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    थाली में परोसे जा रहे 'धीमे जहर' के खिलाफ बगावत: बीकानेर से दिल्ली तक 700+ किमी पैदल मार्च, मिलावटखोरों को फांसी देने की उठी मांग

    देश भर में फल-सब्जियों पर छिड़के जा रहे कीटनाशकों, नकली दूध-घी के सिंडिकेट और भ्रामक विज्ञापनों के जरिए जनता की सेहत से हो रहे खिलवाड़ के खिलाफ एक बड़ा जनआंदोलन उठ खड़ा हुआ है। '#FoodRealityMarch' के बैनर तले बीकानेर से दिल्ली के जंतर-मंतर तक 700 किलोमीटर से अधिक की ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू हो चुकी है। 4 सितंबर को बीकानेर के वैष्णो माता मंदिर से शुरू हुआ यह कारवां चूरू जिले में प्रवेश कर चुका है जिसका रात्रि पड़ाव राजलदेसर रहेगा। बीकानेर के ​दमित गहलोत के नेतृत्व और संयोजक एडवोकेट जयन्त मूण्ड के मार्गदर्शन में चल रहा यह पैदल मार्च अगले 25 दिनों में रतनगढ़, सीकर, जयपुर, कोटपूतली, बहरोड़ और गुरुग्राम होते हुए दिल्ली पहुंचेगा। रास्ते में पड़ने वाले हर गांव, कस्बे और शहर में संवाद कर लोगों को बताया जा रहा है कि कैसे मुनाफाखोरी के चक्कर में उनकी रसोई तक धीमा जहर पहुंचाया जा रहा है। सरकार के सामने रखी गईं 12 बड़ी मांगें: ​मिलावटखोरों को फांसी: नकली दूध, मावा, पनीर, आटा और मसालों में जानलेवा मिलावट करने वाले माफिया के खिलाफ सीधे फांसी का कानून बने। ​खेतों से जहर बंद हो: फसलों, फलों और सब्जियों को असमय पकाने व उगाने में प्रयुक्त होने वाले घातक रसायनों पर तत्काल पूर्ण रोक लगे। ​हेल्थ स्टार रेटिंग व हिंदी में जानकारी: हर डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ पर आगे 5-स्टार रेटिंग (1 स्टार = हानिकारक, 5 स्टार = सुरक्षित) और पीछे सामग्री की पूरी सूची अनिवार्य रूप से बड़े अक्षरों में हिंदी में दर्ज हो। ​हर जिले में मुफ्त जांच लैब: FSSAI प्रत्येक जिले में हाईटेक व निशुल्क 'फूड टेस्टिंग लैब' खोले, जहां समयबद्ध रिपोर्ट मिले और आम उपभोक्ता सीधे ऑनलाइन ट्रैक कर सके। ​कक्षा 1 से 12 तक 'शुद्ध आहार' विषय: बच्चों को बचपन से सही पोषण समझाने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में अलग शिक्षक और पुस्तक के साथ अनिवार्य विषय जोड़ा जाए। ​आर्टिफिशियल फ्लेवर व डाई पर बैन: खाद्य पदार्थों में सिंथेटिक रंगों और केमिकल फ्लेवर के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर केवल प्राकृतिक तत्वों को बढ़ावा मिले। पाम ऑयल पर रोक: पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड उत्पादों में स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक पाम ऑयल के उपयोग पर पूरी तरह पाबंदी लगे। ​तंबाकू और जर्दा पूरी तरह बंद: कैंसर के 50% से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार गुटखा, जर्दा व तंबाकू उत्पादों की बिक्री देश भर में गैरकानूनी घोषित हो। ​भ्रामक प्रचार पर जेल: '100% शुद्ध', 'नेचुरल' या 'ऑर्गेनिक' के फर्जी दावे करने वाली कंपनियों और अस्वास्थ्यकर उत्पादों का विज्ञापन करने वाले सेलिब्रिटीज के खिलाफ जेल की सजा तय हो। ​90 दिन में न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट: मिलावटखोरी से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे हेतु विशेष अदालतों का गठन हो, जिनमें 90 दिनों की समयसीमा में फैसला आए। ​पैकेज्ड फूड में शुगर पर नियंत्रण: भारत को 'डायबिटीज कैपिटल' बनने से बचाने के लिए पैकेज्ड ड्रिंक्स व स्नैक्स में चीनी की अधिकतम सुरक्षित सीमा निर्धारित की जाए। ​कोल्ड ड्रिंक पर देशव्यापी प्रतिबंध: संसद कैंटीन की तरह पूरे देश में अत्यधिक कैफीन, रासायनिक प्रिजर्वेटिव और हानिकारक शुगर वाली कोल्ड ड्रिंक्स की बिक्री पर पूर्ण रोक लगाई जाए।  

    राजस्थान विश्वविद्यालय में मशरूम आधारित उद्यमिता पर 30 दिवसीय उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रम का सफल समापन

    जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर स्थित ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर, जो भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय का मान्यता प्राप्त होस्ट इंस्टीट्यूट है, द्वारा एमएसएमई विकास एवं सुविधा कार्यालय, जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 30 दिवसीय उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रम का सोमवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। “मशरूम उत्पादन के माध्यम से उद्यमिता : फार्म टू मार्केट” विषय पर आधारित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 27 जुलाई से 07 सितम्बर 2026 तक आयोजित किया गया। कार्यक्रम के लिए चयनित 25 प्रतिभागियों को मशरूम उत्पादन से लेकर व्यावसायिक उद्यम स्थापित करने तक की संपूर्ण प्रक्रिया पर व्यावहारिक, तकनीकी एवं उद्यमिता आधारित प्रशिक्षण प्रदान किया गया। समापन समारोह में मुख्य अतिथि तरुण कुमार भटनागर, आईईडीएस, सहायक निदेशक, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, जयपुर उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि एमएसएमई क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन एवं स्थानीय उद्यमिता का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने प्रतिभागियों को भारत सरकार द्वारा उद्यमियों के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं, संस्थागत सहयोग एवं व्यवसाय विकास के अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि, श्रीमती अनिला चौरड़िया, सहायक निदेशक, एमएसएमई विकास एवं सुविधा कार्यालय, जयपुर की भी गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रमों का उद्देश्य युवाओं को केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि उन्हें अपने कौशल को व्यवहारिक व्यवसाय में परिवर्तित करने के लिए सक्षम बनाना है। उन्होंने मशरूम उत्पादन, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों का उल्लेख करते हुए प्रतिभागियों को एमएसएमई मंत्रालय की योजनाओं का अधिकतम लाभ लेने के लिए प्रेरित किया। उद्यम स्थापना एवं व्यवसाय नियोजन को व्यावहारिक रूप देने के उद्देश्य से श्री राहुल सिगाची द्वारा प्रतिभागियों को डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट, प्रोजेक्ट प्रोफाइल तैयार करने तथा एमएसएमई योजनाओं के माध्यम से स्टार्टअप को स्केल करने संबंधी विशेष सत्र प्रदान किया गया। 30 दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मशरूम की विभिन्न प्रजातियों की खेती, मशरूम जीवविज्ञान, टिश्यू कल्चर, मदर कल्चर एवं स्पॉन निर्माण, कम्पोस्ट एवं सब्सट्रेट तैयारी, प्रयोगशाला प्रबंधन, स्टरलाइजेशन, इनोकुलेशन, इन्क्यूबेशन, फसल प्रबंधन एवं संदूषण नियंत्रण संबंधी व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही औषधीय एवं विशेष प्रकार के मशरूमों की आधुनिक उत्पादन तकनीकों से भी प्रतिभागियों को परिचित कराया गया। इस अवसर पर प्रो. सुमिता कच्छवाहा, समन्वयक, ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर, राजस्थान विश्वविद्यालय ने कहा कि कौशल विकास कार्यक्रमों का वास्तविक उद्देश्य प्रशिक्षण प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशिक्षणार्थियों को अपने ज्ञान को सफल उद्यम में परिवर्तित करने के लिए प्रेरित करना है। उन्होंने कहा कि मशरूम क्षेत्र में उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, स्पॉन उत्पादन एवं विपणन के माध्यम से स्वरोजगार एवं स्टार्टअप की व्यापक संभावनाएं उपलब्ध हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर की स्टार्टअप इन्क्यूबेशन, मेंटरशिप, व्यवसाय परामर्श, प्रोटोटाइप विकास, आईपीआर एवं पेटेंट सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन तथा उद्योग–शैक्षणिक सहयोग जैसी सुविधाओं का लाभ लेते हुए अपने व्यावसायिक विचारों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। राजस्थान विश्वविद्यालय में इस प्रकार का 30 दिवसीय व्यावहारिक उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रम पहली बार आयोजित किया गया, जिसमें महिला प्रतिभागियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। प्रशिक्षण से प्रेरित होकर चार प्रतिभागियों ने अपने स्वयं के उद्यम शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया। समापन अवसर पर सभी सफल प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित कर स्वरोजगार एवं रोजगार सृजन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उद्यमिता कौशल विकास कार्यक्रम मशरूम उत्पादन में डॉ. तरुण कुमावत ने प्रतिभागियों को मशरूम उत्पादन को एक वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक उद्यम के रूप में विकसित करने से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। उन्होंने मशरूम उत्पादन इकाई की स्थापना, उत्पादन योजना, गुणवत्ता प्रबंधन, स्वच्छता एवं संदूषण नियंत्रण, उपयुक्त कच्चे माल के चयन, उत्पादन लागत को नियंत्रित करने तथा बाजार की मांग के अनुसार उत्पाद विकसित करने जैसे विषयों पर मार्गदर्शन दिया। डॉ. कुमावत ने प्रशिक्षण के दौरान अर्जित तकनीकी कौशल को व्यवहारिक उद्यम में परिवर्तित करने तथा छोटे स्तर से व्यवस्थित रूप से व्यवसाय शुरू कर धीरे-धीरे उसका विस्तार करने के लिए प्रतिभागियों को प्रेरित किया। कार्यक्रम के दौरान डॉ. सुनील छीम्पा, प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर, ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर ने प्रशिक्षण की गतिविधियों एवं उपलब्धियों का विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि कार्यक्रम को इस प्रकार डिजाइन किया गया था कि प्रतिभागी केवल मशरूम उत्पादन की तकनीक ही नहीं सीखें, बल्कि उत्पादन से बाजार तक की पूरी मूल्य श्रृंखला तथा सफल उद्यम स्थापित करने की प्रक्रिया को भी समझ सकें। कार्यक्रम ने युवाओं को कौशल, तकनीक एवं व्यवसाय की समझ प्रदान कर उन्हें स्वरोजगार एवं रोजगार सृजन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया तथा “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यक्रम के सफल संचालन, तकनीकी समन्वय एवं व्यवस्थाओं में दीपक कुमार शर्मा, टेक्निकल ऑफिसर, ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ईसीएच इन्क्यूबेशन सेंटर की पूरी टीम ने प्रशिक्षण के विभिन्न तकनीकी, प्रायोगिक एवं उद्यमिता सत्रों के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई।  

    संस्कृत बने आम बोलचाल की भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक बनें डिग्रीधारी: राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े

    राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के अष्टम दीक्षांत समारोह में 9,422 विद्यार्थियों को मिली उपाधियां, 37 शोधार्थियों को मिली विद्यावारिधि पीएच.डी. दो विभूतियों को मानद् डी लिट उपाधि से किया सम्मानित जयपुर। राजस्थान के राज्यपाल एवं जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हरिभाऊ किसनराव बागड़े ने कहा कि संस्कृत केवल शास्त्रों और विश्वविद्यालयों की भाषा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, ज्ञान परंपरा और जीवन मूल्यों की आधारशिला है। संस्कृत को जनभाषा बनाने के लिए इसका अधिकाधिक प्रयोग आवश्यक है। प्रत्येक संस्कृत प्रेमी अपने घर और परिवार से संस्कृत संवाद की शुरुआत करे तो यह भाषा पुनः जन-जन के जीवन में प्रतिष्ठित हो सकती है। राज्यपाल सोमवार को केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के बहुउद्देशीय सभागार में आयोजित जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के अष्टम दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। समारोह में कुल 9,422 विद्यार्थियों को विभिन्न उपाधियां तथा 37 शोधार्थियों को विद्यावारिधि (पीएच.डी.) की उपाधि प्रदान की गई। सुप्रसिद्ध संत एवं समाजसेवी ब्रह्मर्षि श्री गुरुवानन्द स्वामी तथा प्रख्यात संस्कृतविद् प्रो. रमेशकुमार पाण्डेय को मानद् विद्यावाचस्पति (डी.लिट्.) की उपाधि से सम्मानित किया गया। राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य केवल पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान और उपाधियां प्रदान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी शिक्षा देना चाहिए जो विद्यार्थियों में विवेक, संस्कार और सही-गलत की पहचान करने की क्षमता विकसित करे। भारतीय गुरुकुल परंपरा में शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास था। आज भी ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसके साथ चरित्र, नैतिकता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व जुड़ा हो। उन्होंने संस्कृत की मौखिक और श्रुति परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मृति और वाणी के माध्यम से संरक्षित एवं हस्तांतरित होता रहा है। राज्यपाल ने नालंदा के ज्ञान भंडार के विनाश का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकालयों को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन मनुष्य के मन-मस्तिष्क में सुरक्षित ज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सकता। भारतीय ज्ञान परंपरा इसी जीवंत स्मृति और निरंतर साधना के कारण आज भी अक्षुण्ण है। राज्यपाल ने भारतीय संत परंपरा को सामाजिक समरसता का आधार बताते हुए जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के संदेश “जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई” का स्मरण किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के प्रणेता ब्रह्मपीठाधीश्वर पद्मश्री नारायणदास महाराज को दूरदर्शी संत बताते हुए कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी भविष्यदृष्टि और ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम है। उन्होंने कहा कि उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी बनकर न रहें, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक बनें और अपने ज्ञान का उपयोग राष्ट्र एवं समाज के कल्याण के लिए करें। विकसित भारत के संकल्प में संस्कृत विश्वविद्यालयों की बड़ी भूमिका प्रो. वरखेडी दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि विकसित भारत के राष्ट्रीय संकल्प को साकार करने में संस्कृत विश्वविद्यालयों और भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका है। राजस्थान की गौरवशाली सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ज्ञान परंपरा इस दिशा में सशक्त आधार प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल उपाधियां प्रदान करने का अवसर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराने का महत्वपूर्ण अवसर है। संस्कृत विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि शास्त्रों, विद्वानों और भारत की ज्ञान परंपरा की रक्षा करते हुए उसकी निरंतरता बनाए रखना भी है। प्रो. वरखेडी ने शास्त्र रक्षा की तुलना गंगा के अविरल प्रवाह से करते हुए कहा कि जिस प्रकार गंगा का प्रवाह निरंतर जीवन देता है, उसी प्रकार संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रवाह भी अविच्छिन्न रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि उपाधिधारक केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि एक महान सभ्यता और ज्ञान परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालयों से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी संस्थानों और अन्य विश्वविद्यालयों के साथ समन्वय बढ़ाने का आह्वान किया। संस्कृत विद्या की सुगंध समाज के प्रत्येक क्षेत्र तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा, तकनीक और रोजगार से जोड़ना समय की आवश्यकता है। इस अवसर पर राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. मदनमोहन झा ने विश्वविद्यालय का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक और रोजगारोन्मुखी कार्यक्रमों से जोड़ने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। समारोह में राज्यपाल ने विश्वविद्यालय की पहल पर स्थापित राजस्थान मंत्र प्रतिष्ठान की वेबसाइट का लोकार्पण भी किया। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को 12 स्वर्ण पदक एवं एक कुलाधिपति स्वर्ण पदक सहित कुल 13 पदक प्रदान किए गए। बी.पी. मौर्य स्मृति पुरस्कार और सागरमल जूनीवाल स्मृति पुरस्कार भी प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रदान किए गए। समारोह में कुलसचिव डॉ. गुंजन सोनी, परीक्षा नियंत्रक डॉ. शंभू कुमार झा, अनुसंधान केंद्र निदेशक प्रो. राजधर मिश्र सहित विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित रहे।  

    डॉ राधाकृष्णन की मूर्ति को फूल मालाओं से सुसज्जित करके माल्यार्पण करके उन्हें नमन किया

    जयपुर। राष्ट्रीय एवं राज्यस्तर पर सम्मानित पुरस्कृत शिक्षकों ने शिक्षक दिवस पुरस्कृत शिक्षक फोरम राजस्थान के बैनर तले जे. एल. एन मार्ग स्थित डॉ एस .राधाकृष्णन शिक्षा संकुल परिसर में स्थापित डॉ राधाकृष्णन की मूर्ति को फूल मालाओं से सुसज्जित करके माल्यार्पण करके उन्हें नमन किया और डाॅ राधाकृष्णन की 138 वें जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जयपुर लोकसभा सांसद मंजू शर्मा ने मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्वलन करके माल्यार्पण किया। अपने उद्बोधन में सांसद ने कहा कि बच्चों और युवाओं की सोच में आ रहे परिवर्तन को समझते हुए उनको सही दिशा देने की अपील की। नई तकनीक के चलन होने पर भी शिक्षक का महत्व घटा नहीं है। इस अवसर पर सांसद मंजू शर्मा ने पुरस्कृत शिक्षकों को सम्मान की गरिमा बनाए रखने की शपथ दिलाई तथा विद्यालयों को हराभरा रखने और प्लास्टिक मुक्त करने की अपील भी की। पुरस्कृत शिक्षक फोरम के महासचिव रामेश्वर प्रसाद शर्मा ने बताया कि विशिष्ट अतिथि स्कूल शिक्षा विभाग के विशेषाधिकारी एवं सलाहकार बी. के. गुप्ता तथा स्कूल शिक्षा जयपुर संभाग की संयुक्त निदेशक मंजू शर्मा थीं। फोरम अध्यक्ष निर्मल ग्रोवर, उपाध्यक्ष विनोद कुमार शर्मा, कोषाध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा, जिला जयपुर फोरम जिला अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा, फोरम सलाहकार डॉ. के. के. चोटिया तथा मुरारी लाल राव और संगठन सचिव महेश बाबू शर्मा महिला सचिव मधु कुल्हार व अंजना वर्मा सहित पचास से अधिक पुरस्कृत शिक्षक उपस्थित थे ।

    फ्लोरल फिएस्टा” थीम पर शिक्षक दिवस का आयोजन

    कानोड़िया स्कूल ऑफ लॉ फॉर वीमेन, जयपुर में शिक्षक दिवस के अवसर पर “फ्लोरल फिएस्टा” थीम पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संगीत, मनोरंजन और विभिन्न प्रस्तुतियों के माध्यम से शिक्षकों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की गई। इस कार्यक्रम में महाविद्यालय निदेशक, डॉ. रश्मि चतुर्वेदी, प्राचार्या डॉ. वर्तिका अरोड़ा एवं सभी शैक्षणिक एवं अशैक्षणिक स्टाफ उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात छात्रसंघ अध्यक्ष मनवीर कौर ने सभी को संबोधित करते हुए शिक्षकों के योगदान और मार्गदर्शन के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह में छात्राओं ने मनमोहक नृत्य प्रस्तुतियां दीं। इसके साथ ही विभिन्न मनोरंजक खेल, गायन एवं भावपूर्ण कविता की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण शिक्षकों की प्रस्तुतियां रहीं, जिनमें उन्होंने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए समारोह में चार चांद लगा दिए। इस अवसर पर शिक्षकों के व्यक्तित्व एवं उनके विशिष्ट योगदान को सम्मानित करते हुए बहुप्रतीक्षित टाइटल वितरण समारोह भी आयोजित किया गया। अशैक्षणिक स्टाफ सदस्यों को भी विशेष टाइटल प्रदान कर उनके योगदान के प्रति सम्मान एवं आभार व्यक्त किया गया। महाविद्यालय निदेशक डॉ. रश्मि चतुर्वेदी ने कहा कि शिक्षक भी हर छात्रा से हमेशा कुछ ना कुछ सीखते हैं। प्राचार्या डॉ. वर्तिका अरोड़ा ने समस्त छात्राओं को इतने भव्य आयोजन के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महाविद्यालय की परम्पराओं को छात्र ही संभाल कर रखते व नए छात्रों को सिखाते हैं। समारोह के समापन अवसर पर शिक्षकों के लिए सरप्राइज डांस प्रस्तुति, विशेष वीडियो प्रदर्शन एवं केक कटिंग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन महाविद्यालय छात्रा प्रनिल एवं तन्वी के द्वारा किया गया। अंत में पलक राज द्वारा सभी को धन्यवाद ज्ञापन कर कार्यक्रम का समापन किया। “फ्लोरल फिएस्टा” ने शिक्षक दिवस को उल्लास, सम्मान और आत्मीयता से भरते हुए सभी के लिए इसे एक यादगार अवसर बना दिया।  

