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    डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रीय स्मृति दिवस पर "कलाम नवाचार एवं सतत विकास कार्यशाला-2026" का सफल आयोजन

    जयपुर। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राजकीय कन्या महाविद्यालय, गंगापोल, जयपुर में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रीय स्मृति दिवस के अवसर पर "कलाम एक... कमाल अनेक" एवं एमएसएमई उद्यमिता जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत "कलाम नवाचार एवं सतत विकास कार्यशाला-2026" का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. हेमंत पारीक ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. अशोक कुमार (अध्यक्ष, ISLS एवं पूर्व कुलपति), विशिष्ट अतिथि प्रो. मधु कुमार (UGC Emeritus Fellow, गोरखपुर विश्वविद्यालय) तथा श्री गिरीश शर्मा (सहायक निदेशक, MSME, जयपुर) ने विद्यार्थियों को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के आदर्शों, नवाचार, उद्यमिता एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में युवाओं की भूमिका पर प्रेरक विचारों से अवगत कराया। एमएसएमई द्वारा उद्यमिता एवं स्वरोजगार से संबंधित विभिन्न शासकीय योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई। साथ ही छात्राओं को अध्ययन सामग्री एवं योजनाओं की पुस्तिकाओं का वितरण किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत विश्वविद्यालय उपाधि वितरण समारोह तथा एलुमनी एसोसिएशन की बैठक भी आयोजित की गई। कार्यक्रम में 153 छात्राओं सहित शिक्षकों एवं पूर्व छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन प्रो. निधि माथुर, प्रभारी, KIIC के संयोजन में सम्पन्न हुआ। आयोजन में श्रीमती चेतना सहल, श्रीमती अनिता कटारा, डॉ. राजकुमार बैरवा, डॉ. दिलीप कुमार पंवार, डॉ. बचन सिंह एवं डॉ. सरिता शर्मा का विशेष सहयोग रहा।  

    राजस्थान विश्वविद्यालय में MSME के 30 दिवसीय उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रम (ESDP) का शुभारम्भ

    जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर स्थित ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर, जो कि भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) का होस्ट इंस्टीट्यूट है, द्वारा एमएसएमई विकास एवं सुविधा कार्यालय (MSME-DFO), जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 30 दिवसीय उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रम (Entrepreneurship Skill Development Programme – ESDP) का आज ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर परिसर में भव्य शुभारम्भ हुआ। "मशरूम उत्पादन के माध्यम से उद्यमिता : फार्म टू मार्केट" विषय पर आधारित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 27 जुलाई 2026 से 07 सितम्बर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम के लिए प्राप्त आवेदनों में से 25 प्रतिभागियों का चयन किया गया है, जिन्हें आगामी 30 दिनों तक मशरूम उत्पादन, स्पॉन एवं कम्पोस्ट निर्माण, उत्पादन तकनीक, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, विपणन, व्यवसाय प्रबंधन, वित्तीय सहायता तथा सरकारी योजनाओं से संबंधित निःशुल्क व्यावहारिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों के स्वागत, दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्प स्वागत के साथ हुआ। इसके पश्चात सुश्री अनिला चौरारिया, सहायक निदेशक, MSME-DFO, जयपुर ने कार्यक्रम की रूपरेखा, उद्देश्यों एवं MSME मंत्रालय द्वारा संचालित उद्यमिता संवर्धन कार्यक्रमों एवं योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रतिभागियों को दी। उन्होंने बताया कि MSME मंत्रालय स्वरोजगार एवं उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों, वित्तीय सहायता एवं क्षमता निर्माण योजनाओं का संचालन कर रहा है। इसके उपरांत प्रो. सुमिता कच्छवाहा, समन्वयक, ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर, राजस्थान विश्वविद्यालय ने ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करते हुए बताया कि यह केंद्र भारत सरकार के MSME मंत्रालय का मान्यता प्राप्त होस्ट इंस्टीट्यूट होने के साथ-साथ विश्वविद्यालय में नवाचार, स्टार्टअप एवं उद्यमिता गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। उन्होंने केंद्र की स्थापना, उपलब्धियों एवं विभिन्न योजनाओं की जानकारी देते हुए बताया कि ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर द्वारा स्टार्टअप इन्क्यूबेशन, प्रोटोटाइप विकास, आईपीआर एवं पेटेंट सहायता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, उद्योग–शैक्षणिक सहयोग, उद्यमिता विकास कार्यक्रम, कौशल विकास प्रशिक्षण, व्यवसाय परामर्श, मेंटरशिप, अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने सहित विभिन्न सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि केंद्र अब तक अनेक स्टार्टअप्स को सफलतापूर्वक इन्क्यूबेट कर चुका है तथा युवा उद्यमियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। इस अवसर पर डॉ. रवि के. गोयल, निदेशक, IEF, CCS National Institute of Agricultural Marketing (CCS NIAM), जयपुर ने कृषि आधारित उद्यमिता, वैल्यू एडिशन, ब्रांडिंग एवं एग्री-बिजनेस के क्षेत्र में अपार संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रतिभागियों को बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप उद्यम स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। प्रो. अरुण कुमार, संयुक्त निदेशक, PM-USHA, राजस्थान सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में नवाचार, कौशल विकास एवं उद्यमिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देते हुए विद्यार्थियों एवं युवाओं से ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अधिकतम लाभ उठाने का आह्वान किया। श्री प्रदीप ओझा, निदेशक, MSME-DFO, जयपुर ने कहा कि भारत सरकार का MSME मंत्रालय युवाओं, महिलाओं एवं नवोदित उद्यमियों को स्वरोजगार एवं रोजगार सृजन के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से निरंतर सहयोग प्रदान कर रहा है। उन्होंने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त ज्ञान एवं कौशल का उपयोग कर सफल उद्यम स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम के समापन पर डॉ. सुनील छीम्पा, प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर, ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर ने सभी अतिथियों, अधिकारियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके उपरांत उन्होंने सभी विशिष्ट अतिथियों को ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, अनुसंधान सुविधाओं, स्टार्टअप इन्क्यूबेशन अवसंरचना, उपकरणों एवं विभिन्न नवाचार गतिविधियों का भ्रमण कराया तथा केंद्र की उपलब्धियों एवं भविष्य की योजनाओं से अवगत कराया। कार्यक्रम के सफल संचालन, समन्वय एवं व्यवस्थाओं में श्री दीपक कुमार शर्मा का विशेष योगदान रहा। उन्होंने सम्पूर्ण कार्यक्रम के संचालन एवं व्यवस्थाओं का कुशलतापूर्वक प्रबंधन किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य, शोधार्थी, विद्यार्थी, उद्यमी, विभिन्न विभागों के अधिकारी तथा चयनित प्रतिभागी उपस्थित रहे। यह 30 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदेश में कृषि आधारित उद्यमिता को प्रोत्साहित करने, युवाओं को स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाने तथा "आत्मनिर्भर भारत" के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगा।  

    अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद सोनम वांगचुक ने की नई शुरुआत की घोषणा, राजघाट जाकर महात्मा गांधी को देंगे श्रद्धांजलि

