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    30 सितंबर तक गौशालाओं के शत-प्रतिशत गौवंश की होगी डिजिटल टैगिंग, अधिकारी निर्देशों की पालन करें

    -गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने समीक्षा बैठक में दिए निर्देश जयपुर। गोपालन, पशुपालन, डेयरी एवं देवस्थान विभाग के कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत की अध्यक्षता में मंगलवार को शासन सचिवालय में गोपालन विभाग की एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक हुई। इस बैठक में राज्य की गौशालाओं की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने, गौवंश के संरक्षण और विभागीय योजनाओं की प्रगति को लेकर कई बड़े और कड़े फैसले लिए गए। बैठक में मंत्री कुमावत ने राज्य की सभी गौशालाओं में रह रहे गौवंश की आगामी 30 सितंबर 2026 तक अनिवार्य रूप से शत-प्रतिशत टैगिंग पूरी करने के निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि गौशालाओं के गौवंश की पहचान को आसान और सटीक बनाने के लिए उन पर एक विशेष रंग की टैगिंग की जाएगी। कुमावत ने बताया कि गौवंश के शरीर पर विशेष चिप लगाई जाएगी। इसके लिए एक नया सॉफ्टवेयर डेवलप कर सभी गौवंश का पूरा डेटा उसमें ऑनलाइन अपलोड किया जाएगा, जिससे उनकी निगरानी डिजिटल रूप से हो सकेगी। लंबित योजनाओं को शीघ्र पूरा करने के आदेश इस दौरान मंत्री कुमावत ने गोशाला विकास योजना, पंचायत स्तरीय पशु आश्रय स्थल और पंचायत समिति स्तरीय नंदीशाला जन सहभागिता योजना के कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने इन सभी योजनाओं के तहत जितने भी कार्य अभी तक लंबित या अधूरे हैं, उन्हें शीघ्र अतिशीघ्र पूरा करने के सख्त आदेश अधिकारियों को दिए। अनुदान प्रक्रिया में तेजी और नियमों का सरलीकरण गोपालन मंत्री कुमावत ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे गौशालाओं को मिलने वाले सरकारी अनुदान की प्रक्रिया में तेजी लाएं, ताकि पात्र गौशालाओं को समय पर अनुदान राशि जारी की जा सके और उन्हें आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े। उन्होंने पात्र गौशालाओं को भूमि आवंटन में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए भूमि आवंटन संबंधी अधिनियम के नियमों को सरल बनाने के निर्देश दिए, ताकि नियमानुसार भूमि मिलने का रास्ता साफ हो सके। इस समीक्षा बैठक में गोपालन विभाग के शासन सचिव विकास सीताराम भाले, निदेशक कसमी कौर रान सहित विभाग उच्च अधिकारी उपस्थित रहे।  

    30 सितंबर तक गौशालाओं के शत-प्रतिशत गौवंश की होगी डिजिटल टैगिंग

    -गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने समीक्षा बैठक में दिए निर्देश जयपुर। गोपालन, पशुपालन, डेयरी एवं देवस्थान विभाग के कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत की अध्यक्षता में मंगलवार को शासन सचिवालय में गोपालन विभाग की एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक हुई। इस बैठक में राज्य की गौशालाओं की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने, गौवंश के संरक्षण और विभागीय योजनाओं की प्रगति को लेकर कई बड़े और कड़े फैसले लिए गए। बैठक में मंत्री कुमावत ने राज्य की सभी गौशालाओं में रह रहे गौवंश की आगामी 30 सितंबर 2026 तक अनिवार्य रूप से शत-प्रतिशत टैगिंग पूरी करने के निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि गौशालाओं के गौवंश की पहचान को आसान और सटीक बनाने के लिए उन पर एक विशेष रंग की टैगिंग की जाएगी। कुमावत ने बताया कि गौवंश के शरीर पर विशेष चिप लगाई जाएगी। इसके लिए एक नया सॉफ्टवेयर डेवलप कर सभी गौवंश का पूरा डेटा उसमें ऑनलाइन अपलोड किया जाएगा, जिससे उनकी निगरानी डिजिटल रूप से हो सकेगी। लंबित योजनाओं को शीघ्र पूरा करने के आदेश इस दौरान मंत्री कुमावत ने गोशाला विकास योजना, पंचायत स्तरीय पशु आश्रय स्थल और पंचायत समिति स्तरीय नंदीशाला जन सहभागिता योजना के कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने इन सभी योजनाओं के तहत जितने भी कार्य अभी तक लंबित या अधूरे हैं, उन्हें शीघ्र अतिशीघ्र पूरा करने के सख्त आदेश अधिकारियों को दिए। अनुदान प्रक्रिया में तेजी और नियमों का सरलीकरण गोपालन मंत्री कुमावत ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे गौशालाओं को मिलने वाले सरकारी अनुदान की प्रक्रिया में तेजी लाएं, ताकि पात्र गौशालाओं को समय पर अनुदान राशि जारी की जा सके और उन्हें आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े। उन्होंने पात्र गौशालाओं को भूमि आवंटन में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए भूमि आवंटन संबंधी अधिनियम के नियमों को सरल बनाने के निर्देश दिए, ताकि नियमानुसार भूमि मिलने का रास्ता साफ हो सके। इस समीक्षा बैठक में गोपालन विभाग के शासन सचिव विकास सीताराम भाले, निदेशक कसमी कौर रान सहित विभाग उच्च अधिकारी उपस्थित रहे।  

    विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश, छात्राओं को वितरित किए गए पौधे

