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    बनास के तट पर महामिलन: जब देवनारायण ने पहचाना अपना बिछड़ा भाई, नागा साधुओं के साथ हुआ था भीषण संघर्ष

    1 hour ago

    राजस्थान की लोक संस्कृति और शौर्य गाथाओं के केंद्र भगवान देवनारायण के जीवन का हर अध्याय त्याग, शक्ति और न्याय की मिसाल है। देवनारायण की यात्रा (काफिले) के दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिसने न केवल शौर्य की परिभाषा लिखी, बल्कि बिछड़े हुए परिवार के पुनर्मिलन की एक भावुक गाथा भी रच दी। देवधा से शुरू हुआ यह काफिला जब बनास नदी के तट पर पहुँचा, तो वहाँ जो कुछ हुआ, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया।

    1. बनास का तट और नागा साधुओं का अवरोध

    देवनारायण का विशाल काफिला अपनी गंतव्य की ओर अग्रसर था। सबसे आगे ग्वालों की टोली अपनी गायों को हाँकते हुए चल रही थी। बीच में साडू माता, हीरा दासी और अन्य परिजन गाड़ियों में सवार थे। काफिले की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भगवान देवनारायण और भेरु जी ने संभाल रखी थी, जो सबसे अंत में सुरक्षा घेरा बनाए हुए थे।

    जैसे ही काफिला बनास नदी के किनारे पहुँचा, वहाँ पहले से डेरा डाले बैठे नागा साधुओं की एक शक्तिशाली फौज ने उनका रास्ता रोक लिया। इन साधुओं का नियम था कि उस मार्ग से गुजरने वाले हर यात्री को दान या कर (Tax) देना अनिवार्य था। अपनी धूनी और चिमटों के साथ खड़े साधुओं ने गर्जना की— "बिना दान चुकाए नदी के उस पार कोई नहीं जा सकता!"

    2. शौर्य और संघर्ष: ग्वालों बनाम नागा साधु

    काफिले के ग्वालों ने जब बिना दान दिए आगे बढ़ने की कोशिश की, तो माहौल तनावपूर्ण हो गया। साधुओं ने अपने भारी चिमटे और अस्त्र उठा लिए। देखते ही देखते बनास के रेतीले किनारों पर युद्ध छिड़ गया। एक तरफ धर्मपरायण ग्वाले थे और दूसरी तरफ हठयोगी नागा साधुओं की जमात। युद्ध की गर्जना और हथियारों की खनक ने नदी के शांत वातावरण को अशांत कर दिया।

    3. पहचान की एक चमक: हीरा दासी की पैनी नजर

    जब युद्ध अपने चरम पर था, तभी काफिले में मौजूद हीरा दासी की नजर साधुओं की भीड़ में शामिल एक युवा साधु पर पड़ी। उस साधु का तेज और शरीर की बनावट (डील-डौल) आम सन्यासियों से भिन्न थी। हीरा दासी को उसमें अपने पुराने मालिक नियाजी की झलक दिखाई दी।

    उसने तुरंत साडू माता के पास जाकर कहा, "माताजी, जरा उस साधु को देखिए! उसकी शक्ल आपकी देवरानी नेतूजी से मिलती है और उसका शरीर बिल्कुल नियाजी जैसा बलशाली है। मुझे संदेह है कि यह कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि हमारे अपने रक्त का कोई अंश है।"

    4. बाबा रूपनाथ का रहस्योद्घाटन

    हीरा की बात सुनकर साडू माता का ममतामयी हृदय बेचैन हो उठा। उन्होंने तुरंत युद्ध रुकवाने का निश्चय किया और साधुओं के गुरु, परम तपस्वी बाबा रूपनाथ के पास पहुँचीं। माता साडू ने बाबा के चरणों में वंदन किया और विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की, "हे ऋषिवर! इस रक्तपात को रोकें। हम तीर्थयात्री हैं, दानी हैं, लुटेरे नहीं।"

    बातों-बातों में साडू माता ने उस विशिष्ट युवा साधु के बारे में पूछा। तब बाबा रूपनाथ ने एक ऐसा रहस्य उजागर किया जिसे सुनकर सबकी आँखें भर आईं। बाबा ने बताया, "यह युवक कोई और नहीं, बल्कि नियाजी और नेतूजी का पुत्र 'भांगी जी' है, जो बचपन से ही सन्यास मार्ग पर निकल पड़ा था।"

    5. माँ का ममता भरा अधिकार और भांगी जी की वापसी

    सत्य जानकर साडू माता की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने बाबा रूपनाथ से भांगी जी को अपने साथ ले जाने की अनुमति माँगी। बाबा रूपनाथ ने साडू माता की ममता और उनके उच्च कुल के धर्म को देखते हुए सहर्ष आज्ञा दे दी।

    साडू माता ने भांगी जी को अपने पास बुलाया और स्नेहपूर्ण स्वर में कहा, "पुत्र, मैं तुम्हारी बड़ी माता हूँ। तुम सन्यास में कहाँ भटक रहे हो? तुम्हारा स्थान राजमहलों और परिवार के बीच है।" प्रारंभ में भांगी जी सन्यास के बंधनों में बंधे थे, लेकिन माता के प्रेम ने उनके हृदय को पिघला दिया।

    6. देवनारायण का आगमन और भाई का अभिषेक

    इसी बीच, युद्ध की सूचना पाकर भगवान देवनारायण भी वहाँ पहुँच गए। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि साधु वेश में खड़ा यह युवक उनका अपना भाई भांगी जी है, तो उनके आनंद की सीमा न रही।

    देवनारायण ने तुरंत भाई की गरिमा के अनुरूप प्रबंध किए:

     * हजामत और संस्कार: भांगी जी की जटाएं कटवाई गईं और उन्हें साधु वेश से मुक्त किया गया।

     * पवित्र स्नान: गंगाजल से उन्हें स्नान कराकर शुद्ध किया गया।

     * राजसी वेशभूषा: देवनारायण ने स्वयं के बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण अपने भाई को पहनाए।

    अंत में, देवनारायण ने भांगी जी को गले लगाया। यह दृश्य इतना भावुक था कि वहाँ उपस्थित ग्वालों और साधुओं की आँखों से भी आँसू छलक पड़े। बाबा रूपनाथ ने भी मुस्कुराते हुए भांगी जी को विदा किया।

    7. सामाजिक और धार्मिक महत्व

    यह घटना केवल एक परिवार के मिलन की कहानी नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि भगवान देवनारायण ने किस प्रकार शक्ति और शांति के बीच संतुलन बनाया। उन्होंने जहाँ अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया, वहीं रिश्तों की मर्यादा को भी सर्वोच्च स्थान दिया। बनास नदी का वह तट आज भी इस महान मिलाप का साक्षी माना जाता है।

     

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