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    गाज़ा के लिए बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में भारत की पर्यवेक्षक के रूप में भागीदारी, दो-राष्ट्र समाधान पर दोहराया समर्थन

    1 month ago

    YUGCHARAN / 21 फरवरी 2026

    भारत ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि उसने वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित गाज़ा के लिए बोर्ड ऑफ पीस की पहली बैठक में केवल पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया था। विदेश मंत्रालय (MEA) ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस बैठक में भारत की मौजूदगी का अर्थ उसकी विदेश नीति में किसी प्रकार का बदलाव नहीं है। भारत ने एक बार फिर फ़िलिस्तीन मुद्दे पर अपने पुराने और स्पष्ट रुख को दोहराते हुए कहा कि वह 1967 की सीमाओं पर आधारित एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के पक्ष में खड़ा है।

    नई दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इज़राइल–फ़िलिस्तीन संघर्ष के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को ही एकमात्र रास्ता मानता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत का मानना है कि स्थायी शांति तभी संभव है जब इज़राइल और फ़िलिस्तीन दोनों सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर, शांति से सह-अस्तित्व में रहें।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब एक दिन पहले ही यह जानकारी सामने आई थी कि एक भारतीय राजनयिक ने गाज़ा के लिए गठित बोर्ड ऑफ पीस की पहली बैठक में हिस्सा लिया था। इस बैठक को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं कि क्या भारत की भूमिका में कोई बदलाव आया है। विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद इन अटकलों पर विराम लग गया है।


    पर्यवेक्षक के रूप में भारत की भूमिका

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने इस बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में हिस्सा लेकर केवल यह समझने का प्रयास किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय गाज़ा संकट को लेकर किन मुद्दों पर चर्चा कर रहा है और भविष्य में कौन-से संभावित रास्ते सामने आ सकते हैं। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पर्यवेक्षक की भूमिका का मतलब यह नहीं है कि भारत बैठक में रखे गए सभी विचारों या प्रस्तावों का समर्थन करता है, न ही इससे भारत पर कोई बाध्यकारी जिम्मेदारी आती है।

    प्रवक्ता ने कहा कि भारत हमेशा ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से जुड़ा रहा है, जहां शांति, मानवीय सहायता और नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है। हालांकि, भारत का यह भी मानना है कि किसी भी समाधान की बुनियाद अंतरराष्ट्रीय कानून और आपसी संवाद पर ही टिकी होनी चाहिए।

    उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत शुरू से ही संतुलित और विवेकपूर्ण नीति अपनाता आया है। यही कारण है कि वह इज़राइल और फ़िलिस्तीन — दोनों के साथ अपने-अपने संबंधों को महत्व देता है और किसी एक पक्ष के समर्थन में एकतरफ़ा रुख नहीं अपनाता।


    फ़िलिस्तीन मुद्दे पर भारत का स्पष्ट रुख

    प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्रालय ने फ़िलिस्तीन मुद्दे पर भारत की नीति को फिर से दोहराया। प्रवक्ता ने कहा कि भारत 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना का समर्थन करता है, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो।

    उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यही रुख अपनाया है। यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही भारत की विदेश नीति का हिस्सा है।

    भारत ने न केवल राजनीतिक स्तर पर, बल्कि मानवीय आधार पर भी फ़िलिस्तीनी जनता का समर्थन किया है। भारत की ओर से फ़िलिस्तीन को समय-समय पर मानवीय सहायता, चिकित्सा मदद, शिक्षा और क्षमता निर्माण से जुड़ा सहयोग दिया गया है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह सहायता फ़िलिस्तीनी लोगों के सम्मानजनक जीवन और आत्मनिर्णय के अधिकार में भारत के विश्वास को दर्शाती है।


    हिंसा और आतंकवाद पर भारत का रुख

    भारत ने इस अवसर पर एक बार फिर यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी रूप में आतंकवाद और निर्दोष नागरिकों के खिलाफ हिंसा का समर्थन नहीं करता। चाहे वह इज़राइल में हो या फ़िलिस्तीन में, भारत का मानना है कि आम नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।

    विदेश मंत्रालय ने कहा कि हिंसा और बदले की राजनीति से केवल पीड़ा बढ़ती है और शांति की संभावना और दूर हो जाती है। भारत का यह भी मानना है कि मानवीय सहायता को कभी भी राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए और संघर्ष प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित होनी चाहिए।


    गाज़ा के लिए बोर्ड ऑफ पीस: पृष्ठभूमि

    गाज़ा के लिए बोर्ड ऑफ पीस एक अंतरराष्ट्रीय पहल मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य गाज़ा में जारी संकट के समाधान के लिए कूटनीतिक और मानवीय विकल्पों पर विचार करना है। गाज़ा क्षेत्र लंबे समय से हिंसा, विस्थापन और मानवीय संकट का सामना कर रहा है।

    इस मंच पर विभिन्न देशों और संगठनों के प्रतिनिधि यह चर्चा कर रहे हैं कि कैसे युद्धविराम, पुनर्निर्माण और दीर्घकालिक शांति की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं। हालांकि, इस बोर्ड के अधिकार क्षेत्र और भविष्य की योजनाओं को लेकर अभी बहुत अधिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    भारत का इस पहली बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होना उसकी उस नीति के अनुरूप माना जा रहा है, जिसके तहत वह किसी भी नए अंतरराष्ट्रीय मंच को पहले समझने और परखने के बाद ही उसमें सक्रिय भूमिका निभाने का निर्णय लेता है।


    कूटनीतिक संतुलन की नीति

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख पश्चिम एशिया में उसके कूटनीतिक संतुलन को दर्शाता है। बीते वर्षों में भारत और इज़राइल के बीच रक्षा, तकनीक और व्यापार जैसे क्षेत्रों में संबंध काफ़ी मज़बूत हुए हैं। इसके साथ ही भारत ने अरब देशों और फ़िलिस्तीन के साथ भी अपने रिश्ते बनाए रखे हैं।

    भारत की यही संतुलित नीति उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक भरोसेमंद और जिम्मेदार देश के रूप में स्थापित करती है। न तो भारत किसी एक पक्ष के पूरी तरह साथ खड़ा होता है और न ही वह मानवीय मुद्दों से आंख मूंदता है।


    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और महत्व

    भारत के इस स्पष्टीकरण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी ध्यान से देखा गया है। कई देशों और कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने समय रहते अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी, जिससे किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश नहीं रही।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की यह स्पष्टता उसे वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों के बीच और अधिक विश्वसनीय बनाती है, जहां भारत को अक्सर एक संतुलित और संवाद समर्थक आवाज़ के रूप में देखा जाता है।


    आगे की राह

    विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया है कि भारत गाज़ा की स्थिति पर लगातार नज़र बनाए रखेगा और जहां आवश्यक होगा, वहां अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के साथ संवाद बनाए रखेगा। हालांकि, फिलहाल भारत की भूमिका पर्यवेक्षक तक ही सीमित रहेगी।

    सरकार का मानना है कि किसी भी स्थायी समाधान के लिए प्रत्यक्ष वार्ता अनिवार्य है और बाहरी पहलें केवल सहायक भूमिका ही निभा सकती हैं। भारत ने यह भी दोहराया कि वह शांति, स्थिरता और मानवीय मूल्यों के पक्ष में हमेशा खड़ा रहेगा।

     

    अंततः, भारत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि उसका रुख स्पष्ट, सुसंगत और दशकों पुरानी विदेश नीति पर आधारित है — एक ऐसी नीति जो संवाद, सह-अस्तित्व और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर टिकी हुई है।

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