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    रिलायंस और आईसीआईसीआई बैंक में बिकवाली से सेंसेक्स-निफ्टी दबाव में, बाजार लाल निशान पर बंद

    घरेलू शेयर बाजार सोमवार को उतार-चढ़ाव भरे कारोबार के बाद गिरावट के साथ बंद हुआ। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव देखने को मिला, जिसका मुख्य कारण दिग्गज कंपनियों के शेयरों में बिकवाली, वैश्विक स्तर पर व्यापार से जुड़ी अनिश्चितता, कमजोर रुपये और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी रहा। खासतौर पर रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईसीआईसीआई बैंक जैसे बड़े शेयरों में आई गिरावट ने बाजार की धारणा को कमजोर किया। दिनभर उतार-चढ़ाव भरा रहा कारोबार सोमवार को कारोबार की शुरुआत सतर्क रुख के साथ हुई। शुरुआती सत्र में बाजार ने सीमित दायरे में कारोबार किया, लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ा, चुनिंदा ब्लू-चिप शेयरों में बिकवाली तेज होती गई। इसके चलते बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 324.17 अंकों की गिरावट के साथ 83,246.18 पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान सेंसेक्स एक समय 672 अंकों तक टूटकर 82,898.31 के निचले स्तर तक पहुंच गया था। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 भी 108.85 अंकों की गिरावट के साथ 25,585.50 पर बंद हुआ। बाजार सहभागियों के अनुसार, निवेशक फिलहाल जोखिम लेने से बचते नजर आए और सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते दिखे। रिलायंस इंडस्ट्रीज में तेज गिरावट दिन की सबसे बड़ी गिरावट रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में देखने को मिली। कंपनी के तीसरी तिमाही के नतीजे अपेक्षाओं के अनुरूप न रहने के कारण शेयर में लगभग 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, गैस उत्पादन में कमी और रिटेल कारोबार में सुस्ती के चलते कंपनी का शुद्ध लाभ लगभग स्थिर रहा। हालांकि अन्य कारोबार खंडों में कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन वह समग्र प्रदर्शन को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं रहा। रिलायंस इंडस्ट्रीज का भारी वजन होने के कारण इसका असर पूरे बाजार पर पड़ा और सूचकांकों पर दबाव बढ़ गया। आईसीआईसीआई बैंक सहित कई बड़े शेयर फिसले बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के शेयर भी सोमवार को कमजोर रहे। आईसीआईसीआई बैंक के शेयरों में करीब 2.26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बैंक के तिमाही नतीजों में मुनाफे में गिरावट और कुछ अतिरिक्त प्रावधानों की खबर से निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई। आईसीआईसीआई बैंक के अलावा टाइटन, अडानी पोर्ट्स, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और अल्ट्राटेक सीमेंट जैसे प्रमुख शेयर भी गिरावट के साथ बंद हुए। इन सभी शेयरों में बिकवाली ने बाजार की समग्र दिशा को नकारात्मक बनाए रखा। कुछ शेयरों ने दिया सहारा हालांकि बाजार में गिरावट का माहौल रहा, फिर भी कुछ चुनिंदा शेयरों में खरीदारी देखने को मिली। इंटरग्लोब एविएशन, टेक महिंद्रा, हिंदुस्तान यूनिलीवर और बजाज फाइनेंस जैसे शेयरों ने मजबूती दिखाई और गिरावट को कुछ हद तक सीमित करने में मदद की। विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक फिलहाल उन कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत है और जिनका प्रदर्शन अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। वैश्विक संकेतों का असर वैश्विक बाजारों से मिले-जुले संकेतों का असर भी घरेलू बाजार पर पड़ा। एशियाई बाजारों में दक्षिण कोरिया और शंघाई के सूचकांक मजबूती के साथ बंद हुए, जबकि जापान और हांगकांग के बाजारों में कमजोरी रही। यूरोपीय बाजारों में भी कारोबार के दौरान दबाव देखा गया। अमेरिकी बाजार पिछले कारोबारी सत्र में मामूली गिरावट के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार नीतियों को लेकर अनिश्चितता और संभावित शुल्क विवाद की चर्चाओं ने निवेशकों को सतर्क बना रखा है। रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की निकासी सोमवार को भारतीय रुपया भी दबाव में रहा। डॉलर के मुकाबले रुपया 14 पैसे कमजोर होकर 90.92 के स्तर पर बंद हुआ। दिन के दौरान रुपया एक बार फिर 91 के स्तर के करीब पहुंच गया था। रुपये में कमजोरी से आयात लागत बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका असर बाजार की धारणा पर पड़ता है। इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से लगातार बिकवाली भी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने हाल के सत्रों में हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने कुछ हद तक खरीदारी कर संतुलन बनाने की कोशिश की। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड लगभग 1 प्रतिशत से अधिक की कमजोरी के साथ 63 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भी भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर पड़ता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है। विशेषज्ञों की राय बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और घरेलू कारकों के कारण निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। एक बाजार विश्लेषक के अनुसार, “वैश्विक जोखिम भावना कमजोर हुई है और इसका असर उभरते बाजारों पर भी दिख रहा है। इसके अलावा तिमाही नतीजों का दौर चल रहा है, जिससे स्टॉक-विशिष्ट उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।” विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक संकेतों, रुपये की चाल और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर निर्भर करेगी। आगे की राह निवेशकों के लिए मौजूदा समय में सावधानी बरतना जरूरी माना जा रहा है। बाजार सहभागियों का मानना है कि अल्पकाल में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, लेकिन मजबूत बुनियादी कारकों वाली कंपनियों में लंबी अवधि के लिए अवसर बने रहेंगे। आने वाले सत्रों में निवेशकों की नजर वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम, घरेलू नीतिगत संकेतों और कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन पर बनी रहेगी। यदि अनिश्चितता कम होती है और सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो बाजार में फिर से स्थिरता देखने को मिल सकती है।

