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    दिल्ली की दमघोंटू हवा पर टकराते सरकारी दावे: क्या वायु प्रदूषण से हो रही हैं मौतें?

    10 hours ago

    दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। हर सर्दी में बढ़ता स्मॉग, सांस की बीमारियां और अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या आम तस्वीर बन चुकी है। लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल फिर से चर्चा में है—क्या भारत में वायु प्रदूषण सीधे तौर पर लोगों की मौत का कारण बन रहा है? इस सवाल पर केंद्र सरकार और देश की शीर्ष चिकित्सा अनुसंधान संस्था के बयानों में स्पष्ट अंतर सामने आया है।

    संसद में सरकार का रुख

    हाल ही में संसद में दिए गए एक लिखित जवाब में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कहा कि देश में ऐसा कोई निर्णायक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो वायु प्रदूषण और मौतों के बीच सीधा संबंध स्थापित करता हो। यह जवाब राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP), पुरानी श्वसन बीमारियों और प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट मानने से जुड़े सवालों के संदर्भ में दिया गया।

    मंत्रालय ने यह भी कहा कि स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लागू होने के बाद कई शहरों में पीएम10 जैसे कणों के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे वायु गुणवत्ता में कुछ सुधार का संकेत मिलता है।

    ICMR के आंकड़े कुछ और कहते हैं

    हालांकि, सरकार का यह रुख स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के आंकड़ों से मेल नहीं खाता। हाल ही में एक सूचना के अधिकार (RTI) के तहत ICMR ने बताया कि 2017 में भारत में लगभग 12.4 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं, जो उस वर्ष हुई कुल मौतों का करीब 12.5 प्रतिशत है।

    ICMR के अनुसार, यह अनुमान देशव्यापी वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय शोध संगठनों के सहयोग से किया गया था। परिषद ने स्पष्ट किया कि ये आंकड़े अनुमान मात्र नहीं, बल्कि मॉडलिंग आधारित वैज्ञानिक शोध से निकाले गए हैं।

    वैश्विक अध्ययनों की चेतावनी

    इन निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिलता है। वैश्विक रोग भार अध्ययन (Global Burden of Disease Study) के तहत प्रकाशित शोध में कहा गया है कि भारत में वायु प्रदूषण—चाहे वह बाहरी वातावरण का हो या घरों के भीतर का—कम उम्र में होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण है। इस अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण से जुड़ी आधे से अधिक मौतें 70 वर्ष से कम आयु के लोगों में हुईं।

    दिल्ली के आंकड़े भी चिंताजनक

    दिल्ली के स्थानीय आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, राजधानी में श्वसन रोगों से होने वाली मौतों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। जहां 2022 में यह संख्या 7,432 थी, वहीं 2024 में बढ़कर 9,211 तक पहुंच गई। हालांकि, हृदय और रक्त संचार से जुड़ी बीमारियां अब भी मौतों का सबसे बड़ा कारण बनी हुई हैं।

    अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की राय

    वैश्विक मंचों पर भी भारत की प्रदूषण समस्या पर चिंता जताई जा रही है। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सम्मेलन में कहा गया कि वायु प्रदूषण भारत के लिए व्यापारिक चुनौतियों से भी बड़ा संकट है। विश्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया गया कि भारत में हर साल लगभग 17 लाख मौतें प्रदूषण से जुड़ी मानी जाती हैं।

    नीति और स्वास्थ्य के बीच दूरी

    विशेषज्ञों का मानना है कि नीति-निर्माण और स्वास्थ्य शोध के बीच यह अंतर चिंताजनक है। एक ओर जहां सरकारी स्तर पर सीधा संबंध स्थापित न होने की बात कही जा रही है, वहीं स्वास्थ्य संस्थानों और वैश्विक अध्ययनों में वायु प्रदूषण को एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम माना जा रहा है।

    आगे की राह

    जैसे-जैसे देश के बड़े शहरों में वायु गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, यह बहस और तेज होती जा रही है कि प्रदूषण को किस स्तर की प्राथमिकता दी जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि आंकड़ों और नीतियों के बीच बेहतर तालमेल, पारदर्शी शोध और ठोस कदमों के बिना इस समस्या से निपटना मुश्किल होगा।

    वायु प्रदूषण को लेकर बढ़ती बीमारियां और मौतों के अनुमान यह संकेत देते हैं कि यह सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य का मुद्दा बन चुका है—जिस पर स्पष्ट और एकजुट रुख की आवश्यकता है।

     
     
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