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    मद्रास हाईकोर्ट में विजय की ₹30 करोड़ की संपत्ति का मामला, क्या जानकारी छिपाना ‘भ्रष्ट आचरण’ माना जाएगा?

    1 hour ago

    Yugcharan News / 08-10-2026

    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की चुनावी संपत्तियों से जुड़ा मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंच गया है। एक मतदाता ने आरोप लगाया है कि अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव के दौरान पेरंबूर विधानसभा क्षेत्र से नामांकन दाखिल करते समय विजय ने अपनी कुछ संपत्तियों और उनसे जुड़े लेनदेन की पूरी जानकारी चुनावी हलफनामे में नहीं दी। याचिका में करीब ₹30 करोड़ की संपत्तियों से संबंधित कथित गैर-प्रकटीकरण और संपत्ति विवरण में विसंगतियों का मुद्दा उठाया गया है।

    मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन कर रहे हैं। 7 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि यदि किसी उम्मीदवार ने लगभग ₹30 करोड़ की संपत्ति का विवरण नहीं दिया हो, तो क्या इसे चुनाव को प्रभावित करने वाला ‘भ्रष्ट आचरण’ माना जा सकता है। अदालत ने यह भी पूछा कि जब विजय ने अपने हलफनामे में ₹600 करोड़ से अधिक की संपत्ति घोषित की है, तब अतिरिक्त ₹30 करोड़ की संपत्ति का कथित गैर-प्रकटीकरण क्या वास्तव में किसी मतदाता के निर्णय को प्रभावित कर सकता था।

    मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

    मतदाता ने विजय की चुनावी जीत को दी चुनौती

    मद्रास हाईकोर्ट में यह मामला पेरंबूर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता एस. दिनेश की ओर से दायर चुनाव याचिका से जुड़ा है। दिनेश ने अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में विजय की जीत को चुनौती देते हुए उनके चुनावी हलफनामे में कथित वित्तीय विसंगतियों का आरोप लगाया है।

    विजय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने याचिका को खारिज करने की मांग की है। उनका पक्ष है कि चुनाव याचिका में आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण तथ्य और विवरण पर्याप्त रूप से प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।

    विजय की ओर से यह भी तर्क दिया गया है कि हलफनामे में मामूली अथवा तकनीकी विसंगतियां अपने आप में किसी चुनाव को रद्द करने का आधार नहीं हो सकतीं, जब तक यह स्पष्ट रूप से नहीं दिखाया जाए कि कथित गलतियों या गैर-प्रकटीकरण का चुनाव परिणाम पर कोई वास्तविक प्रभाव पड़ा।

    कोडाइकनाल की जमीन पर भी उठे सवाल

    याचिकाकर्ता ने विजय की संपत्ति संबंधी जानकारी में कई कथित विसंगतियों का उल्लेख किया है। इनमें कोडाइकनाल के विलपट्टी गांव में करीब 50 सेंट कृषि भूमि का मामला भी शामिल है।

    याचिका के अनुसार, विजय के चुनावी हलफनामे में बताया गया था कि उन्होंने यह जमीन वर्ष 1997 में ₹30,000 में खरीदी थी और इसकी मौजूदा बाजार कीमत लगभग ₹20 लाख बताई गई थी। हालांकि, याचिकाकर्ता का दावा है कि राजस्व रिकॉर्ड में इस जमीन को सरकारी ‘पोरम्बोक’ भूमि के रूप में दर्ज किया गया है।

    यह आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है और मामले में अदालत को उपलब्ध दस्तावेजों तथा पक्षों की दलीलों के आधार पर आगे निर्णय लेना है।

    पोरुर की संपत्ति के क्षेत्रफल और कीमत पर विवाद

    याचिका में चेन्नई के पोरुर स्थित एक गैर-कृषि संपत्ति के विवरण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, विजय के हलफनामे में 2010 में 33,955 वर्ग फुट जमीन ₹9.13 करोड़ में खरीदे जाने का उल्लेख है। वहीं, याचिका में पंजीकरण संबंधी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि संबंधित खरीद 20,773 वर्ग फुट क्षेत्रफल और ₹7.5 करोड़ की कीमत से जुड़ी थी।