    जयपुर। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राजकीय कन्या महाविद्यालय, गंगापोल, जयपुर में "कलाम नवाचार एवं सतत विकास कार्यशाला-2026" के तृतीय दिवस पर विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस के अवसर पर काॅलेज के नेचर क्लब द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं जैव विविधता संवर्धन विषयक कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन डब्ल्यू डब्ल्यू एफ - इंडिया, उदयपुर डिवीजन (राजस्थान) के संयुक्त सहयोग से संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. हेमंत पारीक ने की। मुख्य अतिथि प्रो. टी. आई. खान ने पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग एवं युवाओं की भूमिका पर प्रेरक व्याख्यान दिया। इसके उपरांत डॉ. धर्मेन्द्र खंडाल, प्रसिद्ध वन्यजीव एवं बाघ संरक्षण विशेषज्ञ, रणथम्भौर ने "टाइगर कंजर्वेशन" विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए जैव विविधता संरक्षण में बाघों की महत्ता एवं उनके संरक्षण के प्रयासों पर विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान महाविद्यालय परिसर में अतिथियों द्वारा वृक्षारोपण किया गया। साथ ही दैनिक भास्कर के सहयोग से छात्राओं को पौधों का वितरण किया गया, जिन्हें वे अपने घरों एवं आसपास के क्षेत्रों में रोपित कर उनकी देखभाल का संकल्प लेकर गईं। कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती अनीता कटारा (संयोजक) के निर्देशन में हुआ। आयोजन में प्रो. निधि माथुर, डॉ. राजकुमार बैरवा, डॉ. दिलीप पंवार, डॉ. बचन सिंह एवं डॉ. सरिता शर्मा सहित महाविद्यालय के समस्त संकाय सदस्यों का सक्रिय सहयोग रहा। कार्यक्रम के अंत में प्राचार्य प्रो. हेमंत पारीक ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सतत जिम्मेदारी है। उन्होंने सभी छात्राओं से कम से कम एक पौधा लगाकर उसके संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान किया। कार्यक्रम उत्साहपूर्ण वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।  

    6ठे दिन भी नहीं टूटी आरयू के छात्र नेता शुभम रेवाड़ की तपस्या: जब तक लिखित आदेश नहीं, तब तक अन्न का दाना नहीं, मांगे पूरी होने तक जारी रहेगा विरोध

    जयपुर | राजस्थान विश्वविद्यालय का अनशन स्थल अब केवल विरोध प्रदर्शन का केंद्र नहीं, बल्कि छात्र चेतना की कर्मभूमि बन चुका है। अपनी मातृभाषा राजस्थानी और प्रदेश के लाखों युवाओं के अधिकारों के लिए अनशन पर बैठे छात्र नेता शुभम रेवाड़ की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आज 6ठे दिन में प्रवेश कर गई है। लगातार 6 दिनों से अन्न त्याग के कारण शरीर पर असर साफ़ दिख रहा है, लेकिन शुभम रेवाड़ के तेवर और इरादे पहले से भी अधिक कड़े नज़र आ रहे हैं। 6ठे दिन सुबह से ही राजस्थान के अलग-अलग जिलों से युवाओं के जत्थे सत्याग्रह स्थल पहुँचे और एकजुटता जताई। मीडिया से बातचीत करते हुए शुभम रेवाड़ ने साफ़ शब्दों में कहा: "प्रशासन और सरकार शायद हमारे सब्र की परीक्षा ले रही है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि यह लड़ाई किसी निजी स्वार्थ की नहीं, बल्कि राजस्थानी भाषा के आत्मसम्मान और छात्र लोकतंत्र को बचाने की है। मौखिक आश्वासनों का दौर अब बीत चुका है; जब तक दोनों माँगों पर नोटिफ़िकेशन (लिखित आदेश) जारी नहीं होता, अनशन स्थल से उठने का सवाल ही पैदा नहीं होता।" शेष 2 मुख्य मांगें: राजस्थानी भाषा विभाग की स्थापना: राजस्थान विश्वविद्यालय में पृथक 'राजस्थानी भाषा विभाग' का गठन हो। छात्रसंघ चुनाव की बहाली : प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव तुरंत कराए जाएँ।  

    6ठे दिन भी नहीं टूटी आरयू के छात्र नेता शुभम रेवाड़ की तपस्या: जब तक लिखित आदेश नहीं, तब तक अन्न का दाना नहीं

    जयपुर | राजस्थान विश्वविद्यालय का अनशन स्थल अब केवल विरोध प्रदर्शन का केंद्र नहीं, बल्कि छात्र चेतना की कर्मभूमि बन चुका है। अपनी मातृभाषा राजस्थानी और प्रदेश के लाखों युवाओं के अधिकारों के लिए अनशन पर बैठे छात्र नेता शुभम रेवाड़ की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आज 6ठे दिन में प्रवेश कर गई है। लगातार 6 दिनों से अन्न त्याग के कारण शरीर पर असर साफ़ दिख रहा है, लेकिन शुभम रेवाड़ के तेवर और इरादे पहले से भी अधिक कड़े नज़र आ रहे हैं। 6ठे दिन सुबह से ही राजस्थान के अलग-अलग जिलों से युवाओं के जत्थे सत्याग्रह स्थल पहुँचे और एकजुटता जताई। मीडिया से बातचीत करते हुए शुभम रेवाड़ ने साफ़ शब्दों में कहा: "प्रशासन और सरकार शायद हमारे सब्र की परीक्षा ले रही है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि यह लड़ाई किसी निजी स्वार्थ की नहीं, बल्कि राजस्थानी भाषा के आत्मसम्मान और छात्र लोकतंत्र को बचाने की है। मौखिक आश्वासनों का दौर अब बीत चुका है; जब तक दोनों माँगों पर नोटिफ़िकेशन (लिखित आदेश) जारी नहीं होता, अनशन स्थल से उठने का सवाल ही पैदा नहीं होता।" शेष 2 मुख्य मांगें: राजस्थानी भाषा विभाग की स्थापना: राजस्थान विश्वविद्यालय में पृथक 'राजस्थानी भाषा विभाग' का गठन हो। छात्रसंघ चुनाव की बहाली : प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव तुरंत कराए जाएँ।  