    तकनीक से दूरी नहीं, संतुलन जरूरी : प्रो. अल्पना कटेजा

    डिजिटल डाइट : डिसकनेक्ट टू कनेक्ट पुस्तक का विमोचन मोबाइल फोन के बढ़ते दुष्प्रभावों एवं सोशल मीडिया की बढ़ती लत से युवाओं के बिगड़ते हालात पर केंद्रित पुस्तक 'डिजिटल डाइट : डिसकनेक्ट टू कनेक्ट' का विमोचन सोमवार को राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अल्पना कटेजा ने किया।   राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति सचिवालय में हुए कार्यक्रम में कुलपति प्रो. कटेजा ने कहा कि डिजिटल तकनीक आज के समय की आवश्यकता है, किंतु इसके अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग से युवाओं के मानसिक, सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि डिजिटल डाइट जैसी पुस्तकें समाज को यह संदेश देती हैं कि तकनीक का उपयोग संयम, संतुलन और विवेक के साथ किया जाना चाहिए।   पुस्तक के लेखक डॉ. प्रकाश धवान ने कहा कि यह पुस्तक मोबाइल एवं सोशल मीडिया की लत से उत्पन्न समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है और युवाओं को डिजिटल अनुशासन अपनाने की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि डिसकनेक्ट टू कनेक्ट का आशय तकनीक से पूर्णतः दूरी बनाना नहीं, बल्कि जीवन में मानवीय संबंधों, संवाद और आत्मचिंतन को प्राथमिकता देना है।   कार्यक्रम में राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के शास्त्री कोसलेंद्रदास ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में संयम और संतुलन को जीवन का मूल आधार माना गया है। उन्होंने कहा कि डिजिटल डाइट पुस्तक युवाओं को तकनीक के अति प्रयोग से बचाकर मानसिक शांति और स्वस्थ जीवनशैली की ओर प्रेरित करती हैं। विमोचन समारोह में कमलेश मीणा (अपर आयुक्त, आयकर विभाग), कालूराम (अपर पुलिस अधीक्षक), लोकेश कुमार, बी. एल. मीणा और प्रो. जयन्ती खंडेलवाल सहित अनेक शिक्षाविद, प्रशासनिक अधिकारी एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा ने यजुर्वेद के मंत्रों से मंगलाचरण किया।

    ग्रीनलैंड मुद्दे पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने संयम की अपील की, ट्रंप के टैरिफ़ बयान के बाद सहयोगियों से शांत बातचीत पर ज़ोर

    ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से टैरिफ़ लगाने की चेतावनी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चिंताओं के बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने सहयोगी देशों से संयम और शांतिपूर्ण संवाद बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सहयोगियों के बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए व्यापारिक दबाव या टैरिफ़ जैसे कदम उचित नहीं हैं और इससे दीर्घकालिक साझेदारियों को नुकसान पहुंच सकता है। सोमवार को लंदन में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री स्टारमर ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से ब्रिटेन और अमेरिका के बीच संबंधों ने दोनों देशों को सुरक्षा और समृद्धि प्रदान की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन संबंधों को बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है, लेकिन इसके लिए आपसी सम्मान और संवाद जरूरी है, न कि दबाव की राजनीति। ग्रीनलैंड पर बढ़ता विवाद हाल के दिनों में ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि यदि यूरोपीय देश अमेरिका की ग्रीनलैंड से जुड़ी योजनाओं का विरोध करते हैं, तो उन पर टैरिफ़ लगाए जा सकते हैं। इस बयान के बाद यूरोप के कई देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और इसे सहयोगी देशों के बीच विश्वास को कमजोर करने वाला कदम बताया। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, रणनीतिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राकृतिक संसाधनों और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण यह इलाका वैश्विक शक्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप की टिप्पणियों ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है। “टैरिफ़ सहयोगियों के खिलाफ हथियार नहीं” प्रधानमंत्री स्टारमर ने स्पष्ट किया कि टैरिफ़ जैसे आर्थिक उपायों का इस्तेमाल सहयोगी देशों के खिलाफ नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यापारिक प्रतिबंध अक्सर जवाबी कार्रवाई को जन्म देते हैं, जिससे “टैरिफ़ युद्ध” की स्थिति बन सकती है। ऐसी स्थिति न केवल आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है, बल्कि राजनीतिक रिश्तों में भी दरार डालती है। स्टारमर ने कहा, “हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी तरह का टैरिफ़ युद्ध न हो। सहयोगी देशों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें सुलझाने का रास्ता बातचीत और आपसी समझ से होकर गुजरता है।” ग्रीनलैंड का भविष्य किसके हाथ में ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपनी स्थिति साफ रखी। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड से जुड़े किसी भी निर्णय का अधिकार केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड की जनता के पास है। किसी बाहरी दबाव या आर्थिक धमकी के जरिए इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को प्रभावित करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की मजबूती इसी बात पर निर्भर करती है कि सदस्य देश एक-दूसरे की संप्रभुता और निर्णय प्रक्रिया का सम्मान करें। “गठबंधन दबाव से नहीं, बल्कि साझेदारी और भरोसे से टिके रहते हैं,” उन्होंने कहा। यूरोप में बढ़ती प्रतिक्रिया ट्रंप के बयान के बाद यूरोप के कई देशों ने चिंता जताई है। कुछ यूरोपीय नेताओं ने इसे अनावश्यक उकसावे वाला कदम बताया, जबकि अन्य ने चेतावनी दी कि इस तरह की धमकियों से वैश्विक व्यापार व्यवस्था अस्थिर हो सकती है। यूरोपीय संघ ने भी संकेत दिया है कि यदि टैरिफ़ लगाए जाते हैं, तो जवाबी कदमों पर विचार किया जा सकता है। इस पृष्ठभूमि में ब्रिटेन की भूमिका अहम मानी जा रही है, क्योंकि वह अमेरिका और यूरोप दोनों के साथ मजबूत संबंध रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्टारमर की अपील तनाव कम करने की दिशा में एक संतुलित प्रयास है। ब्रिटेन-अमेरिका संबंधों पर असर? हालांकि स्टारमर ने अमेरिका के साथ संबंधों को बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मित्रता का मतलब हर मुद्दे पर सहमति नहीं होता। कूटनीतिक हलकों में इसे ब्रिटेन की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस तरह के टैरिफ़ विवाद बढ़ते हैं, तो इसका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर भी पड़ सकता है। ऐसे में शांत बातचीत और कूटनीतिक चैनलों का सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। निष्कर्ष ग्रीनलैंड को लेकर उभरे विवाद ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति में आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल कितनी तेजी से तनाव को बढ़ा सकता है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की अपील इस बात पर जोर देती है कि सहयोगियों के बीच मतभेदों का समाधान संवाद, सम्मान और साझेदारी से ही संभव है।   आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका और यूरोपीय देश इस मुद्दे पर किस तरह आगे बढ़ते हैं। फिलहाल, ब्रिटेन का रुख स्पष्ट है—टैरिफ़ नहीं, बल्कि बातचीत ही स्थायी समाधान का रास्ता है।

