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    दिल्ली हाईकोर्ट ने CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका को लगाई फटकार, जंतर-मंतर बैरिकेड तोड़ने पर उठाए सवाल

    33 minutes ago

    Yugcharan News / 21-10-2026

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका के आचरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि बैरिकेड लगाने का एक उद्देश्य होता है। अदालत ने जंतर-मंतर पर कथित रूप से बैरिकेड पार करके प्रवेश करने और बिना अनुमति प्रदर्शन करने से जुड़े मामले में दोनों नेताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी न्यायिक हिरासत दो दिनों के लिए बढ़ाई गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई करने को लेकर अनिच्छा जताए जाने के बाद दोनों ने अपनी याचिका वापस ले ली।

    यह मामला जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद वहां कथित रूप से प्रवेश करने और शांति भंग की आशंका से जुड़ा है। सौरव दास और आशुतोष रंका 14 अक्टूबर से न्यायिक हिरासत में हैं। आरोप है कि उन्होंने जंतर-मंतर के बंद गेट पर चढ़कर परिसर में प्रवेश किया था। इससे पहले दोनों नेताओं को 10 अक्टूबर को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-3 पर हिरासत में लिया गया था।

    ‘बैरिकेड का एक उद्देश्य होता है’: अदालत की टिप्पणी

    हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं के वकील अभिक चिमनी से कहा कि बैरिकेड किसी कारण से लगाए जाते हैं और उन्हें तोड़ने से स्थिति बिगड़ने की आशंका पैदा हो सकती है। अदालत ने विदेशों में हुई आगजनी और हिंसक घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण उद्देश्य से होने का दावा किया जा सकता है, लेकिन यदि उसमें अनधिकृत लोगों की भागीदारी बढ़ जाए तो हालात बदल सकते हैं।

    अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पुलिस से अनुमति लेने का उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं है। इससे पुलिस को व्यवस्था बनाए रखने और ऐसे लोगों को रोकने में मदद मिलती है, जो प्रदर्शन में शामिल होकर स्थिति बिगाड़ सकते हैं।

    हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने वकील से सवाल किया कि जब प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी, तो बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने की जरूरत क्यों पड़ी। अदालत ने इस संदर्भ में यह भी पूछा कि क्या विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट का आदेश पुनरीक्षण याचिका के जरिए चुनौती देने योग्य है।

    अदालत की ये टिप्पणियां फ्रांस सहित विदेशों में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में आईं। हालांकि, सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। आरोपों और हिरासत से जुड़े विवाद पर संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत निर्णय होना बाकी है।

    न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी गई थी चुनौती

    सौरव दास और आशुतोष रंका ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत दोनों की न्यायिक हिरासत दो दिनों के लिए बढ़ा दी गई थी।

    विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने सार्वजनिक शांति और सुरक्षा से संबंधित चिंताओं का हवाला देते हुए हिरासत बढ़ाने का फैसला किया था। रिपोर्ट के अनुसार, आदेश में यह भी कहा गया था कि निर्धारित प्रदर्शन स्थल से जुड़े प्रतिबंधों के बावजूद बार-बार प्रदर्शन का आह्वान करना कानून के प्रति सम्मान की कमी को दर्शाता है। दिल्ली पुलिस ने भी यह दलील दी थी कि दोनों नेताओं की रिहाई से सार्वजनिक व्यवस्था के लिए तत्काल खतरा पैदा हो सकता है।

    बुधवार की सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं के वकील ने पुलिस की इस दलील पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि पुलिस ने ऐसा कौन-सा नया तथ्य या सामग्री पेश की है, जिसके आधार पर भविष्य में तत्काल खतरे की आशंका जताई गई और हिरासत बढ़ाने की जरूरत बताई गई।

    इस प्रकार, विवाद का एक प्रमुख पहलू यह है कि हिरासत बढ़ाने के लिए पेश किए गए आधार कितने पर्याप्त हैं और क्या संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था।

    जमानत बांड और BNSS की प्रक्रिया पर भी सवाल

    सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जमानत बांड से संबंधित प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। अदालत ने वकील से पूछा कि जब किसी व्यक्ति के जमानत बांड स्वीकार किए जा चुके हों और बाद में उनके उल्लंघन का आरोप लगे, तो कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया।

    अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) का उल्लेख करते हुए कहा कि जमानत बांड के उल्लंघन की स्थिति में निर्धारित कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, इन उपायों में जमानतदार की जमानत राशि जब्त करने जैसी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। उसने यह सवाल भी उठाया कि संबंधित प्रक्रिया अपनाने के बजाय दोनों नेताओं को नया नोटिस क्यों दिया गया।

    रिपोर्ट के मुताबिक, सौरव दास और आशुतोष रंका ने 11 अक्टूबर को जमानत बांड जमा किए थे। उसी दिन जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित रखने की व्यवस्था समाप्त किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद दोनों को फिर से हिरासत में लिया गया।

    हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम के संदर्भ में पूछा कि जमानत बांड के कथित उल्लंघन पर BNSS के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से उठाए गए सवालों को अंतिम आदेश या किसी पक्ष के पक्ष में दिए गए निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    10 अक्टूबर को हवाई अड्डे पर हुई थी हिरासत

    मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को हुई घटनाओं से जुड़ी है। उस दिन सौरव दास और आशुतोष रंका को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-3 पर हिरासत में लिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, उनके खिलाफ BNSS की धारा 126 और 170 के तहत निवारक कार्रवाई शुरू की गई थी। इसके बाद दोनों ने 50,000 रुपये के जमानत बांड जमा किए थे।

    11 अक्टूबर को जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित करने की व्यवस्था समाप्त कर दी गई। इस फैसले को अलग-अलग याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।

    इसके बाद दोनों नेताओं पर आरोप लगा कि उन्होंने जंतर-मंतर के बंद गेट पर चढ़कर वहां प्रवेश किया और प्रदर्शन किया। इसी घटनाक्रम के बाद उन्हें दोबारा हिरासत में लिया गया। पुलिस की ओर से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका जताई गई, जबकि बचाव पक्ष ने इस आशंका के समर्थन में पर्याप्त सामग्री पेश किए जाने पर सवाल उठाए।

    अदालत ने उम्र को लेकर भी की टिप्पणी

    सुनवाई के दौरान अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रंका की उम्र के बारे में भी पूछा। उनके वकील अभिक चिमनी ने बताया कि सौरव दास की उम्र 27 वर्ष और आशुतोष रंका की उम्र 32 वर्ष है।

    इसके बाद अदालत ने जेनरेशन Z को लेकर टिप्पणी की। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत को बताया गया था कि जेनरेशन Z में 1997 के बाद जन्म लेने वाले लोग शामिल होते हैं। इस पर अदालत ने कहा कि दोनों नेताओं को इस परिभाषा के अनुसार जेनरेशन Z का हिस्सा नहीं माना जाएगा।

    यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान हुई बातचीत का हिस्सा थी। मामले का मुख्य कानूनी मुद्दा दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत, कथित जमानत बांड उल्लंघन और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़ी परिस्थितियां बनी रहीं।

    याचिका वापस लेने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया अहम

    हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान संकेत दिया कि संबंधित आदेश को चुनौती देने के लिए पहले निचली अदालत में पुनरीक्षण का विकल्प अपनाने पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने बचाव पक्ष से यह भी पूछा कि कानूनी प्रक्रिया के अगले चरण को अपनाने से पहले हाईकोर्ट में चुनौती देने की जल्दबाजी क्यों की जा रही है।

    इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रंका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश के खिलाफ अपनी याचिका वापस ले ली। इस घटनाक्रम का अर्थ यह नहीं है कि हिरासत से जुड़े सभी विवाद समाप्त हो गए हैं। मामले में आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाते हैं, यह संबंधित पक्षों के निर्णय और अदालतों में उपलब्ध कानूनी उपायों पर निर्भर करेगा।

    फिलहाल, इस मामले में दो प्रमुख प्रश्न सामने हैं। पहला, क्या हिरासत बढ़ाने के लिए सार्वजनिक शांति को लेकर जताई गई आशंका पर्याप्त आधारों पर आधारित थी? दूसरा, कथित जमानत बांड उल्लंघन के मामले में क्या BNSS के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सही ढंग से पालन किया गया? इन प्रश्नों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया में स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

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