    Yugcharan News / 27 July 2026 करीब एक महीने तक चले आंदोलन और लंबे अनशन के बाद सामाजिक कार्यकर्ता एवं नवप्रवर्तनकर्ता सोनम वांगचुक को सोमवार को गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अस्पताल से बाहर आने के बाद वांगचुक ने कहा कि वह सबसे पहले नई दिल्ली स्थित राजघाट जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे और उसके बाद अपने गृह क्षेत्र लद्दाख लौटेंगे। उनके इस बयान को उनके आंदोलन के अगले चरण और भविष्य की दिशा के रूप में देखा जा रहा है। वांगचुक ने अस्पताल से छुट्टी मिलने की जानकारी स्वयं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की। उन्होंने अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों और पूरे चिकित्सा दल का आभार व्यक्त करते हुए लिखा कि वह स्वस्थ महसूस कर रहे हैं और अब राजघाट जाकर महात्मा गांधी को नमन करने के बाद पहाड़ों की ओर लौटेंगे। सोशल मीडिया पर साझा किया संदेश सोनम वांगचुक ने अपने संदेश में लिखा कि उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल रही है और वह सबसे पहले राजघाट जाएंगे। उन्होंने मेदांता अस्पताल के चिकित्सकों एवं कर्मचारियों का विशेष धन्यवाद करते हुए कहा कि कठिन समय में उन्हें बेहतरीन चिकित्सा सुविधा और सहयोग मिला। उनके इस संदेश के सामने आने के बाद देशभर से उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर शुभकामनाएं दीं। कई लोगों ने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ पर खुशी जताई, जबकि अनेक समर्थकों ने उनके आंदोलन और सामाजिक मुद्दों पर किए गए प्रयासों की सराहना की। मेदांता अस्पताल ने जारी किया आधिकारिक बयान मेदांता अस्पताल की ओर से जारी आधिकारिक बयान में बताया गया कि सोनम वांगचुक को 21 जुलाई 2026 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। विभिन्न विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में उनका उपचार किया गया। अस्पताल के अनुसार इलाज के दौरान आंतरिक चिकित्सा, क्रिटिकल केयर और अन्य विशेषज्ञ विभागों ने समन्वित रूप से उनकी निगरानी की। अस्पताल ने बताया कि छुट्टी के समय उनकी स्वास्थ्य स्थिति स्थिर थी। उनके सभी आवश्यक शारीरिक संकेत सामान्य पाए गए और उन्हें नियमित अंतराल पर बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में फॉलो-अप कराने की सलाह दी गई है। 26 दिन के अनशन के बाद अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक ने छात्रों से जुड़े विभिन्न मुद्दों के समर्थन में लगभग 26 दिनों तक अनशन किया था। लंबे समय तक भोजन न लेने के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें चिकित्सा निगरानी में रखा गया। अनशन समाप्त होने के बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती रहने की सलाह दी थी। चिकित्सकीय निगरानी के दौरान उनकी नियमित जांच की गई और धीरे-धीरे उनकी स्थिति में सुधार दर्ज किया गया। आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे शामिल हाल के दिनों में राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले आंदोलन के प्रमुख चेहरों में सोनम वांगचुक का नाम लगातार चर्चा में रहा। विभिन्न छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों द्वारा चलाए गए इस आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। आंदोलन के दौरान उन्होंने शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात रखी। उनके अनशन ने भी व्यापक जनचर्चा को जन्म दिया और कई सामाजिक संगठनों ने उनके प्रति समर्थन व्यक्त किया। अनशन शुरू करने से पहले भी पहुंचे थे राजघाट जानकारी के अनुसार, अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करने से पहले भी सोनम वांगचुक राजघाट पहुंचे थे। वहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की थी और शांतिपूर्ण एवं अहिंसक तरीके से अपनी मांगों को आगे बढ़ाने का संदेश दिया था। अब अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उन्होंने एक बार फिर राजघाट जाने की घोषणा की है। इसे गांधीवादी विचारधारा और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा रहा है। स्वास्थ्य बिगड़ने पर बदला गया अस्पताल अनशन के दौरान उनकी तबीयत खराब होने के बाद उन्हें पहले दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था। बाद में न्यायालय के निर्देशों के अनुसार उन्हें गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनका उपचार किया गया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार इलाज के दौरान उनकी सेहत में लगातार सुधार हुआ और चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद उन्हें छुट्टी देने का निर्णय लिया गया। आंदोलन समाप्त होने के बाद नया संदेश जिस आंदोलन से सोनम वांगचुक जुड़े हुए थे, उसके समाप्त होने के बाद अब उनका ध्यान स्वास्थ्य लाभ और अपने गृह क्षेत्र लौटने पर है। हालांकि उन्होंने फिलहाल अपने भविष्य के कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी साझा नहीं की है, लेकिन राजघाट जाने की घोषणा को प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक और सामाजिक हलकों में उनके इस कदम को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश की, जबकि अन्य पक्षों ने पूरे घटनाक्रम पर अलग-अलग दृष्टिकोण व्यक्त किए हैं। देशभर में चर्चा का विषय बने रहे वांगचुक पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान सोनम वांगचुक लगातार राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रहे। उनके स्वास्थ्य, अनशन और आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम पर देशभर की निगाहें बनी रहीं। सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न सार्वजनिक मंचों तक उनके स्वास्थ्य और आंदोलन को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहीं। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उनके समर्थकों ने राहत की सांस ली है। कई लोगों ने उम्मीद जताई है कि वह पूरी तरह स्वस्थ होकर भविष्य में भी सामाजिक और जनहित से जुड़े विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाएंगे। आगे की राह पर नजर फिलहाल सोनम वांगचुक ने स्पष्ट किया है कि उनका पहला पड़ाव राजघाट होगा, जहां वह महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देंगे। इसके बाद वह लद्दाख लौटेंगे। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने उन्हें नियमित जांच और पर्याप्त आराम की सलाह दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह सार्वजनिक जीवन में किस प्रकार सक्रिय होते हैं और जिन मुद्दों को लेकर उन्होंने अपनी आवाज उठाई थी, उन पर आगे क्या कदम उठाते हैं। फिलहाल अस्पताल से स्वस्थ होकर बाहर आना उनके समर्थकों के लिए राहत की खबर माना जा रहा है।   इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध, संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहती है। सोनम वांगचुक की अस्पताल से छुट्टी और राजघाट जाने की घोषणा को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

    कांवड़ यात्रा 2026: 4 से 12 अगस्त तक दिल्ली-हरिद्वार हाईवे रहेगा बंद, भारी वाहनों पर 30 जुलाई से रोक; सुरक्षा के कड़े इंतजाम