    राहुल गांधी मानहानि मामले में अदालत में पेश नहीं हुए, अगली सुनवाई 20 फरवरी को

    कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सोमवार को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर स्थित एमपी-एमएलए विशेष अदालत में तय सुनवाई पर उपस्थित नहीं हो सके। इस पर अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 फरवरी की तारीख निर्धारित करते हुए राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का अंतिम अवसर प्रदान किया है। अदालत में पेशी न होने का कारण पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बताया गया, जिसके चलते राहुल गांधी उस समय केरल में मौजूद थे। क्या है मामला यह मामला वर्ष 2018 से जुड़ा हुआ है, जब चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए एक कथित बयान को लेकर राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का परिवाद दायर किया गया था। शिकायतकर्ता स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने आरोप लगाया है कि चुनावी भाषण के दौरान की गई टिप्पणी से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। मामले की सुनवाई कई वर्षों से चल रही है और यह प्रकरण समय-समय पर राजनीतिक और कानूनी चर्चाओं में बना रहा है। राहुल गांधी इस मामले में पहले भी अदालत के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रख चुके हैं और आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे राजनीतिक प्रेरणा से जुड़ा बताया है। अदालत में क्या हुआ सोमवार को होने वाली सुनवाई में राहुल गांधी को अदालत के समक्ष अपना बयान दर्ज कराना था। हालांकि, उनके अधिवक्ता ने अदालत को सूचित किया कि राहुल गांधी पहले से तय कार्यक्रम के कारण केरल में हैं और इस कारण वे सुल्तानपुर नहीं पहुंच सके। इस दलील को सुनने के बाद अदालत ने अगली तारीख तय करते हुए स्पष्ट किया कि यह अंतिम अवसर होगा और अगली सुनवाई पर उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति अपेक्षित है। अदालत का कहना था कि मामले की प्रक्रिया काफी समय से चल रही है और अब इसे आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि आरोपी पक्ष स्वयं अदालत में उपस्थित होकर औपचारिक कार्यवाही पूरी करे। पिछली सुनवाइयों का सिलसिला इस मामले में अदालत की कार्यवाही वर्ष 2018 से जारी है। बीच के वर्षों में कई बार सुनवाई टली, कभी प्रक्रियागत कारणों से तो कभी दोनों पक्षों की दलीलों के चलते। एक समय पर राहुल गांधी की गैर-हाजिरी के कारण अदालत ने वारंट भी जारी किया था, जिसके बाद वे अदालत में उपस्थित हुए और उन्हें जमानत प्रदान की गई। इसके बाद उन्होंने अदालत के समक्ष अपना बयान दर्ज कराते हुए कहा था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं और यह मामला राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते आगे बढ़ाया जा रहा है। अदालत ने उनके बयान के बाद शिकायतकर्ता पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, जिसके तहत गवाहों के बयान दर्ज किए गए। गवाहों की गवाही और मौजूदा स्थिति शिकायतकर्ता की ओर से गवाहों को अदालत में पेश किया गया, जिनसे बचाव पक्ष द्वारा जिरह भी की गई। कानूनी जानकारों के अनुसार, मामला अब उस चरण में है जहां आरोपी का बयान दर्ज किया जाना आवश्यक है, ताकि आगे की कार्यवाही तय की जा सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई पर राहुल गांधी को दंड प्रक्रिया संहिता की संबंधित धाराओं के तहत अपना बयान दर्ज कराना होगा। इसके बाद ही यह तय होगा कि मामले में आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाएंगे। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और माहौल राहुल गांधी की पेशी को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज रही। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी कानून का सम्मान करते हैं और उचित समय पर अदालत में उपस्थित होंगे। पार्टी का यह भी कहना है कि विपक्ष के नेताओं के खिलाफ इस तरह के मामले अक्सर राजनीतिक दबाव के तहत आगे बढ़ाए जाते हैं। वहीं, दूसरी ओर, विपक्षी दलों का कहना है कि कानून सभी के लिए समान है और किसी भी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया से छूट नहीं मिलनी चाहिए। इस बयानबाजी के बीच अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट संदेश दिया है कि अगली तारीख पर व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य होगी। कानूनी विशेषज्ञों की राय कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत द्वारा “अंतिम अवसर” दिया जाना यह संकेत देता है कि अब मामले में देरी को स्वीकार नहीं किया जाएगा। यदि अगली सुनवाई पर भी आरोपी की अनुपस्थिति रहती है, तो अदालत के पास कानून के तहत अन्य विकल्प खुले रहते हैं। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि लंबे समय से चल रहे मामलों में अदालतें आमतौर पर प्रक्रिया को तेज करने के लिए सख्त रुख अपनाती हैं, ताकि न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम हो और मामलों का समय पर निपटारा हो सके। आगे की राह अब सभी की निगाहें 20 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। इस तारीख को राहुल गांधी की व्यक्तिगत उपस्थिति और उनके बयान के बाद यह स्पष्ट होगा कि मामला किस दिशा में आगे बढ़ेगा। यदि प्रक्रिया सुचारु रूप से आगे बढ़ती है, तो आने वाले महीनों में इस मामले पर कोई निर्णायक स्थिति बन सकती है। राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि राहुल गांधी वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका अहम है। ऐसे में उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों पर न केवल न्यायपालिका बल्कि जनता और राजनीतिक दलों की भी कड़ी नजर रहती है। निष्कर्ष   सुल्तानपुर मानहानि मामले में सोमवार की सुनवाई एक बार फिर टल गई, लेकिन अदालत का रुख इस बार पहले से अधिक स्पष्ट और सख्त नजर आया। 20 फरवरी को तय अगली तारीख इस लंबे चले आ रहे मामले में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। अब देखना होगा कि उस दिन की सुनवाई के बाद यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है और न्यायिक प्रक्रिया किस निष्कर्ष तक पहुंचती है।

    दीपा सिंह को मिली पीएचडी उपाधि

    जयपुर। आईआईएस यूनिवर्सिटी, जयपुर से दीपा सिंह ने पीएचडी (डॉक्टरेट) की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से अपना शोध कार्य पूर्ण किया। उनका शोध विषय “एडॉप्शन ऑफ न्यू मीडिया इन प्रोग्रेसिव फार्मिंग विद स्पेशल रेफरेंस टू रूरल जयपुर” रहा, जो कृषि संचार और डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने यह शोध कार्य पर्यवेक्षक डॉ. शिप्रा माथुर एवं सह- पर्यवेक्षक डॉ. शेलजा के. जुनेजा के मार्गदर्शन पूरा किया है। अपने शोध के दौरान दीपा सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रगतिशील किसानों द्वारा न्यू मीडिया के उपयोग, सूचना प्रसार, कृषि नवाचारों के संचार तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की भूमिका का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण किया।

    रानी मुखर्जी: ‘एक अभिनेता के लिए आत्म-संरक्षण बेहद ज़रूरी है’ — ‘मर्दानी 3’, अभिनय की सीमाएं और बदलता सिनेमा