    भूकंप से जापान दहला: कुमामोटो के शॉपिंग मॉल में बड़ी तबाही, कई लोगों की मौत की आशंका; राहत-बचाव अभियान जारी

      युगचरण न्यूज़ / 28 जुलाई 2026 जापान के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में मंगलवार को आए शक्तिशाली भूकंप ने भारी तबाही मचाई है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, रिक्टर पैमाने पर 7.1 तीव्रता वाले इस भूकंप का सबसे अधिक असर कुमामोटो प्रांत में देखने को मिला। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, काशिमा नगर स्थित एक बड़े शॉपिंग मॉल को गंभीर क्षति पहुंची है, जहां कई लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। कुछ मीडिया संस्थानों ने बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की संभावना भी व्यक्त की है, हालांकि पुलिस ने अभी तक आधिकारिक तौर पर किसी मौत की पुष्टि नहीं की है। भूकंप के बाद जापान सरकार ने तत्काल आपातकालीन प्रतिक्रिया शुरू करते हुए प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव दलों को भेज दिया है। प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने का प्रयास जारी है। कुमामोटो में सबसे अधिक असर भूकंप का केंद्र जापान के कुमामोटो प्रांत के आसपास बताया जा रहा है। तेज झटकों के कारण कई इमारतें हिल गईं और लोगों में अफरा-तफरी मच गई। काशिमा नगर स्थित एक प्रमुख शॉपिंग मॉल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा, जिसकी कई संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं। स्थानीय प्रसारक टीबीएस की रिपोर्ट के अनुसार, इस मॉल में "काफी संख्या में लोगों की मौत" होने की आशंका जताई गई है। हालांकि स्थानीय पुलिस का कहना है कि राहत अभियान पूरा होने तक किसी भी प्रकार की आधिकारिक पुष्टि करना जल्दबाजी होगी। पुलिस ने क्या कहा? अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार, पुलिस अधिकारियों ने कहा कि फिलहाल वे शॉपिंग मॉल में किसी व्यक्ति की मृत्यु की पुष्टि नहीं कर सकते। उनका कहना है कि बचाव कार्य तेजी से चल रहा है और पूरी स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही आधिकारिक आंकड़े जारी किए जाएंगे। प्रशासन ने नागरिकों से अपुष्ट सूचनाओं पर विश्वास न करने और केवल सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है। कई प्रांतों में जारी हुआ आपातकालीन अलर्ट भूकंप के तुरंत बाद जापानी सरकार ने कई प्रांतों के लिए आपातकालीन भूकंप चेतावनी जारी कर दी। प्रभावित क्षेत्रों में कुमामोटो, नागासाकी, कागोशिमा, फुकुओका, सागा, ओइता और मियाजाकी शामिल हैं। इन क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने, समुद्री तटों से दूर रहने और आफ्टरशॉक की संभावना को देखते हुए सतर्क रहने की सलाह दी गई है। राहत और बचाव अभियान तेज राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसियां, दमकल विभाग, पुलिस और सेना की टीमें संयुक्त रूप से राहत अभियान चला रही हैं। भारी मशीनों और विशेष खोजी उपकरणों की मदद से मलबा हटाने का कार्य जारी है। बचावकर्मी यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि यदि कोई व्यक्ति मलबे में फंसा है तो उसे जल्द से जल्द सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। अस्पतालों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि घायलों का तत्काल उपचार किया जा सके। आफ्टरशॉक की आशंका भूकंप विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मुख्य झटके के बाद आने वाले घंटों और दिनों में आफ्टरशॉक महसूस किए जा सकते हैं। इसी कारण प्रशासन ने लोगों से क्षतिग्रस्त इमारतों में प्रवेश न करने और आधिकारिक निर्देशों का पालन करने की अपील की है। जापान दुनिया के सबसे अधिक भूकंप प्रभावित देशों में से एक है और यहां भूकंपरोधी निर्माण व्यवस्था काफी विकसित मानी जाती है। इसके बावजूद इतनी अधिक तीव्रता वाले भूकंप से व्यापक नुकसान की संभावना बनी रहती है। परिवहन और जनजीवन प्रभावित भूकंप के बाद कई स्थानों पर यातायात सेवाएं प्रभावित हुई हैं। सुरक्षा कारणों से कुछ रेल सेवाओं को अस्थायी रूप से रोका गया है, जबकि कई सड़कों का निरीक्षण किया जा रहा है। बिजली और संचार सेवाओं पर भी कुछ इलाकों में असर पड़ने की खबरें हैं। प्रशासन प्रभावित क्षेत्रों में आवश्यक सेवाओं को जल्द से जल्द बहाल करने का प्रयास कर रहा है। सरकार लगातार कर रही निगरानी जापान सरकार ने स्थिति की समीक्षा के लिए आपातकालीन बैठकें शुरू कर दी हैं। संबंधित मंत्रालयों और स्थानीय प्रशासन को राहत कार्य में पूरी क्षमता के साथ जुटने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार ने कहा है कि जैसे-जैसे बचाव अभियान आगे बढ़ेगा, हताहतों और नुकसान से जुड़ी आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार फिलहाल उपलब्ध जानकारी विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और प्रारंभिक प्रशासनिक सूचनाओं पर आधारित है। शॉपिंग मॉल में बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने संबंधी दावों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस और प्रशासन ने कहा है कि राहत एवं बचाव अभियान पूरा होने के बाद ही अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ घंटों में घटनास्थल से अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आने की संभावना है। वहीं प्रशासन ने नागरिकों से सतर्क रहने और केवल आधिकारिक स्रोतों से जारी सूचनाओं पर ही भरोसा करने की अपील की है।      

    CJP प्रदर्शन मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी बदलने से किया इनकार, कहा- बिना सुनवाई किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते

    Yugcharan News / 28 July 2026 नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने CJP (Cockroach Janta Party) के जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान एक महिला को थप्पड़ मारने के आरोपों को लेकर विवादों में आए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Additional DCP) संदीप लांबा की निगरानी में चल रही पुलिस जांच को किसी अन्य अधिकारी को सौंपने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर बिना निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया पूरी हुए उसे दोषी नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि संबंधित अधिकारी ने वास्तव में कोई गलत कार्य किया है तो कानून के अनुसार उसके खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन केवल आरोपों या वायरल वीडियो के आधार पर यह मान लेना कि वह निष्पक्ष जांच नहीं कर सकता, न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। अदालत ने कहा- संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर न करें सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसे कानून के तहत परिणाम भुगतने होंगे, लेकिन इससे पहले उसके खिलाफ पूर्वाग्रह नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी अधिकारी से उसकी पूरी जिम्मेदारी केवल इसलिए नहीं छीनी जा सकती क्योंकि उसके खिलाफ कुछ आरोप लगाए गए हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि निष्पक्षता का सिद्धांत सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता है। याचिकाकर्ता ने जताई थी पक्षपात की आशंका याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि हाल ही में सामने आए वीडियो, जिनमें संदीप लांबा पर एक महिला को थप्पड़ मारने का आरोप लगाया गया है, उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। याचिका में कहा गया कि ऐसी परिस्थितियों में अदालत के निर्देश पर चल रही जांच किसी अन्य पुलिस अधिकारी की निगरानी में कराई जानी चाहिए ताकि जांच प्रक्रिया पर कोई संदेह न रहे। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वह निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। हाईकोर्ट ने दलील से नहीं जताई सहमति अदालत ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई। न्यायमूर्ति कठपालिया ने कहा कि यदि केवल आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी को जांच से हटा दिया जाए तो यह उसके खिलाफ बिना सुनवाई के दोष तय करने जैसा होगा। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई अधिकारी किसी अन्य मामले में आरोपों का सामना कर रहा है, तो इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि वह हर मामले में निष्पक्ष तरीके से कार्य नहीं करेगा। न्यायालय ने कहा कि ऐसा मान लेना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा। "क्या पूरी दिल्ली पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दें?" सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ लगे आरोपों से निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तब अदालत ने टिप्पणी की कि क्या इसका अर्थ यह है कि पूरी दिल्ली पुलिस को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए और वह कोई भी जांच या एफआईआर दर्ज न करे? अदालत ने कहा कि किसी एक अधिकारी पर लगे आरोपों के आधार पर पूरे संस्थागत ढांचे पर सवाल उठाना उचित नहीं माना जा सकता। सरकार ने अदालत को दी जांच पूरी होने की जानकारी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि संबंधित पुलिस जांच पहले ही पूरी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का बयान दर्ज कर लिया गया है और जांच रिपोर्ट सक्षम प्राधिकारी को आगे की कार्रवाई के लिए भेज दी गई है। इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लेते हुए अदालत ने कहा कि चूंकि जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए याचिका अब व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी (Infructuous) हो गई है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी। आदेश के बाद भी याचिका पर हुआ आग्रह अदालत द्वारा आदेश सुनाए जाने के बाद भी याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने आग्रह किया कि हालिया घटनाओं के कारण पक्षपात की आशंका बनी हुई है और मामले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और दोहराया कि केवल किसी वायरल वीडियो या आरोप के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि भविष्य में कानूनी प्रक्रिया के बाद कोई दोष सिद्ध होता है तो उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी। किस मामले से जुड़ी है यह याचिका? यह मामला वर्ष 2025 की एक घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उन्हें मार्च 2025 में जाफराबाद पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। इस शिकायत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस जांच के आदेश दिए थे। बाद में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जांच उनके बयान दर्ज किए बिना ही पूरी की जा रही थी। इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि जांच पूरी करने से पहले उनका बयान दर्ज किया जाए। इसी दौरान उन्होंने नई याचिका दायर कर जांच की निगरानी संदीप लांबा से हटाने की मांग की। CJP प्रदर्शन के बाद कई कानूनी विवाद हाल के दिनों में CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के बाद पुलिस कार्रवाई, हिरासत, बल प्रयोग, एफआईआर और जांच प्रक्रियाओं को लेकर विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। इन मामलों में पुलिस की भूमिका और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से जुड़े कई प्रश्न न्यायालयों के समक्ष विचाराधीन हैं। इसी क्रम में यह मामला भी सामने आया, जिसमें अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ आरोपों की जांच कानून के अनुसार होगी, लेकिन बिना निष्पक्ष सुनवाई के किसी व्यक्ति को दोषी मानना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। निष्कर्ष   दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया के उस मूल सिद्धांत को दोहराया है कि प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। अदालत ने कहा कि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप लगना और उसका दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। जब तक विधिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक केवल आरोपों के आधार पर उसकी जिम्मेदारियां हटाना उचित नहीं होगा। वहीं, सरकार की ओर से जांच पूरी होने की जानकारी दिए जाने के बाद अदालत ने याचिका को निरर्थक मानते हुए खारिज कर दिया।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने CJP प्रदर्शन मामले में पुलिस जांच बदलने से किया इनकार, कहा— “बिना सुनवाई किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहरा सकते

