मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि राज्य सरकार की अपनी जांच की कुछ सीमाएं होती हैं और इसीलिए केंद्रीय जांच की मांग की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का उद्देश्य किसी व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सभी तथ्यों को स्पष्ट रूप से सामने लाना है। मुख्यमंत्री के अनुसार, एसआईटी की रिपोर्ट में कुछ ऐसे बिंदु हैं, जिनकी पुष्टि और गहन जांच की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि आरोप निराधार सिद्ध होते हैं, तो इससे संबंधित लोगों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा, “हम चाहते हैं कि सच्चाई सामने आए और किसी भी तरह का संदेह न रहे।” गौरव गोगोई की प्रतिक्रिया दूसरी ओर, कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता और लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने सोशल मीडिया और मीडिया से बातचीत में कहा कि यह पूरा मामला राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है और इसे जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास बताया। गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रस्तुत किए गए तथ्यों में कोई ठोस आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आरोपों से न तो सच्चाई बदलेगी और न ही जनता गुमराह होगी। कांग्रेस सांसद ने यह भी कहा कि वह सभी आरोपों का तथ्यों के साथ जवाब देने के लिए तैयार हैं। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप इस पूरे घटनाक्रम के बाद असम की राजनीति में बयानबाज़ी और तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि यदि गौरव गोगोई या उनके परिवार से जुड़े किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप गलत साबित होते हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से संतोष होगा। उन्होंने यह भी कहा कि एक निर्वाचित सांसद से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। वहीं, कांग्रेस नेताओं ने मुख्यमंत्री पर राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे को उछालने का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि राज्य सरकार जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए इस तरह के विवाद खड़े कर रही है। पार्टी नेताओं ने यह भी कहा कि केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप पहले भी कई बार लगाया जा चुका है। एसआईटी रिपोर्ट और आगे की प्रक्रिया राज्य सरकार के अनुसार, एसआईटी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गई है और उसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है। रिपोर्ट के सार्वजनिक न किए जाने को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि रिपोर्ट में गंभीर तथ्य हैं, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि जनता स्वयं स्थिति को समझ सके। सरकार का पक्ष है कि रिपोर्ट की प्रकृति संवेदनशील होने के कारण उसे सार्वजनिक करने से पहले सभी कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजे जाने वाले प्रस्ताव में रिपोर्ट के निष्कर्षों का उल्लेख किया जाएगा। कानून और राजनीति के बीच संतुलन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर असम की राजनीति और आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। एक ओर जहां सत्तारूढ़ दल इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रहा है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। यदि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध होती है, तो इससे राजनीतिक तनाव को कम किया जा सकता है। वहीं, जांच में देरी या अस्पष्टता से विवाद और गहराने की आशंका रहती है। जनता की नजरें जांच पर इस पूरे घटनाक्रम के बीच आम जनता की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेती है और आगे जांच की दिशा क्या होगी। लोग यह जानना चाहते हैं कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या जांच प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इससे न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होगी, बल्कि जनता का विश्वास भी बना रहेगा। निष्कर्ष असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के बीच चल रहा यह विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है। एसआईटी रिपोर्ट के बाद केंद्रीय जांच की मांग ने इस मुद्दे को राज्य से राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है और जांच की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।   फिलहाल, यह मामला असम की राजनीति में एक अहम मुद्दा बन चुका है, जहां सत्तापक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच और संयमित राजनीतिक संवाद ही इस विवाद को सुलझाने का रास्ता हो सकता है।

