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    ईरान–अमेरिका तनाव के बीच वार्ता की पहल, इस्तांबुल में होने वाली बैठक पर टिकी निगाहें

    6 hours ago

    ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव में संभावित नरमी के संकेत मिल रहे हैं। दोनों देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के बीच इस सप्ताह तुर्किये के इस्तांबुल में बातचीत होने की संभावना है। यह पहल ऐसे समय सामने आई है, जब हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों, कड़े राजनीतिक बयानों और कूटनीतिक टकराव ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं।

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने हाल ही में अमेरिका के साथ परमाणु मुद्दे पर वार्ता शुरू करने के निर्देश दिए हैं। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यह बातचीत परमाणु कार्यक्रम के दायरे तक सीमित रहेगी और इसका उद्देश्य कूटनीतिक समाधान तलाशना है। हालांकि, वार्ता की रूपरेखा और विस्तृत एजेंडा को अंतिम रूप दिया जाना अभी बाकी है।

    सुप्रीम लीडर की चेतावनी और कूटनीतिक संतुलन

    वार्ता की इस पहल से कुछ दिन पहले ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने अमेरिका को कड़ा संदेश देते हुए कहा था कि किसी भी सैन्य कार्रवाई के गंभीर क्षेत्रीय परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि ईरान दबाव या धमकी के आधार पर बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा। इसके बावजूद, ईरानी नेतृत्व का यह मानना है कि कूटनीति का रास्ता खुला रखना आवश्यक है, ताकि बड़े टकराव से बचा जा सके।

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि उनका देश संवाद के लिए तैयार है, लेकिन यह प्रक्रिया आपसी सम्मान और बिना दबाव के होनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिए कि क्षेत्रीय देश भी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।

    इस्तांबुल बैठक और क्षेत्रीय भागीदारी

    सूत्रों के अनुसार, इस्तांबुल में होने वाली बैठक में अमेरिका के विशेष दूत और ईरान के शीर्ष राजनयिक शामिल हो सकते हैं। इस बैठक में कुछ क्षेत्रीय देशों की भागीदारी की भी संभावना जताई जा रही है, जो पहले भी ईरान-अमेरिका के बीच संदेशों के आदान-प्रदान में भूमिका निभा चुके हैं। माना जा रहा है कि खाड़ी क्षेत्र के कुछ देश और अन्य पश्चिम एशियाई राष्ट्र इस प्रक्रिया में सहायक की भूमिका में रह सकते हैं।

    कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि यह बैठक सफल रहती है, तो यह पिछले कई वर्षों में दोनों देशों के बीच सबसे ठोस संवाद प्रयासों में से एक हो सकता है। हालांकि, दोनों पक्षों के बीच अविश्वास का स्तर अभी भी काफी ऊंचा बना हुआ है।

    सैन्य तैयारियां और सुरक्षा चिंताएं

    कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर, क्षेत्र में सैन्य तैयारियों की खबरें भी सामने आ रही हैं। इज़राइल और अमेरिका दोनों ही अपनी सुरक्षा तैयारियों को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। इज़राइली सैन्य नेतृत्व ने हाल के दिनों में यह संकेत दिया है कि वह किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अपनी तैयारियों की समीक्षा कर रहा है।

    वहीं, अमेरिका ने भी पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति दर्शाती है कि बातचीत के साथ-साथ रणनीतिक दबाव भी बना हुआ है, जिससे वार्ता की प्रक्रिया जटिल हो जाती है।

    आंतरिक हालात और विरोध प्रदर्शनों की आशंका

    ईरान के भीतर भी स्थिति पूरी तरह शांत नहीं है। हाल के महीनों में हुए विरोध प्रदर्शनों और सख्त सरकारी कार्रवाई के बाद, ईरानी नेतृत्व को आंतरिक असंतोष की चिंता सता रही है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, किसी भी बाहरी सैन्य दबाव या हमले से देश के भीतर फिर से विरोध तेज हो सकता है।

    इसी कारण, ईरान के लिए यह कूटनीतिक पहल केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि घरेलू स्थिरता के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है।

    यूरोप, रूस और अन्य देशों की भूमिका

    इस पूरे घटनाक्रम में यूरोपीय देशों, रूस और अन्य वैश्विक शक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। रूस ने संकेत दिए हैं कि वह ईरान से जुड़े परमाणु विवाद को सुलझाने में सहयोग देने को तैयार है। वहीं, कुछ यूरोपीय देशों ने ईरान के आंतरिक हालात को लेकर सख्त रुख अपनाया है, जिससे कूटनीतिक समीकरण और जटिल हो गए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि इस्तांबुल की प्रस्तावित बैठक केवल औपचारिक संवाद तक सीमित रहती है या वास्तव में किसी ठोस समझौते की दिशा में आगे बढ़ती है।

    आगे की राह

    फिलहाल, ईरान और अमेरिका दोनों ही सार्वजनिक रूप से यह कह रहे हैं कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन अपनी-अपनी शर्तों से पीछे हटने को भी तैयार नहीं दिखते। ऐसे में वार्ता की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष कितनी लचीलापन दिखाते हैं और क्षेत्रीय मध्यस्थ किस हद तक विश्वास बहाली में मदद कर पाते हैं।

    दुनिया की निगाहें अब इस्तांबुल में होने वाली संभावित बैठक पर टिकी हैं, जिसे पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

     
     
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