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    दिल्ली हाईकोर्ट से CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका ने वापस ली याचिका, न्यायिक हिरासत को दी थी चुनौती

    41 minutes ago

    Yugcharan News / 21-10-2026

    दिल्ली हाईकोर्ट में कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका ने अपनी न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका वापस ले ली। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा 19 अक्टूबर को उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए बढ़ाने के आदेश को चुनौती दी थी। यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ घोषित विरोध-प्रदर्शनों और दिल्ली के जंतर-मंतर पर तिरंगा प्रदर्शन करने के कथित प्रयास से जुड़ा है। न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद की पीठ ने वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने की बात कहते हुए याचिका पर सुनवाई जारी रखने को लेकर अनिच्छा जताई। इसके बाद याचिकाकर्ताओं के वकील अभिक चिमनी ने निर्देश मिलने के बाद याचिका वापस ले ली। अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की।

    दोनों नेताओं की दो दिन की न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर को समाप्त हो रही थी। उन्हें इसी दिन आगे की कार्यवाही के लिए विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया जाना था। इस परिस्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि पहले मजिस्ट्रेट की अदालत में होने वाली कार्यवाही का परिणाम देखा जाए और उसके बाद कानून के तहत उचित कदम उठाया जाए।

    वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने पर अदालत ने उठाए सवाल

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन जहां कानून किसी मामले में विशिष्ट उपाय उपलब्ध कराता है, वहां उस प्रक्रिया पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि स्वतंत्रता पवित्र है, लेकिन यदि संबंधित कानून में पहले से ही राहत पाने का प्रावधान मौजूद है, तो उसका इस्तेमाल करने के प्रश्न पर विचार करना जरूरी है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता अभिक चिमनी ने 19 अक्टूबर के उस आदेश को रद्द करने की मांग की, जिसके तहत दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत दो दिनों के लिए बढ़ाई गई थी। उन्होंने दलील दी कि मजिस्ट्रेट के आदेश में कथित रूप से तत्काल शांति भंग होने के खतरे के पर्याप्त कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट का आदेश पुनरीक्षण यानी रिवीजन के माध्यम से चुनौती देने योग्य है, तो याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका क्यों दायर की है, इस पर विचार किया जाना चाहिए।

    अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया कि किसी रिट याचिका की विचारणीयता और उस पर सुनवाई किए जाने की उपयुक्तता दो अलग-अलग प्रश्न हैं। पीठ ने कहा कि रिट कार्यवाही में अदालत सामान्यतः निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता की समीक्षा करती है, जबकि अपीलीय या पुनरीक्षण कार्यवाही में तथ्यों और आदेश की शुद्धता की जांच अलग तरीके से की जा सकती है।

    जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और शांति बांड के कथित उल्लंघन का मामला

    यह पूरा मामला जंतर-मंतर पर प्रस्तावित तिरंगा प्रदर्शन और शांति बनाए रखने के लिए पहले दिए गए बांड के कथित उल्लंघन से संबंधित है।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों नेताओं को 10 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ घोषित विरोध-प्रदर्शनों से पहले हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था। उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और धारा 170 के तहत निवारक कार्रवाई की गई थी।

    उसी दिन उन्हें ₹50,000 के शांति बांड प्रस्तुत करने की शर्त पर रिहा कर दिया गया था। अधिकारियों का आरोप था कि दोनों नेताओं ने शांति बनाए रखने का आश्वासन देने के बावजूद 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर तिरंगा प्रदर्शन करने का प्रयास किया। इसके बाद उन्हें दोबारा हिरासत में लिया गया।

    विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने 14 अक्टूबर को दोनों को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। 19 अक्टूबर को मामले पर आगे विचार करते हुए हिरासत की अवधि दो दिन और बढ़ा दी गई।

    हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोप यह है कि उन्होंने पहले दिए गए बांड का उल्लंघन करते हुए उस स्थान पर जाने का प्रयास किया, जिसे विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं रखा गया था।

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचना से हटाए जाने के निर्णय को चुनौती देने वाला मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और संबंधित अधिसूचना पर रोक नहीं लगी है।

    हालांकि, इन टिप्पणियों के माध्यम से हाईकोर्ट ने आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं किया। याचिका वापस लिए जाने के कारण अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया।

    अदालत ने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर जताई चिंता

    सुनवाई के दौरान पीठ ने प्रदर्शन के आयोजन, संभावित भीड़ और सार्वजनिक शांति बनाए रखने से संबंधित पहलुओं पर भी सवाल उठाए।

    अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड तोड़ा जाता है, तो अन्य लोगों के भी वहां शामिल होने की संभावना बढ़ सकती है। पीठ के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के उद्देश्य के बावजूद ऐसी परिस्थितियों में अनियंत्रित व्यक्तियों के शामिल होने और स्थिति बिगड़ने की आशंका पर विचार करना पड़ सकता है।

    न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि पुलिस से अनुमति लेने की प्रक्रिया का उद्देश्य केवल प्रदर्शन को रोकना नहीं, बल्कि अवांछित तत्वों की भागीदारी और संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी समस्याओं को नियंत्रित करना भी हो सकता है।

    अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जब किसी संगठन की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दे समय के साथ बदलते हैं, तो उसके सदस्यों की गतिविधियों और संबंधित परिस्थितियों का महत्व बढ़ जाता है।