    पीएम मोदी ने मलेशिया में प्रमुख उद्योग जगत के नेताओं से की मुलाकात, ‘भारतीय विकास गाथा’ में उनकी भूमिका की सराहना

      कुआलालंपुर | 08/02/2026 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में भारत और मलेशिया के प्रमुख उद्योग जगत के नेताओं से मुलाकात की और भारत की तेज़ी से आगे बढ़ती ‘भारतीय विकास गाथा’ (Indian Growth Story) में उनकी भूमिका की खुलकर सराहना की। विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री ने भारत–मलेशिया के बीच बढ़ते बिज़नेस-टू-बिज़नेस (B2B) संबंधों की प्रशंसा की और भारतीय अर्थव्यवस्था में मलेशियाई कंपनियों की बढ़ती रुचि को दोनों देशों के लिए सकारात्मक संकेत बताया। प्रधानमंत्री मोदी की यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब भारत वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद निवेश गंतव्य के रूप में उभर रहा है और मलेशिया सहित कई एशियाई देश भारत के साथ व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करने के इच्छुक हैं। प्रमुख उद्योगपतियों से मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी ने मलेशिया के चार प्रमुख उद्योग नेताओं से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। इनमें शामिल थे: तेंगकु मुहम्मद तौफिक, अध्यक्ष एवं समूह सीईओ – पेट्रोनास (PETRONAS) विंसेंट टैन ची यीउन, संस्थापक – बर्जाया कॉरपोरेशन बरहाद अमीरुल फैसल वान जाहिर, प्रबंध निदेशक – खज़ाना नेशनल बरहाद पुआ खेन सेंग, संस्थापक – फिसन इलेक्ट्रॉनिक्स इन बैठकों में ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, डिजिटल तकनीक, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वास्थ्य सेवा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। ऊर्जा साझेदारी और हरित भविष्य पर जोर पेट्रोनास के सीईओ तेंगकु मुहम्मद तौफिक के साथ बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और मलेशिया के बीच ऊर्जा साझेदारी को और मजबूत करने पर जोर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, बैठक में ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया, नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ ईंधन जैसे उभरते क्षेत्रों में नए अवसरों पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत आने वाले वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसमें मलेशिया जैसी अनुभवी कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। उल्लेखनीय है कि पेट्रोनास की भारत में तीन दशकों से अधिक की उपस्थिति है और उसका पोर्टफोलियो एलएनजी, पेट्रोकेमिकल्स और उभरते हरित ऊर्जा समाधानों तक फैला हुआ है। सेवाओं और उपभोक्ता क्षेत्रों में निवेश की रुचि बर्जाया कॉरपोरेशन के संस्थापक विंसेंट टैन ने प्रधानमंत्री मोदी को बताया कि उनकी कंपनी भारत के तेजी से बढ़ते सेवा और उपभोक्ता क्षेत्रों में अपने कारोबार का विस्तार करना चाहती है। उन्होंने कहा कि भारत की युवा आबादी, बढ़ती क्रय शक्ति और डिजिटल परिवर्तन ने इसे वैश्विक निवेशकों के लिए अत्यंत आकर्षक बना दिया है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि भारत सरकार ने सेवा क्षेत्र में निवेश को आसान बनाने के लिए कई नीतिगत सुधार किए हैं, जिससे विदेशी कंपनियों को स्थिर और पारदर्शी कारोबारी माहौल मिल रहा है। सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में भागीदारी फिसन इलेक्ट्रॉनिक्स के संस्थापक पुआ खेन सेंग ने भारत के तेजी से विकसित हो रहे टेक्नोलॉजी और इनोवेशन इकोसिस्टम में भागीदारी की इच्छा जताई। उन्होंने विशेष रूप से सेमीकंडक्टर उद्योग में भारत की बढ़ती क्षमताओं की सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर निर्माण और डिजाइन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की नीतियां वैश्विक तकनीकी कंपनियों को भारत में निवेश और संयुक्त उद्यम (Joint Ventures) के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। भारत: निवेश के लिए उच्च संभावनाओं वाला बाज़ार खज़ाना नेशनल बरहाद के प्रबंध निदेशक अमीरुल फैसल वान जाहिर ने भारत की आर्थिक परिवर्तन यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत अब एक उच्च संभावनाओं वाला निवेश बाजार बन चुका है। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप इकोसिस्टम में भारत की प्रगति उल्लेखनीय है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत में किए गए संरचनात्मक सुधार, जैसे जीएसटी, दिवालियापन संहिता, डिजिटल भुगतान प्रणाली और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं (PLI), देश को दीर्घकालिक विकास की मजबूत नींव प्रदान कर रही हैं। ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस और नीतिगत सुधार प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक के दौरान भारत में हाल के वर्षों में किए गए ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस सुधारों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने निवेशकों के लिए स्थिर, कुशल और पूर्वानुमेय नीति वातावरण तैयार किया है, जिससे विदेशी कंपनियों का विश्वास बढ़ा है। उन्होंने मलेशियाई कंपनियों से भारत में विशेष रूप से इन्फ्रास्ट्रक्चर, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हेल्थकेयर क्षेत्रों में अवसर तलाशने का आह्वान किया। उद्योग जगत के नेताओं ने भी भारत सरकार द्वारा किए गए सुधारों की सराहना की और भारत की विकास क्षमता पर मजबूत भरोसा जताया। निवेश विस्तार और संयुक्त उपक्रमों में रुचि विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, उद्योग नेताओं ने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया कि वे भारत में अपनी निवेश पोर्टफोलियो का विस्तार करना चाहते हैं और भारतीय कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रमों की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत और मलेशिया की पूरक क्षमताएं दोनों देशों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकती हैं। इंडिया–मलेशिया सीईओ फोरम की अहम भूमिका प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और मलेशिया के सीईओs के साथ भी संवाद किया। उन्होंने कहा कि सीईओ फोरम ने दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के नए अवसर खोले हैं। प्रधानमंत्री ने 10वें भारत–मलेशिया सीईओ फोरम के आयोजन की सराहना की, जो शनिवार (07 फरवरी 2026) को कुआलालंपुर में संपन्न हुआ। उन्होंने विश्वास जताया कि फोरम में हुई चर्चाएं भारत–मलेशिया के व्यापार और निवेश संबंधों को और गहरा करेंगी। भारत–मलेशिया संबंधों को नई ऊंचाई प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा और उद्योग जगत से उनकी बातचीत यह स्पष्ट संकेत देती है कि भारत और मलेशिया के द्विपक्षीय संबंध केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग के माध्यम से लगातार मजबूत हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि, स्थिर राजनीतिक वातावरण और सुधारोन्मुख नीतियां मलेशिया जैसे देशों को भारत के साथ दीर्घकालिक साझेदारी के लिए प्रेरित कर रही हैं। निष्कर्ष कुआलालंपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशियाई उद्योग नेताओं से मुलाकात भारत की वैश्विक आर्थिक छवि को और सुदृढ़ करने वाली साबित हुई है। ऊर्जा से लेकर सेमीकंडक्टर, डिजिटल टेक्नोलॉजी से लेकर हेल्थकेयर तक, विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं दोनों देशों के लिए विन-विन स्थिति पैदा कर रही हैं।प्रधानमंत्री द्वारा व्यक्त किया गया यह विश्वास कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक विकास का एक प्रमुख केंद्र बनेगा, न केवल निवेशकों का भरोसा बढ़ाता है, बल्कि भारत–मलेशिया संबंधों को भी एक नई दिशा देता है।    

    सूरजकुंड झूला हादसा: राइड संचालक और कर्मचारी गिरफ्तार, मुख्यमंत्री सैनी के सख्त निर्देश