    Yugcharan News / 27 July 2026 कांवड़ यात्रा 2026 को शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन ने व्यापक ट्रैफिक और सुरक्षा व्यवस्था लागू करने की घोषणा की है। प्रशासन के अनुसार, मुजफ्फरनगर जिले से होकर गुजरने वाले दिल्ली-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग तथा गंगा नहर मार्ग पर 4 अगस्त से 12 अगस्त तक सभी प्रकार के वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा 30 जुलाई से ही भारी वाहनों के प्रवेश पर चरणबद्ध तरीके से रोक लगाई जाएगी ताकि लाखों कांवड़ यात्रियों की आवाजाही सुचारु रूप से हो सके। हर वर्ष सावन के महीने में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा देश की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु हरिद्वार सहित विभिन्न गंगा घाटों से पवित्र गंगाजल लेकर अपने-अपने शहरों और गांवों के शिव मंदिरों तक पैदल यात्रा करते हैं। श्रद्धालुओं की भारी संख्या को देखते हुए प्रशासन पहले से ही सुरक्षा, ट्रैफिक प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं की विशेष तैयारी करता है। 30 जुलाई से शुरू होगी कांवड़ यात्रा प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस वर्ष कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होकर 11 अगस्त तक चलेगी। यात्रा के अंतिम दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक रहने की संभावना है। इसी कारण 4 अगस्त से 12 अगस्त तक दिल्ली-हरिद्वार हाईवे और गंगा नहर मार्ग को सामान्य वाहनों के लिए पूरी तरह बंद रखने का निर्णय लिया गया है। ट्रैफिक पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह कदम श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और यात्रा मार्ग पर किसी भी प्रकार की अव्यवस्था से बचने के लिए उठाया गया है। भारी वाहनों की आवाजाही पर पहले ही लगेगी रोक यातायात विभाग के अनुसार 30 जुलाई से ही भारी वाहनों की आवाजाही को प्रतिबंधित किया जाएगा। ट्रकों और अन्य बड़े व्यावसायिक वाहनों को वैकल्पिक मार्गों से भेजा जाएगा ताकि मुख्य मार्ग पर केवल कांवड़ यात्रियों और आवश्यक सेवाओं से जुड़े वाहनों की आवाजाही बनी रहे। ट्रैफिक अधिकारियों ने परिवहन कंपनियों और वाहन चालकों से अपील की है कि वे पहले से अपनी यात्रा की योजना बनाएं और प्रशासन द्वारा जारी किए जाने वाले डायवर्जन प्लान का पालन करें। श्रद्धालुओं के लिए आरक्षित रहेगा हाईवे का हिस्सा मुजफ्फरनगर के पुलिस अधिकारियों के अनुसार दिल्ली-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग के कई हिस्सों को कांवड़ यात्रियों के लिए आरक्षित किया जाएगा। इससे श्रद्धालुओं को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से यात्रा करने में सुविधा मिलेगी। प्रशासन का कहना है कि यात्रा के दौरान पुलिस और यातायात विभाग लगातार मार्ग की निगरानी करेगा तथा किसी भी आपात स्थिति में तत्काल कार्रवाई की जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष तैयारी जिला प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी व्यापक इंतजाम किए हैं। अधिकारियों के अनुसार प्रमुख स्नान घाटों पर प्रशिक्षित पुलिस गोताखोरों की तैनाती की जाएगी ताकि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में तुरंत राहत और बचाव कार्य किया जा सके। इसके अलावा दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित रामपुर तिराहा पर एक अस्थायी पुलिस थाना स्थापित किया गया है। इस थाने में एक थाना प्रभारी के नेतृत्व में लगभग 20 पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाएगी, जो पूरे यात्रा काल के दौरान सुरक्षा व्यवस्था संभालेंगे। 24 घंटे सक्रिय रहेगा कंट्रोल रूम राज्य सरकार ने कांवड़ यात्रा के दौरान विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के लिए 24 घंटे संचालित होने वाला कंट्रोल रूम स्थापित करने का निर्णय लिया है। यह कंट्रोल रूम पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग, बिजली विभाग और अन्य एजेंसियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखेगा। किसी भी आपात स्थिति, दुर्घटना, ट्रैफिक जाम या अन्य समस्या की सूचना मिलने पर संबंधित विभागों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए जाएंगे। सीसीटीवी और ड्रोन से होगी निगरानी प्रशासन ने यात्रा मार्गों पर सुरक्षा बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक का भी सहारा लिया है। संवेदनशील स्थानों पर बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं, जबकि प्रमुख मार्गों और भीड़भाड़ वाले इलाकों की निगरानी ड्रोन कैमरों के माध्यम से की जाएगी। अधिकारियों का मानना है कि तकनीकी निगरानी से भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा व्यवस्था और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तत्काल नजर रखी जा सकेगी। अतिरिक्त बस सेवाओं का संचालन कांवड़ यात्रा के दौरान यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) ने अतिरिक्त बसें चलाने का निर्णय लिया है। 30 जुलाई से हरिद्वार सहित प्रमुख कांवड़ मार्गों पर अतिरिक्त बस सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा गाजियाबाद-हरिद्वार मार्ग पर भी विशेष व्यवस्था की गई है। परिवहन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस रूट पर लगभग 350 अतिरिक्त बसों का संचालन किया जाएगा ताकि यात्रियों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। अस्थायी बस डिपो भी बनाए जाएंगे परिवहन विभाग ने बताया कि यात्रा के दौरान संचालन को बेहतर बनाने के लिए लालकुआं और डासना में अस्थायी बस डिपो स्थापित किए जाएंगे। इन डिपो से बसों का संचालन नियमित रूप से किया जाएगा और आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त सेवाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। अधिकारियों का कहना है कि सामान्य दिनों की तुलना में कांवड़ यात्रा के दौरान शहर के भीतर ट्रैफिक का दबाव कम रहता है, इसलिए कई बसों को हरिद्वार रूट पर लगाया जा सकेगा। यात्रियों और वाहन चालकों के लिए प्रशासन की अपील प्रशासन ने आम नागरिकों से अनुरोध किया है कि वे 4 अगस्त से 12 अगस्त के बीच दिल्ली-हरिद्वार मार्ग पर यात्रा की योजना बनाने से पहले ट्रैफिक एडवाइजरी अवश्य देखें। जिन लोगों को आवश्यक कारणों से यात्रा करनी हो, वे प्रशासन द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करें। वाहन चालकों से यह भी कहा गया है कि वे ट्रैफिक पुलिस के निर्देशों का पालन करें और किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें। यात्रा के दौरान केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की सलाह दी गई है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता उत्तर प्रदेश प्रशासन का कहना है कि कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल, यातायात नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। विभिन्न विभागों को समन्वय के साथ कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि यात्रा शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सके।   विशेषज्ञों का मानना है कि कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति को देखते हुए ट्रैफिक प्रतिबंध और अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक कदम हैं। प्रशासन का उद्देश्य धार्मिक आयोजन को सुरक्षित और सुचारु रूप से संपन्न कराना है, साथ ही आम नागरिकों को भी न्यूनतम असुविधा हो, इसके लिए वैकल्पिक यातायात व्यवस्था पर लगातार काम किया जा रहा है।

    प्रह्लाद जोशी के पुराने NEET बयान की फिर चर्चा, शिक्षा मंत्री बनने के बाद सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

      Yugcharan News / 27 July 2026 केंद्र सरकार में नए शिक्षा मंत्री के रूप में प्रह्लाद जोशी की नियुक्ति के बाद वर्ष 2022 में दिया गया उनका एक पुराना बयान एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स और राजनीतिक नेताओं ने उस बयान का उल्लेख करते हुए अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। यह बयान उस समय का है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हजारों भारतीय मेडिकल छात्र यूक्रेन में फंसे हुए थे और उन्हें सुरक्षित वापस लाने के लिए केंद्र सरकार अभियान चला रही थी। नए शिक्षा मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद प्रह्लाद जोशी के पुराने बयान के वीडियो और समाचार क्लिप दोबारा साझा किए जाने लगे। इसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस मुद्दे को लेकर व्यापक बहस देखने को मिली। कुछ लोगों ने बयान की आलोचना की, जबकि अन्य ने इसे उस समय के संदर्भ में देखने की बात कही। 2022 में क्या कहा था प्रह्लाद जोशी ने? वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय छात्र मेडिकल शिक्षा के लिए यूक्रेन में मौजूद थे। उस समय मीडिया से बातचीत के दौरान प्रह्लाद जोशी ने कहा था कि विदेश में मेडिकल पढ़ने जाने वाले लगभग 90 प्रतिशत छात्र भारत की मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) उत्तीर्ण नहीं कर पाते। उन्होंने उस समय यह भी कहा था कि इस विषय पर विवाद खड़ा करना उचित नहीं होगा और उस समय प्राथमिकता युद्धग्रस्त क्षेत्र में फंसे भारतीय छात्रों की सुरक्षित वापसी होनी चाहिए। उनके अनुसार उस समय छात्रों के विदेश जाने के कारणों पर बहस करने का समय नहीं था। हालांकि, उनका यह बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर काफी प्रतिक्रियाएं आई थीं और कई लोगों ने इसे छात्रों के प्रति असंवेदनशील बताया था। शिक्षा मंत्री बनने के बाद फिर वायरल हुआ बयान हाल ही में प्रह्लाद जोशी को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनका पुराना बयान फिर से विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया जाने लगा। कई यूजर्स ने वीडियो क्लिप और पुराने समाचारों के स्क्रीनशॉट पोस्ट करते हुए इस पर अपनी राय व्यक्त की। कुछ विपक्षी नेताओं ने भी इस बयान का उल्लेख करते हुए सरकार पर निशाना साधा। वहीं कई समर्थकों का कहना है कि उस समय दिए गए बयान को उसके पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए और केवल एक हिस्से को साझा कर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मिला नया दायित्व प्रह्लाद जोशी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का पद ऐसे समय संभाला है जब देश में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेष रूप से NEET परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। पूर्व शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा और विनम्रता के साथ निभाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि उन्हें शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपे जाने पर गर्व है और वे देश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में कार्य करेंगे। प्रह्लाद जोशी का राजनीतिक अनुभव प्रह्लाद जोशी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और कर्नाटक के धारवाड़ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे पहले वे संसदीय कार्य मंत्री, कोयला मंत्री, खान मंत्री सहित कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वर्तमान में उनके पास उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की भी जिम्मेदारी है। अब शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त दायित्व मिलने के बाद उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मेडिकल शिक्षा को लेकर पुरानी बहस फिर तेज जोशी के पुराने बयान के फिर से चर्चा में आने के साथ ही मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर बहस भी तेज हो गई है। हर वर्ष बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेशों में मेडिकल शिक्षा के लिए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि देश में सीमित सरकारी मेडिकल सीटें, निजी कॉलेजों की ऊंची फीस और प्रतिस्पर्धा के कारण कई छात्र विदेश का रुख करते हैं। दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता, सीटों की उपलब्धता और प्रवेश प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय के सामने आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण चुनौतियां रहेंगी। सोशल मीडिया पर मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया प्रह्लाद जोशी के पुराने बयान को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे छात्रों की मेहनत का अपमान बताया, जबकि कई अन्य यूजर्स ने कहा कि बयान को पूरे संदर्भ के साथ समझना चाहिए। राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी इस विषय पर अपनी-अपनी राय रखी है। विपक्षी दलों ने इसे सरकार की शिक्षा नीति से जोड़कर सवाल उठाए, जबकि भाजपा नेताओं का कहना है कि नए शिक्षा मंत्री शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए गंभीरता से कार्य करेंगे। आगे की चुनौतियां शिक्षा मंत्रालय की कमान संभालने के बाद प्रह्लाद जोशी के सामने प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, परीक्षा सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, मेडिकल शिक्षा में सुधार और छात्रों का विश्वास बहाल करने जैसी कई महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के घटनाक्रमों के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने के लिए व्यापक सुधारों की आवश्यकता होगी। ऐसे में नए शिक्षा मंत्री से छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा जगत की अपेक्षाएं भी काफी बढ़ गई हैं। फिलहाल, वर्ष 2022 का उनका पुराना बयान एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ है, जबकि शिक्षा मंत्रालय की ओर से भविष्य में परीक्षा प्रणाली और उच्च शिक्षा से जुड़े सुधारों पर सभी की नजर बनी रहेगी।      

