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    दिल्ली में बिना हीटवेव के भी क्यों पड़ रही है इतनी ज्यादा गर्मी? जानिए वजह

      युगचरण न्यूज़ | 15 जुलाई 2026 दिल्ली में इन दिनों तापमान सामान्य सीमा में रहने के बावजूद लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार अधिकतम तापमान लगभग 32 से 37 डिग्री सेल्सियस के बीच है, लेकिन लोगों को महसूस होने वाला तापमान (फील्स लाइक टेम्परेचर) करीब 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी मुख्य वजह हवा में अत्यधिक नमी (Humidity) है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के अस्थायी रूप से कमजोर पड़ने के दौरान वातावरण में नमी काफी बढ़ गई है। हाल के दिनों में दिल्ली में सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) लगभग 58 से 61 प्रतिशत तक दर्ज की गई, जिससे मौसम काफी उमस भरा हो गया। मानव शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है। सामान्य परिस्थितियों में पसीना जल्दी सूख जाता है, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है। लेकिन जब हवा में नमी अधिक होती है तो पसीना आसानी से नहीं सूख पाता। इसका परिणाम यह होता है कि शरीर को अधिक गर्मी महसूस होती है और व्यक्ति को वास्तविक तापमान से कहीं ज्यादा गर्म वातावरण का अनुभव होता है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय हीटवेव जैसी आधिकारिक स्थिति नहीं है, लेकिन अधिक नमी के कारण उमस लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। ऐसे मौसम में थोड़ी देर बाहर रहने पर भी थकान, अत्यधिक पसीना, बेचैनी और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि वे पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें, धूप में लंबे समय तक रहने से बचें, हल्के रंग के सूती कपड़े पहनें और अत्यधिक शारीरिक गतिविधियों से परहेज करें। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। मौसम विभाग के अनुसार मानसून की गतिविधियां सामान्य होने के बाद नमी और तापमान के बीच संतुलन बनने की संभावना है, जिससे लोगों को उमस से कुछ राहत मिल सकती है। तब तक राजधानी में गर्मी का एहसास वास्तविक तापमान से कहीं अधिक बना रह सकता है।    

    ह्यूमन एज इन एआई एरा-इनोवेशन, साॅफ्ट स्किल्स एंड सोशल इंटरप्रेन्योरशिप’ विषय पर एक व्याख्यान सत्र का आयोजन

    कानोड़िया पीजी महिला महाविद्यालय, जयपुर के इंस्टीट्यूशंस इनोवेशन काउंसिल एवं राष्ट्रीय सेवा योजना ने संयुक्त रूप से आई.सी.एफ.ए.आई विश्वविद्यालय के सहयोग से दिनांक 15 जुलाई 2026 को ‘द ह्यूमन एज इन एआई एरा-इनोवेशन, साॅफ्ट स्किल्स एंड सोशल इंटरप्रेन्योरशिप’ विषय पर एक व्याख्यान सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. तन्मय अग्रवाल, सहायक आचार्य, संयोजक इनोवेशन क्लब, (आई.सी.एफ.ए. आई विश्वविद्यालय) रहे। उन्होंने बताया कि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है तथा शिक्षा, उद्योग, स्टार्टअप, नवाचार, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य एवं अनुसंधान सहित अनेक क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग हो रहा है। उन्होंने छात्राओं को विभिन्न एआई टूल एवं उनके व्यावहारिक उपयोगों की जानकारी दी तथा यह भी बताया कि इन तकनीकों को प्रभावी रूप से उपयोग कर छात्राएँ अपनी सीखने की क्षमता, रचनात्मकता और नवाचार कौशल को विकसित कर सकते हैं। उन्होंने छात्राओं को एआई का नैतिक एवं सकारात्मक उपयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने कार्यक्रम की सराहना करते हुये छात्राओं को एआई आधारित तकनीकों को सीखने तथा उनका रचनात्मक उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में 92 छात्राओं की उत्साहपूर्वक सहभागिता रही साथ ही छात्राओं ने मुख्य वक्ता से एआई से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने प्रश्न पूछकर वक्ता से मार्गदर्शन प्राप्त किया। महाविद्यालय की इंस्टीट्यूशंस इनोवेशन काउंसिल एवं राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डाॅ. आंचल पुरी, डाॅ. विजयलक्ष्मी गुप्ता, डाॅ. हर्षा शर्मा एवं चारूल शर्मा की सक्रिय भूमिका रही।    

    अमेरिकी हमलों का सबसे अधिक असर ईरान के दक्षिणी तटीय इलाकों पर, आम नागरिकों में बढ़ी चिंता

    युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का प्रभाव अब केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया घटनाक्रम में ईरान के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों पर लगातार हो रहे अमेरिकी हमलों ने स्थानीय आबादी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यदि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच किसी प्रकार का समझौता नहीं होता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे (Civilian Infrastructure) पर भी हमले तेज करने की चेतावनी दी है। इस बीच ईरान के दक्षिणी समुद्री तटों पर स्थित कई क्षेत्रों में लगातार सैन्य गतिविधियां बढ़ने से आम नागरिकों में भय और असुरक्षा का माहौल बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। दक्षिणी तटीय इलाकों पर लगातार हमले रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों में कई स्थानों पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जारी है। इन इलाकों का सामरिक महत्व काफी अधिक माना जाता है क्योंकि ये फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट स्थित हैं। बताया जा रहा है कि हाल के दिनों में इन क्षेत्रों के आसपास सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं, जिसके कारण स्थानीय नागरिकों के दैनिक जीवन पर भी असर पड़ रहा है। कई इलाकों में लोगों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि संबंधित पक्षों द्वारा सभी सैन्य अभियानों का विस्तृत आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। नागरिक बुनियादी ढांचे को लेकर बढ़ी आशंका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस बयान को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यदि अगले सप्ताह तक कोई समझौता नहीं होता है तो ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया जा सकता है। इस बयान के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी देश के नागरिक ढांचे पर हमले की संभावना मानवीय संकट को और गंभीर बना सकती है। हालांकि इस संबंध में आगे क्या कदम उठाए जाएंगे, इसे लेकर आधिकारिक स्तर पर अभी कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है। सबसे अधिक प्रभावित हो रहे तटीय समुदाय ईरान का दक्षिणी समुद्री तट सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में मछुआरे, बंदरगाह कर्मचारी, व्यापारी और समुद्री परिवहन से जुड़े लोग रहते हैं। लगातार बढ़ते सैन्य तनाव के कारण इन समुदायों की आजीविका पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। समुद्री गतिविधियों में व्यवधान, सुरक्षा प्रतिबंध और संभावित संघर्ष की स्थिति ने स्थानीय लोगों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात सामान्य नहीं हुए तो क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य बना वैश्विक चिंता का केंद्र ईरान के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों के निकट स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। विश्व के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और ऊर्जा आपूर्ति इसी मार्ग से होकर गुजरती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। पिछले कुछ समय से इस समुद्री मार्ग के आसपास बढ़ती सैन्य गतिविधियों के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां भी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के समानांतर क्षेत्र के कई अन्य देशों में भी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि सैन्य कार्रवाई का दायरा और बढ़ता है तो इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया में देखने को मिल सकता है। कई देशों ने अपने नागरिकों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर विशेष निगरानी व्यवस्था लागू की है। आम नागरिकों पर पड़ रहा असर लगातार जारी संघर्ष का सबसे बड़ा असर स्थानीय नागरिकों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। सुरक्षा संबंधी अनिश्चितता, संभावित हवाई हमलों की आशंका और सैन्य गतिविधियों के कारण लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है। कई परिवार भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। मानवीय संगठनों का मानना है कि यदि संघर्ष जल्द नहीं रुका तो प्रभावित क्षेत्रों में राहत और पुनर्वास की आवश्यकता बढ़ सकती है। वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है प्रभाव विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री परिवहन पर भी पड़ सकता है। यदि समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ते हैं तो शिपिंग लागत में वृद्धि, बीमा प्रीमियम में इजाफा और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। भारत सहित कई देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। कूटनीतिक समाधान की जरूरत अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि वर्तमान परिस्थिति में सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक वार्ता ही स्थायी समाधान का रास्ता हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि दोनों पक्ष बातचीत के माध्यम से मतभेद दूर करने का प्रयास करते हैं, तो क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम किया जा सकता है और आम नागरिकों को राहत मिल सकती है।   फिलहाल पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। ईरान के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों में जारी सैन्य गतिविधियां, संभावित नए हमलों की आशंका और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण बने रहेंगे।

    भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते से बदल सकती है बाजार की तस्वीर, कपड़ा उद्योग से लेकर स्कॉच व्हिस्की तक मिलेगा बड़ा लाभ

    युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच लागू हुए मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement-FTA) को दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इस समझौते के लागू होने के साथ ही भारत के निर्यातकों, उद्योगों और उपभोक्ताओं के लिए नए अवसर खुलने की उम्मीद जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे अधिक लाभ वस्त्र उद्योग, रेडीमेड गारमेंट्स, समुद्री उत्पाद, ऑटोमोबाइल, फुटवियर और कई अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों को मिल सकता है। वहीं दूसरी ओर ब्रिटेन से आयात होने वाले कई उत्पाद, विशेषकर स्कॉच व्हिस्की, आने वाले वर्षों में भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती है। हालांकि व्यापार विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस समझौते का वास्तविक प्रभाव धीरे-धीरे सामने आएगा। केवल शुल्क (टैरिफ) कम होने से व्यापार में स्वतः वृद्धि नहीं होगी, बल्कि उद्योगों को नए नियमों के अनुरूप अपनी रणनीति भी बदलनी होगी। कई वर्षों की बातचीत के बाद लागू हुआ समझौता भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत वर्ष 2022 में शुरू हुई थी। लंबी वार्ताओं के बाद दोनों देशों ने इस समझौते को अंतिम रूप दिया और अब यह आधिकारिक रूप से लागू हो चुका है। यह समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके तहत भारत से ब्रिटेन जाने वाले लगभग 99 प्रतिशत उत्पादों पर लगने वाले शुल्क को समाप्त या काफी कम किया गया है। वहीं भारत में आने वाले लगभग 90 प्रतिशत ब्रिटिश उत्पादों पर भी आयात शुल्क में राहत दी गई है। ब्रिटिश सरकार का अनुमान है कि इस समझौते से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में सकारात्मक बढ़ावा मिलेगा और द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। भारतीय वस्त्र उद्योग को मिल सकता है सबसे बड़ा फायदा भारत का वस्त्र एवं होम टेक्सटाइल उद्योग इस समझौते से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले क्षेत्रों में शामिल माना जा रहा है। अब तक भारतीय उत्पादों पर ब्रिटेन में लगभग 12 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता था, जबकि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को विशेष व्यापार योजनाओं के तहत शुल्क में छूट मिलती थी। इस कारण भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ता था। अब शुल्क कम होने के बाद भारतीय निर्यातकों को ब्रिटिश बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय कपड़ा उद्योग, रेडीमेड गारमेंट्स, बेडशीट, तौलिया, कालीन और घरेलू वस्त्रों की मांग में वृद्धि हो सकती है। रेडीमेड गारमेंट्स क्षेत्र के लिए सुनहरा अवसर बाजार विश्लेषकों का कहना है कि ब्रिटेन में रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) के आयात में चीन की हिस्सेदारी पिछले कुछ वर्षों से लगातार घट रही है। बढ़ती उत्पादन लागत और वैश्विक कंपनियों द्वारा वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश के कारण भारत के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भारत ब्रिटेन के रेडीमेड परिधान बाजार में अपनी हिस्सेदारी लगभग दोगुनी कर सकता है। इसके अलावा बांग्लादेश में हाल के वर्षों में उत्पन्न सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का भी कुछ लाभ भारतीय निर्यातकों को मिल सकता है। स्कॉच व्हिस्की हो सकती है सस्ती इस व्यापार समझौते का एक बड़ा प्रभाव ब्रिटेन से आयात होने वाली स्कॉच व्हिस्की पर भी देखने को मिल सकता है। समझौते के तहत स्कॉच व्हिस्की पर भारत में लगने वाला आयात शुल्क तत्काल प्रभाव से 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके बाद अगले दस वर्षों में इसे चरणबद्ध तरीके से 40 प्रतिशत तक लाने की योजना है। आयातकों का मानना है कि इससे ब्रिटिश शराब कंपनियों को भारत में अधिक प्रतिस्पर्धी बाजार मिलेगा। हालांकि खुदरा कीमतों में वास्तविक कमी आने में कुछ समय लग सकता है क्योंकि कंपनियां पहले नई व्यापार व्यवस्था के अनुसार अपनी आपूर्ति श्रृंखला, दस्तावेजी प्रक्रियाओं और आयात प्रणाली को व्यवस्थित करेंगी। व्यापारिक कंपनियां कर रही हैं तैयारी समझौता लागू होने के बाद कई भारतीय और ब्रिटिश कंपनियों ने अपनी व्यापारिक रणनीतियों में बदलाव शुरू कर दिया है। कई भारतीय निर्यातक ब्रिटिश कंपनियों के साथ दीर्घकालिक व्यापार योजनाओं पर काम कर रहे हैं। वहीं आयातक कंपनियां नए सीमा शुल्क नियमों, मूल प्रमाणपत्र (Certificate of Origin), लॉजिस्टिक्स और कस्टम प्रक्रियाओं को लेकर तैयारी कर रही हैं ताकि उन्हें शुल्क में मिलने वाली छूट का पूरा लाभ मिल सके। व्यापार जगत का मानना है कि शुरुआती चरण में तैयारी पर अधिक ध्यान रहेगा और वास्तविक व्यापारिक विस्तार अगले कुछ वर्षों में दिखाई देगा। विशेषज्ञ बोले— बदलाव होगा, लेकिन धीरे-धीरे व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते को लेकर अत्यधिक उत्साहित होने के बजाय इसके व्यावहारिक प्रभावों को समझना जरूरी है। भारत के कई उत्पाद पहले भी ब्रिटेन में कम शुल्क या शुल्क-मुक्त व्यवस्था के तहत प्रवेश कर रहे थे। ऐसे में हर क्षेत्र को समान लाभ नहीं मिलेगा। विशेषज्ञों के अनुसार असली सफलता इस बात से तय होगी कि जिन उत्पादों पर पहले 4 से 16 प्रतिशत तक शुल्क लगता था, क्या अब उनके निर्यात ऑर्डर बढ़ते हैं, निर्यात मात्रा में वृद्धि होती है और कंपनियों का लाभ बढ़ता है। इन संकेतकों के आधार पर अगले एक से तीन वर्षों में इस समझौते की वास्तविक सफलता का आकलन किया जा सकेगा। अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हालांकि शुल्क में कमी के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। ब्रिटेन ने कुछ उत्पादों, विशेष रूप से स्टील आयात पर सुरक्षा संबंधी सीमाएं लागू रखी हैं। इसके अलावा प्रस्तावित कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भी भारतीय निर्यातकों के लिए अतिरिक्त लागत का कारण बन सकता है। यदि कार्बन उत्सर्जन से जुड़े नए शुल्क लागू होते हैं, तो कुछ क्षेत्रों में एफटीए से मिलने वाले लाभ का असर कम हो सकता है। छोटे उद्योगों के सामने जागरूकता की चुनौती भारत में पहले हुए कई मुक्त व्यापार समझौतों का पूरा लाभ छोटे और मध्यम उद्योग नहीं उठा सके क्योंकि उन्हें नियमों और दस्तावेजी प्रक्रियाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं थी। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी एफटीए का लाभ तभी मिलता है जब निर्यातक निर्धारित नियमों के अनुसार आवश्यक प्रमाणपत्र तैयार करें और विदेशी खरीदारों को शुल्क में हुई कमी की जानकारी दें। यदि उद्योगों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला तो केवल समझौता लागू होने से निर्यात में स्वतः वृद्धि नहीं होगी। सरकार और उद्योग संगठनों की होगी अहम भूमिका विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, निर्यात संवर्धन परिषदों और उद्योग संगठनों को मिलकर छोटे और मध्यम उद्यमों को नए नियमों की जानकारी देनी होगी। निर्यातकों को यह समझाना आवश्यक होगा कि किस प्रकार वे मूल प्रमाणपत्र प्राप्त करें, नए दस्तावेज तैयार करें और शुल्क में मिली छूट का लाभ उठाकर अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद बेच सकें। यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो भारतीय निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। उपभोक्ताओं को भी मिलेगा फायदा इस समझौते का लाभ केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प, बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद और प्रतिस्पर्धी कीमतों का लाभ मिल सकता है। यदि व्यापारिक गतिविधियां अपेक्षा के अनुरूप बढ़ती हैं, तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार की वार्षिक वृद्धि दर वर्तमान 10–12 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।   कुल मिलाकर भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक नई शुरुआत माना जा रहा है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव तत्काल दिखाई देने के बजाय आने वाले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे सामने आएगा। यदि उद्योग नए नियमों के अनुसार स्वयं को ढालने में सफल रहते हैं और सरकार आवश्यक सहयोग प्रदान करती है, तो यह समझौता भारतीय निर्यात, निवेश और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकता है।