    भाजपा राज में नगरपालिकाएं बनी भ्रष्टाचार का अड्डा: डोटासरा

    पालिका चुनाव को लेकर पीसीसी अध्यक्ष ने करीब डेढ़ दर्जन वार्डों में किया जनसंपर्क, प्रत्याशियों के कार्यालयों का उद्घाटन लक्ष्मणगढ़. नगरपालिका चुनाव को लेकर कांग्रेस ने प्रचार अभियान तेज कर दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय विधायक गोविन्द सिंह डोटासरा ने शनिवार को लक्ष्मणगढ़ नगरपालिका क्षेत्र के विभिन्न वार्डों में व्यापक जनसंपर्क कर कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं एवं मतदाताओं को संबोधित करते हुए भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। डोटासरा ने आरोप लगाया कि भाजपा के कुशासन से आमजन परेशान है और नगरपालिकाओं की व्यवस्थाएं बदहाल हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा शासन में नगरपालिकाएं भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई हैं। शहर में सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है, रास्तों में जगह-जगह गड्ढे हैं और आमजन मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान है। उन्होंने कहा कि नगरपालिका क्षेत्र में नरोदड़ा और मानासी को शामिल किए जाने के बावजूद वहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं। करीब आठ माह बीत जाने के बाद भी सफाई और रोशनी की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी है। वहीं, सीवरेज व्यवस्था को लेकर भी कोई ठोस प्लान नहीं बनाया गया है। डोटासरा ने कहा कि केवल क्षेत्र का विस्तार कर देने से विकास नहीं होता, बल्कि नए शामिल क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी सरकार और नगरपालिका की जिम्मेदारी है। करीब डेढ़ दर्जन वार्डों में पहुंचे डोटासरा पीसीसी अध्यक्ष डोटासरा ने शनिवार को नरोदड़ा सहित लक्ष्मणगढ़ के ब्रह्मानंद बगीची, बंजारा बस्ती और सरकारी अस्पताल क्षेत्र में जनसंपर्क किया। उन्होंने करीब डेढ़ दर्जन वार्डों का दौरा कर कांग्रेस प्रत्याशियों के चुनाव कार्यालयों का उद्घाटन किया तथा मतदाताओं से संवाद किया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से चुनाव में पूरी ताकत के साथ जुटने का आह्वान करते हुए कहा कि वार्ड स्तर पर जनता के बीच जाकर स्थानीय समस्याओं को समझें और कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में समर्थन जुटाएं। इस दौरान विभिन्न स्थानों पर कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने डोटासरा का स्वागत भी किया। कार्यक्रमों में पीसीसी जिला प्रभारी विशाल जांगिड़, सह प्रभारी पीएल प्रजापति, मुस्तफा कुरैशी, बनवारी पाण्डेय सहित कांग्रेस पदाधिकारी, कार्यकर्ता और प्रत्याशी मौजूद रहे।  

    संत सुंदर दास जी महाराज की सुंदर चालीसा एवं आरती को गाया भजन सम्राट अनूप जलोटा एवं अंतर्राष्ट्रीय भजन गायिका अनीता खंडेलवाल ने

    जयपुर. एक ऐतिहासिक एवं गौरवमयी धरोहर खंडेलवाल समाज के कुल शिखर संत, परम पूज्य संत सुंदर दास जी महाराज की सुंदर चालीसा एवं आरती की रिकॉर्डिंग एवं शूटिंग कर पद्मश्री भजन सम्राट अनूप जलोटा एवं अंतर्राष्ट्रीय भजन गायिका अनीता खंडेलवाल ने डुएट स्वर में अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सजाया है। इसका अत्यंत सुंदर, मधुर एवं भक्तिमय संगीत संयोजन विवेक प्रकाश जी ने किया है। वहीं अभिनेत्री अपूर्वा खंडेलवाल ने अपने शानदार अभिनय एवं भावपूर्ण प्रस्तुति से इस वीडियो को और भी जीवंत, आकर्षक एवं मनमोहक बना दिया। संत सुंदर दास जी महाराज की सुंदर चालीसा एवं आरती को सुमधुरा सखी सहेली मंच की और से बनाया गया है! सुमधुरा सखी सहेली मंच की प्रमुख मधु खंडेलवाल ने बताया कि सुंदर चालीसा एवं आरती केवल एक भक्ति रचना नहीं, बल्कि हमारे खंडेलवाल समाज की आस्था, श्रद्धा, गौरव, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का एक अनमोल एवं ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। हम सभी के लिए यह परम सौभाग्य और गौरव का विषय है कि संत सुंदर दास जी महाराज की पावन स्मृति एवं उनकी भक्ति परंपरा को संगीत और कला के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रार्थना है कि संत सुंदर दास जी महाराज की कृपा और आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बना रहे तथा यह पावन रचना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी श्रद्धा, भक्ति और प्रेरणा का स्रोत बने। संत सुंदर दास जी महाराज की सुंदर चालीसा एवं आरती के इस भक्ती मय कृति को लेकर अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वैश्य महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश चंद्र गुप्ता ( तुंगा वाले), अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वैश्य महासभा के मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष संजीव कट्टा, अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वेश्यमहासभा के प्रधानमंत्री चंद्र प्रकाश खंडेलवाल, अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वैश्य महासभा पत्रिका के मुख्य संपादक राम निरंजन खुटेटा, अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वैश्य महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं मीडिया प्रभारी तथा कुलसचिव, सिक्किम प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, गैंगटोक, सिक्किम, प्रोफेसर रमेश कुमार रावत, अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वैश्य महासभा के राष्ट्रीय युवा सयोजक शरद फरसोईया,सुमधुरा सखी सहेली मंच की प्रमुख मधु खंडेलवाल, म्यूचुअल फण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन कोऑर्डिनेशन ग्रुप (MACG) के अखिल भारतीय अध्यक्ष राजेश कूलवाल, सीएआईटी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमेश चंद्र गुप्ता, कार्यकारी अध्यक्ष गिरधारी लाल खंडेलवाल, कार्यालय मंत्री रामकिशोर खूंटेटा, आजीवन संरक्षकगण हनुमान सहाय ओढ, कृष्ण मोहन खंडेलवाल, ललित खंडेलवाल, राकेश कूलवाल, राम स्वरूप ताम्बी, राम बाबू गुप्ता, भवन संयोजक रमेश चंद्र सौखिया व संयुक्त मंत्री नितिन खंडेलवाल भरतपुर, कार्यकारी अध्यक्ष गोपाल खण्डेलवाल एडवोकेट मथुरा, कार्यकारी अध्यक्ष गिरधारीलाल खंडेलवाल (डीग), महासभा के पूर्व प्रधानमंत्री राकेश रावत दिल्ली,पूर्व प्रधानमंत्री नरेश खंडेलवाल मंडी गोविंदगढ़ सहित अखिल भारतवर्षीय खंडेलवाल वैश्य महासभा के राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, छतीसगढ़, झारखंड, आसाम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, सहित अनेक प्रदेश एवं कोलकाता, दिल्ली, अहमदाबाद, हैदराबाद, रतलाम, मुंबई, राजनंद गाव, सहित देश के अनेक प्रमुख शहरों से अनेक पदाधिकारी, कार्यकारिणी सदस्य, आजीवन सदस्यों ने खुशी व्यक्त की है एवं भजन सम्राट अनूप जलोटा एवं अंतर्राष्ट्रीय भजन गायिका अनीता खंडेलवाल सहित समस्त टीम को बधाई दी है! मधु खण्डेलवाल सुमधुरा सखी सहेली मंच के अथक प्रयास से यह सपना साकार हो पाया!  

    शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए 148 शिक्षकों का हुआ सम्मान

    शिक्षक दिवस 2026 पर प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स अवॉर्ड के 15वें संस्करण का भव्य आयोजन सात वरिष्ठ शिक्षकों को प्रदान किया गया माला माथुर मेमोरियल लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन एजुकेशन जयपुर । शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के सम्मान में प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स अवॉर्ड 2026 के 15वें संस्करण का भव्य आयोजन किया गया। समारोह का आयोजन थार सर्वोदय संस्थान, सिम्पली जयपुर एवं रघु सिन्हा माला माथुर चैरिटी ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में किया गया। समारोह की मुख्य अतिथि राजस्थान सरकार की पूर्व मंत्री एवं अभिनेत्री बीना काक रहीं। इस अवसर पर उन्होंने शिक्षकों के योगदान को नमन करते हुए कहा, “शिक्षकों का सम्मान अपनी संस्कृति का सम्मान है।” उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल विद्यार्थियों को शिक्षा देने का कार्य नहीं करते, बल्कि वे समाज के संस्कार, मूल्यों और भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आयोजक सोमेंद्र हर्ष ने कहा कि, “प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स अवॉर्ड का 15वां संस्करण शिक्षा के क्षेत्र में कड़ी मेहनत, समर्पण और उपलब्धियों को सम्मान देने की एक महत्वपूर्ण पहल रहा। शिक्षक केवल ज्ञान प्रदान करने वाले नहीं, बल्कि समाज के भविष्य का निर्माण करने वाले मार्गदर्शक होते हैं। वे विद्यार्थियों में ज्ञान विकसित करने के साथ-साथ उन्हें प्रेरित करते हैं और रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करते हैं।” इस वर्ष के समारोह में प्री-स्कूल, सरकारी एवं निजी विद्यालयों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों तथा विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की अलग-अलग श्रेणियों से कुल 148 शिक्षकों को प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स अवॉर्ड 2026 से सम्मानित किया गया। इनमें राजस्थान के जयपुर से 68 शिक्षक शामिल रहे। इसके अलावा जोधपुर, अजमेर, बाड़मेर, सिरोही, पाली, भीलवाड़ा, ब्यावर, करौली, सीकर, किशनगढ़, लक्ष्मणगढ़, हनुमानगढ़, जैसलमेर और जालोर से लगभग 46 शिक्षकों को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। वहीं दिल्ली, लखनऊ, वृंदावन, छत्तीसगढ़ और बहरोड़ से लगभग 27 शिक्षकों को सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों के समर्पण, उत्कृष्ट कार्य, नवाचार तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में उनके योगदान को रेखांकित करता है। रघु सिन्हा माला माथुर चैरिटी ट्रस्ट के ट्रस्टी सुधीर माथुर ने बताया कि समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन समर्पित करने वाले सात वरिष्ठ शिक्षकों को विशेष रूप से माला माथुर मेमोरियल “लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन एजुकेशन” से सम्मानित किया गया।उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रयास है, जिन्होंने वर्षों तक ज्ञान, संस्कार और शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस वर्ष प्रो. बी.के. शर्मा, डॉ. दीपक सक्सेना, डॉ. रश्मि पाटनी, डॉ. जयश्री भार्गव, श्रीमती अनुराधा टंडन, डॉ. सिद्धार्थ मोथड़िया एवं श्रीमती लवलीना सोगानी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। थार सर्वोदय संस्थान की ट्रस्टी अंशु हर्ष ने कहा कि, “प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स अवॉर्ड का उद्देश्य उन शिक्षकों को सम्मानित करना है, जो अपने ज्ञान, समर्पण और निरंतर प्रयासों से विद्यार्थियों के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। इस वर्ष विशेष रूप से ऐसे वरिष्ठ शिक्षकों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने अपना जीवन शिक्षा और नई पीढ़ी को ज्ञान देने के लिए समर्पित किया है।” समारोह को विद्यार्थियों की आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने और भी विशेष बना दिया। एम.जी.डी. स्कूल की छात्राओं ने मनमोहक नृत्य प्रस्तुति दी। वहीं मान्या लखानी ने हुला हूप की शानदार प्रस्तुति देकर दर्शकों का मन मोह लिया। पदमा ने राजस्थानी लोक नृत्य प्रस्तुत किया अन्य विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने भी शिक्षकों के सम्मान में विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों ने अपने शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और स्नेह को अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. ज्योति जोशी ने किया । प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स अवॉर्ड पिछले 15 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों और प्राचार्यों को सम्मानित करने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है। इसके 15वें संस्करण के माध्यम से भी इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिक्षा जगत के समर्पित कर्मयोगियों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त किया गया।  

    सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज ने अनलर्निंग जेंडरः स्टीरियोटाइप्स एंड सोशल एक्सपेक्टेशंस पर जागरूकता सत्र का हुआ आयोजन

    कानोड़िया पीजी महिला महाविद्यालय, जयपुर के सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज द्वारा 5 सितंबर को महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय, लाल कोठी, जयपुर में ‘अनलर्निंग जेंडरः स्टीरियोटाइप्स एंड सोशल एक्सपेक्टेशंस’ विषय पर जागरूकता सत्र का आयोजन किया गया। सत्र के दौरान सेंटर संयोजक डॉ. स्वीटी माथुर ने ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि सेक्स जैविक आधार पर निर्धारित होता है, जबकि जेंडर समाज द्वारा निर्मित एवं परिभाषित भूमिकाओं और अपेक्षाओं से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि   प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है, लेकिन समाज ने समय के साथ स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग भूमिकाएं और अपेक्षाएं निर्धारित कर दीं। उन्होंने इस विषय को अधिक प्रभावी एवं रोचक ढंग से समझाने के लिए दो वीडियो के माध्यम से विद्यार्थियों को जेंडर आधारित रूढ़ियों, सामाजिक अपेक्षाओं एवं निर्धारित भूमिकाओं के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना तभी संभव है जब महिलाएं सशक्त हों और इसके लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। सत्र को संवादात्मक बनाते हुए विद्यार्थियों को अपने अनुभव एवं विचार साझा करते हुए बताया कि उनके घरों में सामान्यतः पैसा कमाने की जिम्मेदारी पिता की होती है, जबकि रोजमर्रा के घरेलू कार्य मुख्य रूप से मां करती हैं। इस चर्चा के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह समझने का प्रयास किया कि किस प्रकार पारंपरिक सामाजिक अपेक्षाएं परिवार और दैनिक जीवन में जेंडर भूमिकाओं को प्रभावित करती हैं। सेंटर सदस्य डॉ. पूर्वा भारद्वाज ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि समाज द्वारा निर्मित इन जंजीरों और रूढ़ियों को तोड़ पाना आसान नहीं है। इसके लिए बदलाव की शुरुआत हमें स्वयं से और अपने घर से करनी होगी। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने घरों में ही कार्यों और जिम्मेदारियों को जेंडर के आधार पर बांटने के बजाय समान रूप से साझा करने की शुरुआत करें, तो व्यापक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है। महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के जागरूकता सत्र विद्यार्थियों को सामाजिक रूढ़ियों पर विचार करने तथा अधिक समानतापूर्ण और संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं। सत्र में लगभग 60 विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में सेंटर की सदस्य डॉ. साक्षी शर्मा, डॉ. दमयंती सोढ़ा एवं डॉ. सुरभि माथुर की सक्रिय भागीदारी रही एवं विद्यालय के प्रधानाचार्य रामसेवक, शिक्षिका अनिता दाधीच एवं नरेश चंद्र शर्मा उपस्थित रहे।

    सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज ने ‘अनलर्निंग जेंडरः स्टीरियोटाइप्स एंड सोशल एक्सपेक्टेशंस’ पर जागरूकता सत्र का हुआ आयोजन

    कानोड़िया पीजी महिला महाविद्यालय, जयपुर के सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज द्वारा 5 सितंबर को महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय, लाल कोठी, जयपुर में ‘अनलर्निंग जेंडरः स्टीरियोटाइप्स एंड सोशल एक्सपेक्टेशंस’ विषय पर जागरूकता सत्र का आयोजन किया गया। सत्र के दौरान सेंटर संयोजक डॉ. स्वीटी माथुर ने ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि सेक्स जैविक आधार पर निर्धारित होता है, जबकि जेंडर समाज द्वारा निर्मित एवं परिभाषित भूमिकाओं और अपेक्षाओं से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि   प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है, लेकिन समाज ने समय के साथ स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग भूमिकाएं और अपेक्षाएं निर्धारित कर दीं। उन्होंने इस विषय को अधिक प्रभावी एवं रोचक ढंग से समझाने के लिए दो वीडियो के माध्यम से विद्यार्थियों को जेंडर आधारित रूढ़ियों, सामाजिक अपेक्षाओं एवं निर्धारित भूमिकाओं के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना तभी संभव है जब महिलाएं सशक्त हों और इसके लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। सत्र को संवादात्मक बनाते हुए विद्यार्थियों को अपने अनुभव एवं विचार साझा करते हुए बताया कि उनके घरों में सामान्यतः पैसा कमाने की जिम्मेदारी पिता की होती है, जबकि रोजमर्रा के घरेलू कार्य मुख्य रूप से मां करती हैं। इस चर्चा के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह समझने का प्रयास किया कि किस प्रकार पारंपरिक सामाजिक अपेक्षाएं परिवार और दैनिक जीवन में जेंडर भूमिकाओं को प्रभावित करती हैं। सेंटर सदस्य डॉ. पूर्वा भारद्वाज ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि समाज द्वारा निर्मित इन जंजीरों और रूढ़ियों को तोड़ पाना आसान नहीं है। इसके लिए बदलाव की शुरुआत हमें स्वयं से और अपने घर से करनी होगी। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने घरों में ही कार्यों और जिम्मेदारियों को जेंडर के आधार पर बांटने के बजाय समान रूप से साझा करने की शुरुआत करें, तो व्यापक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है। महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के जागरूकता सत्र विद्यार्थियों को सामाजिक रूढ़ियों पर विचार करने तथा अधिक समानतापूर्ण और संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं। सत्र में लगभग 60 विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में सेंटर की सदस्य डॉ. साक्षी शर्मा, डॉ. दमयंती सोढ़ा एवं डॉ. सुरभि माथुर की सक्रिय भागीदारी रही एवं विद्यालय के प्रधानाचार्य रामसेवक, शिक्षिका अनिता दाधीच एवं नरेश चंद्र शर्मा उपस्थित रहे।

    विशेष साक्षात्कार: हिंदी—संस्कृति, ज्ञान और आधुनिक तकनीक का सेतु

    हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में प्रो.जनक सिंह मीना,  गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय  प्र. आपके लिए हिंदी भाषा का क्या महत्व है? 1. मेरे लिए हिंदी भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, संवेदना, विचार और ज्ञान-परंपरा से जुड़ने का सशक्त माध्यम है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जनसामान्य से सहज रूप से जुड़ती है और विविध सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों के बीच संवाद स्थापित करती है। एक शिक्षक और शोधकर्ता के रूप में मैं हिंदी को ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का महत्वपूर्ण साधन मानता हूँ। मेरे लिए हिंदी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच सेतु का कार्य करती है। भाषाई विविधता भारत की शक्ति है। अतः हिंदी मेरे लिए केवल एक भाषा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक समावेशन और ज्ञान-विस्तार का माध्यम है। प्र. हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता आप क्यों महसूस करते हैं? 2. मेरे विचार से हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता केवल हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी भाषाई अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का अवसर है। हिंदी भारत के करोड़ों लोगों को जोड़ने वाली एक सशक्त संपर्क भाषा है। यह हमारे साहित्य, लोकजीवन, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। आज वैश्वीकरण और डिजिटल युग में अंग्रेजी सहित अनेक विदेशी भाषाओं का प्रभाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में हिंदी दिवस हमें अपनी मातृभाषाओं और भारतीय भाषाओं के महत्व को समझने तथा हिंदी को आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और प्रशासन की भाषा के रूप में अधिक सक्षम बनाने की प्रेरणा देता है। प्र. आज के समय में हिंदी भाषा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं? 3. मेरे विचार से आज हिंदी के सामने चुनौती उसके अस्तित्व की नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, उपयोगिता और बदलती तकनीकी दुनिया में उसकी प्रभावी उपस्थिति की है।मेरे अनुसार हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेज़ी से प्रतिस्पर्धा करना नहीं, बल्कि स्वयं को समयानुकूल बनाना है। हमें ऐसी हिंदी चाहिए जो सरल भी हो, वैज्ञानिक भी हो, तकनीक-सक्षम भी हो और वैश्विक संवाद में प्रभावी ढंग से अपनी भूमिका निभा सके। प्र. क्या आपको लगता है कि युवा पीढ़ी हिंदी से दूर होती जा रही है? क्यों? 4. हाँ, मुझे लगता है कि युवा पीढ़ी का एक वर्ग हिंदी से कुछ हद तक दूर होता जा रहा है, लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरी युवा पीढ़ी हिंदी से विमुख हो रही है। इसके पीछे मुख्य कारण अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रभाव, रोजगार और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी की उपयोगिता, डिजिटल माध्यमों में हिंग्लिश का बढ़ता चलन और हिंदी को लेकर बनी सामाजिक धारणाएँ हैं। प्र. सोशल मीडिया ने हिंदी भाषा को बढ़ावा दिया है या उसके स्वरूप को प्रभावित किया है? 5. भारतीय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के बीच Hinglish के प्रयोग में निरंतर वृद्धि पाई गई। इसके साथ हिंदी की लिपि और अभिव्यक्ति शैली में भी परिवर्तन आया है। अनेक युवा देवनागरी के बजाय रोमन लिपि में हिंदी लिखते हैं—जैसे “Aap kaise hain?”। इससे संवाद तेज और सहज होता है, लेकिन वर्तनी की एकरूपता तथा हिंदी की पारंपरिक भाषिक संरचना के सामने चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं। प्र. हिंदी और अंग्रेजी के बीच संतुलन को आप किस तरह देखते हैं? 6. हिंदी और अंग्रेजी के बीच संतुलन को मैं प्रतिस्पर्धा के बजाय सह-अस्तित्व और सहयोग के रूप में देखता हूँ। अंग्रेजी आज वैश्विक संचार, विज्ञान, तकनीक और रोजगार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जबकि हिंदी हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना, अभिव्यक्ति और जनसंचार की सशक्त भाषा है। मेरे विचार से अंग्रेजी सीखना या उसका प्रयोग करना हिंदी के प्रति दूरी का संकेत नहीं होना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि हम अंग्रेजी को ज्ञान और वैश्विक अवसरों की भाषा के रूप में अपनाएँ तथा हिंदी को अपनी जड़ों, विचारों और व्यापक जनसमुदाय से जुड़ने की भाषा के रूप में सशक्त बनाएँ। आज आवश्यकता “हिंदी बनाम अंग्रेजी” की नहीं, बल्कि “हिंदी और अंग्रेजी” के संतुलित प्रयोग की है। बहुभाषिकता हमारी शक्ति है। यदि युवा दोनों भाषाओं में दक्ष हों, तो वे स्थानीय संवेदना और वैश्विक दृष्टि—दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ सकते हैं। प्र. उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में हिंदी की स्थिति कैसी है? 7. मेरे विचार से उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में हिंदी की स्थिति संभावनाओं से भरी हुई है, लेकिन अभी इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है। लंबे समय तक उच्च शिक्षा और विशेषकर शोध के क्षेत्र में अंग्रेजी का वर्चस्व रहा है, जिसके कारण हिंदी में उच्च स्तरीय अकादमिक सामग्री और शोध प्रकाशन अपेक्षाकृत सीमित रहे। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा, ज्ञान के स्थानीयकरण और बहुभाषी शिक्षा को अधिक महत्व मिला है। यूजीसी भी भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रम, अनुवाद और शिक्षण को प्रोत्साहित करने की दिशा में पहल कर रहा है। प्र. विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए शिक्षकों को क्या प्रयास करने चाहिए? 8. विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए शिक्षकों को हिंदी को केवल परीक्षा का विषय न बनाकर अभिव्यक्ति, संवाद और रचनात्मकता की भाषा के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रयास किए जा सकते हैं: कक्षा को संवादात्मक बनाना ,तकनीक और सोशल मीडिया का उपयोग,साहित्य को रोचक बनाना , रचनात्मक गतिविधियाँ , दैनिक जीवन से जोड़ना, विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति का सम्मान, हिंदी और अन्य भाषाओं के बीच संतुलन । मेरे विचार से शिक्षक स्वयं हिंदी के प्रभावी और सहज प्रयोग का उदाहरण बनें, तभी विद्यार्थी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण महसूस करेंगे। हिंदी को बोझ नहीं, संवाद, संस्कृति, ज्ञान और रोजगार की संभावनाओं से जुड़ी जीवंत भाषा के रूप में प्रस्तुत करना सबसे प्रभावी उपाय होगा। प्र. क्या हिंदी रोजगार के लिए भी एक प्रभावी भाषा बन सकती है? 9. हाँ, हिंदी रोजगार के लिए एक प्रभावी और व्यापक भाषा बन सकती है। आज हिंदी केवल साहित्य और संवाद की भाषा नहीं रह गई है, बल्कि प्रशासन, शिक्षा, मीडिया, पत्रकारिता, अनुवाद, पर्यटन, बैंकिंग, डिजिटल कंटेंट, विज्ञापन और तकनीकी क्षेत्र में भी इसके अवसर बढ़ रहे हैं। विशेष रूप से डिजिटल अर्थव्यवस्था और सोशल मीडिया के विस्तार ने हिंदी में कंटेंट राइटिंग, पत्रकारिता, अनुवाद, कॉपीराइटिंग, वॉयस-ओवर और ऑनलाइन शिक्षा जैसे नए रोजगार के क्षेत्र खोले हैं। सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में राजभाषा हिंदी के प्रयोग से भी रोजगार की संभावनाएँ बनी हुई हैं। प्र. नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं और हिंदी की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं? 10. नई शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषाओं और हिंदी की भूमिका को मैं शिक्षा, ज्ञान, संस्कृति और आत्मविश्वास—इन चारों के समन्वय के रूप में देखता हूँ। NEP 2020 ने पहली बार भाषा को केवल संचार का माध्यम न मानकर ज्ञान-अर्जन और व्यक्तित्व-विकास का महत्वपूर्ण आधार माना है। नीति में जहाँ तक संभव हो, कम-से-कम कक्षा 5 तक और preferably कक्षा 8 तथा आगे भी मातृभाषा/स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा देने की बात कही गई है। मेरे विचार से हिंदी की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंदी ज्ञान के लोकतंत्रीकरण और उच्च शिक्षा तक व्यापक पहुँच का माध्यम बन सकती है। यदि विज्ञान, तकनीक, कानून, प्रशासन, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान की गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में उपलब्ध हो, तो विद्यार्थी अपनी भाषा में विषय को अधिक सहजता से समझ सकेंगे। NEP उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं के माध्यम से तथा द्विभाषी रूप में कार्यक्रम संचालित करने को भी प्रोत्साहित करती है।  प्र. तकनीक और AI के बढ़ते दौर में हिंदी के लिए क्या संभावनाएँ हैं? 11. तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दौर में हिंदी के लिए संभावनाएँ अत्यंत व्यापक हैं। मेरे विचार से AI हिंदी के सामने चुनौती नहीं, बल्कि उसे ज्ञान, रोजगार, शिक्षा और वैश्विक संचार की भाषा बनाने का एक बड़ा अवसर है।सबसे पहली संभावना हिंदी में AI आधारित सेवाओं की है। दूसरी बड़ी संभावना शिक्षा और उच्च शिक्षा में है। तीसरी संभावना रोजगार और नए व्यवसायों की है। चौथी संभावना समावेशी डिजिटल शासन की है। हालाँकि, इसके साथ हमें भाषाई शुद्धता, सांस्कृतिक संदर्भ, डेटा की गुणवत्ता और AI द्वारा उत्पन्न गलत सूचनाओं जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। हिंदी के लिए उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल कॉर्पस, शब्दकोश, पारिभाषिक शब्दावली और प्रमाणित साहित्यिक सामग्री का बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण आवश्यक है।  प्र. हिंदी को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के लिए हमें क्या करना चाहिए? 12. मेरे दृष्टिकोण से कहा जाए तो हिंदी को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के लिए उसे केवल साहित्य और संस्कृति की भाषा न रखकर ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संवाद की भाषा बनाना होगा। आज डिजिटल युग में भाषा की वैश्विक शक्ति उसके डिजिटल विस्तार से भी निर्धारित होती है। UNESCO भी बहुभाषी डिजिटल व्यवस्था, मशीन अनुवाद, वाक्-पहचान और भाषा-प्रौद्योगिकी को भाषाओं के विस्तार के महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखता है। प्र. विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ने और साहित्य से जुड़ने के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे? 13. विद्यार्थियों के लिए मेरा संदेश है कि हिंदी को केवल एक विषय के रूप में न पढ़ें, बल्कि उसे अपने विचार, संवेदना और अभिव्यक्ति की भाषा के रूप में अपनाएँ। हिंदी साहित्य हमारे समाज, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का दर्पण है। प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, निराला और कबीर जैसे साहित्यकारों को पढ़ने से न केवल भाषा समृद्ध होती है, बल्कि जीवन को समझने की दृष्टि भी विकसित होती है। प्र. अंत में, हिंदी दिवस के अवसर पर आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे? 14. हिंदी दिवस के अवसर पर मैं युवाओं से कहना चाहूँगा कि हिंदी केवल हमारी भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, संवेदना, विचार और पहचान की अभिव्यक्ति है। आज का युवा वैश्विक दुनिया से जुड़ रहा है, इसलिए अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। युवाओं को हिंदी को केवल परीक्षा या औपचारिकता की भाषा न मानकर ज्ञान, शोध, तकनीक, रोजगार और नवाचार की भाषा के रूप में अपनाना चाहिए। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से हिंदी के नए अवसर सामने आ रहे हैं। हमें इन अवसरों का रचनात्मक उपयोग करना चाहिए। मेरा युवाओं से आग्रह है—दूसरी भाषाएँ सीखिए, लेकिन अपनी भाषा को मत भूलिए; वैश्विक बनिए, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहिए। हिंदी का सम्मान करना भारत की भाषायी और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना है। हिंदी का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब युवा इसे बोलने के साथ-साथ इसमें सोचेंगे, लिखेंगे, शोध करेंगे और नए ज्ञान का सृजन करेंगे।

    नटखट कान्हा के रूप में मुस्कुराए 8 माह के भव विभू, जन्माष्टमी पर घर में छा गया गोकुल जैसा आनंद

    जयपुर। इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर शर्मा परिवार में भक्ति और उत्सव का एक अनोखा और अद्भुत नज़ारा देखने को मिला। परिवार के सबसे छोटे और दुलारे सदस्य मास्टर भव विभू (आयु 8 माह) ने अपने बाल-सुलभ अंदाज और नटखट रूप से हर किसी का दिल जीत लिया। जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर बाल भव विभू को माखनचोर श्री कृष्ण के पारंपारिक रूप में सजाया गया। सिर पर मोरपंख, माथे पर चंदन का तिलक और हाथों में छोटी सी बांसुरी थामे 8 माह के कान्हा जब मुस्कुराए, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो साक्षात बाल गोपाल घर पधार गए हों। भव विभू की इस मनमोहक छवि को देखकर उनके पिता जयंत शर्मा और माता डॉ. अनिंधा भावविभोर हो उठे। माता डॉ. अनिंधा ने बताया कि भव विभू की यह पहली जन्माष्टमी है, इसलिए पूरा परिवार बेहद उत्साहित था। वहीं उनके नानाजी प्रो. आर. एन. शर्मा ने अपने दौहित्र (नाती) को स्नेह और आशीर्वाद देते हुए कहा कि बच्चों में ही भगवान का वास होता है और भव विभू की यह बाल-लीला हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार है। घर में बनाई गई विशेष झांकी और माखन की मटकी के साथ भव विभू की इस बाल-लीला ने जन्माष्टमी के उत्सव में चार चांद लगा दिए। स्वजनों और शुभचिंतकों ने मास्टर भव विभू को स्वस्थ, दीर्घायु और तेजस्वी जीवन की ढेरों शुभकामनाएं व आशीर्वाद दिए हैं।