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    भारत को तेल खरीदने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: अमेरिकी दबाव के दावों पर पी. चिदंबरम

    10 hours ago

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सोमवार को कहा कि भारत को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए किसी भी देश से तेल खरीदने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों के बाद भारत के कच्चे तेल आयात को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

    पी. चिदंबरम ने संकेत दिया कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीद में आई तेज गिरावट के पीछे अमेरिका की ओर से दबाव एक प्रमुख कारण हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच इस विषय पर किसी भी प्रकार की आपसी समझ या कूटनीतिक बातचीत की पूरी जानकारी केवल विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को ही होगी।

    रूस से तेल आयात में गिरावट पर सवाल

    मीडिया से बातचीत के दौरान चिदंबरम ने कहा कि भारत जैसे बड़े और उभरते हुए देश को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ऊर्जा संसाधनों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए।
    उन्होंने कहा, “भारत को जहां भी उचित कीमत और शर्तों पर तेल उपलब्ध हो, वहां से खरीदने में सक्षम होना चाहिए। वह रूस हो, वेनेजुएला हो या कोई और देश।”

    पूर्व वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में रूस से भारत के तेल आयात में जो कमी देखी गई है, वह सामान्य बाजार कारणों से अधिक राजनीतिक दबाव का परिणाम प्रतीत होती है।
    “हमने देखा कि अमेरिका की धमकी या दबाव के बाद रूस से तेल की खरीद में तेज गिरावट आई,” उन्होंने कहा।

    वेनेजुएला से तेल खरीदने की संभावना

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यह दावा किए जाने के बाद कि भारत ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चिदंबरम ने कहा कि यदि वेनेजुएला से उचित कीमत पर तेल मिल सकता है, तो उस विकल्प पर विचार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

    हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि वेनेजुएला से तेल खरीदना कूटनीतिक और व्यावहारिक दृष्टि से जटिल हो सकता है।
    “इसमें कोई अड़चन या अंतरराष्ट्रीय जटिलता है या नहीं, यह केवल विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री ही बेहतर तरीके से जानते होंगे,” उन्होंने कहा।

    अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों पर प्रतिक्रिया

    डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अमेरिका में संवाददाताओं से बातचीत में कहा था कि भारत ईरान से तेल खरीदने के बजाय वेनेजुएला की ओर रुख कर रहा है और इसे एक तरह की ‘डील’ का हिस्सा बताया था। भारत सरकार की ओर से अब तक इन बयानों की कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं किया गया है।

    इससे पहले, बजट के बाद एक प्रेस वार्ता में जब चिदंबरम से पूछा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की ओर से ऐसे बयान क्यों दे रहे हैं, तो उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति के प्रवक्ता नहीं हैं और उनसे भारतीय बजट से जुड़े सवाल पूछे जाने चाहिए।

    सरकार की चुप्पी और बढ़ती अटकलें

    फिलहाल, केंद्र सरकार की ओर से इस पूरे मामले पर कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। न तो रूस से तेल आयात में कमी के कारणों पर और न ही वेनेजुएला से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दावों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया दी गई है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है और उसकी नीति हमेशा विविध स्रोतों से तेल खरीदने की रही है, ताकि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न बने। तेल खरीद के फैसले आमतौर पर कीमत, आपूर्ति की स्थिरता, परिवहन लागत और दीर्घकालिक समझौतों पर आधारित होते हैं।

    रणनीतिक स्वायत्तता पर बहस

    पी. चिदंबरम के बयान के बाद एक बार फिर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष का कहना है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने आर्थिक और ऊर्जा संबंधी फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए।

    वहीं, सरकार समर्थक विश्लेषकों का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में भारत को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है, जहां कूटनीति, व्यापार और सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में यदि सरकार इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट करती है, तो कई अटकलों पर विराम लग सकता है। फिलहाल, भारत की तेल आयात नीति और अमेरिका के साथ उसके ऊर्जा संबंधों पर सभी की नजर बनी हुई है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक तेल बाजार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है।

     
     
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