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    मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन: AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में कल सुनवाई

    34 minutes ago

    Yugcharan News / 21-10-2026

    दिल्ली हाईकोर्ट 22 अक्टूबर को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें उन्होंने शांति बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत बांड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने संबंधी नोटिस को चुनौती दी है। यह नोटिस 16 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ हुए ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन में उनकी भागीदारी के बाद जारी किया गया था। नेहा बोरा ने अदालत से नोटिस रद्द करने, उससे जुड़ी कार्यवाही समाप्त करने और अधिकारियों को उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की है।

    लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, मामले को 21 अक्टूबर को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था। हालांकि, नेहा बोरा के वकील के अनुरोध पर न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने सुनवाई स्थगित कर दी। अब मामले की सुनवाई 22 अक्टूबर को होने की संभावना है।

    यह मामला दिल्ली में प्रदर्शनों, निषेधाज्ञाओं और शांति बनाए रखने के लिए जारी किए जाने वाले निवारक नोटिसों से जुड़े व्यापक कानूनी विवाद के बीच सामने आया है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या अधिकारियों ने नेहा बोरा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से पहले शांति भंग होने की आशंका को दर्शाने वाली पर्याप्त सामग्री पेश की थी।

    BNSS की धाराओं के तहत जारी नोटिस को दी चुनौती

    नेहा बोरा ने अपनी याचिका में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा 17 अक्टूबर को जारी नोटिस को चुनौती दी है। यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और धारा 130 के साथ धारा 135(3) के तहत जारी किया गया था।

    नोटिस में नेहा बोरा से जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बांड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया है। याचिका में उन्होंने इस नोटिस को रद्द करने के साथ-साथ इससे उत्पन्न होने वाली कार्यवाही को समाप्त करने की मांग की है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अदालत से अधिकारियों को उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने का अनुरोध किया है।

    याचिका का प्रमुख तर्क यह है कि नोटिस में ऐसी ठोस सामग्री का उल्लेख नहीं किया गया है, जिससे यह स्थापित हो सके कि नेहा बोरा के कारण शांति भंग होने की वास्तविक आशंका थी। उनके पक्ष का कहना है कि BNSS की धारा 126 के तहत निवारक कार्यवाही शुरू करने के लिए शांति भंग होने की संभावना से संबंधित आधार आवश्यक हैं।

    हालांकि, ये याचिका में किए गए दावे हैं। इन पर अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है। आगामी सुनवाई में अदालत नोटिस को चुनौती देने वाले तर्कों पर विचार कर सकती है और मामले की कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

    16 अक्टूबर को ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन का आह्वान

    याचिका के अनुसार, नेहा बोरा ने 16 अक्टूबर को शाम पांच बजे मंडी हाउस में शांतिपूर्ण सभा आयोजित करने का आह्वान किया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराना था। याचिका में कहा गया है कि यह कार्यक्रम मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा था।

    नेहा बोरा का आरोप है कि उन्हें उसी दिन शाम लगभग 5:30 बजे हिरासत में ले लिया गया। याचिका के मुताबिक, उन्हें पहले एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया और बाद में आर.के. पुरम पुलिस स्टेशन पहुंचाया गया, जहां उन्हें रातभर रखा गया।

    याचिका में कहा गया है कि उन्हें 17 अक्टूबर की सुबह छह बजे रिहा किया गया। इसके बाद 18 अक्टूबर को उन्हें विवादित नोटिस प्राप्त हुआ।

    इन घटनाओं का विवरण नेहा बोरा की ओर से दायर याचिका में दिया गया है। हिरासत के दौरान हुई घटनाओं और नोटिस जारी करने के आधारों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष तथा अदालत की आगे की टिप्पणियां मामले के परिणाम को समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगी।

    नोटिस में नारेबाजी और निषेधाज्ञा के उल्लंघन का आरोप

    याचिका के अनुसार, नेहा बोरा को जारी नोटिस में मंडी हाउस में कथित नारेबाजी, जंतर-मंतर के आसपास बार-बार प्रदर्शन किए जाने और 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के लिए लोगों को कथित रूप से उकसाने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया है।

    नोटिस में जंतर-मंतर के आसपास निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद प्रदर्शनों का आयोजन किए जाने का भी संदर्भ दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित प्रतिबंधों का उल्लेख BNSS की धारा 163 के तहत जारी आदेशों के संदर्भ में किया गया है।