    सोनम वांगचुक के अनशन पर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका, अस्पताल में भर्ती कर जबरन पोषण देने की मांग

    युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन अब 18वें दिन में प्रवेश कर चुका है। लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंताओं के बीच अब यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। एक जनहित याचिका (PIL) में अदालत से मांग की गई है कि सोनम वांगचुक को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जाए और आवश्यक होने पर उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में पोषण उपलब्ध कराया जाए ताकि उनके जीवन की रक्षा की जा सके। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी इस अनशन ने अब राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है। जहां एक ओर विपक्षी दल और कई सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी लगातार गिरती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग भी तेज हो गई है। हाईकोर्ट में दायर हुई जनहित याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में अधिवक्ता राकेश कुमार सैनी ने जनहित याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी। याचिका में कहा गया कि सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से लगातार भूख हड़ताल पर हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया जाए कि सोनम वांगचुक को तत्काल किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उन्हें आवश्यक तरल पोषण, विटामिन तथा अन्य जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। याचिका में यह भी कहा गया कि यदि किसी व्यक्ति का जीवन गंभीर खतरे में हो, तो राज्य का दायित्व है कि वह उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे और आवश्यक चिकित्सा सहायता प्रदान करे। दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई की अनुमति दी मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका दायर करने की अनुमति प्रदान कर दी है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत इस बात पर विचार कर सकती है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासन को सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए। हालांकि, इस मामले पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई और संबंधित पक्षों की दलीलों के बाद ही सामने आएगा। 18 दिनों से जारी है अनिश्चितकालीन अनशन सोनम वांगचुक पिछले 18 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन कर रहे हैं। उनका यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों और केंद्र सरकार के समक्ष रखी गई विभिन्न मांगों के समर्थन में चल रहा है। बताया जा रहा है कि उन्होंने पहले सरकार को अपनी मांगों पर विचार करने के लिए समय दिया था। निर्धारित समयसीमा तक अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। समय बीतने के साथ उनका अनशन लंबा होता गया और अब उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता लंबे समय तक भोजन न करने के कारण सोनम वांगचुक की शारीरिक स्थिति पर असर पड़ने की खबरें सामने आई हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि उनका वजन काफी कम हो चुका है और शरीर में कमजोरी लगातार बढ़ रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक उपवास रहने से शरीर में ऊर्जा की कमी, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, मांसपेशियों का क्षय, रक्तचाप में गिरावट और कई अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसी कारण अदालत में दायर याचिका में उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग की गई है। विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन सोनम वांगचुक के आंदोलन को कई विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों का समर्थन मिल रहा है। हाल के दिनों में कई प्रमुख हस्तियां जंतर-मंतर पहुंचकर उनसे मुलाकात कर चुकी हैं। उन्होंने एक ओर उनकी मांगों के प्रति समर्थन व्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर उनके स्वास्थ्य को देखते हुए अनशन समाप्त करने की भी अपील की। समर्थकों का कहना है कि सरकार को आंदोलनकारियों की बात सुननी चाहिए और संवाद के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए। अनशन समाप्त करने पर अभी नहीं लिया गया फैसला हालांकि कई लोगों ने सोनम वांगचुक से स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए अनशन समाप्त करने की अपील की है, लेकिन फिलहाल उनकी ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है। उनके समर्थकों का कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस पहल नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। इस बीच लगातार बढ़ती स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण प्रशासन और चिकित्सा विशेषज्ञ भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। जबरन भोजन कराने पर कानूनी और नैतिक बहस सोनम वांगचुक के मामले ने एक बार फिर उस बहस को जन्म दिया है कि क्या किसी अनशनकारी को उसकी इच्छा के विरुद्ध चिकित्सकीय रूप से भोजन या पोषण देना उचित है। एक पक्ष का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति का जीवन खतरे में हो तो राज्य का दायित्व है कि वह उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए। वहीं दूसरा पक्ष इसे व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा विषय मानता है। इसी कारण अदालत के समक्ष यह मामला केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारी से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी बन गया है। आगे क्या होगा? अब सभी की निगाहें दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत यह तय करेगी कि वर्तमान परिस्थितियों में सरकार और प्रशासन को क्या निर्देश दिए जाने चाहिए। यदि अदालत चिकित्सा हस्तक्षेप का आदेश देती है, तो प्रशासन को उसके अनुरूप कार्रवाई करनी पड़ सकती है। वहीं यदि अदालत पहले संबंधित पक्षों का विस्तृत पक्ष सुनने का निर्णय लेती है, तो मामले में आगे और सुनवाई हो सकती है।   फिलहाल जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का अनशन जारी है और उनके समर्थक लगातार उनके साथ मौजूद हैं। दूसरी ओर, उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए देशभर में चिंता बढ़ती जा रही है। आने वाले दिनों में अदालत का रुख और सरकार की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    E20 पेट्रोल से इंजन खराब नहीं होता, IIT कानपुर के शोध और ऑटो विशेषज्ञों ने दावों को बताया भ्रामक

    युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 देशभर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) को लेकर चल रही बहस के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के शोधकर्ताओं और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों ने दावा किया है कि E20 पेट्रोल से वाहनों के इंजन को नुकसान पहुंचने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ईंधन की माइलेज में यदि कोई कमी आती भी है तो वह बहुत सीमित होती है और सामान्य परिस्थितियों में वाहन मालिकों को इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर E20 पेट्रोल को लेकर कई तरह के दावे वायरल हुए हैं। इनमें इंजन खराब होने, माइलेज में भारी गिरावट आने और पुराने वाहनों के लिए इस ईंधन को नुकसानदायक बताए जाने जैसी बातें शामिल हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन दावों का अधिकांश हिस्सा वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है और लोगों को अपुष्ट जानकारी की बजाय अधिकृत स्रोतों पर भरोसा करना चाहिए। E20 पेट्रोल को लेकर क्यों शुरू हुई बहस? केंद्र सरकार ने देशभर में चरणबद्ध तरीके से 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) की आपूर्ति शुरू की है। इस पहल का उद्देश्य पेट्रोल पर निर्भरता कम करना, कच्चे तेल के आयात में कमी लाना, किसानों की आय बढ़ाना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। लेकिन E20 लागू होने के बाद कुछ वाहन मालिकों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह दावा किया जाने लगा कि इससे वाहनों के इंजन को नुकसान हो सकता है तथा माइलेज में काफी गिरावट आएगी। इन दावों के बाद E20 को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। IIT कानपुर की रिसर्च में क्या सामने आया? IIT कानपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की इंजन रिसर्च लैब में किए गए परीक्षणों के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि E20 पेट्रोल इंजन को नुकसान नहीं पहुंचाता। शोधकर्ताओं के अनुसार विस्तृत परीक्षणों के दौरान इंजन में किसी प्रकार की गंभीर तकनीकी समस्या, जंग (Corrosion) या यांत्रिक क्षति के प्रमाण नहीं मिले। संस्थान का यह भी कहना है कि माइलेज में होने वाली कमी सामान्य परिस्थितियों में पांच प्रतिशत से कम रहती है और कई बार यह अंतर ड्राइविंग शैली, सड़क की स्थिति, ट्रैफिक और वाहन के रखरखाव जैसे अन्य कारणों से भी हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल ईंधन को माइलेज में बदलाव का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा। सोशल मीडिया के दावों को बताया वैज्ञानिक आधार से परे शोधकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई दावों को वैज्ञानिक रूप से असत्य बताया है। उनका कहना है कि वाहन मालिकों को इंटरनेट पर फैल रही अपुष्ट जानकारी की बजाय अपने वाहन निर्माता द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की आधिकारिक सलाह पर भरोसा करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि गलत सूचनाएं लोगों में अनावश्यक भ्रम और डर पैदा कर रही हैं। ऑटो विशेषज्ञ ने भी किया समर्थन ऑटोमोबाइल क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भी E20 पेट्रोल को लेकर फैल रही आशंकाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने वाहनों की उपयोगकर्ता पुस्तिका (मैनुअल) उस समय तैयार की गई थी, जब देश में E20 ईंधन उपलब्ध नहीं था। इसलिए कई पुराने मैनुअल में केवल E10 या सामान्य पेट्रोल का उल्लेख मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे वाहन E20 पर नहीं चल सकते। वाहन निर्माता आमतौर पर सुरक्षा और कानूनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए सीमित तकनीकी जानकारी प्रकाशित करते हैं। पुराने वाहन मालिकों को किन बातों का रखना होगा ध्यान? विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वाहन का नियमित रखरखाव किया जाता है, तो अधिकांश मामलों में E20 पेट्रोल से कोई विशेष समस्या नहीं आती। हालांकि जिन वाहनों की लंबे समय तक सर्विस नहीं हुई है या जिनके फ्यूल सिस्टम में पहले से गंदगी जमा है, उनमें एथेनॉल की सफाई करने वाली प्रकृति (डिटर्जेंट प्रभाव) के कारण कुछ प्रारंभिक समस्याएं सामने आ सकती हैं। ऐसी स्थिति में ईंधन प्रणाली में मौजूद पुरानी गंदगी निकलकर फिल्टर या अन्य हिस्सों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए वाहन मालिकों को समय-समय पर सर्विस और रखरखाव करवाने की सलाह दी जा रही है। लंबे समय तक खड़ा वाहन होने पर हो सकती है परेशानी विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि एथेनॉल वातावरण से नमी को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। यदि कोई वाहन एक महीने या उससे अधिक समय तक बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जाता, तो ईंधन में नमी बढ़ने के कारण कुछ तकनीकी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। हालांकि नियमित रूप से उपयोग किए जाने वाले वाहनों में ऐसी स्थिति की संभावना काफी कम मानी जाती है। ईंधन में मिलावट की समस्या नई नहीं हाल के दिनों में कुछ लोगों ने खराब ईंधन की शिकायत भी की है। इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन में मिलावट की समस्या नई नहीं है और यह कई वर्षों से अलग-अलग क्षेत्रों में देखने को मिलती रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी क्षेत्र में ईंधन की गुणवत्ता खराब है, तो उसका असर किसी भी वाहन पर पड़ सकता है। इसे केवल E20 से जोड़ना उचित नहीं होगा। तेल विपणन कंपनियों ने भी पिछले कुछ वर्षों में गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था को पहले की तुलना में काफी मजबूत बनाया है। वाहन निर्माता कंपनियों का भी समर्थन देश की कई प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी E20 पेट्रोल को सुरक्षित बताया है। कंपनियों का कहना है कि उन्होंने बड़ी संख्या में पुराने वाहनों का परीक्षण और सर्विसिंग की है, जिसमें E20 से संबंधित कोई गंभीर तकनीकी समस्या सामने नहीं आई। निर्माताओं के अनुसार उनके परीक्षणों में धातु या प्लास्टिक के हिस्सों पर भी कोई बड़ा प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया। इससे उद्योग जगत का विश्वास और मजबूत हुआ है कि E20 ईंधन का उपयोग सुरक्षित तरीके से किया जा सकता है। सरकार ने भी दी सफाई पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि E20 पेट्रोल एक स्वच्छ और बेहतर गुणवत्ता वाला ईंधन है। मंत्रालय के अनुसार इसे लागू करने से पहले कई वर्षों तक वैज्ञानिक परीक्षण किए गए, ऑटोमोबाइल कंपनियों से परामर्श लिया गया और घरेलू एथेनॉल उत्पादन क्षमता को भी मजबूत किया गया। सरकार का कहना है कि E20 के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को भी अतिरिक्त लाभ मिलेगा। केंद्रीय मंत्री ने भी किया बचाव केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी E20 पेट्रोल का समर्थन करते हुए कहा है कि माइलेज को लेकर कई दावे वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाते। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वाहन की माइलेज कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें सड़क की स्थिति, ट्रैफिक, वाहन का रखरखाव, ड्राइविंग शैली और मौसम भी शामिल हैं। इसलिए केवल ईंधन को माइलेज में बदलाव का कारण मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं माना जा सकता। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि E20 पेट्रोल को लेकर फैलाई जा रही अधिकांश आशंकाएं अतिरंजित हैं। उनका कहना है कि यदि वाहन का नियमित रखरखाव किया जाए, समय-समय पर सर्विस कराई जाए और अधिकृत पेट्रोल पंपों से ईंधन भरवाया जाए, तो अधिकांश वाहन बिना किसी बड़ी समस्या के E20 पर चल सकते हैं। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले अपुष्ट दावों की बजाय वैज्ञानिक शोध, वाहन निर्माता कंपनियों की सलाह और सरकारी दिशानिर्देशों पर भरोसा करना चाहिए।   E20 पेट्रोल को भारत की स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में इसके व्यापक उपयोग के साथ इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर भी लगातार अध्ययन जारी रहेगा, लेकिन फिलहाल उपलब्ध वैज्ञानिक शोध और उद्योग विशेषज्ञों की राय यही संकेत देती है कि उचित रखरखाव वाले वाहनों के लिए E20 पेट्रोल किसी बड़े खतरे का कारण नहीं है।

    हॉर्मुज संकट के बीच भारत सरकार का बड़ा फैसला: हर भारतीय नाविक की होगी निगरानी, ‘सीफेयरर-फर्स्ट’ पहल शुरू

      युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते समुद्री सुरक्षा हालात के बीच भारत सरकार ने भारतीय नाविकों (सीफेयरर्स) की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने ‘सीफेयरर-फर्स्ट’ (Seafarer-First) पहल की शुरुआत की है, जिसके तहत फारस की खाड़ी, हॉर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में संचालित प्रत्येक जहाज पर मौजूद हर भारतीय नाविक की निगरानी की जाएगी, चाहे वह जहाज किसी भी देश के झंडे (फ्लैग) के तहत संचालित हो। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में दो व्यापारी जहाजों पर हुए मिसाइल हमलों में एक भारतीय नाविक की मृत्यु हो गई, जबकि कई अन्य भारतीय घायल हो गए। घटना के बाद भारत सरकार ने समुद्री सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करते हुए कई नए निर्देश जारी किए हैं। भारतीय नाविक की मौत के बाद सरकार हुई सक्रिय हाल ही में हॉर्मुज जलडमरूमध्य में दो तेल टैंकरों पर हुए हमलों में भारतीय नाविक रोहन कुमार की मौत हो गई थी। इसके अलावा कई अन्य भारतीय नाविक घायल हुए, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई गई है। इस घटना ने सरकार की चिंता बढ़ा दी, क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण समुद्री मार्गों की सुरक्षा लगातार चुनौती बनती जा रही है। भारतीय नाविक बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर कार्यरत हैं और वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। सरकार का मानना है कि मौजूदा हालात में हर भारतीय नाविक की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। ‘सीफेयरर-फर्स्ट’ पहल क्या है? केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने ‘सीफेयरर-फर्स्ट’ पहल की घोषणा करते हुए कहा कि सरकार प्रत्येक भारतीय नाविक की सुरक्षा के लिए समन्वित और व्यापक व्यवस्था लागू करेगी। इसके तहत डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (DGS) को निर्देश दिया गया है कि वह एक डिजिटल ऑपरेशनल डैशबोर्ड तैयार करे, जिसमें फारस की खाड़ी, हॉर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में चल रहे प्रत्येक जहाज पर मौजूद भारतीय नागरिकों की वास्तविक समय (रियल टाइम) जानकारी उपलब्ध रहे। इस प्रणाली के माध्यम से सरकार किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सकेगी। रियल टाइम निगरानी की होगी व्यवस्था सरकार द्वारा तैयार किए जाने वाले डैशबोर्ड में प्रत्येक जहाज से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज होंगी। इनमें जहाज की वर्तमान स्थिति, स्वामित्व, कार्गो, चालक दल की संख्या, भारतीय नाविकों की जानकारी, संभावित सुरक्षा खतरे, यात्रा मार्ग, अगला बंदरगाह तथा उपलब्ध सहायता सुविधाओं जैसी सूचनाएं शामिल रहेंगी। इससे सरकार को किसी भी संकट की स्थिति में तत्काल निर्णय लेने और राहत कार्यों का समन्वय करने में सुविधा मिलेगी। क्यों उठाना पड़ा यह कदम? पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण समुद्री सुरक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ रही है। हाल ही में दो व्यापारी जहाजों पर हुए हमलों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। हमले की चपेट में आए दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य मौजूद थे, जिनमें 30 भारतीय नागरिक शामिल थे। एक जहाज पर एक भारतीय नाविक की मौत हो गई, जबकि दूसरे जहाज पर कार्यरत कई भारतीय घायल हुए। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि संघर्ष का असर सीधे उन भारतीय नागरिकों पर भी पड़ रहा है जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन क्षेत्र में कार्यरत हैं। उच्चस्तरीय बैठक में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा घटना के बाद केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें विदेश मंत्रालय, भारतीय नौसेना, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग, भारत के ईरान और ओमान स्थित मिशनों सहित विभिन्न समुद्री एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक में फारस की खाड़ी, हॉर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की गई तथा भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए व्यापक रणनीति तैयार की गई। सरकार ने संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच चौबीसों घंटे समन्वय बनाए रखने के निर्देश भी दिए हैं। हर प्रभावित परिवार के लिए नियुक्त होगा संपर्क अधिकारी सरकार ने यह भी फैसला किया है कि संकट से प्रभावित प्रत्येक भारतीय नाविक के परिवार के लिए एक समर्पित संपर्क अधिकारी (लायजन ऑफिसर) नियुक्त किया जाएगा। यह अधिकारी परिवार और सरकार के बीच एकल संपर्क बिंदु के रूप में कार्य करेगा। वह चिकित्सा सहायता, यात्रा दस्तावेज, स्वदेश वापसी, बीमा, वेतन, मुआवजा, सीफेयरर वेलफेयर फंड तथा अन्य आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने में समन्वय करेगा। सरकार का कहना है कि किसी भी प्रभावित परिवार को जानकारी या सहायता के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। भारतीय दूतावासों से लगातार समन्वय सरकार ने ईरान, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात स्थित भारतीय दूतावासों को भी विशेष निर्देश जारी किए हैं। विदेश मंत्रालय के सहयोग से समुद्री मार्गों की सुरक्षा, बंदरगाहों की स्थिति, चिकित्सा सहायता, सुरक्षित निकासी, शवों को भारत लाने की व्यवस्था तथा चल रही जांच की जानकारी लगातार प्राप्त की जाएगी। सरकार ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संबंधित संस्थाओं के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है। 24 घंटे सहायता प्रणाली सक्रिय भारतीय नाविकों और उनके परिवारों की सहायता के लिए सरकार ने 24×7 हेल्पलाइन भी शुरू कर दी है। इस व्यवस्था के तहत टोल-फ्री नंबर, व्हाट्सएप और ईमेल के माध्यम से किसी भी समय सहायता प्राप्त की जा सकेगी। सरकार का उद्देश्य संकट के समय प्रभावित परिवारों तक तुरंत सहायता पहुंचाना है। जहाज मालिकों के लिए भी जारी हुए निर्देश सरकार ने जहाज मालिकों, शिप मैनेजमेंट कंपनियों और भर्ती एजेंसियों को भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी भारतीय नाविक को पर्याप्त सुरक्षा जानकारी, सुरक्षा व्यवस्था और जोखिम का आकलन किए बिना संघर्ष प्रभावित क्षेत्र में यात्रा के लिए मजबूर न किया जाए। हर जहाज को यात्रा शुरू करने से पहले नए सिरे से सुरक्षा मूल्यांकन करना होगा और संबंधित समुद्री प्राधिकरणों के साथ समन्वय बनाए रखना होगा। वैश्विक व्यापार में भारतीय नाविकों की महत्वपूर्ण भूमिका भारत दुनिया के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। हजारों भारतीय नाविक अंतरराष्ट्रीय व्यापारी जहाजों पर कार्यरत हैं और वैश्विक सप्लाई चेन को सुचारु बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय परिवहन व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसी कारण भारतीय सरकार ने नाविकों की सुरक्षा को लेकर पहले से अधिक सक्रिय और समन्वित रणनीति अपनाई है। सरकार ने सुरक्षा का दिया भरोसा केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने प्रभावित परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार प्रत्येक भारतीय नाविक और उसके परिवार के साथ खड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा किसी भी परिस्थिति में सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। सरकार का कहना है कि मौजूदा संकट के दौरान सभी संबंधित मंत्रालय, भारतीय नौसेना, विदेश मंत्रालय, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग और विदेशों में स्थित भारतीय मिशन मिलकर लगातार स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। भारत की यह नई ‘सीफेयरर-फर्स्ट’ पहल न केवल संकटग्रस्त क्षेत्र में कार्यरत भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सरकार वैश्विक समुद्री व्यापार में योगदान देने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।    

    अमेरिका ने ईरान पर नए हवाई हमलों का वीडियो जारी किया, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड ने जवाबी कार्रवाई का किया दावा

      युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड (यूएस सेंटकॉम) ने ईरान के खिलाफ अपने हालिया सैन्य अभियान का वीडियो जारी किया है। वीडियो में कथित तौर पर ईरान के बंदर अब्बास (Bandar Abbas) और क़ेश्म (Qeshm), किश (Kish) तथा अबू मूसा (Abu Musa) द्वीपों पर किए गए हवाई हमलों को दिखाया गया है। दूसरी ओर, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने दावा किया है कि उसने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी सहयोगी ठिकानों को निशाना बनाया है। हालांकि दोनों पक्षों द्वारा किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है। लेकिन इन घटनाओं ने पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव को और अधिक गंभीर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव आगे बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी सेंटकॉम ने जारी किया सैन्य अभियान का वीडियो अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड ने हालिया हवाई हमलों का एक वीडियो सार्वजनिक किया है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह अभियान ईरान से जुड़े रणनीतिक सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर चलाया गया। बताया जा रहा है कि हमलों का केंद्र बंदर अब्बास बंदरगाह और फारस की खाड़ी में स्थित क़ेश्म, किश और अबू मूसा द्वीप रहे। ये क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि इनका संबंध हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की समुद्री गतिविधियों और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने अभियान से जुड़े विस्तृत सैन्य विवरण सार्वजनिक नहीं किए हैं। आईआरजीसी का जवाबी कार्रवाई का दावा अमेरिकी हमलों के बाद ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने दावा किया है कि उसने जवाबी सैन्य कार्रवाई की है। आईआरजीसी के अनुसार, उसके अभियान के तहत बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी सहयोगियों से जुड़े लक्ष्यों को निशाना बनाया गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित देशों की ओर से भी आधिकारिक स्तर पर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में दोनों पक्ष लगातार सैन्य और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहा तनाव पिछले कुछ समय से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर टकराव तेज़ हो चुका है। हालिया घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया के सुरक्षा ढांचे पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय सहयोगी देश भी सीधे इस संघर्ष का हिस्सा बनते हैं, तो स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। बंदर अब्बास और द्वीप क्यों हैं महत्वपूर्ण? बंदर अब्बास ईरान का प्रमुख समुद्री बंदरगाह माना जाता है। यह फारस की खाड़ी और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार क़ेश्म, किश और अबू मूसा द्वीप भी समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक गतिविधियों और व्यापारिक मार्गों के लिहाज से विशेष महत्व रखते हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरती है। यदि इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बढ़ी चिंता पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक बाजार पहले से ही इस क्षेत्र के घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सैन्य कार्रवाई लगातार जारी रहती है तो समुद्री व्यापार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। कई देशों ने संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है ताकि क्षेत्र में शांति बनाए रखी जा सके। विमानन और समुद्री क्षेत्र पर असर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों का प्रभाव केवल समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं है। कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस भी अपने उड़ान मार्गों की समीक्षा कर रही हैं ताकि यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसी तरह समुद्री परिवहन कंपनियां भी जोखिम का आकलन कर रही हैं और अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने पर विचार कर रही हैं। यदि संघर्ष लंबा चलता है तो अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव पश्चिम एशिया दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। इसलिए यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर तुरंत दिखाई देता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य या आसपास के समुद्री मार्गों में व्यवधान उत्पन्न होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी हो सकती है। इसका प्रभाव परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन और आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। इसके अलावा वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अनिश्चितता बढ़ सकती है। सैन्य दावों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार अमेरिकी सेना द्वारा जारी वीडियो और ईरान की जवाबी कार्रवाई के दावों को लेकर फिलहाल स्वतंत्र स्रोतों से पूरी पुष्टि नहीं हो सकी है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में दोनों पक्ष अपनी-अपनी सैन्य उपलब्धियों के दावे करते हैं, इसलिए विशेषज्ञ आधिकारिक पुष्टि का इंतजार करने की सलाह दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विभिन्न एजेंसियां लगातार घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और स्थिति स्पष्ट होने के साथ नई जानकारियां सामने आने की संभावना है। आगे क्या? पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यदि दोनों पक्ष सैन्य कार्रवाई की बजाय बातचीत का रास्ता नहीं अपनाते, तो संघर्ष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय देशों के फैसले यह तय करेंगे कि हालात शांति की ओर बढ़ते हैं या तनाव और गहरा होता है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कूटनीतिक पहल और संवाद की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।    

    हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर ट्रंप ने बदला रुख, 20% शुल्क लगाने का फैसला वापस; पश्चिम एशिया में फिर तेज़ हुआ संघर्ष

      युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर प्रस्तावित 20 प्रतिशत शुल्क लगाने के अपने फैसले को वापस ले लिया है। हालांकि इस घोषणा के साथ ही क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और तेज़ हो गई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ नए हवाई हमलों की खबरें सामने आई हैं, जबकि जवाबी कार्रवाई में ईरान ने समुद्री मार्गों और अमेरिका के सहयोगी देशों से जुड़े लक्ष्यों पर हमले तेज़ कर दिए हैं। इन घटनाओं ने हाल ही में हुए अंतरिम शांति समझौते को लगभग निष्प्रभावी बना दिया है और पूरे क्षेत्र में एक बार फिर युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल की कीमतों और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ट्रंप ने वापस लिया 20 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले संकेत दिए थे कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर 20 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया जा सकता है। यह प्रस्ताव वैश्विक व्यापार और ऊर्जा क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया था, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरते हैं। हालांकि मंगलवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने इस प्रस्ताव से पीछे हटते हुए कहा कि खाड़ी क्षेत्र के देशों द्वारा अमेरिका में निवेश बढ़ाने की दिशा में पहल की जाएगी। माना जा रहा है कि इस फैसले के पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण दोनों शामिल हैं। यदि शुल्क लागू होता तो इससे वैश्विक व्यापार पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता था और कई देशों की ऊर्जा लागत बढ़ सकती थी। अंतरिम शांति समझौता नहीं रोक पाया हिंसा हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के उद्देश्य से एक अंतरिम शांति व्यवस्था पर सहमति बनने की खबरें सामने आई थीं। इस व्यवस्था का उद्देश्य हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना और दोनों पक्षों को स्थायी समाधान के लिए बातचीत का समय देना था। लेकिन ताज़ा घटनाक्रम ने इस उम्मीद को बड़ा झटका दिया है। समझौते के कुछ ही समय बाद दोनों पक्षों के बीच फिर से सैन्य कार्रवाई तेज़ हो गई। अमेरिका ने ईरान से जुड़े ठिकानों पर नए हवाई हमले किए, जबकि ईरान की ओर से भी समुद्री गतिविधियों और अमेरिकी सहयोगी देशों से जुड़े लक्ष्यों पर जवाबी हमले किए जाने की खबरें सामने आई हैं। इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्षेत्र में स्थायी शांति की राह अभी भी काफी कठिन बनी हुई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण? हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। दुनिया में निर्यात होने वाले कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, इराक और अन्य खाड़ी देशों से ऊर्जा उत्पादों का निर्यात इसी समुद्री मार्ग के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। यदि इस जलमार्ग में किसी प्रकार की रुकावट आती है या सुरक्षा संबंधी खतरे बढ़ते हैं, तो उसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों, समुद्री व्यापार और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा है। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक मतभेदों के साथ-साथ सैन्य गतिविधियों में भी वृद्धि देखने को मिली है। अमेरिका का कहना है कि क्षेत्र में उसके सैन्य अभियान सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा के उद्देश्य से चलाए जा रहे हैं। वहीं ईरान ने इन कार्रवाइयों का विरोध करते हुए जवाबी कदम उठाने की बात कही है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच बातचीत आगे नहीं बढ़ती, तो क्षेत्र में अस्थिरता और अधिक बढ़ सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष का सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। निवेशकों और व्यापारिक संस्थानों की नजर लगातार इस क्षेत्र के घटनाक्रम पर बनी हुई है। यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आ सकती है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जिसका असर परिवहन, विनिर्माण, बिजली उत्पादन और आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने पर कई देशों में महंगाई बढ़ सकती है और वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। समुद्री व्यापार और विमानन क्षेत्र पर असर समुद्री व्यापार से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने पर विचार कर रही हैं। कुछ कंपनियां वैकल्पिक मार्गों का आकलन भी कर रही हैं, हालांकि हॉर्मुज का विकल्प सीमित होने के कारण यह आसान नहीं माना जाता। इसके अलावा वाणिज्यिक विमान सेवाओं को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है। क्षेत्र में बढ़ते सैन्य अभियानों के कारण कई एयरलाइंस अपने उड़ान मार्गों की समीक्षा कर रही हैं ताकि यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। खाड़ी देशों की भूमिका रहेगी महत्वपूर्ण विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में खाड़ी देशों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुचारु रखने के लिए इन देशों के बीच समन्वय आवश्यक माना जा रहा है। अमेरिका द्वारा निवेश संबंधी नए संकेत दिए जाने के बाद यह संभावना भी जताई जा रही है कि आर्थिक सहयोग के माध्यम से क्षेत्र में तनाव कम करने के प्रयास किए जा सकते हैं। हालांकि इसके लिए सभी पक्षों के बीच विश्वास बहाली और कूटनीतिक संवाद की आवश्यकता होगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बढ़ी चिंता दुनिया के कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थिति जल्द नियंत्रित नहीं हुई तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और वित्तीय बाजारों पर भी व्यापक असर देखने को मिल सकता है। कूटनीतिक स्तर पर कई देशों द्वारा शांति वार्ता और संयम बरतने की अपील की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि सैन्य कार्रवाई की बजाय बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना ही क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक आर्थिक हितों के लिए सबसे बेहतर विकल्प होगा। आगे क्या? फिलहाल पश्चिम एशिया की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जहाजों पर प्रस्तावित 20 प्रतिशत शुल्क वापस लेने के फैसले ने तत्काल एक बड़े आर्थिक विवाद को टाल दिया है, लेकिन क्षेत्र में जारी सैन्य संघर्ष अब भी चिंता का प्रमुख कारण बना हुआ है। आने वाले दिनों में अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के कदम यह तय करेंगे कि क्षेत्र शांति की ओर बढ़ेगा या संघर्ष और गहरा होगा। पूरी दुनिया की निगाहें अब पश्चिम एशिया के बदलते घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यहां होने वाला हर फैसला वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर सकता है।    

    भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता लागू: निर्यात, कारोबार और उपभोक्ताओं के लिए खुले नए अवसर

      युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026 भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट-एफटीए) आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते को दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। सरकारों और उद्योग जगत को उम्मीद है कि यह समझौता व्यापार, निवेश, रोजगार और आर्थिक सहयोग को नई गति देगा। इसके साथ ही दोनों देशों के व्यवसायों और उपभोक्ताओं को भी अनेक लाभ मिलने की संभावना है। भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंध पहले से ही मजबूत रहे हैं, लेकिन इस नए समझौते के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान पहले की तुलना में अधिक आसान और किफायती हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत के कई उद्योगों के लिए नए अवसरों का द्वार खोल सकता है, जबकि ब्रिटेन के उत्पादों को भी भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिल सकती है। भारत-यूके व्यापार संबंधों को मिलेगा नया आयाम यह समझौता ऐसे समय में लागू हुआ है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है। व्यापारिक बाधाओं को कम करने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। समझौते के तहत भारत से ब्रिटेन जाने वाले अधिकांश उत्पादों पर लगने वाले शुल्क को समाप्त या कम कर दिया गया है। इसी प्रकार ब्रिटेन से भारत आने वाले कई उत्पादों को भी शुल्क में राहत मिलेगी। इससे दोनों देशों के व्यापारियों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल है। भारतीय वस्त्र उद्योग को मिल सकता है बड़ा फायदा भारतीय टेक्सटाइल और होम फर्निशिंग उद्योग को इस समझौते से सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। वर्षों से भारतीय कंपनियां ब्रिटेन के बाजार में अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा कर रही थीं, जहां कुछ देशों को पहले से शुल्क में विशेष छूट प्राप्त थी। अब शुल्क में कमी के बाद भारतीय उत्पाद ब्रिटेन में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध हो सकेंगे। इससे तौलिया, बेडशीट, घरेलू कपड़ा उत्पाद और अन्य टेक्सटाइल सामानों की मांग बढ़ने की उम्मीद है। उद्योग जगत का मानना है कि यदि भारतीय कंपनियां गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति बनाए रखती हैं तो आने वाले वर्षों में ब्रिटेन को होने वाला निर्यात तेजी से बढ़ सकता है। रेडीमेड गारमेंट उद्योग के लिए सुनहरा अवसर भारत का रेडीमेड गारमेंट उद्योग भी इस समझौते को लेकर काफी उत्साहित है। वैश्विक स्तर पर कई अंतरराष्ट्रीय ब्रांड अपने आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में भारत के पास ब्रिटेन के बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का अच्छा अवसर है। कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारतीय परिधान उद्योग आने वाले समय में ब्रिटेन के आयात बाजार में अपनी उपस्थिति को उल्लेखनीय रूप से मजबूत कर सकता है। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा बल्कि देश में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। विशेष रूप से श्रम-प्रधान उद्योगों को इस समझौते से सकारात्मक लाभ मिलने की संभावना है। स्कॉच व्हिस्की पर शुल्क में कमी इस समझौते का एक प्रमुख पहलू स्कॉच व्हिस्की पर लगने वाले आयात शुल्क में कमी है। भारत लंबे समय से स्कॉच व्हिस्की पर उच्च आयात शुल्क लगाने वाले देशों में शामिल रहा है। नई व्यवस्था के तहत इन शुल्कों में चरणबद्ध तरीके से कमी लाई जाएगी। इससे भविष्य में ब्रिटिश व्हिस्की भारतीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ताओं को कीमतों में तत्काल बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि नई व्यवस्था को पूरी तरह लागू होने और बाजार में प्रभाव दिखाने में कुछ समय लग सकता है। निर्यातकों के लिए नए अवसर भारत के निर्यातक इस समझौते को नए बाजार अवसरों के रूप में देख रहे हैं। कई कंपनियां पहले ही ब्रिटेन स्थित अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ नए अनुबंधों और व्यापार योजनाओं पर काम शुरू कर चुकी हैं। व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि जो कंपनियां नियमों, दस्तावेजी प्रक्रियाओं और गुणवत्ता मानकों को बेहतर तरीके से समझेंगी, उन्हें सबसे अधिक लाभ मिलेगा। यह समझौता भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करेगा। चुनौतियां अभी भी बरकरार हालांकि समझौते से कई संभावनाएं खुली हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार केवल शुल्क में कमी ही सफलता की गारंटी नहीं है। निर्यातकों को विभिन्न दस्तावेजी प्रक्रियाओं, मूल देश प्रमाणन, गुणवत्ता मानकों और अन्य नियमों का पालन करना होगा। विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योगों को इन प्रक्रियाओं को समझने और लागू करने के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा पर्यावरण संबंधी नियम, कार्बन उत्सर्जन से जुड़े वैश्विक मानक और अन्य गैर-शुल्क बाधाएं भी व्यापार को प्रभावित कर सकती हैं। सरकार और उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का पूरा लाभ तभी मिल सकेगा जब सरकार और उद्योग संगठन मिलकर काम करें। निर्यातकों को जागरूक करने, प्रशिक्षण देने और प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में प्रयास आवश्यक होंगे। अतीत में देखा गया है कि कई व्यापारिक समझौतों का पूरा लाभ केवल इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि छोटे व्यवसायों को उनके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी। इसलिए जागरूकता और क्षमता निर्माण इस समझौते की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उपभोक्ताओं को भी मिलेगा लाभ इस समझौते का फायदा केवल उद्योगों और निर्यातकों तक सीमित नहीं रहेगा। उपभोक्ताओं को भी अधिक विकल्प और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध हो सकते हैं। भारत में ब्रिटिश उत्पादों की उपलब्धता बढ़ सकती है, जबकि ब्रिटेन के उपभोक्ताओं को भारतीय वस्त्र, परिधान, कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुएं अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर मिल सकती हैं। बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से गुणवत्ता सुधार और नवाचार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। भविष्य की संभावनाएं भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। हालांकि इसके वास्तविक परिणाम आने वाले वर्षों में सामने आएंगे, लेकिन शुरुआती संकेत उद्योग जगत के लिए उत्साहजनक हैं। यदि भारतीय उद्योग इस अवसर का सही उपयोग करने में सफल रहते हैं, तो निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि, नए रोजगार अवसर और वैश्विक बाजार में भारत की मजबूत उपस्थिति देखने को मिल सकती है। यही कारण है कि इस समझौते को भारत और ब्रिटेन के बीच आर्थिक सहयोग के नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।    

    एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट के बोर्ड में अब नेक्स्ट जनरेशन, अविरल माहेश्वरी, आनंद माहेश्वरी और केशव माहेश्वरी बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में शामिल