    Yugcharan News / 28 July 2026 नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर पर हुए CJP (Cockroach Janta Party) प्रदर्शन के दौरान महिला को थप्पड़ मारने के आरोपों को लेकर विवादों में आए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Additional DCP) संदीप लांबा की निगरानी में चल रही पुलिस जांच को दूसरे अधिकारी को सौंपने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों या वायरल वीडियो के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी नहीं माना जा सकता और बिना निष्पक्ष सुनवाई के उसके अधिकार या जिम्मेदारियां नहीं छीनी जा सकतीं। यह मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें अदालत से अनुरोध किया गया था कि अदालत के निर्देश पर चल रही पुलिस जांच को संदीप लांबा की निगरानी से हटाकर किसी अन्य जिले के पुलिस उपायुक्त को सौंपा जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि हाल ही में CJP के प्रदर्शन के दौरान सामने आए वीडियो और उन पर लगे आरोपों के कारण जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। अदालत ने निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत पर दिया जोर मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी अधिकारी ने वास्तव में कानून का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी, लेकिन बिना किसी निष्पक्ष जांच और सुनवाई के उसे दोषी मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि किसी भी व्यक्ति को आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि विधिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दोषी माना जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी अधिकारी के विरुद्ध आरोप लगना और उसके दोष सिद्ध होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। “संस्था की विश्वसनीयता को कमजोर न करें” सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया और संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है। अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध आरोप हैं तो उन्हें कानून के अनुसार देखा जाएगा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी निगरानी में चल रहे सभी कार्य उससे तुरंत वापस ले लिए जाएं। अदालत ने संकेत दिया कि केवल सार्वजनिक धारणा या सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री के आधार पर किसी अधिकारी की निष्पक्षता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। याचिकाकर्ता ने जताई थी पक्षपात की आशंका याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि हाल के घटनाक्रमों के बाद उन्हें यह आशंका है कि जांच निष्पक्ष नहीं होगी। उनका तर्क था कि यदि वही अधिकारी जांच की निगरानी करेंगे जिन पर स्वयं विवाद चल रहा है तो जांच की पारदर्शिता पर प्रश्न उठ सकते हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि अदालत के निर्देश पर चल रही जांच में निष्पक्षता दिखाई देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी वास्तविक निष्पक्षता। अदालत ने कहा— पूरी दिल्ली पुलिस को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि केवल आरोपों के आधार पर पूरी प्रक्रिया बदल दी जाए तो इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी एक अधिकारी पर आरोप हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए जाएं। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि इस प्रकार हर मामले में केवल आरोपों के आधार पर जांच अधिकारी बदले जाने लगें तो इससे न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। केंद्र की ओर से अदालत को दी गई जानकारी सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि संबंधित जांच पहले ही पूरी की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का बयान दर्ज किया जा चुका है और जांच रिपोर्ट सक्षम प्राधिकारी को आगे की कार्रवाई के लिए भेज दी गई है। इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लेते हुए अदालत ने कहा कि चूंकि जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए याचिका अब निरर्थक (Infructuous) हो गई है और इसे खारिज किया जाता है। आदेश के बाद भी याचिका पर जोर अदालत द्वारा आदेश सुनाए जाने के बाद भी याचिकाकर्ता के वकील ने मामले पर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि हाल के घटनाक्रमों से पक्षपात की आशंका और मजबूत हुई है। हालांकि न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल किसी वीडियो के वायरल होने या आरोप सामने आने से यह मान लेना उचित नहीं होगा कि संबंधित अधिकारी हर मामले में निष्पक्षता से काम नहीं करेंगे। अदालत ने निष्पक्ष प्रक्रिया को बताया सर्वोपरि न्यायमूर्ति कठपालिया ने कहा कि यदि अदालत केवल आरोपों के आधार पर जांच किसी अन्य अधिकारी को सौंप देती है तो इसका अर्थ होगा कि बिना मुकदमे और बिना दोष सिद्ध हुए संबंधित अधिकारी को दोषी मान लिया गया है। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है और यह अधिकार सरकारी अधिकारी पर भी समान रूप से लागू होता है। मामला किस पृष्ठभूमि से जुड़ा है? यह याचिका वर्ष 2025 की एक घटना से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उन्हें जाफराबाद पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। इस शिकायत पर पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस जांच के आदेश दिए थे। बाद में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जांच उनके बयान दर्ज किए बिना ही पूरी की जा रही है। इस पर अदालत ने निर्देश दिया था कि जांच पूरी करने से पहले उनका बयान दर्ज किया जाए। इसके बाद उन्होंने अलग याचिका दाखिल कर जांच की निगरानी बदलने की मांग की। CJP प्रदर्शन को लेकर लगातार बनी हुई है कानूनी हलचल हाल के दिनों में CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों और उनसे जुड़े घटनाक्रमों को लेकर विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, बल प्रयोग, हिरासत, एफआईआर तथा जांच प्रक्रियाओं को लेकर अलग-अलग मामलों में न्यायिक समीक्षा जारी है। इसी क्रम में यह मामला भी सामने आया, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच कानून के अनुसार होगी, लेकिन केवल आरोपों के आधार पर प्रशासनिक निर्णय नहीं बदले जा सकते। निष्कर्ष   दिल्ली हाईकोर्ट के इस निर्णय ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्ष सुनवाई और विधिक प्रक्रिया का पालन सर्वोच्च सिद्धांत है। अदालत ने माना कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध आरोप हैं तो उनकी जांच कानून के अनुसार होगी, लेकिन बिना दोष सिद्ध हुए किसी अधिकारी को पक्षपाती मानकर उसकी जिम्मेदारियां हटाना उचित नहीं होगा। वहीं, इस मामले में जांच पूरी होने की सरकारी जानकारी को देखते हुए अदालत ने याचिका को निरर्थक मानते हुए खारिज कर दिया।

    दिल्ली प्रदर्शन: सीसीटीवी और फेस रिकग्निशन के जरिए प्रदर्शनकारियों की पहचान में जुटी पुलिस, आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की मौजूदगी का दावा