    नई दिल्ली / फरीदाबाद | 08/02/2026 हरियाणा के फरीदाबाद में आयोजित सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में शनिवार शाम हुए भीषण हादसे के बाद प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। विशाल ‘ट्सुनामी’ झूले के बीच हवा में टूटकर गिर जाने से एक ड्यूटी पर तैनात पुलिस इंस्पेक्टर की मौत हो गई, जबकि 12 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे के एक दिन बाद पुलिस ने झूला संचालक और उसके एक कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया है। इस घटना ने मेले में सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस के अनुसार यह हादसा शनिवार शाम करीब 6:15 बजे हुआ, जब झूले पर लगभग 26 लोग सवार थे। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि झूला अचानक एक ओर झुक गया और तेज आवाज के साथ जमीन पर आ गिरा। हादसे के समय मेले में भारी भीड़ मौजूद थी, जिससे अफरा-तफरी मच गई। लोग इधर-उधर भागने लगे और घायलों की चीख-पुकार से माहौल दहशत में बदल गया। इंस्पेक्टर ने बचाव करते हुए गंवाई जान इस हादसे में जान गंवाने वाले इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद (58 वर्ष) मौके पर ड्यूटी पर तैनात थे। फरीदाबाद पुलिस आयुक्त सतेंद्र कुमार गुप्ता के अनुसार, इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद झूले के नीचे फंसे लोगों को निकालने की कोशिश कर रहे थे, तभी उन्हें गंभीर चोटें आईं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। रविवार को पोस्टमॉर्टम के बाद उनका शव परिवार को सौंप दिया गया। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद का यह साहसिक प्रयास उनकी कर्तव्यनिष्ठा और मानवता का उदाहरण है। उनके बलिदान को देखते हुए हरियाणा के डीजीपी अजय सिंघल ने उन्हें ‘शहीद’ का दर्जा देने की घोषणा की है। दो आरोपी गिरफ्तार, जांच जारी हादसे के बाद सूरजकुंड थाने में बीएनएस की धारा 105 के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर त्वरित कार्रवाई करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान मोहम्मद शाकिर, जो हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का निवासी है और ‘हिमाचल फन केयर’ नामक कंपनी का मालिक है, तथा नितेश, जो उत्तर प्रदेश के मेरठ का निवासी है और शाकिर के अधीन कर्मचारी के रूप में काम करता था, के रूप में हुई है। फरीदाबाद पुलिस के एक प्रवक्ता ने बताया कि दोनों आरोपियों से पूछताछ की जा रही है और यह भी जांच की जा रही है कि झूले के रखरखाव, तकनीकी जांच और सुरक्षा प्रमाणपत्रों में कोई लापरवाही तो नहीं बरती गई। इसके अलावा, अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। घायलों का इलाज जारी, हालत स्थिर इस हादसे में घायल हुए 12 लोगों को तुरंत नजदीकी दो अस्पतालों में भर्ती कराया गया। पुलिस आयुक्त ने बताया कि सभी घायलों का इलाज जारी है और उनकी हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है। डॉक्टरों की टीम लगातार निगरानी कर रही है, जबकि प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है। मुख्यमंत्री सैनी के सख्त निर्देश हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने इस दर्दनाक घटना पर गहरा दुख जताया है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि मेले और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह हादसा बेहद पीड़ादायक है और इसकी उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए हैं। मुख्यमंत्री सैनी ने गंभीर रूप से घायल लोगों को राज्य सरकार की ओर से ₹1 लाख की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। उन्होंने इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य सरकार इस कठिन समय में उनके परिवार के साथ मजबूती से खड़ी है। शहीद इंस्पेक्टर के परिवार को मुआवजा हरियाणा के डीजीपी अजय सिंघल ने घोषणा की कि शहीद इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद के परिवार को ₹1 करोड़ का मुआवजा दिया जाएगा। इसके साथ ही उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का भी आश्वासन दिया गया है। डीजीपी ने कहा कि इंस्पेक्टर की बहादुरी और कर्तव्यनिष्ठा को हमेशा याद रखा जाएगा। सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल यह हादसा सूरजकुंड मेले में हुआ दूसरा बड़ा हादसा है। इससे पहले प्रवेश द्वार संख्या 2 पर एक डिजाइनर गेट के गिरने की घटना सामने आई थी। लगातार हो रही इन घटनाओं ने मेले की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि अधिकारियों का दावा है कि झूलों की रोजाना जांच की जाती है और रिपोर्ट तैयार की जाती है, लेकिन इस घटना के बाद इन दावों पर भी संदेह जताया जा रहा है। डीजीपी ने बताया कि इस हादसे पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी और जो भी व्यक्ति या संस्था लापरवाही की दोषी पाई जाएगी, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मेला जारी रहेगा, झूला क्षेत्र सील जिला प्रशासन ने कहा है कि सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला रविवार को भी जारी रहेगा, लेकिन हादसे वाले झूला क्षेत्र को पूरी तरह से सील कर दिया गया है। जांच पूरी होने तक उस क्षेत्र में किसी को जाने की अनुमति नहीं होगी। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी झूलों और मनोरंजन साधनों की दोबारा तकनीकी जांच कराई जाएगी। देशभर में बढ़ती चिंता सूरजकुंड हादसे के बाद देश के अन्य हिस्सों में हुए झूला और मनोरंजन पार्क हादसों की भी चर्चा तेज हो गई है। हाल के महीनों में दार्जिलिंग रोपवे और अन्य मेलों में हुई घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मनोरंजन साधनों की सुरक्षा जांच और रखरखाव में गंभीर सुधार की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजनों में निजी संचालकों की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ सरकारी निगरानी को भी मजबूत किया जाना चाहिए। नियमित तकनीकी ऑडिट, प्रशिक्षित स्टाफ और आपातकालीन व्यवस्थाओं को अनिवार्य बनाए बिना इस तरह के हादसों को रोका नहीं जा सकता। निष्कर्ष   सूरजकुंड झूला हादसा न केवल एक दुखद दुर्घटना है, बल्कि यह सार्वजनिक आयोजनों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी का गंभीर उदाहरण भी है। इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद का बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि कर्तव्य के दौरान जान जोखिम में डालने वाले सुरक्षाकर्मियों के प्रति समाज और सरकार की जिम्मेदारी कितनी बड़ी है। अब यह प्रशासन और सरकार पर निर्भर करता है कि जांच को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरा कर दोषियों को सजा दिलाई जाए, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को इस तरह का दर्द न झेलना पड़े।

    भारत–जापान संबंधों को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का भरोसा: प्रधानमंत्री मोदी ने जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची को दी चुनावी जीत पर बधाई

    Yugcharan / 08/02/2026 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची को जापान के प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) के चुनावों में मिली निर्णायक जीत पर बधाई दी। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि उनके नेतृत्व में भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी और अधिक सशक्त होगी तथा दोनों देशों के रिश्ते नई ऊँचाइयों तक पहुँचेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में भारत–जापान संबंधों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह साझेदारी न केवल द्विपक्षीय हितों के लिए बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता, शांति और समृद्धि के लिए भी अहम भूमिका निभाती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में दोनों देश आपसी सहयोग को और गहरा करेंगे। प्रधानमंत्री का संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से साने ताकाइची को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी चुनावी जीत ऐतिहासिक है और इससे भारत–जापान संबंधों को नई दिशा मिलेगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच सहयोग लोकतांत्रिक मूल्यों, साझा हितों और अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था पर आधारित है। प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत और जापान की साझेदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन, आर्थिक सहयोग, प्रौद्योगिकी विकास और आपसी निवेश को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने यह भी कहा कि साने ताकाइची के नेतृत्व में यह सहयोग और मजबूत होगा। जापान में राजनीतिक परिदृश्य साने ताकाइची ने हाल ही में हुए आकस्मिक निचले सदन के चुनावों में व्यापक जनादेश हासिल किया है। उनकी पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर मजबूत बहुमत प्राप्त किया है, जिससे सरकार को नीतिगत फैसलों और विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में मजबूती मिलेगी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह जीत जापान की राजनीति में स्थिरता का संकेत मानी जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब देश पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक दबाव, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था। जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री 64 वर्षीय साने ताकाइची अक्टूबर 2025 में एलडीपी के नेतृत्व चुनाव में जीत हासिल करने के बाद जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। उनका प्रधानमंत्री बनना जापान के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। उन्होंने सत्ता संभालने के बाद प्रशासनिक सुधारों, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक पुनरुद्धार को प्राथमिकता देने की बात कही थी। उनकी नेतृत्व शैली को दृढ़ और स्पष्ट माना जाता है। रक्षा और आर्थिक सुरक्षा के मुद्दों पर उनका रुख सख्त रहा है, वहीं वे तकनीकी नवाचार और औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा देने की पक्षधर रही हैं। भारत–जापान संबंधों की पृष्ठभूमि भारत और जापान के बीच संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ का दर्जा प्राप्त है। दोनों देश रक्षा, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, डिजिटल प्रौद्योगिकी, शिक्षा और निवेश जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से सहयोग करते आ रहे हैं। जापान भारत के प्रमुख निवेश साझेदारों में से एक है। मेट्रो परियोजनाओं, हाई-स्पीड रेल, स्मार्ट सिटी विकास और औद्योगिक कॉरिडोर जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट्स में जापानी सहयोग देखने को मिला है। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच रक्षा अभ्यास और समुद्री सुरक्षा सहयोग भी लगातार मजबूत हुआ है। इंडो-पैसिफिक में सहयोग भारत और जापान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मुक्त, खुले और समावेशी व्यवस्था के समर्थक रहे हैं। दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान पर जोर देते हैं। इस संदर्भ में भारत–जापान सहयोग को कई वैश्विक मंचों पर महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री साने ताकाइची के बीच आने वाले समय में होने वाली द्विपक्षीय वार्ताओं से क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण और मजबूत होने की उम्मीद है। आगे की राह विशेषज्ञों का मानना है कि साने ताकाइची को मिले स्पष्ट जनादेश से उनकी सरकार को रक्षा सुधार, आर्थिक प्रोत्साहन और विदेश नीति के क्षेत्र में निर्णायक कदम उठाने में मदद मिलेगी। भारत के साथ संबंधों को मजबूत करना उनकी विदेश नीति के प्रमुख स्तंभों में शामिल माना जा रहा है। भारत सरकार के सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच आगामी महीनों में उच्चस्तरीय वार्ताएं, रणनीतिक संवाद और आर्थिक सहयोग से जुड़े कई अहम कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। इन पहलों का उद्देश्य आपसी विश्वास बढ़ाना और साझेदारी को व्यावहारिक रूप से और प्रभावी बनाना होगा।   प्रधानमंत्री मोदी का बधाई संदेश न केवल औपचारिक कूटनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा है, बल्कि यह भारत की उस नीति को भी दर्शाता है, जिसमें जापान को एशिया और वैश्विक मंच पर एक भरोसेमंद और अहम साझेदार माना जाता है। साने ताकाइची की जीत के साथ ही दोनों देशों के संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत होने की संभावना जताई जा रही है, जो आने वाले वर्षों में सहयोग, संवाद और साझेदारी को और सुदृढ़ करेगा।

    जनवरी में साइबर अपराधों पर कड़ा शिकंजा: हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने 117 मामले दर्ज किए, सात राज्यों से 37 आरोपी गिरफ्तार

    Yugcharan / 08/02/2026 तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में साइबर अपराधों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियानों के तहत साइबर क्राइम पुलिस ने जनवरी 2026 के दौरान कुल 117 मामले दर्ज किए हैं। इन मामलों की जांच के दौरान देश के सात अलग-अलग राज्यों से 37 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई डिजिटल अपराधों की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए अपनाई गई बहु-राज्यीय रणनीति का हिस्सा है। साइबर क्राइम विंग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दर्ज किए गए मामलों में बड़ी संख्या ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, फर्जी निवेश योजनाओं, सोशल मीडिया के माध्यम से ठगी, फिशिंग, ओटीपी