    नेहा बोरा की याचिका इन आरोपों के आधार पर जारी नोटिस की वैधता को चुनौती देती है। उनका कहना है कि नोटिस में शांति भंग होने की आशंका को साबित करने वाली आवश्यक सामग्री नहीं बताई गई है।

    इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह है कि निवारक कार्रवाई के लिए केवल प्रदर्शन में भागीदारी या नारेबाजी का उल्लेख पर्याप्त है या अधिकारियों को ऐसी विशिष्ट परिस्थितियां भी दिखानी होंगी, जिनसे सार्वजनिक शांति को खतरा होने की आशंका स्थापित होती हो। इस प्रश्न पर अदालत का रुख मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी दिया गया हवाला

    नेहा बोरा की याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 अक्टूबर और 15 अक्टूबर 2026 को पारित आदेशों का भी उल्लेख किया गया है। ये आदेश नई दिल्ली में सभाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों और BNSS की धारा 163 के तहत जारी आदेशों से संबंधित कार्यवाहियों के संदर्भ में दिए गए थे।

    याचिका के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर को निर्देश दिया था कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। याचिका में इस निर्देश को विशेष रूप से उन मामलों के संदर्भ में उद्धृत किया गया है, जिनमें शांतिपूर्ण सभाएं धारा 163 के आदेश से प्रभावित क्षेत्र के बाहर आयोजित की जाती हैं।

    याचिका में यह भी कहा गया है कि 15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह 23 अगस्त के आदेश के अतिरिक्त नई दिल्ली में लागू धारा 163 के आदेशों को रिकॉर्ड पर रखे। इन आदेशों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 19 नवंबर के लिए स्थगित कर दी गई थी।

    नेहा बोरा ने इन आदेशों का हवाला देते हुए अपनी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया और शांतिपूर्ण सभा से संबंधित अधिकारों के संदर्भ में चुनौती दी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उनकी याचिका पर सटीक प्रभाव क्या होगा, यह दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रखे गए तथ्यों और कानूनी दलीलों पर निर्भर करेगा।

    शांति बांड की कार्यवाही पर क्यों है विवाद?

    शांति बनाए रखने के लिए बांड प्रस्तुत कराने की प्रक्रिया का उद्देश्य संभावित शांति भंग होने की स्थिति में निवारक कार्रवाई करना है। ऐसी कार्यवाही में अधिकारियों को लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप कार्रवाई करनी होती है। नेहा बोरा की याचिका इसी प्रक्रिया के आधार और उसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाती है।

    उनकी ओर से अदालत में यह दलील दी गई है कि नोटिस में शांति भंग होने की आशंका से संबंधित पर्याप्त सामग्री का खुलासा नहीं किया गया। यदि अदालत इस तर्क पर विचार करती है, तो उसे नोटिस में दर्ज आधारों, लागू कानूनी प्रावधानों और याचिका में उद्धृत सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के संदर्भ में मामले का परीक्षण करना पड़ सकता है।

    दूसरी ओर, नोटिस में जिन घटनाओं और आरोपों का उल्लेख किया गया है, उनका कानूनी महत्व संबंधित रिकॉर्ड और अधिकारियों के पक्ष को देखकर ही निर्धारित किया जा सकता है। फिलहाल, उपलब्ध रिपोर्ट में अदालत द्वारा नोटिस की वैधता पर कोई अंतिम फैसला सुनाए जाने की जानकारी नहीं है।

    22 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर

    नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक ओर निवारक कार्रवाई के लिए आवश्यक कानूनी आधार का प्रश्न है और दूसरी ओर प्रदर्शन तथा सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित प्रतिबंधों का मुद्दा है।

    याचिका में नोटिस रद्द करने, उससे जुड़ी कार्यवाही समाप्त करने और अधिकारियों को दंडात्मक कार्रवाई से रोकने की मांग की गई है। अदालत को इन मांगों पर विचार करते हुए याचिका में दिए गए तथ्यों, कानूनी प्रावधानों और उद्धृत न्यायिक आदेशों का परीक्षण करना होगा।

    फिलहाल, नेहा बोरा को जारी नोटिस को रद्द करने की मांग पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। 22 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत का रुख और आगे जारी होने वाले आदेश यह स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि इस मामले में निवारक कार्यवाही को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाएगा।

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