      युगचरण न्यूज़ | 28 जुलाई 2026 नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हाल ही में हुए सीजेपी (Cockroach Janta Party) के प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने जांच तेज कर दी है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज और फेस रिकग्निशन तकनीक की मदद से प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान कर रही है। पुलिस सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि अब तक हजारों लोगों की पहचान की गई है, जिनमें कई ऐसे लोग भी शामिल हैं जिनके खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच अभी जारी है। सीसीटीवी फुटेज की हो रही जांच पुलिस सूत्रों के अनुसार, 20 और 22 जुलाई को जंतर-मंतर, संसद मार्ग और आसपास के इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की सैकड़ों घंटों की फुटेज खंगाली जा रही है। जांच एजेंसियां कथित तौर पर उन लोगों की पहचान कर रही हैं, जिन पर प्रदर्शन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़, पुलिसकर्मियों पर हमला और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं। बताया जा रहा है कि जांच के दौरान फेस रिकग्निशन सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। पुलिस का दावा सूत्रों के अनुसार, फेस रिकग्निशन तकनीक के माध्यम से अब तक 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जिनका नाम पहले से पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद बताया गया है। इन्हीं में से 989 लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, दुष्कर्म, अपहरण, आर्म्स एक्ट तथा पॉक्सो (POCSO) जैसे गंभीर मामलों में केस दर्ज होने का दावा किया गया है। पुलिस सूत्रों द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार— 101 लोगों पर हत्या के मामले दर्ज बताए गए हैं। 62 लोगों पर हत्या के प्रयास के आरोप हैं। 284 लोगों पर लूट के मामले दर्ज हैं। 61 लोगों पर दुष्कर्म के मामले दर्ज होने का दावा किया गया है। 229 लोगों पर आर्म्स एक्ट के तहत मामले दर्ज बताए गए हैं। 19 लोगों पर अपहरण के मामले हैं। 25 लोगों पर यौन उत्पीड़न तथा 6 लोगों पर पॉक्सो कानून के तहत मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई है। सूत्रों का यह भी दावा है कि कई लोगों के खिलाफ एक से अधिक आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं। किन घटनाओं की जांच हो रही है? जांच एजेंसियों के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज में कथित तौर पर कई घटनाएं रिकॉर्ड हुई हैं, जिनमें— बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ती भीड़, पुलिस पर पथराव, पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश, सरकारी और निजी संपत्ति में तोड़फोड़, कुछ स्थानों पर आगजनी, पुलिसकर्मियों पर कथित हमला, सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने की घटनाएं शामिल हैं। पुलिस का दावा है कि कुछ वीडियो में प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित रूप से पुलिस कर्मियों पर मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाते हुए भी देखा गया है। करीब 200 पुलिसकर्मी घायल होने का दावा दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान लगभग 200 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। पुलिस का कहना है कि कई वीडियो में घायल पुलिसकर्मियों को घटनास्थल से हटाते हुए देखा गया है। हालांकि इन दावों की पुष्टि न्यायिक या स्वतंत्र जांच के माध्यम से अभी नहीं हुई है। आपत्तिजनक टिप्पणियों की भी जांच पुलिस सूत्रों के मुताबिक, कुछ वीडियो में कथित रूप से सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों, संसद तथा पुलिस के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां भी रिकॉर्ड हुई हैं। जांच एजेंसियां इन वीडियो का विश्लेषण कर रही हैं और आवश्यक कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है। सीजेपी ने समाप्त किया था आंदोलन केंद्र सरकार और सीजेपी के बीच हुई बातचीत के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पश्चात संगठन ने अपना आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी थी। इसके बाद देशभर में दर्ज विभिन्न एफआईआर को लेकर भी बहस शुरू हुई। सीजेपी का दावा है कि सरकार ने आंदोलन से जुड़े मामलों में कार्रवाई की समीक्षा करने और कुछ मामलों में एफआईआर वापस लेने का आश्वासन दिया है। हालांकि इस संबंध में संबंधित सरकारी एजेंसियों की ओर से विस्तृत आधिकारिक जानकारी का इंतजार है। जांच जारी फिलहाल दिल्ली पुलिस पूरे मामले की जांच जारी रखे हुए है। सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल साक्ष्यों और अन्य उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही किसी भी व्यक्ति की भूमिका और जिम्मेदारी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष सामने आएगा। उधर, विभिन्न पक्ष इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, ताकि प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।      

    नीट पेपर लीक विवाद के बाद सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की तैयारी, संसद में संशोधन विधेयक पेश

        नीट पेपर लीक विवाद के बाद सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की तैयारी, संसद में संशोधन विधेयक पेश युगचरण न्यूज़ | 28 जुलाई 2026 नई दिल्ली: राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) पेपर लीक विवाद और उसके बाद देशभर में हुए छात्र आंदोलनों के बीच केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद में सार्वजनिक परीक्षाओं से संबंधित कानून में संशोधन का विधेयक पेश किया है। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है, ताकि भविष्य में पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है जब हाल के महीनों में प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता को लेकर व्यापक बहस हुई और लाखों छात्रों ने परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग उठाई। सुधारों की जरूरत क्यों पड़ी? नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के बाद सरकार को परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। इसके कारण लगभग 20 लाख अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। परीक्षा रद्द होने के बाद देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से दिल्ली में, छात्रों और युवाओं ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। इस पूरे घटनाक्रम के बाद परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठे। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने व्यापक सुधारों की प्रक्रिया शुरू की। संसद में क्या संशोधन प्रस्तावित किए गए? सरकार ने वर्ष 2024 में बनाए गए सार्वजनिक परीक्षा कानून (Public Examinations Act) में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इस कानून का उद्देश्य पहले से ही परीक्षा में गड़बड़ी, पेपर लीक और अनुचित साधनों के उपयोग पर रोक लगाना था, लेकिन अब इसे और अधिक सख्त बनाने की तैयारी की गई है। प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार— परीक्षा में धांधली करने वालों के लिए न्यूनतम सजा तीन वर्ष से बढ़ाकर पाँच वर्ष करने का प्रस्ताव है। अधिकतम आर्थिक दंड एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पाँच करोड़ रुपये तक किया जा सकता है। दोषी पाए जाने वाले संस्थानों या एजेंसियों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध की अवधि चार वर्ष से बढ़ाकर आठ वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों से परीक्षा माफिया और संगठित गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई संभव होगी। तेज जांच और शीघ्र सुनवाई पर जोर प्रस्तावित संशोधनों में केवल सजा बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि मामलों की त्वरित जांच और समयबद्ध सुनवाई पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। सरकार का उद्देश्य है कि परीक्षा से जुड़े अपराधों के मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बजाय जल्द फैसला हो, जिससे दोषियों को शीघ्र दंड मिल सके। नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति सरकार ने परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधारों के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का भी गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार रहे नंदन नीलेकणी कर रहे हैं। सरकार के अनुसार यह समिति आधुनिक तकनीक के अधिकतम उपयोग के माध्यम से परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के सुझाव दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि समिति की सिफारिशों के आधार पर परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम जल्द उठाए जाएंगे। पहले भी बनी थी विशेषज्ञ समिति नीट पेपर लीक की घटनाओं के बाद वर्ष 2024 में भी विशेषज्ञों की एक समिति गठित की गई थी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल 101 सिफारिशें प्रस्तुत की थीं। इन सिफारिशों में कई महत्वपूर्ण सुझाव शामिल थे, जैसे— पारंपरिक पेन-पेपर परीक्षा से धीरे-धीरे कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली की ओर बढ़ना। बड़े स्तर की परीक्षाओं को कई चरणों और अलग-अलग शिफ्टों में आयोजित करना। डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाना। परीक्षा केंद्रों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाना। हालांकि इनमें से कई सुझावों पर अभी भी चरणबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है। परीक्षा प्रणाली में तकनीक की बढ़ेगी भूमिका सरकार का मानना है कि भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल निगरानी, सुरक्षित एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र वितरण प्रणाली और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का अधिक उपयोग करके परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को भी मजबूत करना आवश्यक होगा। छात्रों की उम्मीदें हाल के घटनाक्रमों के बाद देशभर के लाखों छात्र परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने की घटनाओं से छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है और वर्षों की मेहनत पर असर पड़ता है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन और तकनीकी सुधारों का उद्देश्य छात्रों का भरोसा बहाल करना तथा देश की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और पारदर्शी बनाना है। आगे क्या होगा? संसद में पेश किए गए संशोधन विधेयक पर चर्चा और पारित होने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद नए प्रावधान लागू किए जा सकते हैं। इसके साथ ही उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर परीक्षा प्रणाली में अतिरिक्त प्रशासनिक और तकनीकी सुधार भी चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाने की संभावना है। यदि ये प्रस्तावित बदलाव प्रभावी रूप से लागू होते हैं, तो भविष्य में सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ने, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने और छात्रों का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।      

    पीएम मोदी वीडियो विवाद: संसदीय समिति ने Meta, X, Google और Snapchat को किया तलब, गोपनीयता और सार्वजनिक व्यवस्था पर मांगा जवाब

    युगचरण न्यूज़ | 28 जुलाई 2026 नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक फेसबुक अकाउंट से एक वीडियो के कुछ समय के लिए हटाए जाने के विवाद के बाद मामला अब संसद तक पहुंच गया है। संसद की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने Meta, X (पूर्व में Twitter), Google और Snapchat के वरिष्ठ प्रतिनिधियों को 3 अगस्त को तलब किया है। बैठक में डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही, उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने जानकारी दी कि सोशल मीडिया कंपनियों से यह स्पष्ट करने को कहा जाएगा कि वे महिलाओं, बच्चों, किसानों, ग्रामीणों, मजदूरों और आम नागरिकों की डिजिटल गोपनीयता की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित करती हैं। इसके साथ ही यह भी पूछा जाएगा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में इन प्लेटफॉर्मों की क्या भूमिका और जिम्मेदारी है। क्या है पूरा विवाद? विवाद उस समय शुरू हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक फेसबुक पेज पर साझा किया गया एक वीडियो कुछ समय के लिए प्लेटफॉर्म से हट गया। यह वीडियो युवाओं को संबोधित संदेश से जुड़ा बताया गया। बाद में वीडियो दोबारा बहाल कर दिया गया। Meta ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सामग्री "गलती से हट गई थी" और तकनीकी त्रुटि का पता चलते ही उसे पुनः उपलब्ध करा दिया गया। कंपनी ने इस घटना पर खेद भी व्यक्त किया। केंद्र सरकार ने भी मांगा स्पष्टीकरण मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने भी Meta के वैश्विक सार्वजनिक नीति प्रमुख को स्पष्टीकरण के लिए तलब किया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, सरकार इस मामले को केवल तकनीकी गलती मानकर समाप्त नहीं करना चाहती और पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी चाहती है। 3 अगस्त को होगी अहम बैठक संसदीय समिति की बैठक 3 अगस्त को आयोजित होगी। बैठक का एजेंडा "सोशल और डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा उनका विनियमन" रखा गया है। इसमें Meta, Google, X और Snapchat के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा गृह मंत्रालय के अधिकारियों को भी उपस्थित रहने के लिए कहा गया है। किन मुद्दों पर होगी चर्चा? बैठक में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की कार्यप्रणाली, कंटेंट मॉडरेशन, उपयोगकर्ताओं की निजता, गलत सूचना की रोकथाम, डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही तथा कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में उनकी भूमिका जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। समिति यह भी समझना चाहती है कि बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म अपने निर्णयों में पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करते हैं। विपक्ष और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं वीडियो हटने की घटना के बाद राजनीतिक हलकों में भी इस पर चर्चा तेज हो गई। विभिन्न पक्षों ने सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली, कंटेंट मॉडरेशन नीति और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। हालांकि Meta ने दोहराया कि वीडियो हटाना किसी नीति आधारित कार्रवाई का परिणाम नहीं था, बल्कि एक तकनीकी त्रुटि थी जिसे जल्द ही सुधार लिया गया। डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही पर बढ़ी बहस विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक वीडियो हटाए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही, एल्गोरिदमिक निर्णयों, कंटेंट मॉडरेशन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ उनके संबंधों पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। संसदीय समिति की आगामी बैठक में इन सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार होने की संभावना है।   फिलहाल सभी की निगाहें 3 अगस्त को होने वाली बैठक पर टिकी हैं, जहां प्रमुख वैश्विक सोशल मीडिया कंपनियों से संसद की स्थायी समिति सीधे जवाब मांगेगी। इस बैठक के बाद डिजिटल प्लेटफॉर्मों के नियमन और उनकी जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है। 