    ई-20 ईंधन विवाद: केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ी राहत, Meta-Google समेत कई प्लेटफॉर्म के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की अनुमति

    Yugcharan News / 27 July 2026 ई-20 ईंधन नीति को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कथित डीपफेक वीडियो और आपत्तिजनक पोस्ट के मामले में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को महत्वपूर्ण कानूनी राहत मिली है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें Meta, Google, X (पूर्व में Twitter), YouTube तथा अन्य संबंधित पक्षों के खिलाफ दीवानी मानहानि (Civil Defamation) का मुकदमा दायर करने की अनुमति प्रदान कर दी है। बताया जा रहा है कि मंत्री की ओर से अदालत में दायर याचिका में दावा किया गया है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे वीडियो, पोस्ट, रील और अन्य डिजिटल सामग्री प्रसारित की गई, जिनमें उनकी छवि को कथित रूप से गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। याचिका के अनुसार इन सामग्रियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित डीपफेक तकनीक का उपयोग कर मंत्री की आवाज, चेहरा और व्यक्तित्व का बिना अनुमति इस्तेमाल किया गया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास हुआ। अदालत ने दी मुकदमा दायर करने की अनुमति मामले की सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अभय आहूजा की अदालत में हुई। नितिन गडकरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप एस. लड्डा ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि विवादित सामग्री मुंबई सहित देशभर में इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध है। चूंकि यह कंटेंट बॉम्बे हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में भी देखा जा सकता है, इसलिए इस मामले में अदालत के समक्ष दीवानी वाद दायर करने की अनुमति आवश्यक थी। दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने मंत्री को मुकदमा दायर करने की अनुमति प्रदान कर दी। विस्तृत आदेश आने की प्रतीक्षा है। क्या है पूरा विवाद? याचिका के अनुसार कुछ अज्ञात व्यक्तियों द्वारा सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट और डीपफेक वीडियो प्रसारित किए गए जिनमें यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि ई-20 पेट्रोल कार्यक्रम के लिए व्यक्तिगत रूप से नितिन गडकरी जिम्मेदार हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ पोस्टों में मंत्री और उनके परिवार पर इस नीति से आर्थिक लाभ उठाने जैसे आरोप लगाए गए, जिन्हें पूरी तरह निराधार, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक बताया गया है। मंत्री का कहना है कि इस प्रकार की सामग्री आम लोगों के बीच उनकी सार्वजनिक छवि को प्रभावित करने तथा यह संदेश देने का प्रयास करती है कि उन्होंने अपने सार्वजनिक पद का निजी लाभ के लिए उपयोग किया है। डीपफेक तकनीक पर भी जताई चिंता याचिका में विशेष रूप से डीपफेक तकनीक के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि AI आधारित तकनीक के माध्यम से मंत्री की आवाज, चेहरा, हाव-भाव और व्यक्तित्व की नकली डिजिटल सामग्री तैयार कर सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई। विशेषज्ञों के अनुसार डीपफेक तकनीक का उपयोग हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है, जिसके कारण फर्जी वीडियो और ऑडियो बनाकर किसी भी व्यक्ति की छवि को प्रभावित करना पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया है। किन पक्षों को बनाया गया प्रतिवादी? प्रस्तावित मुकदमे में Meta (Facebook और Instagram), Google LLC, YouTube, X Corp के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा दूरसंचार विभाग को भी पक्षकार बनाया गया है। इसके अतिरिक्त उन अज्ञात व्यक्तियों को भी "John Doe" या "Ashok Kumar" प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया है, जिनकी पहचान अभी तक स्पष्ट नहीं हो सकी है लेकिन जिन पर कथित रूप से विवादित सामग्री तैयार करने या प्रसारित करने का आरोप है। 11 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग मंत्री की ओर से दायर प्रस्तावित मुकदमे में लगभग 11 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग भी की गई है। याचिका के अनुसार वायरल सामग्री के कारण उनकी प्रतिष्ठा, सार्वजनिक छवि, व्यक्तिगत सम्मान और व्यक्तित्व अधिकारों को गंभीर क्षति पहुंची है। इसलिए संबंधित पक्षों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction), आपत्तिजनक सामग्री हटाने तथा क्षतिपूर्ति की मांग की गई है। अदालत में क्या कहा गया? याचिका में स्पष्ट किया गया है कि यह मुकदमा किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक आलोचना या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने के उद्देश्य से नहीं लाया जा रहा है। दस्तावेजों के अनुसार मंत्री की ओर से कहा गया है कि तथ्य आधारित, सद्भावना में की गई और सार्वजनिक हित से जुड़ी आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। हालांकि, झूठे आरोप, डीपफेक सामग्री और मानहानिकारक दुष्प्रचार को वैध अभिव्यक्ति की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। ई-20 पेट्रोल क्या है? ई-20 पेट्रोल ऐसा ईंधन है जिसमें लगभग 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण होता है। केंद्र सरकार का उद्देश्य इस मिश्रण के माध्यम से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, प्रदूषण में कमी लाना तथा देश में जैव ईंधन (Biofuel) के उपयोग को बढ़ावा देना है। हालांकि इस नीति को लेकर समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा होती रही है। कुछ विशेषज्ञों और वाहन मालिकों ने पुराने वाहनों की ई-20 ईंधन के साथ अनुकूलता को लेकर चिंता व्यक्त की है। वहीं सरकार और कई वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि नई पीढ़ी के वाहन इस ईंधन के अनुरूप तैयार किए जा रहे हैं। आगे क्या होगा? हाईकोर्ट से अनुमति मिलने के बाद अब नितिन गडकरी औपचारिक रूप से दीवानी मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे। मामले की सुनवाई आगे बॉम्बे हाईकोर्ट की संबंधित पीठ के समक्ष होगी, जहां सभी पक्षों को अपना-अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। यदि अदालत प्रारंभिक सुनवाई में उचित समझती है, तो संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को विवादित सामग्री हटाने, भविष्य में ऐसी सामग्री के प्रसार को रोकने अथवा अन्य आवश्यक निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं। हालांकि अंतिम निर्णय अदालत की विस्तृत सुनवाई और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।   फिलहाल यह मामला देश में डीपफेक तकनीक, ऑनलाइन मानहानि, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और डिजिटल अधिकारों से जुड़ी बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। मामले में आगे आने वाले न्यायिक आदेशों पर सभी की नजर बनी हुई है।

    संसद में हंगामे के बीच परीक्षा सुधार विधेयक पेश, छात्र आंदोलन और राजनीतिक आरोपों पर गरमाई सियासत