    इस अंतर को याचिकाकर्ता ने चुनावी हलफनामे में कथित गलत या अपूर्ण जानकारी के उदाहरण के तौर पर पेश किया है।

    पाडी की संपत्ति और ₹35 करोड़ की बिक्री का आरोप

    याचिका में चेन्नई के पाडी इलाके की एक व्यावसायिक संपत्ति को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, विजय के हलफनामे में 11,854 वर्ग फुट की इमारत का मूल्य ₹7 करोड़ बताया गया था। इसमें यह भी उल्लेख था कि संपत्ति वर्ष 2009 में ₹1.95 करोड़ में खरीदी गई और इसके निर्माण पर ₹3.9 करोड़ खर्च किए गए।

    याचिकाकर्ता का दावा है कि संबंधित संपत्ति का निर्मित क्षेत्रफल 23,460 वर्ग फुट था और इसे 12 फरवरी 2026 को ₹35 करोड़ में बेचा गया। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि संपत्ति विजय ने सीधे खरीदने के बजाय कोरट्टूर की एक संपत्ति से जुड़े एक्सचेंज डीड के जरिए प्राप्त की थी।

    याचिकाकर्ता का आरोप है कि संपत्ति के अधिग्रहण के तरीके और बाद में हुई कथित ₹35 करोड़ की बिक्री का चुनावी हलफनामे में उचित रूप से खुलासा नहीं किया गया।

    नीलांगरई बंगले को लेकर भी विवाद

    विजय की नीलांगरई स्थित संपत्ति को लेकर भी याचिका में अलग दावा किया गया है। याचिकाकर्ता ने हलफनामे में इस संपत्ति को विरासत में मिली संपत्ति बताए जाने पर आपत्ति जताई है।

    याचिका के अनुसार, विजय के पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने वर्ष 2003 में यह संपत्ति खरीदी थी और वर्ष 2005 में इसे एक सेटलमेंट डीड के जरिए विजय के नाम किया गया था।

    दस्तावेज के अनुसार, करीब 17,100 वर्ग फुट क्षेत्र में फैली इस संपत्ति में लगभग 5,500 वर्ग फुट का भवन था और इसकी कीमत ₹2.75 करोड़ निर्धारित की गई थी।

    याचिकाकर्ता का आरोप है कि विजय के 2026 के चुनावी हलफनामे में इस संपत्ति के संबंध में 18,633 वर्ग फुट के निर्मित क्षेत्र पर ₹18.73 करोड़ खर्च होने और मौजूदा बाजार मूल्य करीब ₹20 करोड़ होने की जानकारी दी गई थी।

    इन सभी दावों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों और दलीलों के आधार पर ही निकलना है।

    याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

    याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एन.सी. अशोक कुमार ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 2013 के ‘रेसर्जेंस इंडिया बनाम निर्वाचन आयोग’ मामले के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में उम्मीदवार के बारे में जानकारी हासिल करने के मतदाता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा गया था।

    याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि उम्मीदवार द्वारा अपनी संपत्तियों के संबंध में गलत, अधूरी या छिपाई गई जानकारी मतदाता के सूचित चुनावी निर्णय के अधिकार को प्रभावित कर सकती है।

    वकील ने रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका पर भी सवाल उठाया और 2009 के ‘कृष्णमूर्ति बनाम शिवकुमार’ मामले में न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन के फैसले का हवाला दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, उस फैसले में गलत, अधूरी, झूठी अथवा छिपाई गई जानकारी को मतदाता के स्वतंत्र चुनावी अधिकार में हस्तक्षेप से जोड़ा गया था। इस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में बरकरार रखा था।