    जंतर-मंतर प्रदर्शन में RAF ने दिल्ली पुलिस अधिकारी के निर्देश पर चलाई पेललेट गन? दस्तावेज़ में बड़ा दावा

    युगचरण न्यूज़ | 28 जुलाई 2026 नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए सीजेपी (Cockroach Janta Party) के प्रदर्शन के दौरान पेललेट गन के इस्तेमाल को लेकर नया विवाद सामने आया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, घटना के कई दिनों बाद सामने आए एक आधिकारिक दस्तावेज़ में दावा किया गया है कि रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एंटी-रायट गन से पेललेट कारतूस दागे थे। यदि यह दावा सही पाया जाता है, तो राष्ट्रीय राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान इस प्रकार के हथियार के उपयोग का यह पहला दर्ज मामला माना जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रकार की पेललेट गन का इस्तेमाल नहीं किया गया। हालांकि अब सामने आए जनरल डायरी (General Diary) के एक कथित रिकॉर्ड में अलग तस्वीर सामने आती दिखाई दे रही है। दस्तावेज़ में क्या दावा किया गया? रिपोर्ट के अनुसार, संसद मार्ग थाने में दर्ज एक जनरल डायरी प्रविष्टि में उल्लेख किया गया है कि सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी रैंक के अधिकारी के निर्देश पर RAF ने कार्रवाई की। दस्तावेज़ में बताया गया है कि RAF के डिप्टी कमांडेंट ने विभिन्न प्रकार के दंगा-नियंत्रण उपकरणों का इस्तेमाल किया। दावे के अनुसार, कार्रवाई के दौरान 55 नॉन-इलेक्ट्रिकल शेल, 15 इलेक्ट्रिकल शेल, पाँच टियर स्मोक ग्रेनेड तथा एंटी-रायट गन से प्लास्टिक पेललेट वाले दो बैलिस्टिक कारतूस दागे गए। बताया गया है कि यह प्रविष्टि 21 जुलाई की रात लगभग 1:24 बजे दर्ज की गई थी। पहले पुलिस ने किया था इनकार घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने मीडिया से बातचीत में पेललेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया था। पुलिस का कहना था कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए केवल मानक दंगा-नियंत्रण उपाय अपनाए गए थे। लेकिन अब सामने आए कथित दस्तावेज़ ने उस दावे पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटनाक्रम के बाद यह मांग तेज हो सकती है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्रदर्शन के दौरान वास्तव में किन साधनों का उपयोग किया गया था और उनके इस्तेमाल की अनुमति किस स्तर पर दी गई। प्रदर्शन के दौरान कई लोग हुए थे घायल 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनावपूर्ण स्थिति बन गई थी। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कम से कम चार लोगों को पेललेट जैसी चोटें लगी थीं। कुछ घायलों को सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार किया गया। घटना के बाद कुछ परिवारों ने आरोप लगाया था कि घायल प्रदर्शनकारियों को गंभीर चोटें आई हैं। एक 19 वर्षीय युवक के परिजनों ने दावा किया था कि उसकी एक आंख की रोशनी प्रभावित हो सकती है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक जांच और चिकित्सकीय रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में पहली बार ऐसा दावा रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पहली बार पेललेट गन के इस्तेमाल का दावा सामने आया है। इससे पहले इस प्रकार के हथियार का उपयोग मुख्य रूप से संवेदनशील और हिंसक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में किए जाने की चर्चा होती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजधानी में भीड़ नियंत्रण के दौरान ऐसे हथियारों का प्रयोग हुआ है, तो इसके कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं की विस्तृत समीक्षा आवश्यक होगी। विपक्ष और नागरिक संगठनों की प्रतिक्रिया दस्तावेज़ सामने आने के बाद विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी प्रदर्शनकारी के खिलाफ आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिए जाते हैं और सभी कार्रवाई स्थापित नियमों के तहत की जाती है। हालांकि इस विशेष मामले में आधिकारिक स्तर पर विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है। सुप्रीम कोर्ट में भी उठ चुका है मुद्दा सीजेपी प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम पर पहले भी न्यायिक स्तर पर चर्चा हो चुकी है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित बल प्रयोग को लेकर विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के महत्व पर टिप्पणी की थी। हालांकि पेललेट गन के इस्तेमाल से जुड़े नए दावे पर अभी किसी न्यायिक निष्कर्ष की घोषणा नहीं हुई है। जांच के बाद ही होगी स्थिति स्पष्ट फिलहाल सामने आया दस्तावेज़ सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है। हालांकि संबंधित एजेंसियों की ओर से इस पर विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण या अंतिम जांच रिपोर्ट अभी जारी नहीं की गई है। ऐसे में यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि दस्तावेज़ में दर्ज जानकारी की पुष्टि किस स्तर तक होती है और क्या वास्तव में प्रदर्शन के दौरान पेललेट कारतूस का इस्तेमाल किया गया था।   मामले की आगे की जांच और संबंधित अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बाद ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने आ सकेगी।