      Yugcharan News / 27 July 2026 नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामे के बीच Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 पेश किया गया। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं को रोकने के लिए कानून को और प्रभावी बनाना बताया जा रहा है। हालांकि विपक्ष ने इसे पर्याप्त समाधान मानने से इनकार करते हुए छात्र आंदोलनों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई, विरोध प्रदर्शन और जवाबदेही के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। लोकसभा में विधेयक पेश होने के तुरंत बाद विपक्षी सदस्यों के विरोध के कारण कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। लोकसभा अध्यक्ष ने विधेयक पर चर्चा के लिए छह घंटे का समय निर्धारित करने की घोषणा की और सभी दलों से सार्थक बहस में भाग लेने की अपील की। इसके बावजूद सदन में लगातार नारेबाजी जारी रही और कार्यवाही बाधित होती रही। विपक्ष ने उठाए छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के मुद्दे संसद के भीतर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने हाल के छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई कथित पुलिस कार्रवाई पर सरकार से जवाब मांगा। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किया गया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री से संसद में विस्तृत बयान देने की मांग भी की। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि छात्रों पर कथित रूप से बल प्रयोग लोकतांत्रिक अधिकारों के विपरीत है। समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि सरकार की ओर से इन आरोपों पर अलग रुख सामने आया। सत्तापक्ष के नेताओं ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और यदि कहीं किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो उसकी जांच की जाएगी। परीक्षा सुधार विधेयक पर सरकार का पक्ष सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ाने और संगठित पेपर लीक नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार के अनुसार नई व्यवस्था परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता मजबूत करेगी तथा भविष्य में होने वाली अनियमितताओं को रोकने में मदद करेगी। सत्तापक्ष के कई सांसदों ने दावा किया कि सरकार परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने के लिए व्यापक सुधारों पर काम कर रही है। वहीं विपक्ष के कुछ सांसदों का कहना है कि केवल कानून में संशोधन पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक चुनौतियों पर भी व्यापक सुधार आवश्यक हैं। संसद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज रही। विपक्ष ने पूर्व शिक्षा मंत्री को लेकर सरकार पर निशाना साधा, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सांसदों ने उनका समर्थन किया। कांग्रेस नेताओं ने सरकार पर जवाबदेही से बचने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा नेताओं ने कहा कि विपक्ष राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है और परीक्षा सुधारों को लेकर सरकार गंभीर है। बिहार में प्रदर्शनों के बाद कार्रवाई इसी बीच बिहार में छात्र आंदोलनों से जुड़े घटनाक्रम भी चर्चा में रहे। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई लोगों को हिरासत में लिया गया था। कुछ अधिवक्ताओं ने दावा किया कि बड़ी संख्या में छात्रों को विभिन्न थानों में रखा गया तथा कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए। दूसरी ओर पुलिस अधिकारियों ने कहा कि हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों के आधार पर कार्रवाई की गई। पुलिस के अनुसार कई मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई और कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई गई। कथित AK-47 फायरिंग मामले में कार्रवाई बिहार के सीवान जिले में विरोध प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से फायरिंग किए जाने का वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन ने संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया। वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। पुलिस के अनुसार प्रदर्शन के दौरान कई सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया तथा कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई किए जाने की बात कही है। सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव विपक्ष लगातार यह मांग करता रहा कि छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और परीक्षा प्रणाली से जुड़े सभी मुद्दों पर संसद में विस्तृत चर्चा कराई जाए। वहीं सरकार ने परीक्षा सुधार विधेयक को प्राथमिकता देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य भविष्य में ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति रोकना है। राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदनों में दिनभर कई बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्ष से चर्चा में भाग लेने की अपील की, जबकि विपक्ष ने पहले छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर सरकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया की मांग दोहराई। मीडिया रिपोर्टों में आंदोलन पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी हाल के छात्र आंदोलनों और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर विस्तृत विश्लेषण प्रकाशित किए हैं। इन रिपोर्टों में आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव, युवाओं की भागीदारी और सोशल मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। हालांकि इन विश्लेषणों में व्यक्त विचार संबंधित प्रकाशनों के हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना शेष है। नितिन गडकरी ने कथित डीपफेक सामग्री पर कानूनी कदम उठाया इसी दौरान एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपने खिलाफ कथित रूप से प्रसारित डीपफेक और मानहानिकारक सामग्री को लेकर कानूनी कार्रवाई शुरू की है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें संबंधित सिविल मुकदमा दायर करने की अनुमति प्रदान की। याचिका में दावा किया गया है कि सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री प्रसारित की गई जिसमें उन्हें E20 ईंधन कार्यक्रम के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बताया गया तथा उनके और उनके परिवार पर आर्थिक लाभ लेने के आरोप लगाए गए। गडकरी ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और मानहानिकारक बताया है। प्रस्तावित मुकदमे में Meta, Google, X, YouTube सहित कई संस्थाओं और अज्ञात व्यक्तियों को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में लगभग 11 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग भी की गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि मुकदमे का उद्देश्य वैध आलोचना को रोकना नहीं बल्कि कथित रूप से झूठी और AI आधारित भ्रामक सामग्री के प्रसार को चुनौती देना है। आगे की राह फिलहाल संसद में परीक्षा सुधार विधेयक पर चर्चा और छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक टकराव जारी है। आने वाले दिनों में विधेयक पर विस्तृत बहस, पुलिस कार्रवाई की जांच, अदालतों में चल रही कानूनी कार्यवाही तथा विभिन्न राज्यों में दर्ज मामलों की प्रगति पर सभी की नजर रहेगी। सरकार का कहना है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, जबकि विपक्ष का आग्रह है कि कानून के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही और छात्रों के अधिकारों की भी समान रूप से रक्षा की जानी चाहिए। संसद के मानसून सत्र में यह मुद्दा आने वाले दिनों में भी प्रमुख राजनीतिक और विधायी विषय बना रहने की संभावना है।      

    बिहार बंद हिंसा: सिवान में AK-47 चलाने वाला पुलिसकर्मी निलंबित, छात्र प्रदर्शन के बाद 200 से अधिक लोगों की हिरासत पर उठे सवाल

      युगचरण न्यूज़ / 27-07-2026 बिहार में हाल ही में हुए छात्र आंदोलन और बिहार बंद के दौरान हुई हिंसा को लेकर नया घटनाक्रम सामने आया है। राज्य के सिवान जिले में प्रदर्शन के दौरान कथित रूप से AK-47 से फायरिंग करने वाले एक पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया है। वहीं, पटना सहित विभिन्न जिलों में छात्र प्रदर्शन के बाद बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने को लेकर भी कानूनी और राजनीतिक बहस तेज हो गई है। प्रदर्शन कथित NEET पेपर लीक मामले और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित किए गए थे। इस दौरान कई स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक होने की भी खबरें सामने आईं। प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई, जबकि प्रदर्शनकारियों और उनके पक्ष में खड़े अधिवक्ताओं ने पुलिस पर आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग और मनमानी हिरासत के आरोप लगाए हैं। सिवान में पुलिसकर्मी निलंबित बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, 25 जुलाई को बिहार बंद के दौरान सिवान में एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से फायरिंग किए जाने की घटना सामने आने के बाद संबंधित पुलिसकर्मी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) के अनुसार, पूरे मामले की विभागीय जांच शुरू कर दी गई है और यह पता लगाया जा रहा है कि फायरिंग किन परिस्थितियों में हुई तथा निर्धारित पुलिस प्रोटोकॉल का पालन किया गया या नहीं। इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया था। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया और निष्पक्ष जांच की मांग की। 200 से अधिक प्रदर्शनकारियों की हिरासत का दावा प्रदर्शनकारियों को कानूनी सहायता उपलब्ध करा रहे कुछ अधिवक्ताओं का दावा है कि 22 और 25 जुलाई को हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद लगभग 200 लोगों को विभिन्न थानों में हिरासत में लिया गया था। उनका कहना है कि इनमें बड़ी संख्या में छात्र शामिल थे तथा कुछ नाबालिग भी थे। वकीलों के अनुसार कई हिरासत में लिए गए लोगों को बाद में न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जबकि महिलाओं और कुछ नाबालिगों को व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा कर दिया गया। कुछ परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके परिजनों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी समय पर नहीं दी गई। वहीं अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि गिरफ्तार व्यक्तियों को नियमानुसार निर्धारित समय के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। हालांकि इन आरोपों पर पुलिस प्रशासन का पक्ष अलग है। पुलिस का क्या कहना है? पटना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि 25 जुलाई को गांधी मैदान क्षेत्र में हुई हिंसा के संबंध में गिरफ्तार किए गए कई आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जबकि महिलाओं और नाबालिगों सहित कुछ लोगों को व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा कर दिया गया। पुलिस के अनुसार हिंसा के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ तथा कानून-व्यवस्था बाधित करने की कोशिश की गई। इसी आधार पर विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं। प्रशासन का कहना है कि जिन लोगों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिले हैं, उनके विरुद्ध विधि सम्मत कार्रवाई की जा रही है। कई जिलों में दर्ज हुए मामले बिहार पुलिस के अनुसार 25 जुलाई को हुए बिहार बंद के दौरान सिवान, सारण, भागलपुर, सीतामढ़ी और जहानाबाद सहित कई जिलों में हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं दर्ज की गईं। अधिकारियों ने बताया कि विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और कई आरोपियों को गिरफ्तार भी किया गया है। पुलिस के अनुसार इस दौरान कई सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा, एक निजी वाहन में भी तोड़फोड़ की गई तथा कई पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान घायल हुए। गांधी मैदान हिंसा पर चार एफआईआर पटना के गांधी मैदान थाना क्षेत्र में हुई हिंसा को लेकर पुलिस ने चार अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की हैं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार एक मामला थाना प्रभारी के बयान पर, दूसरा मजिस्ट्रेट की शिकायत पर, तीसरा पुलिस चौकी पर हमले से संबंधित तथा चौथा सरकारी वाहन को नुकसान पहुंचाने के आरोप में दर्ज किया गया है। इन मामलों में गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा, सरकारी कार्य में बाधा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अन्य संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है। प्रदर्शनकारियों के आरोप प्रदर्शन से जुड़े कुछ छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई निर्दोष छात्रों को केवल प्रदर्शन स्थल के आसपास मौजूद होने के कारण हिरासत में लिया गया। उनका कहना है कि सरकार की ओर से पहले यह आश्वासन दिया गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन इसके बावजूद कई मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई। प्रदर्शनकारियों का यह भी कहना है कि यदि किसी छात्र ने हिंसा में भाग नहीं लिया है, तो उसके खिलाफ दर्ज मामलों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर प्रशासन का जोर राज्य प्रशासन का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन किसी भी स्थिति में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या पुलिस पर हमला स्वीकार्य नहीं हो सकता। अधिकारियों का कहना है कि जहां भी कानून का उल्लंघन हुआ, वहां नियमानुसार कार्रवाई की गई। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी पुलिसकर्मी द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। सिवान में पुलिसकर्मी का निलंबन इसी प्रक्रिया का हिस्सा बताया जा रहा है। राजनीतिक और कानूनी बहस जारी बिहार बंद और छात्र आंदोलन के बाद उत्पन्न स्थिति अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है। यह मुद्दा संसद से लेकर न्यायालय तक पहुंच चुका है। विपक्ष लगातार छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि सरकार परीक्षा सुधार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर अपना पक्ष रख रही है। उधर, सुप्रीम कोर्ट में भी छात्र प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। अदालत ने हाल ही में मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि शांतिपूर्ण और वैधानिक प्रदर्शन संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार हैं तथा यदि कहीं अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। आगे क्या? अब सभी की नजर बिहार पुलिस की विभागीय जांच, दर्ज मामलों की कानूनी प्रक्रिया और न्यायालयों में चल रही सुनवाई पर टिकी हुई है। यदि जांच में किसी भी पक्ष की ओर से नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो आगे और कार्रवाई संभव है। फिलहाल यह मामला छात्र आंदोलनों, पुलिस की जवाबदेही, कानून-व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक जांच, न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।      

