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    दक्षिण अफ्रीका के तट पर हुए ‘ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास’ से भारत की दूरी, विदेश मंत्रालय ने दी स्पष्ट वजह

    1 day ago

    दक्षिण अफ्रीका के तट के पास आयोजित संयुक्त नौसैनिक अभ्यास में भारत के शामिल न होने को लेकर उठे सवालों पर विदेश मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट की है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जिस अभ्यास को ‘ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास’ कहा जा रहा है, वह न तो ब्रिक्स का नियमित कार्यक्रम है और न ही कोई संस्थागत गतिविधि। मंत्रालय के अनुसार, यह पूरी तरह दक्षिण अफ्रीका की पहल थी, जिसमें सभी ब्रिक्स देशों ने हिस्सा नहीं लिया।

    यह अभ्यास जनवरी के दूसरे सप्ताह में दक्षिण अफ्रीका के समुद्री क्षेत्र में शुरू हुआ, जिसमें चीन, रूस और ईरान जैसे देशों की नौसेनाएं शामिल रहीं। भारत और ब्राजील, जो ब्रिक्स समूह के संस्थापक सदस्य हैं, इस अभ्यास से अलग रहे।

    विदेश मंत्रालय का आधिकारिक बयान

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत की गैर-भागीदारी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत ने इस तरह की गतिविधियों में पहले भी हिस्सा नहीं लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अभ्यास किसी साझा ब्रिक्स निर्णय का परिणाम नहीं था।

    विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया कि भारत इस संदर्भ में जिस नियमित नौसैनिक अभ्यास का हिस्सा है, वह IBSAMAR है, जिसमें भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की नौसेनाएं भाग लेती हैं। IBSAMAR का पिछला संस्करण अक्टूबर 2024 में आयोजित किया गया था और इसे तीनों देशों के बीच समुद्री सहयोग को मजबूत करने का एक स्थापित मंच माना जाता है।

    ब्रिक्स और दक्षिण अफ्रीका की भूमिका

    ब्रिक्स समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका इस समूह की अध्यक्षता कर रहा है। इसी पृष्ठभूमि में दक्षिण अफ्रीका की ओर से आयोजित इस नौसैनिक अभ्यास को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान गया, खासकर तब जब इसमें ईरान की भागीदारी भी सामने आई।

    यह अभ्यास 9 जनवरी से शुरू हुआ और दक्षिण अफ्रीका के सायमन टाउन नौसैनिक अड्डे के आसपास के समुद्री क्षेत्र में आयोजित किया गया। यह इलाका रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहीं हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर का संगम होता है।

    अभ्यास का उद्देश्य क्या बताया गया

    चीन के रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि इस अभ्यास का उद्देश्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और आर्थिक गतिविधियों की सुरक्षा के लिए संयुक्त संचालन का अभ्यास करना है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अभ्यास के दौरान चीनी, रूसी और ईरानी युद्धपोतों को सायमन टाउन के बंदरगाह में आते-जाते देखा गया।

    हालांकि, भारत की ओर से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस अभ्यास को ब्रिक्स की सामूहिक सैन्य गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि न तो सभी सदस्य देश इसमें शामिल थे और न ही इसे ब्रिक्स के औपचारिक ढांचे के तहत आयोजित किया गया था।

    अमेरिका की तीखी प्रतिक्रिया

    इस अभ्यास को लेकर अमेरिका की ओर से भी कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका द्वारा ईरान को अभ्यास में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ऐसे समय में ईरान की भागीदारी चिंता का विषय है, जब वहां आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन की खबरें सामने आ रही हैं।

    अमेरिकी बयान में यह भी दावा किया गया कि दक्षिण अफ्रीका के रक्षा मंत्रालय ने कथित तौर पर अपनी ही सरकार के निर्देशों का पालन नहीं किया और ईरानी युद्धपोतों को दक्षिण अफ्रीकी जल क्षेत्र छोड़ने के लिए नहीं कहा। अमेरिका ने इसे समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए प्रतिकूल बताया।

    दक्षिण अफ्रीका की प्रतिक्रिया

    अमेरिकी आरोपों के जवाब में दक्षिण अफ्रीका के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि इन आरोपों की जांच की जाएगी। मंत्रालय के अनुसार, मामले की तह तक जाने के लिए एक आंतरिक जांच शुरू की जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या वास्तव में किसी स्तर पर सरकारी निर्देशों की अनदेखी हुई है।

    दक्षिण अफ्रीका की ओर से यह भी कहा गया कि देश अपनी विदेश और रक्षा नीति को स्वतंत्र रूप से संचालित करता है और सभी साझेदार देशों के साथ संवाद बनाए रखना उसकी नीति का हिस्सा है।

    भारत की रणनीतिक स्थिति

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की इस अभ्यास से दूरी उसकी संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाती है। भारत आमतौर पर ऐसे सैन्य अभ्यासों में हिस्सा लेता है, जो स्पष्ट रूप से स्थापित ढांचे और दीर्घकालिक सहयोग पर आधारित हों। IBSAMAR जैसे अभ्यास इसका उदाहरण हैं, जहां भारत समुद्री सुरक्षा और सहयोग को लेकर स्पष्ट एजेंडे के साथ भागीदारी करता है।

    विदेश मंत्रालय के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि भारत किसी भी बहुपक्षीय मंच को लेकर सावधानी बरतता है और उसे राजनीतिक या सैन्य संदेश के रूप में इस्तेमाल किए जाने से बचता है।

    आगे क्या संकेत मिलते हैं

    इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि ब्रिक्स जैसे मंच के भीतर भी सभी सदस्य देशों के दृष्टिकोण और प्राथमिकताएं समान नहीं हैं। भारत और ब्राजील का इस अभ्यास से दूर रहना यह दिखाता है कि ब्रिक्स के नाम पर होने वाली हर गतिविधि को सभी सदस्य देशों की सामूहिक सहमति नहीं मिलती।

     

    आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ब्रिक्स के भीतर सैन्य और सुरक्षा सहयोग को किस रूप में आगे बढ़ाया जाता है और क्या ऐसे अभ्यासों के लिए कोई स्पष्ट संस्थागत ढांचा तैयार किया जाता है या नहीं। फिलहाल, भारत ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए यह संदेश दे दिया है कि वह केवल उन्हीं गतिविधियों में भाग लेगा, जो पारदर्शी, नियमित और आपसी सहमति पर आधारित हों।

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