      मुंबई की सर्द दोपहर है। जुहू बीच पर हल्की धूप फैली हुई है और समुद्र की नीली लहरें दूर तक फैली नज़र आती हैं। इसी शांत माहौल में रानी मुखर्जी अपने कार्यालय में सहज लेकिन आत्मविश्वास से भरी दिखाई देती हैं। वर्षों से भारतीय सिनेमा का एक मजबूत चेहरा रहीं रानी आज भी अपने काम को लेकर उतनी ही सजग और स्पष्ट हैं, जितनी अपने करियर के शुरुआती दिनों में थीं। रानी मुखर्जी इन दिनों अपनी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘मर्दानी 3’ की तैयारी और प्रचार में व्यस्त हैं। इस फिल्म के साथ वह एक बार फिर पुलिस अधिकारी शिवानी शिवाजी रॉय की भूमिका में लौट रही हैं। यह किरदार उनके करियर के सबसे प्रभावशाली और सामाजिक रूप से प्रासंगिक पात्रों में से एक माना जाता है। ‘मर्दानी’ फ्रेंचाइज़ी और सामाजिक सरोकार ‘मर्दानी’ सीरीज़ शुरू से ही महिलाओं की सुरक्षा और समाज में मौजूद गंभीर अपराधों को केंद्र में रखती आई है। पहले भाग में मानव तस्करी जैसे मुद्दे को सामने लाया गया था, जबकि दूसरे भाग में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की भयावह मानसिकता को दिखाया गया। अब ‘मर्दानी 3’ उसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए एक नई कहानी के साथ दर्शकों के सामने आने वाली है। रानी बताती हैं कि यह फ्रेंचाइज़ी केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज में मौजूद एक गहरे दर्द और गुस्से की अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार, यह फिल्म श्रृंखला उस सामूहिक पीड़ा से जन्मी थी, जो देश ने पिछले दशक में महिलाओं के खिलाफ हुए जघन्य अपराधों के बाद महसूस की। चुनौतीपूर्ण दृश्यों और मानसिक सीमाओं पर बात ‘मर्दानी 3’ की शूटिंग के दौरान कुछ दृश्य ऐसे थे, जिन्हें निभाना भावनात्मक और मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। इस पर बात करते हुए रानी कहती हैं कि हर अभिनेता के लिए यह समझना जरूरी है कि कहां रुकना है। उनके शब्दों में, “एक अभिनेता के तौर पर ईमानदारी से काम करना ज़रूरी है, लेकिन आत्म-संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर आप खुद को भावनात्मक रूप से पूरी तरह तोड़ लेंगे, तो आप लंबे समय तक इस पेशे में टिक नहीं पाएंगे।” रानी मानती हैं कि संवेदनशील विषयों पर काम करते समय कलाकारों को अपनी मानसिक सेहत का भी ध्यान रखना चाहिए। उनका कहना है कि अभिनय में डूबना ज़रूरी है, लेकिन खुद को खो देना नहीं। बदलता सिनेमा और महिलाओं की भूमिकाएं रानी मुखर्जी ने अपने करियर में हिंदी सिनेमा के कई दौर देखे हैं। रोमांटिक भूमिकाओं से लेकर सशक्त महिला किरदारों तक, उनका सफर भारतीय सिनेमा में आए बदलावों को भी दर्शाता है। वह कहती हैं कि आज के समय में दर्शक कहीं अधिक जागरूक हैं और वे ऐसी कहानियां देखना चाहते हैं जो समाज की वास्तविकता से जुड़ी हों। महिलाओं को अब केवल सहायक भूमिकाओं तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि उन्हें कहानी के केंद्र में रखा जा रहा है। ‘मर्दानी’ जैसी फिल्में इस बदलाव का उदाहरण हैं, जहां महिला पात्र सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक और मजबूत भूमिका में दिखाई देती हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार और मान्यता पर दृष्टिकोण राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जैसे सम्मान को लेकर रानी का दृष्टिकोण संतुलित है। वह मानती हैं कि पुरस्कार किसी भी कलाकार के लिए प्रोत्साहन का काम करते हैं, लेकिन वे कभी भी काम करने की एकमात्र वजह नहीं होने चाहिए। उनके अनुसार, “सम्मान मिलना अच्छा लगता है, लेकिन असली संतुष्टि तब मिलती है जब आपका काम दर्शकों तक पहुंचता है और उन्हें प्रभावित करता है।” बॉक्स ऑफिस और व्यक्तिगत सोच बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों को लेकर रानी बेहद व्यावहारिक सोच रखती हैं। वह मानती हैं कि फिल्म का व्यावसायिक प्रदर्शन महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे उद्योग चलता है, लेकिन एक अभिनेता के तौर पर उनका ध्यान कहानी और किरदार की सच्चाई पर रहता है। उनका कहना है कि हर फिल्म करोड़ों का कारोबार करे, यह जरूरी नहीं, लेकिन हर फिल्म ईमानदारी से बनाई जानी चाहिए। दर्शक अंततः उसी काम को याद रखते हैं जिसमें सच्चाई और संवेदनशीलता हो। शिवानी शिवाजी रॉय: एक जिम्मेदारी रानी के लिए शिवानी शिवाजी रॉय केवल एक किरदार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। वह मानती हैं कि इस भूमिका के ज़रिए वह उन महिलाओं की आवाज़ बनती हैं, जो खुद के लिए आवाज़ नहीं उठा पातीं। वह कहती हैं कि इस तरह के किरदार निभाते समय उन्हें यह एहसास रहता है कि दर्शक उनसे केवल अभिनय नहीं, बल्कि एक संदेश की उम्मीद भी रखते हैं। आगे की राह ‘मर्दानी 3’ के ज़रिए रानी मुखर्जी एक बार फिर यह साबित करने जा रही हैं कि उम्र या समय किसी अभिनेता की प्रासंगिकता तय नहीं करता, बल्कि उसका काम और सोच तय करती है। वह ऐसे सिनेमा में विश्वास रखती हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज को सोचने पर मजबूर करे। उनकी बातचीत से साफ झलकता है कि अनुभव के साथ उनकी दृष्टि और भी गहरी हुई है। आत्म-संरक्षण, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी — यही तीन शब्द उनके मौजूदा अभिनय दर्शन को परिभाषित करते हैं। जैसे-जैसे ‘मर्दानी 3’ की रिलीज़ नज़दीक आ रही है, दर्शकों की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। रानी मुखर्जी के लिए यह सिर्फ एक और फिल्म नहीं, बल्कि उस यात्रा का अगला अध्याय है, जिसमें सिनेमा समाज से सीधा संवाद करता है।    

    राजस्थान: बजट 2026-27 के लिए बेरोजगारों ने खोला मांगों का पिटारा, इधर राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव पर बढ़ी हलचल