    विजय के वकील ने आरोपों को बताया अपर्याप्त

    मुख्यमंत्री विजय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने आरोपों का विरोध किया। उनके पक्ष की दलील है कि चुनाव याचिका में ऐसे आवश्यक तथ्य नहीं दिए गए हैं, जिनके आधार पर चुनाव परिणाम को चुनौती देने का कानूनी आधार बनता हो।

    विजय की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि क्या याचिकाकर्ता ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 81 की आवश्यकताओं को पूरा किया है। अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि याचिका में यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता संबंधित विधानसभा क्षेत्र का मतदाता है।

    विजय की ओर से यह भी कहा गया कि हलफनामे में कथित विसंगतियों और चुनाव परिणाम के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध को याचिका में स्थापित नहीं किया गया है।

    हाईकोर्ट ने पूछा—क्या ₹30 करोड़ का अंतर चुनाव को प्रभावित करता है?

    7 अक्टूबर की सुनवाई में न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने मामले के इसी पहलू पर विशेष ध्यान दिया। अदालत ने पूछा कि यदि विजय ने अपने हलफनामे में ₹600 करोड़ से अधिक की संपत्ति घोषित की है, तो लगभग ₹30 करोड़ की कथित गैर-घोषित संपत्ति से मतदाता के चुनावी निर्णय पर कितना प्रभाव पड़ सकता है।

    अदालत ने यह भी सवाल किया कि यदि कोई मतदाता पहले ही विजय को वोट देने का फैसला कर चुका था, तो क्या अतिरिक्त संपत्ति की जानकारी उसके निर्णय को बदल देती।

    न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायणन ने इस संदर्भ में यह संभावना भी उठाई कि इतने बड़े संपत्ति पोर्टफोलियो का पूरा विवरण स्वयं उम्मीदवार द्वारा तैयार किए जाने के बजाय चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता से तैयार किया गया हो सकता है।

    अदालत ने उदाहरण देते हुए सवाल किया कि यदि किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से संपत्ति की सूची तैयार कराने के दौरान कोई संपत्ति छूट जाती है, तो क्या केवल इस आधार पर चुनाव को रद्द किया जा सकता है।

    रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका पर भी सवाल

    अदालत ने याचिकाकर्ता के उस आरोप पर भी सवाल किया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने विजय का नामांकन अनुचित तरीके से स्वीकार किया था।

    न्यायालय ने पूछा कि रिटर्निंग ऑफिसर से उम्मीदवार के हलफनामे में घोषित प्रत्येक संपत्ति की वास्तविकता और सही बाजार मूल्य की विस्तृत जांच की अपेक्षा किस सीमा तक की जा सकती है।

    यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी नामांकन के समय दाखिल हलफनामों में उम्मीदवारों द्वारा दी गई जानकारी की प्रकृति और उसकी जांच की सीमा चुनावी कानून के तहत अलग-अलग स्तरों पर निर्धारित होती है।

    मामले में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं

    मद्रास हाईकोर्ट ने अभी इस मामले में विजय के चुनाव को रद्द करने या याचिकाकर्ता के आरोपों को सही ठहराने संबंधी कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। फिलहाल अदालत विजय की उस अर्जी पर सुनवाई कर रही है, जिसमें चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करने की मांग की गई है।

    अदालत ने 7 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों पर भरोसा किए जाने से मामले का कानूनी स्वरूप अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायणन ने विजय के पक्ष से इन दलीलों पर जवाब मांगा और सुनवाई 8 अक्टूबर तक स्थगित कर दी।

     

    इसलिए फिलहाल ₹30 करोड़ की कथित संपत्ति के गैर-प्रकटीकरण को लेकर लगाए गए आरोप केवल याचिकाकर्ता के दावे हैं। इन आरोपों की सत्यता और उनका चुनाव परिणाम पर कोई कानूनी प्रभाव पड़ा या नहीं, इसका निर्धारण अदालत की आगे की कार्यवाही के बाद ही होगा।

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