    CJP आंदोलन की सफलता से बढ़ी मोदी सरकार की चुनौती, विपक्ष और युवाओं को मिला नया राजनीतिक संबल

    युगचरण न्यूज़ / 27-07-2026 देशभर में परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन अब केवल एक छात्र विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आंदोलन ने केंद्र की राजनीति, विपक्ष की सक्रियता और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इसी बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इस आंदोलन को बड़ी राजनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है, जबकि इसे लेकर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रकाशित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विश्लेषणों के अनुसार, यह घटनाक्रम पिछले कई वर्षों में केंद्र सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में से एक माना जा रहा है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस पूरे घटनाक्रम को लेकर विस्तृत राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन संसद से लेकर सोशल मीडिया तक इस विषय पर व्यापक चर्चा जारी है। छात्र आंदोलन से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा मुद्दा बताया जा रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर का अभियान बन गया। हजारों छात्रों और युवाओं ने विभिन्न राज्यों में विरोध प्रदर्शन किए और सरकार से जवाबदेही की मांग की। आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर थी। बाद में उनके इस्तीफे के बाद आंदोलन से जुड़े कई लोगों ने इसे जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने शिक्षा सुधार, रोजगार, युवाओं की भागीदारी और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे व्यापक मुद्दों को भी राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बना दिया। सोशल मीडिया बना आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत विश्लेषकों के अनुसार इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता सोशल मीडिया का व्यापक उपयोग रहा। बड़ी संख्या में युवाओं ने इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व ट्विटर), यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वीडियो, मीम्स और संदेश साझा कर आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लाखों युवाओं की भागीदारी ने आंदोलन को तेजी से विस्तार दिया। सोशल मीडिया पर लगातार चल रहे अभियानों ने शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को लेकर सार्वजनिक चर्चा को भी प्रभावित किया। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव ने पारंपरिक राजनीतिक अभियानों की तुलना में युवाओं को अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से रखने का अवसर दिया। राजनीतिक माहौल में बदलाव के संकेत राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस घटनाक्रम ने लंबे समय बाद विपक्षी दलों को भी एक साझा मुद्दा उपलब्ध कराया। संसद में कई विपक्षी दलों ने छात्र आंदोलनों, शिक्षा सुधार और कथित पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने सरकार से शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और छात्र आंदोलनों के दौरान हुई घटनाओं पर जवाब मांगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इस आंदोलन ने विपक्ष को एक ऐसा मंच दिया है, जिसके माध्यम से वह युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उठा रहा है। सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद सरकार के सामने अब केवल परीक्षा सुधार का प्रश्न नहीं है, बल्कि युवाओं के बीच विश्वास बहाल करने की चुनौती भी है। हालांकि केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनियमितताओं को रोकने के लिए नया संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया है और परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम उठाने की बात कही है। सरकार का कहना है कि परीक्षा माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई और तकनीकी सुधारों के माध्यम से भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने का प्रयास किया जाएगा। इसके बावजूद विपक्ष का कहना है कि केवल कानून में संशोधन पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक संरचनात्मक सुधारों की भी आवश्यकता है। लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी बढ़ी चर्चा आंदोलन के दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों और उन पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई के बाद देशभर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को लेकर भी व्यापक बहस शुरू हो गई है। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदान किया गया है। वहीं प्रशासन का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी है। ऐसे में इन दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी विषय से संबंधित कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है, जहां अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार बताते हुए पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर टिप्पणी की है। युवाओं की राजनीतिक भागीदारी पर जोर आंदोलन से जुड़े कुछ प्रतिनिधियों ने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा है कि देश की राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी के सामने रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर राजनीतिक विमर्श होना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि यह भागीदारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में आगे बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव विभिन्न चुनावों और सार्वजनिक नीतियों पर भी दिखाई दे सकता है। आगामी चुनावों पर भी रहेगी नजर राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस आंदोलन का वास्तविक राजनीतिक प्रभाव आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य के आम चुनावों के दौरान देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से उन राज्यों में, जहां बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श का प्रमुख हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस आंदोलन का चुनावी राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ेगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इसने युवाओं की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई है। लोकतंत्र में संवाद की आवश्यकता राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि शिक्षा, रोजगार और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार, विपक्ष और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच निरंतर संवाद आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी असंतोष का समाधान बातचीत, संस्थागत सुधार और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संभव है।   फिलहाल, छात्र आंदोलन, शिक्षा सुधार और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम देश की राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं। आने वाले दिनों में संसद, न्यायपालिका और विभिन्न राजनीतिक दलों की भूमिका इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वहीं लाखों छात्र और अभिभावक अब परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थायी सुधारों की उम्मीद लगाए हुए हैं।

    संसद में पेपर लीक कानून पर घमासान, छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार- विपक्ष आमने-सामने