    - आगामी 100 वर्षों के विजन की दिशा में एलन ने शुरू किया नया चरण बोर्ड में यह परिवर्तन संस्थापक मूल्यों, प्रोफेशनल मैनेजमेंट और अगली पीढ़ी के नेतृत्व को साथ लेकर एलन को भविष्य के लिए और बेहतर तैयार करेगा कोटा। देश की अग्रणी एजुकेशन कंपनी एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट प्राइवेट लिमिटेड ने नेक्स्ट जनरेशन अविरल माहेश्वरी, आनंद माहेश्वरी और केशव माहेश्वरी को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल किया है। एलन की अगले 100 वर्षों तक निरंतर प्रगति, समय के साथ विकास और भारतीय शिक्षा में सार्थक योगदान के उद्देश्य से ये महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट अपने विजन के अनुरूप समय-समय पर गवर्नेंस, सिस्टम, प्रक्रियाओं, नेतृत्व क्षमता और संस्थागत आधार को सुदृढ़ करने के लिए निरन्तर नवाचार और प्रयास करता आया है। यह परिवर्तन एलन की यात्रा में मील का पत्थर है, जो अगली पीढ़ी के डायरेक्टर्स के नए दृष्टिकोण, फाउंडर्स के अनुभव तथा एलन की प्रोफेशनल लीडरशिप टीम की विशेषज्ञता के साथ इंस्टीट्यूट के विजन को आगे बढ़ाएगा। इस नियुक्ति पर संस्थापक डाॅ. गोविंद माहेश्वरी ने कहा कि चार दशकों में एलन ने साझा मूल्यों, समर्पण और कठोर परिश्रम से नई ऊँचाइयाँ प्राप्त की हैं। आज जब हम अगली पीढ़ी का बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में स्वागत कर रहे हैं, तो हमें पूरा विश्वास है कि उनकी ऊर्जा और नवाचार की सोच हमें आगे की नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी। हम सभी मिलकर भारत के प्रत्येक विद्यार्थी तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाने के अपने मिशन को साकार करेंगे। नए डायरेक्टर्स का स्वागत करते हुए संस्थापक राजेश माहेश्वरी ने कहा कि अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। संस्थान में कई महत्वपूर्ण कर्यों से जुड़े रहने के कारण इन्हें एलन की कार्य संस्कृति और मूल्यों की गहरी समझ है। मुझे विश्वास है कि उनके विचार, समर्पण, हमारे बोर्ड और नेतृत्व टीम के अनुभव के साथ मिलकर एलन विकास के अगले चरण तथा आगामी 100 वर्षों के लिए सशक्त संस्थान बनाने के हमारे विजन को नई दिशा देंगे। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए संस्थापक नवीन माहेश्वरी ने कहा, हम नए नियुक्त डायरेक्टर्स को इस नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएँ देते हैं। उनकी ऊर्जा और दूरदृष्टि एलन के विकास के नए अध्याय लिखेगी। हम सलाहकार की भूमिका में बोर्ड और नेतृत्व टीम के साथ निरंतर खड़े रहेंगे तथा अपने अनुभव और मार्गदर्शन से हर कदम पर उनका सहयोग करेंगे। इस अवसर पर अविरल माहेश्वरी ने कहा, यह नियुक्ति मेरे लिए सम्मान के साथ-साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है, जिसे मैं पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूँ। मेरा प्रमुख उद्देश्य एलन की समृद्ध विरासत को और मजबूत बनाते हुए संस्थान को भविष्य के लिए तैयार करना होगा। हम अकादमिक उत्कृष्टता, तकनीक-सक्षम शिक्षण, फैकल्टी डवलपमेंट, विद्यार्थियों के समग्र कल्याण तथा मजबूत गवर्नेंस में निवेश जारी रखेंगे, ताकि हमारे विद्यार्थियों और सभी हितधारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य का निर्माण हो सके। मैं संस्थापकों, बोर्ड तथा संपूर्ण नेतृत्व टीम द्वारा मुझ पर व्यक्त किए गए विश्वास के लिए उनका आभारी हूँ और संस्थान के उद्देश्य के प्रति पूर्णतः समर्पित रहूँगा। आनंद माहेश्वरी ने कहा कि इस जिम्मेदारी के लिए मुझ पर विश्वास जताया जाना मेरे लिए सम्मान की बात है और मैं एलन के अगले चरण मेंयोगदान देने के लिए उत्साहित हूँ। मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता और प्रतिबद्धता विद्यार्थियों तथा फैकल्टीजं के प्रति रहेगी। 21वीं सदी में तकनीक, अकादमिक सिस्टम और प्रक्रियाओं के साथ मिलकर बेहतर शिक्षण का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। मेरा प्रयास रहेगा कि अकादमिक उत्कृष्टता और तकनीक के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग को एक साथ जोड़कर विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षण अनुभव और अधिक सशक्त कॅरियर परिणाम उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि वे भविष्य के अवसरों के लिए पूरी तरह तैयार हों। बोर्ड में शामिल होने पर केशव माहेश्वरी ने कहा एलन मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है और इसके मूल्यों ने मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था ‘‘वे ही वास्तव में जीवित हैं, जो दूसरों के लिए जीते हैं।‘‘ मैं इस नियुक्ति को एक बड़ी जिम्मेदारी के रूप में देखता हूँ, जिसके माध्यम से शिक्षा का सकारात्मक प्रभाव और अधिक विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सके। हमारा उद्देश्य एलन की पहुँच का विस्तार करना है, ताकि भारत या दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला एक प्रतिभाशाली और मेहनती विद्यार्थी अपने सपनों को साकार करने का वास्तविक अवसर प्राप्त कर सके। हमारा दायित्व केवल एलन की विरासत की रक्षा करना नहीं, बल्कि ए-आई और नए विचारों को अपनाते हुए इसकी संभावनाओं को नए आयाम देना भी है, साथ ही अपने मूल्यों से जुड़े रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मैं अपने सभी बोर्ड सदस्यों से सीखते हुए फाउंडर्स द्वारा तैयार की गई मजबूत नींव पर आगे निर्माण करने के लिए उत्सुक हूँ। डायरेक्टर उदय शंकर ने नव-नियुक्त डायरेक्टर्स को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पिछले 38 वर्षों में एलन ने उत्कृष्टता की एक सशक्त विरासत स्थापित की है। बदलती दुनिया में उत्कृष्टता को बनाए रखने के लिए संस्थानों का भी समय के साथ विकसित होना आवश्यक है। एलन की मजबूत गवर्नेंस स्ट्रक्चर इसी सोच को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें अगली पीढ़ी के डायरेक्टर्स का दूरदर्शी दृष्टिकोण, फाउंडर्स का अनुभव तथा सीईओ नितिन कुकरेजा के नेतृत्व में कार्यरत अनुभवी प्रोफेशनल मैनेजमेंट टीम की विशेषज्ञता एक साथ कार्य करेगी। यह संस्थान के मूल उद्देश्य की निरंतरता बनाए रखते हुए कार्यान्वयन में नवाचार को प्रोत्साहित करेगा। परिचय अविरल माहेश्वरी बारे में वर्ष 2014 से एलन से जुड़े अविरल माहेश्वरी ने संस्थान के ऑपरेशनल फ्रेमवर्क को आधुनिक बनाने तथा संगठनात्मक क्षमताओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वरिष्ठ नेतृत्व टीम के साथ मिलकर उन्होंने ऐसी संस्थागत प्रक्रियाओं का नेतृत्व किया, जिन्होंने एलन के विस्तार को गति दी, साथ ही उसके अकादमिक मानकों की गुणवत्ता को बनाए रखा। आनंद माहेश्वरी के बारे में वर्ष 2019 में एलन से जुड़ने के बाद आनंद माहेश्वरी ने अकादमिक और टेक्नोलॉजी टीमों के साथ मिलकर संस्थान के डिजिटल इकोसिस्टम को मजबूत किया है, जिससे तकनीकी नवाचार कक्षा शिक्षण को और अधिक प्रभावी बना सके। उनके नेतृत्व में एलन ने कक्षा शिक्षण में अपनी डिजिटल क्षमताओं को लगातार मजबूत किया है, साथ ही यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक नवाचार संस्थान के मूल अकादमिक दर्शन के अनुरूप हो। केशव माहेश्वरी के बारे में वर्ष 2019 में एलन से जुड़ने के बाद केशव माहेश्वरी ने संस्थान के इंटरनेशनल बिजनस का नेतृत्व किया है। उनके नेतृत्व में एलन ने विदेशी धरती पर उपस्थिति का विस्तार किया है और यह सुनिश्चित किया है कि भारतीय विद्यार्थियों को विदेशों में भी वही अकादमिक उत्कृष्टता प्राप्त हो, जिसके लिए एलन पहचाना जाता है। उनके नेतृत्व में एलन ओवरसीज भारतीय विद्यार्थियों के लिए एक मजबूत वैश्विक मंच के रूप में विकसित हुआ है तथा अंतरराष्ट्रीय ओलंपियाड और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रतिभाओं को भी तैयार कर रहा है। एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट के बारे में वर्ष 1988 में राजस्थान के कोटा में स्थापित एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट भारत के अग्रणी शिक्षा संस्थानों में से एक है, जो जेईई (मेन एवं एडवांस्ड), नीट-यूजी, इंटरनेशनल ओलंपियाड तथा अन्य राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी एवं प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए समर्पित है। पिछले 38 वर्षों में एलन ने अकादमिक उत्कृष्टता, अनुभवी फैकल्टी, विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण पद्धति तथा लगातार उत्कृष्ट परिणामों के माध्यम से लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों का विश्वास अर्जित किया है। संस्थान भारत तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने क्लासरूम कार्यक्रमों और डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म्स के व्यापक नेटवर्क के माध्यम से विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहा है।  

    "डॉ शर्मा जयपुर केंद्र निदेशक "

    वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा के कुलगुरु प्रोफेसर बी एल वर्मा द्वारा डॉ जितेंद्र कुमार शर्मा को जयपुर स्थित क्षेत्रीय केंद्र का निदेशक नियुक्त किया है l डॉ शर्मा पूर्व में जोधपुर बीकानेर कोटा अजमेर के भी निदेशक पद पर रहे हैं आपने विश्वविद्यालय में छात्र वृद्धि में नए आयाम स्थापित किए है l डॉ शर्मा को विश्वविद्यालय मैं उत्कृष्ट कार्य करने के परिणाम स्वरूप "मेमो ऑफ़ एक्सीलेंस अवॉर्ड"से भी नवाजा जा चुका हैl डॉ शर्मा ने निदेशक का पदभार ग्रहण करने के पश्चात अपनी प्राथमिकताओं में क्षेत्रीय केंद्र पर सेवाओं का विस्तार करना, छात्र संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि करना, ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार करना एवं छात्रों को बेहतर सुविधाएं प्रदान करने हेतु नवाचारों को प्राथमिकता देना शामिल हैl