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    पीएम मोदी ने ‘सेवा तीर्थ’ और कर्तव्य भवन का उद्घाटन किया, बोले प्रशासन में नागरिक सेवा की नई सोच

    1 month ago

     

    नई दिल्ली में शनिवार को प्रशासनिक और वैचारिक दृष्टि से एक अहम अध्याय जुड़ा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन–1 एवं 2 का औपचारिक उद्घाटन किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने इसे केवल भवनों का लोकार्पण नहीं, बल्कि शासन की सोच में बदलाव का प्रतीक बताया।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का दिन देश के प्रशासनिक इतिहास में एक नई दिशा तय करता है, जहाँ फैसलों के केंद्र में फाइलें नहीं, बल्कि नागरिक होंगे।

     

    ‘नागरिक देवो भव’ से ‘राष्ट्र प्रथम’ तक का संदेश

     

    अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने ज़ोर दिया कि सेवा तीर्थ की अवधारणा नागरिक देवो भव’ की भावना से निकली है। उनका कहना था कि यह स्थान आने वाले समय में ऐसे निर्णयों का केंद्र बनेगा, जो सीधे आम लोगों के जीवन को प्रभावित करेंगे।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि कर्तव्य और करुणा केवल शब्द नहीं, बल्कि प्रशासन की आत्मा होने चाहिए। सेवा तीर्थ उसी सोच का मूर्त रूप है, जो अधिकारियों और कर्मचारियों को जनता की सेवा के प्रति निरंतर सजग रखेगा।

     

    सेवा तीर्थ से लिए गए फैसले, जिनका असर ज़मीनी स्तर पर दिखेगा

     

    लोकार्पण के बाद प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ में कई अहम नीतिगत फाइलों को मंज़ूरी दी। इन फैसलों का दायरा समाज के अलग-अलग वर्गों तक फैला हुआ है।

    दुर्घटनाओं में घायल लोगों को तुरंत राहत देने के लिए एक नई योजना को मंजूरी दी गई, जिसके तहत पीड़ितों को 1.5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज मिलेगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इलाज के अभाव में किसी की जान न जाए।

    महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को गति देने के लिए लखपति दीदी योजना के दायरे को दोगुना कर दिया गया है, जिससे अब 6 करोड़ महिलाओं तक इस योजना का लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

    किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा की गई। कृषि अवसंरचना कोष को बढ़ाकर 2 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जिससे भंडारण, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग सुविधाओं को मज़बूती मिलेगी।

    वहीं, नवाचार और तकनीक पर काम करने वाले उद्यमियों के लिए स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 को हरी झंडी दी गई, जिसके लिए 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

     

    कर्तव्य भवन: प्रशासनिक सोच का नया केंद्र

     

    इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ से जुड़े स्मारक डाक टिकट और सिक्के भी जारी किए। उन्होंने कहा कि कर्तव्य भवन और सेवा तीर्थ, दोनों मिलकर ऐसे प्रशासनिक ढांचे की नींव रखेंगे, जो 140 करोड़ भारतीयों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर काम करेगा।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पिछले एक दशक से सरकार देश को गुलामी की मानसिकता से बाहर निकालने के प्रयास में लगी है और प्रशासनिक भाषा, सोच और प्रतीकों में यह बदलाव साफ दिखाई देता है।

     

    कर्तव्य को बताया राष्ट्र की प्राणशक्ति

     

    अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में प्रधानमंत्री ने कहा कि कर्तव्य किसी एक विभाग या पद तक सीमित नहीं होता। यह पूरे राष्ट्र की ऊर्जा है। उनका मानना है कि सेवा तीर्थ में लिया गया हर फैसला आम नागरिक के जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम होगा।

     

    निष्कर्ष: इमारत नहीं, एक विचार का उद्घाटन

     

    सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन का उद्घाटन सिर्फ़ नए भवनों का निर्माण नहीं, बल्कि शासन के उस विचार का उद्घाटन है, जहाँ सेवा, संवेदनशीलता और जवाबदेही को प्रशासन का मूल आधार बनाया जा रहा है। सरकार का संदेश साफ है नीतियां तभी सफल होंगी, जब उनका असर ज़मीनी हकीकत में दिखाई दे।

     
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