    बेरोजगार यूनियन ने मुख्यमंत्री को भेजा 17 सूत्री मांग पत्र; साक्षात्कार खत्म करने और 1 लाख नई भर्तियों की गूंज जयपुर। राजस्थान के आगामी बजट को लेकर प्रदेश के युवा बेरोजगारों और छात्र राजनीति के गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। एक ओर जहाँ राजस्थान बेरोजगार यूनियन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर युवाओं के भविष्य के लिए बड़े बदलावों की मांग की है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनावों को लेकर न्यायालय के दखल के बाद प्रशासनिक सक्रियता बढ़ गई है। बजट में युवा शक्ति की हुंकार: साक्षात्कार हटाने और नई भर्तियों पर जोर राजस्थान बेरोजगार यूनियन ने बजट 2026-27 के लिए सरकार के समक्ष एक विस्तृत मांग पत्र पेश किया है। यूनियन की प्रमुख मांगों में भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर देना शामिल है। मांग पत्र की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:  * भर्ती सुधार: अन्य राज्यों की तर्ज पर राजस्थान उप निरीक्षक (SI) भर्ती से साक्षात्कार प्रक्रिया को पूर्णतः समाप्त करने की मांग की गई है। इसके अलावा, प्रतियोगिता परीक्षाओं की OMR शीट गुजरात मॉडल के आधार पर ऑनलाइन उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।  * पदों की घोषणा: बजट में कम से कम 1 लाख नए पदों पर भर्तियों की घोषणा करने और शिक्षा विभाग में व्याख्याता, वरिष्ठ अध्यापक व अध्यापकों के रिक्त पदों को तत्काल भरने की अपील की गई है।  * वेतन और भत्ता: पशु परिचर और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का पे-लेवल L-3 करने तथा बेरोजगारी भत्ते में बढ़ोतरी करने की मांग उठाई गई है।  * व्यवस्था परिवर्तन: एक वर्ष के भीतर नौकरी छोड़ने वालों के स्थान पर वेटिंग लिस्ट का प्रावधान करने और संविदा कर्मियों को उनके गृह जिले में ही नियुक्ति देने जैसी महत्वपूर्ण माँगें रखी गई हैं।  * जांच की मांग: RSSB की पुरानी भर्तियों में हुए OMR घोटाले की निष्पक्ष जांच और PTI भर्ती 2022 की जांच प्रक्रिया जल्द पूरी करने पर जोर दिया गया है। राजस्थान विश्वविद्यालय: छात्रसंघ चुनावों पर हाईकोर्ट के निर्देश के बाद बड़ी बैठक छात्र राजनीति के केंद्र राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव आयोजन को लेकर चल रहा गतिरोध अब टूटने की कगार पर है। माननीय न्यायालय द्वारा विभिन्न याचिकाओं (Civil Writ Petitions) पर दिए गए निर्देशों के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।  * आपात बैठक का आह्वान: अधिष्ठाता छात्र कल्याण (DSW) कार्यालय ने 19 जनवरी 2026 को प्रातः 11:00 बजे वनस्पति शास्त्र विभाग के सेमिनार भवन में एक विशेष बैठक बुलाई है।  * मुख्य एजेंडा: इस बैठक का मुख्य विषय छात्रसंघ चुनावों का न होना और भविष्य में इनके आयोजन की रूपरेखा तय करना है।  * प्रतिनिधियों की उपस्थिति: इस संवाद सत्र में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के छात्र प्रतिनिधियों, अभ्यर्थियों और व्यथित विद्यार्थियों को आमंत्रित किया गया है ताकि चुनावों से जुड़ी शिकायतों का निस्तारण हो सके। युवाओं की उम्मीदों पर टिकी सरकार की नजर राजस्थान की राजनीति में युवाओं और छात्रों का बड़ा दखल रहा है। एक तरफ बेरोजगारों का 17 सूत्री मांग पत्र सरकार की प्रशासनिक कुशलता की परीक्षा लेगा, तो दूसरी तरफ राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने का दबाव प्रशासन पर बना हुआ है। बजट में इन मांगों को कितनी जगह मिलती है और विश्वविद्यालय में चुनाव की तारीखों पर कब सहमति बनती है, इस पर प्रदेशभर के युवाओं की नजरें टिकी हैं।  

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    चीन में बिजली खपत ने 2025 में बनाया नया रिकॉर्ड, पहली बार 10 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे के पार; हाई-टेक उद्योग बने सबसे बड़े कारण

    चीन में बिजली की खपत ने वर्ष 2025 में नया ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम कर दिया है। देश की कुल बिजली खपत पहली बार 10 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे (kWh) के आंकड़े को पार करते हुए 10.37 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे तक पहुंच गई। यह जानकारी चीन की राष्ट्रीय ऊर्जा प्रशासन (National Energy Administration – NEA) ने शनिवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों में दी। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, यह वृद्धि चीन की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, औद्योगिक गतिविधियों में विस्तार और खासतौर पर हाई-टेक तथा नई ऊर्जा से जुड़े उद्योगों की मजबूत मांग का परिणाम है। चीन की यह बिजली खपत अब यूरोपीय संघ, रूस, भारत और जापान की संयुक्त बिजली खपत से भी अधिक हो चुकी है, जो वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में चीन की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। 5 प्रतिशत की सालाना वृद्धि, ऐतिहासिक उपलब्धि राष्ट्रीय ऊर्जा प्रशासन के मुताबिक, वर्ष 2025 में चीन की बिजली खपत में साल-दर-साल आधार पर लगभग 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि न केवल मात्रा के लिहाज से अहम है, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसने पहली बार 10 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे की मनोवैज्ञानिक सीमा को पार किया है। राज्य मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 10.37 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे की यह खपत वर्ष 2024 में यूरोपीय संघ, रूस, भारत और जापान की कुल संयुक्त बिजली खपत से अधिक है। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता बन चुका है और उसकी ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। हाई-टेक उद्योग बने प्रमुख चालक विशेषज्ञों का कहना है कि चीन में बिजली की बढ़ती खपत का सबसे बड़ा कारण हाई-टेक उद्योगों का तेज़ विस्तार है। खासकर इंटरनेट सेवाओं, डेटा सेंटर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल इकोनॉमी से जुड़े क्षेत्रों में बिजली की मांग में जबरदस्त उछाल देखा गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025 के पहले 11 महीनों में इंटरनेट और उससे संबंधित सेवाओं के क्षेत्र में बिजली की खपत में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि चीन में डिजिटल सेवाओं का दायरा तेजी से बढ़ रहा है और इसके साथ ही ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। नई ऊर्जा वाहनों से बढ़ी मांग बिजली की खपत बढ़ाने में नई ऊर्जा वाहनों (New Energy Vehicles – NEVs) की भूमिका भी अहम रही है। इसमें इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और हाइब्रिड कारें शामिल हैं। निर्माण क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, नई ऊर्जा वाहनों के निर्माताओं की बिजली मांग में 2025 के दौरान 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। चीन पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन बाजार है और सरकार की नीतियों के चलते इस क्षेत्र में निवेश और उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार, बैटरी निर्माण और उससे जुड़े उद्योगों ने भी बिजली की मांग को तेज़ी से बढ़ाया है। औद्योगिक और शहरीकरण का असर चीन की बिजली खपत में वृद्धि के पीछे औद्योगिक उत्पादन और शहरीकरण भी बड़े कारण हैं। भारी उद्योगों, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और निर्यात आधारित इकाइयों में उत्पादन बढ़ने से ऊर्जा की जरूरत भी बढ़ी है। इसके अलावा, शहरी आबादी में वृद्धि, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं, मेट्रो रेल नेटवर्क, हाई-स्पीड रेलवे और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं ने भी बिजली की मांग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वैश्विक तुलना में चीन की स्थिति ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की बिजली खपत का यह स्तर उसे वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अलग स्थान पर ले जाता है। जहां कई विकसित देश ऊर्जा दक्षता और खपत में स्थिरता की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं चीन की खपत लगातार बढ़ रही है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि चीन की आबादी, औद्योगिक पैमाना और आर्थिक संरचना अन्य देशों से काफी अलग है, इसलिए सीधी तुलना हमेशा पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। फिर भी, 10 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे से अधिक की खपत अपने आप में एक बड़ा संकेत है। ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण की चुनौती बिजली की बढ़ती खपत के साथ चीन के सामने ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। देश अभी भी कोयले पर काफी हद तक निर्भर है, हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी उसने बड़ा निवेश किया है। चीन सरकार सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जलविद्युत के क्षेत्र में लगातार क्षमता बढ़ा रही है ताकि बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सके। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बिजली की मांग इसी गति से बढ़ती रही, तो चीन को ऊर्जा उत्पादन के स्रोतों में संतुलन बनाना होगा, ताकि पर्यावरणीय लक्ष्यों और आर्थिक विकास के बीच सामंजस्य कायम रखा जा सके। वैश्विक नीति और व्यापार पर असर चीन की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों का असर वैश्विक नीति और व्यापार पर भी पड़ सकता है। ऊर्जा संसाधनों की मांग बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी निर्माण जैसे क्षेत्रों में चीन की बढ़ती क्षमता वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित कर रही है। हाल के महीनों में चीन, अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार और शुल्क से जुड़े मुद्दों पर तनाव देखने को मिला है। ऐसे में ऊर्जा और हाई-टेक उद्योगों में चीन की बढ़ती भूमिका वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी अहम साबित हो सकती है। भविष्य की राह ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले वर्षों में भी चीन की बिजली खपत बढ़ती रहने की संभावना है, हालांकि इसकी गति नीतिगत फैसलों और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। सरकार की ओर से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, स्मार्ट ग्रिड विकसित करने और नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। यदि ये योजनाएं सफल रहती हैं, तो चीन अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को अधिक टिकाऊ तरीके से पूरा कर सकता है। निष्कर्ष कुल मिलाकर, वर्ष 2025 में चीन की बिजली खपत का 10 ट्रिलियन किलोवाट-घंटे के पार जाना न केवल एक आंकड़ा है, बल्कि यह देश की आर्थिक संरचना, औद्योगिक ताकत और तकनीकी विस्तार का प्रतीक भी है। हाई-टेक उद्योगों, नई ऊर्जा वाहनों और डिजिटल सेवाओं ने इस वृद्धि में निर्णायक भूमिका निभाई है।   हालांकि, इसके साथ ही ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक संतुलन जैसी चुनौतियां भी चीन के सामने खड़ी हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि चीन अपनी बढ़ती ऊर्जा मांग को किस तरह संतुलित और टिकाऊ तरीके से पूरा करता है।

    डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती, शुरुआती कारोबार में 12 पैसे की बढ़त; वैश्विक संकेतों और घरेलू चुनौतियों के बीच बाजार सतर्क

    भारतीय मुद्रा रुपये ने सोमवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती दर्ज की और 12 पैसे की बढ़त के साथ 90.66 के स्तर पर पहुंच गई। यह सुधार ऐसे समय में देखने को मिला है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में नरमी दिखाई दी और प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले ग्रीनबैक कमजोर हुआ। हालांकि, विदेशी पूंजी की लगातार निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चित परिस्थितियों के कारण निवेशकों की सतर्कता बनी हुई है। विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों के अनुसार, रुपये में यह मजबूती मुख्य रूप से डॉलर इंडेक्स में आई गिरावट का नतीजा है। डॉलर इंडेक्स, जो अमेरिकी मुद्रा की ताकत को छह प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मुकाबले मापता है, सोमवार को गिरकर 98.99 के स्तर पर आ गया। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं, विशेष रूप से भारतीय रुपये को कुछ राहत मिली। शुरुआती कारोबार में रुपये की चाल अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में सोमवार सुबह रुपये की शुरुआत 90.68 के स्तर पर हुई। शुरुआती सौदों के दौरान इसमें और सुधार देखने को मिला और यह 90.66 के स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले 12 पैसे की बढ़त को दर्शाता है। गौरतलब है कि इससे पहले शुक्रवार को रुपया भारी दबाव में रहा था और 44 पैसे की गिरावट के साथ लगभग अपने निचले स्तर 90.78 पर बंद हुआ था। इसके पहले के दो कारोबारी सत्रों में भी रुपये में कुल 17 पैसे की कमजोरी दर्ज की गई थी। इस तरह, हालिया मजबूती को बाजार विशेषज्ञ एक अस्थायी राहत के रूप में देख रहे हैं, न कि किसी स्थायी रुझान के रूप में। डॉलर में नरमी से मिला सहारा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी डॉलर में आई बिकवाली ने रुपये को सहारा दिया है। हाल के दिनों में अमेरिका की व्यापार नीति से जुड़े बयानों ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोपीय देशों पर संभावित शुल्क लगाने की घोषणा के बाद डॉलर पर दबाव बढ़ा। इन बयानों से निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना और उन्होंने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख किया, जिससे डॉलर की मांग कुछ हद तक घटी। इसका सीधा असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ा, जिनमें भारतीय रुपया भी शामिल है। डॉलर में आई कमजोरी के चलते रुपये को कुछ राहत मिली और यह शुरुआती कारोबार में मजबूती के साथ कारोबार करता दिखा। कच्चे तेल की कीमतें बनीं चिंता का कारण हालांकि, रुपये की मजबूती पर कच्चे तेल की कीमतों का दबाव बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें सोमवार को वायदा कारोबार में 0.17 प्रतिशत की बढ़त के साथ 64.24 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गईं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी से देश के चालू खाते पर दबाव बढ़ता है और रुपये पर नकारात्मक असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो रुपये की मजबूती को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी घरेलू मुद्रा बाजार पर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की गतिविधियों का भी गहरा असर पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार से करीब 4,346 करोड़ रुपये की निकासी की। विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने से न केवल शेयर बाजार में दबाव बढ़ता है, बल्कि रुपये पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से धन निकालते हैं, तो उन्हें डॉलर की आवश्यकता होती है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है। शेयर बाजार में गिरावट सोमवार को घरेलू शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। बीएसई सेंसेक्स 482.80 अंकों या 0.58 प्रतिशत की गिरावट के साथ 83,087.55 के स्तर पर कारोबार करता दिखा। वहीं, एनएसई निफ्टी 129.30 अंकों या 0.50 प्रतिशत की गिरावट के साथ 25,565.05 के स्तर पर आ गया। विश्लेषकों के अनुसार, शेयर बाजार में यह गिरावट वैश्विक संकेतों, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण देखने को मिली। शेयर बाजार में कमजोरी का असर अक्सर मुद्रा बाजार पर भी पड़ता है, क्योंकि निवेशकों का भरोसा कमजोर होने पर वे सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं। वैश्विक परिस्थितियों का असर वर्तमान समय में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रम का असर सभी प्रमुख मुद्राओं पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार नीतियों से जुड़ी अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियां मुद्रा बाजार की दिशा तय कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर स्थिरता नहीं आती और विदेशी निवेशकों का भरोसा बहाल नहीं होता, तब तक रुपये में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। हालांकि, भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद, बड़े विदेशी मुद्रा भंडार और नियंत्रित मुद्रास्फीति रुपये को लंबी अवधि में सहारा दे सकती है। आगे का रुख क्या होगा? मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में रुपये की चाल कई कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें डॉलर की वैश्विक स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख और घरेलू आर्थिक आंकड़े प्रमुख होंगे। यदि डॉलर में कमजोरी का रुझान जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो रुपये को और मजबूती मिल सकती है। वहीं, अगर वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती है या विदेशी पूंजी की निकासी तेज होती है, तो रुपये पर फिर से दबाव बन सकता है। निष्कर्ष   कुल मिलाकर, सोमवार को रुपये में दर्ज की गई 12 पैसे की बढ़त ने बाजार को कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। विदेशी निवेशकों की सतर्कता, ऊंची कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक घटनाक्रम रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते रहेंगे। निवेशकों और कारोबारियों की नजर आने वाले दिनों में वैश्विक संकेतों और घरेलू आर्थिक घटनाओं पर बनी रहेगी, जो भारतीय मुद्रा के भविष्य के रुख को निर्धारित करेंगी।