        युगचरण न्यूज़ / 27-07-2026 संसद के मानसून सत्र का सोमवार का दिन भारी हंगामे, तीखी राजनीतिक बयानबाज़ी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अहम विधेयक पर टकराव के नाम रहा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्ष ने हाल ही में हुए छात्र आंदोलनों के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई, पेलेट गन के इस्तेमाल और बिहार में कथित रूप से हथियारों के प्रयोग के आरोपों को लेकर केंद्र सरकार को घेरा। वहीं सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल पर रोक लगाने के उद्देश्य से सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया। दिनभर विपक्ष ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सदन में बयान देने की मांग की, जबकि सरकार ने परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए लाए गए विधेयक पर चर्चा कराने की अपील की। लगातार नारेबाजी और विरोध के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। पेपर लीक रोकने के लिए संशोधन विधेयक पेश लोकसभा में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया। सरकार का कहना है कि यह संशोधन परीक्षा माफियाओं पर सख्त कार्रवाई, डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बताया कि इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा के लिए छह घंटे का समय निर्धारित किया गया है। उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने और सार्थक बहस में भाग लेने की अपील की। हालांकि विपक्ष के लगातार विरोध और नारेबाजी के चलते विधेयक पेश होने के कुछ ही मिनटों बाद लोकसभा की कार्यवाही पहले दोपहर तक और बाद में शाम पांच बजे तक स्थगित करनी पड़ी। छात्र आंदोलन पर सरकार से जवाब मांगता विपक्ष संसद में विपक्षी दलों ने 20 जुलाई को हुए छात्र आंदोलन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई को प्रमुख मुद्दा बनाया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया। कांग्रेस नेताओं ने गृह मंत्री अमित शाह से सदन में विस्तृत बयान देने की मांग करते हुए कहा कि छात्रों पर हुई कार्रवाई को लेकर सरकार को जवाब देना चाहिए। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों की आवाज़ सुनने के बजाय उन पर बल प्रयोग किए जाने के आरोप गंभीर हैं और इस पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। कई विपक्षी सांसदों ने यह भी मांग की कि प्रदर्शन के दौरान दर्ज किए गए मामलों की समीक्षा की जाए और यदि निर्दोष छात्रों पर कार्रवाई हुई है तो उन्हें राहत दी जाए। सरकार ने परीक्षा सुधारों को बताया प्राथमिकता सरकार की ओर से भारतीय जनता पार्टी के कई सांसदों ने संशोधन विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आए पेपर लीक मामलों ने लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया है। ऐसे में परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त बनाना समय की आवश्यकता है। बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा कि केंद्र सरकार परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है और यह विधेयक उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार सरकार ने पहले ही विशेषज्ञ समिति का गठन किया है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। सत्ता पक्ष के अन्य नेताओं ने भी कहा कि कठोर कानूनी प्रावधान परीक्षा माफियाओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे और ईमानदार छात्रों का विश्वास मजबूत करेंगे। विपक्ष ने विधेयक को बताया अधूरा समाधान कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने संशोधन विधेयक की आलोचना करते हुए कहा कि यह केवल अस्थायी समाधान है। उनका कहना था कि यदि सरकार वास्तव में शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार चाहती है तो उसे संपूर्ण शिक्षा प्रणाली से जुड़े मूलभूत मुद्दों पर व्यापक कानून लाना चाहिए। अन्य विपक्षी नेताओं ने भी आरोप लगाया कि केवल सजा बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनके अनुसार परीक्षा संस्थाओं में पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधारों पर भी समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत पर बढ़ा राजनीतिक विवाद पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के संसद पहुंचने पर एनडीए सांसदों द्वारा उनका स्वागत किए जाने से भी राजनीतिक विवाद गहरा गया। संसद परिसर में कुछ सांसदों ने उनके समर्थन में नारे लगाए, जिसके बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। विपक्ष का कहना था कि हाल के घटनाक्रम के बाद इस प्रकार का स्वागत गलत संदेश देता है। वहीं एनडीए नेताओं ने इसे राजनीतिक समर्थन और व्यक्तिगत सम्मान का प्रतीक बताया। इस मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों के बीच संसद के भीतर और बाहर तीखी बयानबाज़ी देखने को मिली। अमित शाह के बयान की मांग तेज कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल लगातार गृह मंत्री अमित शाह से संसद में बयान देने की मांग करते रहे। विपक्ष का आरोप है कि छात्र आंदोलनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर सरकार को सदन में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा, के.सी. वेणुगोपाल सहित कई नेताओं ने कहा कि यदि कहीं भी अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने भी कहा कि सरकार को छात्रों पर दर्ज मामलों की जानकारी सदन में देनी चाहिए। हालांकि सरकार की ओर से इस विषय पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सदन में सामने नहीं आई। संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित दिनभर विपक्षी सदस्यों की नारेबाजी के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। अध्यक्ष ओम बिरला ने कई अवसरों पर सभी दलों से सहयोग की अपील करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और संसद का समय सार्थक बहस में व्यतीत होना चाहिए। राज्यसभा की कार्यवाही भी कई बार स्थगित करनी पड़ी। लोकसभा में भी अध्यक्ष ने विपक्ष से शाम के सत्र में विधेयक पर चर्चा में भाग लेने का अनुरोध किया। एनडीए की संसदीय बैठक आज इस बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने मंगलवार को अपनी नियमित संसदीय बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि बैठक में संसद की रणनीति, विपक्ष के आरोपों और पेपर लीक संशोधन विधेयक को लेकर आगे की कार्ययोजना पर चर्चा होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, छात्र आंदोलनों और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर बहस और तेज हो सकती है। आगे की राह मानसून सत्र के दौरान सरकार की प्राथमिकता परीक्षा सुधार संबंधी विधेयक को पारित कराना है, जबकि विपक्ष छात्र आंदोलनों के दौरान हुई कथित पुलिस कार्रवाई, युवाओं के मुद्दों और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग को प्रमुखता से उठा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में संसद में इन दोनों मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है। यदि सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलती है तो पेपर लीक रोकने से जुड़े प्रस्तावित संशोधन विधेयक पर विस्तृत बहस के साथ विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों पर भी सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना पड़ सकता है। फिलहाल, संसद का मानसून सत्र शिक्षा व्यवस्था, छात्रों के अधिकार, परीक्षा सुधार और राजनीतिक जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित होता दिखाई दे रहा है, जिनका प्रभाव आने वाले समय में देश की नीतियों और लाखों छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है।

    शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार, केवल विरोध के आधार पर लाठीचार्ज उचित नहीं: सीजेआई सूर्यकांत