    पीठ ने जुलाई में नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हुए जेन-जी प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में आंदोलन का मुद्दा अलग बताया जा रहा है। अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रंका की उम्र का उल्लेख करते हुए पूछा कि उनकी गतिविधियों, संगठन और प्रदर्शन के उद्देश्य को किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

    हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे व्यापक प्रश्नों पर विचार करने के लिए उचित कानूनी कार्यवाही आवश्यक है। मौजूदा याचिका में मुख्य प्रश्न न्यायिक हिरासत बढ़ाने और बांड से संबंधित आदेश की वैधता का था।

    BNSS की धारा 135(3) पर भी हुई चर्चा

    सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अभिक चिमनी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 135(3) के तहत की गई कार्रवाई के प्रभाव पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि केवल व्यक्तिगत शांति बांड के कथित उल्लंघन के आधार पर हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता, विशेषकर तब जब आदेश में तत्काल खतरे का पर्याप्त विवरण न दिया गया हो।

    BNSS के तहत शांति भंग होने या सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका की स्थिति में मजिस्ट्रेट को निवारक कार्रवाई करने के अधिकार दिए गए हैं। संबंधित प्रावधानों का उद्देश्य संभावित अव्यवस्था या अपराध को रोकना है। हालांकि, किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की वैधता का निर्धारण मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाना होता है।

    चिमनी ने दलील दी कि 19 अक्टूबर के आदेश में राज्य पक्ष की बात सुनने और आशंका होने का उल्लेख तो किया गया, लेकिन ऐसी कौन-सी तत्काल परिस्थिति थी जिसके कारण न्यायिक हिरासत आवश्यक हो गई, इसका पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

    इस पर अदालत ने सवाल किया कि क्या पहले दिए गए शांति बांड का कथित उल्लंघन अपने आप में तत्काल चिंता का कारण नहीं हो सकता। वकील ने जवाब में कहा कि दोनों याचिकाकर्ता आदतन अपराधी नहीं हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार होना चाहिए।

    पीठ ने इसके जवाब में उल्लेख किया कि दोनों नेताओं ने 11 अक्टूबर को शांति बनाए रखने के लिए बांड दिया था और उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने बाद में उसका उल्लंघन किया।

    यहां ध्यान देने वाली बात है कि अदालत की मौखिक टिप्पणियां और किसी पक्ष की दलीलें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के समान नहीं होतीं। इस मामले में याचिका वापस लिए जाने के कारण हाईकोर्ट ने इन मुद्दों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया।

    जमानतदारों की पात्रता पर भी उठा विवाद

    मामले में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उन जमानतदारों की स्वीकार्यता का भी था, जिन्हें दोनों नेताओं की रिहाई के लिए प्रस्तुत किया गया था।

    विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश के अनुसार, अदालत ने प्रस्तुत जमानतदारों को उपयुक्त नहीं पाया था। आदेश में जमानत संबंधी दस्तावेजों में लगी तस्वीरों और आधार कार्ड पर मौजूद तस्वीरों के बीच कथित विसंगतियों का उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, जमानतदारों से पूछताछ के दौरान मिले जवाबों को भी असंतोषजनक बताया गया था।

    अधिवक्ता चिमनी ने जमानतदारों को अस्वीकार करने के निर्णय पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह कार्रवाई मनमाने ढंग से की गई। उन्होंने व्यक्तिगत बांड पर रिहाई देने की मांग भी उठाई।

    वकील ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि हाईकोर्ट में याचिका वापस लेने के बाद मजिस्ट्रेट की अदालत में जमानतदारों को फिर अस्वीकार कर दिया जाता है, तो याचिकाकर्ताओं को राहत के लिए दोबारा अदालत का रुख करना पड़ेगा।

    इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में उपलब्ध उपायों के तहत मामले को आगे बढ़ाया जा सकता है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या नए जमानतदार उसी दिन प्रस्तुत किए जा रहे हैं और जमानतदारों को अस्वीकार करने वाले आदेश को किस कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जा सकती है।

    पीठ ने निवारक हिरासत और निवारक निरोध के बीच अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने कहा कि निवारक निरोध के मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यानी हेबियस कॉर्पस का उपाय उपयुक्त हो सकता है, लेकिन दोनों प्रकार की कार्रवाई को एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए।

    आगे क्या होगा?

    हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुझाव दिया कि दोनों नेताओं को पहले 21 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होने दिया जाए। वहां से मिलने वाली राहत या आदेश के आधार पर आगे की कानूनी रणनीति तय की जा सकती है।

    पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि यदि मजिस्ट्रेट की अदालत याचिकाकर्ताओं के पक्ष में राहत देती है, तो विवाद समाप्त हो सकता है। यदि राहत नहीं मिलती, तो वे कानून के तहत पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

    अंततः अधिवक्ता अभिक चिमनी ने अपने मुवक्किलों के निर्देश पर याचिका वापस ले ली और हाईकोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी। अदालत ने स्पष्ट रूप से मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की।

    इसलिए, याचिका वापस लिए जाने को दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत के आदेश के खिलाफ जीत या हार के रूप में नहीं देखा जा सकता। हिरासत, जमानतदारों की स्वीकार्यता और कथित शांति बांड उल्लंघन से जुड़े प्रश्नों पर आगे की स्थिति विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में होने वाली कार्यवाही तथा उपलब्ध कानूनी उपायों पर निर्भर करेगी।

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