    टी20 वर्ल्ड कप 2026 में बांग्लादेश की भागीदारी पर 21 जनवरी को होगा अंतिम फैसला

    आईसीसी पुरुष टी20 वर्ल्ड कप 2026 में बांग्लादेश की भागीदारी को लेकर लंबे समय से चल रही अनिश्चितता अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि इस अहम मुद्दे पर अंतिम फैसला 21 जनवरी 2026 को लिया जाएगा। यह निर्णय खास तौर पर इस बात को लेकर होगा कि बांग्लादेश की टीम भारत में अपने निर्धारित मुकाबले खेलने के लिए यात्रा करेगी या नहीं। यह टूर्नामेंट भारत और श्रीलंका की संयुक्त मेजबानी में आयोजित किया जाना है। बांग्लादेश की टीम को ग्रुप चरण के अपने कई मुकाबले भारत में खेलने हैं, जिनमें कोलकाता और मुंबई प्रमुख वेन्यू हैं। हालांकि, हाल के हफ्तों में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) ने खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं का हवाला देते हुए अपने मैचों को भारत के बाहर कराने की मांग रखी है। ICC और BCB के बीच लगातार बातचीत मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड और आईसीसी के बीच बीते एक सप्ताह में दो अहम बैठकें हो चुकी हैं। इनमें से एक बैठक ढाका में आयोजित की गई, जहां दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से रखी। आईसीसी ने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को साफ तौर पर यह जानकारी दी कि टूर्नामेंट के तय कार्यक्रम में किसी भी तरह का बदलाव करना आसान नहीं है। वहीं, बांग्लादेश बोर्ड ने भी यह दोहराया कि वह टी20 वर्ल्ड कप में हिस्सा लेना चाहता है, लेकिन भारत में मैच खेलने को लेकर वह अभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। बांग्लादेश की आपत्ति का कारण बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए वह अपने खिलाड़ियों और सहयोगी स्टाफ की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना चाहता है। इसी आधार पर BCB ने यह सुझाव दिया था कि बांग्लादेश के मैचों को श्रीलंका में स्थानांतरित किया जाए या फिर ग्रुप में बदलाव कर दिया जाए, जिससे टीम को भारत की यात्रा न करनी पड़े। हालांकि, आईसीसी ने इन प्रस्तावों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। परिषद का मानना है कि पूरे टूर्नामेंट की योजना, सुरक्षा व्यवस्था और लॉजिस्टिक्स पहले से तय हैं और अंतिम समय में बदलाव से आयोजन पर व्यापक असर पड़ सकता है। ICC का रुख: सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त आईसीसी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, टूर्नामेंट से पहले स्वतंत्र सुरक्षा आकलन कराया गया है। यह आकलन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सुरक्षा विशेषज्ञों द्वारा किया गया, जिसमें भारत में होने वाले मैचों को लेकर जोखिम को कम से मध्यम स्तर का बताया गया है। इन रिपोर्ट्स में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बांग्लादेश टीम, उसके अधिकारियों या मैच स्थलों को लेकर कोई प्रत्यक्ष या विशिष्ट खतरा सामने नहीं आया है। आईसीसी का कहना है कि भारत जैसे बड़े खेल आयोजनों की मेजबानी करने वाले देश में पहले भी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट सफलतापूर्वक आयोजित होते रहे हैं और सुरक्षा प्रबंधन को लेकर व्यापक अनुभव मौजूद है। तय कार्यक्रम पर अडिग ICC आईसीसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि बांग्लादेश को जिस ग्रुप में रखा गया है, उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाएगा। बांग्लादेश ग्रुप सी में शामिल है, जहां उसे वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड, इटली और नेपाल के साथ मुकाबले खेलने हैं। टीम का पहला मैच 7 फरवरी 2026 को कोलकाता में वेस्टइंडीज के खिलाफ निर्धारित है। इसके बाद दो और ग्रुप मुकाबले कोलकाता में होंगे, जबकि अंतिम ग्रुप मैच मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाना है। ऐसे में टूर्नामेंट की शुरुआत में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। विकल्प के तौर पर स्कॉटलैंड का नाम आईसीसी ने यह भी संकेत दिया है कि यदि बांग्लादेश अंतिम समय पर भारत आने से इनकार करता है, तो टूर्नामेंट के नियमों के अनुसार उसकी जगह किसी अन्य टीम को शामिल किया जा सकता है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग के आधार पर स्कॉटलैंड को संभावित विकल्प माना जा रहा है। हालांकि, यह कदम केवल अंतिम विकल्प के तौर पर ही उठाया जाएगा। आईसीसी की प्राथमिकता यही है कि सभी क्वालिफाई की गई टीमें टूर्नामेंट में हिस्सा लें और किसी भी तरह का बदलाव न्यूनतम रखा जाए। बांग्लादेश बोर्ड के सामने कठिन फैसला बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के लिए यह फैसला आसान नहीं माना जा रहा है। एक ओर टीम और देश के क्रिकेट प्रशंसक विश्व कप में बांग्लादेश की भागीदारी देखना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर बोर्ड किसी भी तरह का जोखिम उठाने से बचना चाहता है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बांग्लादेश टूर्नामेंट से बाहर होता है, तो इससे न केवल टीम को बल्कि वैश्विक क्रिकेट को भी नुकसान पहुंचेगा। टी20 वर्ल्ड कप जैसे बड़े आयोजन में किसी टीम का अंतिम समय पर हटना हमेशा चर्चा का विषय बनता है। क्रिकेट जगत की नजर 21 जनवरी पर अब पूरे क्रिकेट जगत की नजरें 21 जनवरी पर टिकी हुई हैं। इसी दिन यह तय होगा कि बांग्लादेश भारत में अपने निर्धारित मुकाबले खेलेगा या नहीं। यदि बांग्लादेश सहमति देता है, तो यह मामला यहीं समाप्त हो जाएगा और टीम अपनी तैयारियों पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर सकेगी। वहीं, यदि इनकार किया जाता है, तो आईसीसी को वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी, जिससे टूर्नामेंट की संरचना प्रभावित हो सकती है। टूर्नामेंट की तैयारियों पर असर टी20 वर्ल्ड कप 2026 के आयोजन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। भारत और श्रीलंका में स्टेडियम, सुरक्षा व्यवस्था, प्रसारण और लॉजिस्टिक्स को लेकर बड़े पैमाने पर काम चल रहा है। ऐसे समय में किसी टीम की भागीदारी पर अनिश्चितता आयोजकों के लिए भी चुनौती बन जाती है। आईसीसी अधिकारियों का कहना है कि वे सभी सदस्य बोर्ड्स के साथ समन्वय बनाए हुए हैं और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं। निष्कर्ष बांग्लादेश की टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भागीदारी को लेकर चल रहा यह मामला अब निर्णायक चरण में है। 21 जनवरी को लिया जाने वाला फैसला न केवल बांग्लादेश क्रिकेट के भविष्य के लिए अहम होगा, बल्कि पूरे टूर्नामेंट की दिशा भी तय करेगा।   अब देखना होगा कि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड आईसीसी के सुरक्षा आश्वासनों पर भरोसा करता है या किसी अन्य विकल्प को चुनता है। फिलहाल, क्रिकेट प्रेमी उम्मीद कर रहे हैं कि सभी टीमें मैदान पर उतरें और विश्व कप का रोमांच अपने पूरे शबाब पर पहुंचे।