      युगचरण न्यूज़ / 27-07-2026 भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सोमवार को शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में किए जाने वाले प्रदर्शनों को संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार बताते हुए महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि केवल इस आधार पर कि लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, पुलिस द्वारा लाठीचार्ज या अत्यधिक बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी भी प्रकार के पुलिस अत्याचार या बल प्रयोग के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई, जिनमें देशभर में परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस बल प्रयोग, विशेष रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर क्षेत्र में हुई कार्रवाई, को चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई। शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र की पहचान सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण और वैधानिक तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक कोई प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, तब तक केवल प्रदर्शन होने के कारण कठोर पुलिस कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती। पीठ ने यह भी कहा कि यदि पुलिस द्वारा आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगाए गए हैं, तो उन आरोपों की स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच होनी चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यह केवल दिल्ली तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश में प्रदर्शन से निपटने के लिए एक समान पुलिस प्रोटोकॉल बनाए जाने की आवश्यकता है। अदालत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन के महत्व पर भी जोर दिया, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट किया कि अनुशासन बनाए रखने के नाम पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों का हनन स्वीकार्य नहीं हो सकता। पुलिसकर्मियों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान उन पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से पेश हुए वकील को भी अदालत ने कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी, जिनके परिजन प्रदर्शन के दौरान घायल हुए थे। इस दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की चोट चिंता का विषय है, चाहे वह प्रदर्शनकारी छात्र हो या पुलिसकर्मी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पुलिसकर्मियों को भीड़ नियंत्रण के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, तो राज्य सरकारों से इस संबंध में जवाब मांगा जा सकता है। अदालत ने संकेत दिया कि पुलिस बल को हेलमेट और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। सभी याचिकाओं पर होगी संयुक्त सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे से जुड़ी सभी याचिकाओं को एक साथ सुनने का निर्णय लिया है। अदालत का मानना है कि विभिन्न याचिकाओं में उठाए गए प्रश्न समान प्रकृति के हैं और एक साथ सुनवाई से व्यापक संवैधानिक मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय देने में सुविधा होगी। इससे पहले वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने देशभर में जारी छात्र आंदोलनों और कथित पुलिस कार्रवाई का हवाला देते हुए मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश ने उस समय इस विषय पर विचार करने का आश्वासन दिया था। हालांकि इससे पहले 22 जुलाई को अदालत ने इसी विषय पर भेजे गए एक पत्र के आधार पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। बाद में स्पष्ट किया गया कि उस समय अदालत के समक्ष विधिवत दायर याचिका उपलब्ध नहीं थी, इसलिए सूचीबद्ध नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं ने क्या आरोप लगाए? याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि 20 जुलाई 2026 को शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के विरोध में छात्रों एवं अन्य नागरिकों ने संसद की ओर शांतिपूर्ण मार्च निकाला था। प्रदर्शन के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी की गई थी। याचिकाओं के अनुसार प्रदर्शन के दौरान भारी पुलिस बल तैनात किया गया, बैरिकेड लगाए गए, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज किया गया तथा बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी घायल हुए। कुछ महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित अभद्र व्यवहार और अज्ञात या सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों द्वारा बल प्रयोग के भी आरोप लगाए गए हैं। इन सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। पुलिस कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश की मांग याचिका में देशभर में सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर एक समान दिशा-निर्देश तैयार करने की मांग की गई है। इसमें विशेष रूप से यह मांग की गई है कि भीड़ नियंत्रण या गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई के दौरान सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती पर रोक लगाई जाए और प्रत्येक अधिकारी अपनी स्पष्ट पहचान प्रदर्शित करे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और किसी भी प्रकार की जवाबदेही तय करना आसान होगा। निषेधाज्ञा के बार-बार इस्तेमाल पर सवाल याचिकाओं में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के बार-बार इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कई स्थानों पर लंबे समय तक लगातार निषेधाज्ञा लागू रखी जाती है, जिससे नागरिकों के शांतिपूर्ण एकत्र होने के संवैधानिक अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वास्तविक और निकट भविष्य के खतरे के बिना बार-बार प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अन्य कानूनी प्रावधानों पर भी उठाए गए प्रश्न याचिकाओं में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के उपयोग को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान की व्याख्या अत्यधिक व्यापक हो सकती है, जिससे शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति या सरकार की आलोचना करने वाले नागरिकों पर भी कार्रवाई की आशंका बनी रहती है। इसके अलावा याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए पुलिस सुधार संबंधी निर्देशों को प्रभावी रूप से लागू करने की भी मांग की गई है। इसमें स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण के गठन, जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने जैसे मुद्दे शामिल हैं। स्वतंत्र जांच आयोग गठित करने की मांग याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया है कि 20 जुलाई को हुई कथित पुलिस कार्रवाई, महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार तथा मनमानी हिरासत के आरोपों की जांच के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायिक आयोग अथवा विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाए। साथ ही, जिन पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उनकी पहचान कर उनके विरुद्ध कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने की भी मांग की गई है। लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक दिन हुए प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत इन याचिकाओं पर विस्तार से विचार करेगी। इस मामले में आने वाला निर्णय भविष्य में देशभर में होने वाले सार्वजनिक प्रदर्शनों, पुलिस की कार्यप्रणाली तथा नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मानकों को प्रभावित कर सकता है।      

    प्रधानमंत्री के विचारों को केवल सुनें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारें” “मन की बात” कार्यक्रम के बाद कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत का आह्वान

    सुमेरपुर। पशुपालन, गोपालन, डेयरी एवं देवस्थान विभाग के कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत ने रविवार को अपने विधानसभा क्षेत्र सुमेरपुर के प्रवास के दौरान विभिन्न विकास कार्यों और सामाजिक अभियानों में सक्रिय भागीदारी निभाई। मंत्री कुमावत ने जहाँ क्षेत्र को लाखों रुपये की सड़क की सौगात दी, वहीं पर्यावरण संरक्षण और प्रधानमंत्री के 'मन की बात' कार्यक्रम के माध्यम से आमजन से सीधा संवाद किया। लोकार्पण कार्यक्रम के पश्चात मंत्री जोराराम कुमावत ने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' को सुमेरपुर के स्थानीय नागरिकों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर सुना। उन्होंने प्रधानमंत्री के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने और उनके आह्वान पर अमल करने की बात कही। इस दौरान संबोधित करते हुए कुमावत ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह कार्यक्रम केवल एक रेडियो प्रसारण नहीं है, बल्कि यह पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने और समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति की प्रेरणादायी कहानियों को सामने लाने का एक सशक्त माध्यम है। आज प्रधानमंत्री जी ने जिन विषयों पर हमारा ध्यान आकर्षित किया है, वे हमारे दैनिक जीवन और राष्ट्र निर्माण से सीधे जुड़े हैं। चाहे वह जल संरक्षण हो, हमारी अनमोल विरासत का सम्मान हो, या फिर लोकल फॉर वोकल को बढ़ावा देना हो। मोदी का हर एक सुझाव देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाला है। हम सभी का यह कर्तव्य है कि हम प्रधानमंत्री जी के इन विचारों को केवल सुनें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारें। आइए, हम सब मिलकर अपने सुमेरपुर को स्वच्छ, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लें और देश की प्रगति में अपना अमूल्य योगदान दें।   ₹64 लाख की लागत से बनी सड़क का लोकार्पण दौरे की शुरुआत में कैबिनेट मंत्री कुमावत ने ग्राम पंचायत पोमावा में राज्य सड़क निधि योजना (वर्ष 2022-23) के अंतर्गत निर्मित 3 किलोमीटर लंबी सड़क का फीता काटकर लोकार्पण किया। ₹64 लाख की लागत से बनी यह सड़क पोमावा से हनुमान जी मंदिर तक कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करेगी। इस अवसर पर ग्रामीणों ने मंत्री का गर्मजोशी से स्वागत किया। मंत्री कुमावत ने कहा कि राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और सड़कों के जाल को मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।   'हरियालो राजस्थान': 'एक पेड़ माँ के नाम' महाअभियान पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए कैबिनेट मंत्री ने मुख्यमंत्री वृक्षारोपण महाअभियान ‘हरियालो राजस्थान’ के अंतर्गत ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने राजकीय जनजातीय आवासीय विद्यालय, सुमेरपुर के परिसर में पौधारोपण कर विद्यार्थियों को पर्यावरण बचाने का संकल्प दिलाया। इसके उपरांत, वन विभाग (पाली रेंज, सुमेरपुर) द्वारा ग्राम पंचायत दुजाना के वन खंड 'कालाभाखर' में आयोजित वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम में भी मंत्री कुमावत ने शिरकत की। इस दौरान कुमावत ने कहा कि हमारी प्रकृति और हमारी माता, दोनों ही जीवन का आधार हैं। आज मुख्यमंत्री वृक्षारोपण महाअभियान ‘हरियालो राजस्थान’ के तहत चलाया जा रहा ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान इन दोनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पवित्र जरिया है। जिस प्रकार माँ हमारा पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार प्रकृति हमें जीवनदायिनी हवा, जल और आश्रय देती है। लगातार बढ़ते तापमान और पर्यावरण असंतुलन से निपटने का एकमात्र रास्ता केवल और केवल वृक्षारोपण है। मेरा आप सभी से विनम्र आग्रह है कि इस मानसून सत्र में अपनी माता जी के नाम पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं। पौधा लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि एक संतान की तरह उसकी सुरक्षा और देखरेख का संकल्प भी लें। आइए, अपनी धरती माँ को फिर से हरी-भरी चुनर ओढ़ाएं और आने वाली पीढ़ी को एक स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण उपहार में दें।" इस दौरान एसडीएम कालूराम कुम्हार, जिला उपाध्यक्ष पूनम सिंह परमार, मन की बात कार्यक्रम के जिला संयोजक शिवराज सिंह बिठिया, सुमेरपुर नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष अनोप सिंह, फूलाराम सुथार, नगर मण्डल अध्यक्ष रविकांत रावल, बांकली मण्डल अध्यक्ष हनुंवत सिंह राजपुरोहित, संभाग अध्यक्ष सुमेर सिंह राणावत, सांडेराव मण्डल के महामंत्री मुकेश मोदी, दुजाना के प्रशासक नागेश देवासी, वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता शंकर सिंह राजपुरोहित काकू, पन्नालाल, सांडेराव के वरिष्ठ आरएसएस कार्यकर्ता भूराराम कुमावत, बांकली मण्डल के सोशल मीडिया संयोजक इंद्र सिंह जाखोड़ा, मंत्री हुंगर सिंह, सहायक वन रक्षक ऋषिराज, पोमावा के प्रशासक गोविंद सिंह, युवा मोर्चा के अध्यक्ष गौरव राजपुरोहित सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे।