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    भारत-EFTA व्यापार समझौते के तहत 99.6% भारतीय निर्यात को टैरिफ कवरेज, वाणिज्य सचिव ने निर्यातकों से बनाई रणनीति

    49 minutes ago

    Yugcharan News / 08-10-2026

    नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) के तहत EFTA देशों को होने वाले भारत के 99.6% निर्यात को टैरिफ कवरेज मिल रहा है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बुधवार को कहा कि भारतीय निर्यातकों, उद्योग संगठनों और राज्य सरकारों को इस समझौते से मिलने वाले अवसरों का अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रत्येक बाजार के हिसाब से अलग रणनीति तैयार करनी चाहिए।

    नई दिल्ली में प्रमुख निर्यातकों के लिए आयोजित एक आउटरीच कार्यक्रम में बोलते हुए अग्रवाल ने कहा कि भारत-EFTA व्यापार समझौता भारतीय कारोबारियों के लिए आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के बाजारों में पहुंच के महत्वपूर्ण अवसर पैदा करता है।

    यह कार्यक्रम दूसरे भारत-EFTA समृद्धि शिखर सम्मेलन 2026 के तहत आयोजित किया गया। इसमें EFTA के चारों देशों के प्रतिनिधि और नेता नई दिल्ली में मौजूद रहे। सम्मेलन का उद्देश्य TEPA लागू होने के एक वर्ष पूरे होने के अवसर पर समझौते की प्रगति की समीक्षा करना और आगे की दिशा पर चर्चा करना था।

    1 अक्टूबर 2025 से लागू हुआ था TEPA

    भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौता 1 अक्टूबर 2025 से लागू हुआ था। समझौते के तहत दोनों पक्षों ने विभिन्न उत्पादों पर टैरिफ और बाजार पहुंच से संबंधित प्रतिबद्धताएं की हैं।

    वाणिज्य सचिव के अनुसार, EFTA की प्रतिबद्धताओं में उसके कुल टैरिफ लाइनों का 92.2% हिस्सा शामिल है, जो भारत के कुल निर्यात का लगभग 99.6% कवर करता है। गैर-कृषि उत्पादों के लिए कवरेज पूर्ण बताया गया है।

    दूसरी ओर, भारत ने अपनी 82.7% टैरिफ लाइनों के लिए प्रतिबद्धता जताई है, जो EFTA से होने वाले लगभग 95.3% निर्यात को कवर करती हैं।

    सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से दोनों पक्षों के कारोबारियों को अधिक स्पष्टता और बाजार तक बेहतर पहुंच मिल सकती है।

    सिर्फ शुल्क में कमी नहीं, स्थिरता भी महत्वपूर्ण

    राजेश अग्रवाल ने कहा कि TEPA को केवल टैरिफ में कमी वाले समझौते के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, व्यापारिक गतिविधियों के लिए पूर्वानुमेयता भी इस समझौते का एक महत्वपूर्ण लाभ है।

    उन्होंने कहा कि टैरिफ में स्थिरता रहने से कंपनियों को निवेश करने, आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने और लंबे समय की कारोबारी योजनाएं बनाने में अधिक भरोसा मिलेगा।

    व्यापारिक क्षेत्र के लिए टैरिफ में अचानक बदलाव न होने की संभावना महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इससे निर्यातकों को अपने उत्पादों की कीमत, उत्पादन क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को पहले से तय करने में मदद मिल सकती है।

    EFTA देशों के साथ कारोबारी साझेदारी पर जोर

    वाणिज्य सचिव ने भारतीय कंपनियों से EFTA देशों की कंपनियों के साथ साझेदारी विकसित करने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के कारोबारी मिलकर ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं विकसित कर सकते हैं, जिनमें कच्चे माल और अन्य इनपुट से लेकर अंतिम उत्पाद तक विभिन्न चरण शामिल हों।

    ऐसी साझेदारियों से भारतीय कंपनियों को उच्च आय वाले बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, दोनों पक्षों के लिए आपूर्ति व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ाने का अवसर भी मिल सकता है।

    अग्रवाल ने भारतीय निर्यातकों से यह समझने को कहा कि किन उत्पादों पर शुल्क में कमी से वास्तविक कारोबारी अवसर पैदा हुए हैं और उन उत्पादों के लिए EFTA देशों के खरीदारों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते विकसित किए जा सकते हैं।

    EFTA का बाजार 500 अरब डॉलर से अधिक

    वाणिज्य सचिव के अनुसार, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड को मिलाकर EFTA देश हर वर्ष 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की वस्तुओं और सेवाओं का आयात करते हैं।

    इतना बड़ा बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध करा सकता है। सरकार अब चाहती है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद निर्यातक इस समझौते का उपयोग करके EFTA बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाएं।

    अग्रवाल ने निर्यात संवर्धन परिषदों, उद्योग संघों और राज्य सरकारों से कहा कि वे कारोबारियों को TEPA के तहत उपलब्ध अवसरों और उसके इस्तेमाल की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दें।

    हर EFTA देश के लिए अलग पांच वर्षीय रणनीति

    वाणिज्य सचिव ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अधिक लक्षित रणनीति अपनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने हितधारकों से प्रत्येक EFTA देश और प्रत्येक बाजार के लिए पांच वर्ष की कार्ययोजना तैयार करने को कहा।

    ऐसी योजनाओं में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि भारत किसी विशेष बाजार में अपनी हिस्सेदारी कैसे बढ़ा सकता है और किन गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने की जरूरत है।

    इसका उद्देश्य केवल शुल्क में मिलने वाली रियायतों का लाभ उठाना नहीं, बल्कि प्रत्येक देश की मांग, उपभोक्ता बाजार, कारोबारी नियमों और संभावित बाधाओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय निर्यात के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना है।

    कृषि क्षेत्र के लिए भी अवसर

    TEPA से कृषि क्षेत्र को भी अवसर मिलने की उम्मीद है। राजेश अग्रवाल ने कहा कि कई कृषि उत्पादों पर शुल्क घटाकर शून्य किया गया है।

    उन्होंने निर्यातकों से ऐसे उत्पादों की पहचान करने को कहा जिनके लिए टैरिफ में कमी से EFTA बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक अवसर पैदा हुए हैं। इसके साथ ही, उन्होंने खरीदारों के साथ लंबे समय की आपूर्ति व्यवस्था तैयार करने पर भी जोर दिया।

    कृषि निर्यात में स्थिर और दीर्घकालिक खरीदार संबंध महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि भारतीय कंपनियां केवल तत्काल निर्यात अवसरों पर निर्भर रहने के बजाय स्थायी बाजार विकसित करें।

    TEPA में 100 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य

    भारत-EFTA समझौते की एक प्रमुख विशेषता निवेश से जुड़ी प्रतिबद्धताएं भी हैं। राजेश अग्रवाल ने इसे भारत के अन्य व्यापार समझौतों से अलग महत्वपूर्ण पहलू के रूप में रेखांकित किया।

    समझौते के अनुच्छेद 7.1 के तहत EFTA देशों ने भारत में EFTA निवेशकों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को समझौता लागू होने के 10 वर्षों के भीतर 50 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इसके बाद अगले पांच वर्षों में अतिरिक्त 50 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य है।

    इस तरह कुल मिलाकर 15 वर्षों की अवधि में 100 अरब डॉलर के निवेश को बढ़ावा देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

    समझौते में 15 वर्षों के भीतर भारत में 10 लाख रोजगार सृजित करने में मदद करने का लक्ष्य भी शामिल है।

    भारत को सिर्फ निर्यात बाजार नहीं, निवेश गंतव्य के रूप में भी देखना होगा

    अग्रवाल ने कहा कि भारत का तेजी से विस्तार करता घरेलू बाजार EFTA देशों के निवेशकों के लिए कई क्षेत्रों में अवसर उपलब्ध कराता है। उनके अनुसार, भारतीय और EFTA कंपनियों के बीच मजबूत साझेदारी से निवेश का स्तर समझौते में निर्धारित लक्ष्यों से भी आगे जा सकता है।

    उन्होंने भारतीय कारोबारियों से भी EFTA को केवल निर्यात के लिए एक गंतव्य के रूप में देखने के बजाय अपने संभावित बाजार के विस्तार के तौर पर देखने की अपील की।

    इस दृष्टिकोण के तहत भारतीय कंपनियां EFTA देशों में केवल अपने उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि वहां की कंपनियों के साथ निवेश, साझेदारी, आपूर्ति श्रृंखला और अन्य कारोबारी अवसरों पर भी काम कर सकती हैं।

     

    भारत-EFTA TEPA के एक वर्ष पूरे होने के साथ सरकार अब इस समझौते को कागजी व्यापार प्रतिबद्धताओं से आगे ले जाकर वास्तविक निर्यात, निवेश और रोजगार के अवसरों में बदलने पर जोर दे रही है। आने वाले वर्षों में यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय कंपनियां अलग-अलग EFTA बाजारों की जरूरतों को कितनी प्रभावी ढंग से समझती हैं और टैरिफ रियायतों के साथ-साथ गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करते हुए वहां अपनी स्थायी कारोबारी मौजूदगी कितनी मजबूत कर पाती हैं।

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