    चांदी ने रचा इतिहास: वायदा कारोबार में पहली बार ₹3 लाख प्रति किलो के पार पहुंची कीमत

    घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिल रहे मजबूत संकेतों के बीच सोमवार को चांदी की कीमतों ने नया इतिहास रच दिया। वायदा कारोबार में चांदी पहली बार ₹3 लाख प्रति किलोग्राम के स्तर को पार कर गई। निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी, औद्योगिक मांग में तेजी और अमेरिकी डॉलर की कमजोरी को इस उछाल की प्रमुख वजह माना जा रहा है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर मार्च डिलीवरी वाली चांदी के वायदा भाव में तेज उछाल दर्ज किया गया। कारोबार के दौरान चांदी की कीमतों में ₹13,500 से अधिक की बढ़त देखने को मिली, जिससे यह ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई। यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है और इससे पहले चांदी ने घरेलू वायदा बाजार में इतना ऊंचा आंकड़ा कभी नहीं छुआ था। MCX पर रिकॉर्ड तेजी, निवेशकों में उत्साह MCX के आंकड़ों के अनुसार, चांदी के मार्च वायदा अनुबंध में करीब 4.5 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार से ही कीमतों में मजबूती दिखी और दिन चढ़ने के साथ-साथ तेजी और तेज होती चली गई। कमोडिटी बाजार के जानकारों का कहना है कि बीते कुछ सत्रों से चांदी लगातार सोने से बेहतर प्रदर्शन कर रही है। जहां सोने की कीमतें सीमित दायरे में कारोबार कर रही हैं, वहीं चांदी ने तेज रफ्तार पकड़ ली है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिला मजबूत समर्थन घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चांदी की कीमतों में जोरदार तेजी देखी गई। वैश्विक बाजारों में मार्च डिलीवरी वाले चांदी के वायदा अनुबंध ने प्रति औंस 94 डॉलर के पार का स्तर छू लिया, जो अब तक का रिकॉर्ड माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह तेजी केवल सट्टा गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मजबूत बुनियादी कारण मौजूद हैं। खास तौर पर औद्योगिक उपयोग में चांदी की बढ़ती मांग ने कीमतों को नया आधार दिया है। औद्योगिक मांग बनी प्रमुख कारण चांदी को केवल कीमती धातु या निवेश के विकल्प के रूप में ही नहीं, बल्कि एक अहम औद्योगिक धातु के तौर पर भी देखा जाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, मेडिकल उपकरण और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में चांदी की मांग तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि हरित ऊर्जा परियोजनाओं और इलेक्ट्रिक वाहनों की वैश्विक मांग में हो रही वृद्धि ने चांदी की खपत को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। इसके चलते निवेशकों को भविष्य में भी चांदी की मांग मजबूत रहने की उम्मीद है। कमजोर डॉलर से मिली अतिरिक्त मजबूती अमेरिकी डॉलर में कमजोरी भी चांदी की कीमतों को सहारा देने वाला एक अहम कारक बनकर उभरी है। जब डॉलर कमजोर होता है, तो डॉलर में कीमत तय होने वाली धातुएं अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए सस्ती हो जाती हैं, जिससे उनकी मांग बढ़ती है। कमोडिटी विश्लेषकों के मुताबिक, हाल के दिनों में डॉलर इंडेक्स में आई नरमी ने न केवल चांदी बल्कि अन्य कीमती धातुओं की कीमतों को भी समर्थन दिया है। हालांकि, चांदी ने इस माहौल में सोने की तुलना में कहीं अधिक तेज प्रतिक्रिया दी है। क्या सोने से बेहतर विकल्प बन रही है चांदी? हाल के महीनों में सोने और चांदी—दोनों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंची हैं। लेकिन मौजूदा रुझानों को देखें तो चांदी ने रिटर्न के मामले में सोने को पीछे छोड़ दिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जहां सोना पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माना जाता है, वहीं चांदी में निवेश को अब दोहरा फायदा मिल रहा है—कीमती धातु के रूप में निवेश और औद्योगिक धातु के रूप में बढ़ती मांग। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव सोने की तुलना में अधिक होता है। ऐसे में निवेशकों को सतर्कता के साथ कदम उठाने की सलाह दी जाती है। आगे क्या रह सकता है रुझान? कमोडिटी बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं और औद्योगिक मांग में मजबूती जारी रही, तो चांदी की कीमतों में आगे भी उतार-चढ़ाव के साथ ऊंचे स्तर देखने को मिल सकते हैं। हालांकि, किसी भी निवेश से पहले बाजार जोखिमों को समझना जरूरी है। ब्याज दरों में बदलाव, वैश्विक भू-आर्थिक घटनाक्रम और डॉलर की चाल जैसे कारक चांदी की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। निवेशकों के लिए क्या है संकेत? चांदी के ₹3 लाख प्रति किलो के पार पहुंचने को बाजार में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि निवेशक केवल पारंपरिक सुरक्षित विकल्पों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे एसेट्स की ओर भी रुख कर रहे हैं जिनमें औद्योगिक ग्रोथ की संभावनाएं जुड़ी हों। विशेषज्ञों का मानना है कि पोर्टफोलियो में संतुलन बनाए रखने के लिए चांदी एक विकल्प हो सकती है, लेकिन इसमें निवेश हमेशा दीर्घकालिक रणनीति और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।   चांदी की यह ऐतिहासिक तेजी न केवल कमोडिटी बाजार के लिए अहम है, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक रुझानों और निवेशकों की बदलती प्राथमिकताओं को भी दर्शाती है। आने वाले दिनों में बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या चांदी इस ऊंचे स्तर पर टिक पाती है या इसमें मुनाफावसूली देखने को मिलती है।