और लिंक के जरिए बैंक खातों से अवैध निकासी, तथा पहचान की चोरी से जुड़े हैं। इन अपराधों में आम नागरिकों के साथ-साथ नौकरीपेशा लोग, वरिष्ठ नागरिक और छोटे कारोबारी भी निशाना बने। पुलिस के अनुसार, 117 मामलों में से 26 मामले सीधे हैदराबाद शहर से संबंधित हैं, जबकि शेष मामलों की कड़ियां तेलंगाना के अन्य जिलों और देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़ी पाई गईं। जांच में यह सामने आया कि अपराधियों का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ था और वे तकनीक का इस्तेमाल कर एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य के लोगों को ठग रहे थे। सात राज्यों तक फैला नेटवर्क जांच के दौरान जिन राज्यों से आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, उनमें तेलंगाना के अलावा आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली शामिल हैं। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इन राज्यों में स्थानीय पुलिस के सहयोग से एक साथ छापेमारी कर आरोपियों को पकड़ा गया। कई मामलों में आरोपियों ने फर्जी सिम कार्ड, नकली बैंक खाते और डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल कर अपराध को अंजाम दिया। अधिकारी ने बताया कि कुछ आरोपी ऐसे गिरोहों से जुड़े थे, जो कॉल सेंटर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को आकर्षक रिटर्न का लालच देकर निवेश के लिए उकसाते थे। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि कई पीड़ितों से लाखों रुपये की ठगी की गई। जांच के तरीके और तकनीकी विश्लेषण साइबर क्राइम पुलिस ने इन मामलों की जांच में डिजिटल फॉरेंसिक तकनीकों, बैंक ट्रांजैक्शन एनालिसिस और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) का सहारा लिया। संदिग्ध मोबाइल नंबरों, आईपी एड्रेस और सोशल मीडिया अकाउंट्स की जांच कर अपराधियों तक पहुंच बनाई गई। कई मामलों में तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर यह साबित हुआ कि एक ही गिरोह अलग-अलग नामों और तरीकों से लोगों को निशाना बना रहा था। पुलिस का कहना है कि साइबर अपराधों की प्रकृति तेजी से बदल रही है और अपराधी नए-नए तरीके अपनाकर कानून से बचने की कोशिश करते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए साइबर क्राइम विंग ने अपने अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण और तकनीकी संसाधनों को मजबूत किया है। पीड़ितों को राहत और जागरूकता पर जोर पुलिस अधिकारियों ने बताया कि गिरफ्तारियों के साथ-साथ पीड़ितों को राहत दिलाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। कई मामलों में ठगी की गई राशि को फ्रीज कर दिया गया है और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद पीड़ितों को वापस दिलाने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा, साइबर क्राइम पुलिस आम नागरिकों को जागरूक करने के लिए भी अभियान चला रही है। लोगों से अपील की जा रही है कि वे अनजान कॉल, संदिग्ध लिंक, ई-मेल या सोशल मीडिया संदेशों पर भरोसा न करें। किसी भी तरह की ऑनलाइन धोखाधड़ी की स्थिति में तुरंत साइबर क्राइम हेल्पलाइन या नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई है। भविष्य की रणनीति साइबर क्राइम विंग के अनुसार, आने वाले महीनों में ऐसे अभियानों को और तेज किया जाएगा। पुलिस का फोकस अंतर-राज्यीय गिरोहों को चिन्हित करने, तकनीकी ढांचे को मजबूत करने और बैंकिंग तथा टेलीकॉम एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाने पर रहेगा। अधिकारियों का मानना है कि साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और सूचना साझा करना बेहद जरूरी है। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि साइबर अपराधों के मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों के खिलाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी। जनवरी 2026 के आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि साइबर अपराधों के खिलाफ लड़ाई में पुलिस सक्रिय है, लेकिन साथ ही यह भी दर्शाता है कि डिजिटल दुनिया में सतर्कता और जागरूकता पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है।   हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने नागरिकों से सहयोग की अपील करते हुए कहा है कि सुरक्षित डिजिटल व्यवहार अपनाकर ही साइबर अपराधों को रोका जा सकता है।