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    दिल्ली में एआई का महाकुंभ: वैश्विक तकनीकी दिग्गजों की मौजूदगी में भारत बना ग्लोबल साउथ की एआई रणनीति का केंद्र

    2 months ago

    YUGCHARAN | 18/02/2026

    दिल्ली इस सप्ताह वैश्विक प्रौद्योगिकी विमर्श का केंद्र बनने जा रही है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के भविष्य को लेकर दुनिया के सबसे प्रभावशाली तकनीकी दिग्गज, नीति-निर्माता और विशेषज्ञ एक मंच पर एकत्र होंगे। भारत सरकार की मेज़बानी में आयोजित AI Impact Summit 2026 में न केवल विकसित देशों की बड़ी टेक कंपनियां भाग ले रही हैं, बल्कि ग्लोबल साउथ के कई देशों के प्रतिनिधि भी एआई के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों पर मंथन करेंगे। इस शिखर सम्मेलन को भारत की उस रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसके जरिए वह एशिया और अफ्रीका में एआई नेतृत्व स्थापित करना चाहता है।

    इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें दुनिया की अग्रणी तकनीकी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी शामिल हो रहे हैं। Sundar Pichai, Sam Altman और Dario Amodei जैसे नाम एआई उद्योग की दिशा तय करने वाले माने जाते हैं। इनके साथ ही, कई देशों के मंत्री, नीति सलाहकार, एआई सुरक्षा विशेषज्ञ और शोधकर्ता भी इस सप्ताह भर चलने वाले सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। यह आयोजन केवल तकनीकी चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शासन, लोकतंत्र, सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे व्यापक विषयों को भी शामिल किया गया है।

    प्रधानमंत्री Narendra Modi इस सम्मेलन को संबोधित करेंगे और भारत की एआई को लेकर दृष्टि साझा करेंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भारत एआई को केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं, बल्कि “मानव-केंद्रित प्रगति” का उपकरण मानता है। सम्मेलन का आधिकारिक नारा भी इसी सोच को दर्शाता है—“सभी का कल्याण, सभी की खुशी।” एजेंडे में कृषि, जल प्रबंधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासन में एआई के उपयोग पर विशेष ध्यान दिया गया है, खासकर उन देशों के संदर्भ में जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन जनसंख्या बड़ी है।

    ग्लोबल साउथ के कई देशों, जिनमें केन्या, सेनेगल, मॉरीशस, टोगो, इंडोनेशिया और मिस्र शामिल हैं, ने इस सम्मेलन में अपने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा है। इन देशों के लिए एआई केवल एक उन्नत तकनीक नहीं, बल्कि विकास की खाई को पाटने का संभावित साधन है। सम्मेलन में यह सवाल प्रमुख रूप से उठाया जा रहा है कि क्या एआई वैश्विक असमानताओं को कम कर सकता है, या फिर यह एक नए प्रकार के “डिजिटल उपनिवेशवाद” को जन्म देगा, जिसमें कुछ गिनी-चुनी बहुराष्ट्रीय कंपनियां तकनीक पर नियंत्रण रखेंगी।

    हालांकि, इस उत्साह के बीच चिंताएं भी कम नहीं हैं। नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से जुड़े संगठनों ने आशंका जताई है कि एआई का इस्तेमाल राज्य निगरानी बढ़ाने, अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव करने और चुनावी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने में किया जा सकता है। इन संगठनों का कहना है कि भारत सहित कई देशों में पहले से ही निगरानी तकनीकों का दायरा बढ़ रहा है, और एआई इसे और अधिक शक्तिशाली बना सकता है। इन आलोचनाओं के जवाब में, सरकार का तर्क है कि उचित नियमों और पारदर्शिता के साथ एआई का उपयोग समाज के व्यापक हित में किया जा सकता है।

    इस सम्मेलन को एक वैचारिक टकराव के रूप में भी देखा जा रहा है। एक ओर अमेरिकी टेक कंपनियां हैं, जो एआई के तेज़ व्यावसायिक विस्तार और प्रतिस्पर्धा पर जोर देती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ “टेक्नो-गांधीवाद” की अवधारणा सामने रख रहे हैं, जिसमें तकनीक का उपयोग सामाजिक न्याय, समावेशन और कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण के लिए किया जाए। दिल्ली में हो रहा यह सम्मेलन इसी बहस का केंद्र बन गया है और इसे ग्लोबल साउथ में आयोजित होने वाला पहला ऐसा बड़ा एआई शिखर सम्मेलन माना जा रहा है।

    इससे पहले एआई इम्पैक्ट समिट के तीन संस्करण आयोजित हो चुके हैं—2023 में ब्रिटेन के ब्लेचली पार्क में, 2024 में सियोल में और 2025 में पेरिस में। इन सम्मेलनों का मुख्य फोकस अत्याधुनिक एआई मॉडलों से जुड़े जोखिमों को समझना और अंतरराष्ट्रीय समन्वय स्थापित करना रहा है। दिल्ली में हो रहा संस्करण इन चर्चाओं को आगे बढ़ाते हुए, एआई की व्यावहारिक उपयोगिता और सामाजिक प्रभाव पर अधिक जोर दे रहा है।

    सम्मेलन में एआई सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया जा रहा है। प्रसिद्ध एआई शोधकर्ता और “एआई के जनक” कहे जाने वाले Yoshua Bengio ने शक्तिशाली एआई प्रणालियों से जुड़े खतरों पर चिंता जताई है। उनके अनुसार, एआई का दुरुपयोग साइबर हमलों, जैव हथियारों और स्वचालित युद्ध प्रणालियों में किया जा सकता है, जिससे वैश्विक सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। उनका मानना है कि तकनीक की क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन जोखिम प्रबंधन और नियमन की गति उससे पीछे है।

    संयुक्त राष्ट्र महासचिव António Guterres भी सम्मेलन को संबोधित करेंगे। उन्होंने हाल ही में कहा था कि यह पूरी तरह अस्वीकार्य होगा यदि एआई केवल विकसित देशों या दो-तीन महाशक्तियों तक सीमित रह जाए। उनके अनुसार, एआई का लाभ समान रूप से सभी देशों और समाजों तक पहुंचना चाहिए, ताकि यह वैश्विक विकास का साधन बन सके, न कि विभाजन का कारण।

    दिल्ली सम्मेलन की एक अहम विशेषता यह भी है कि इसमें एआई और शिक्षा पर विशेष सत्र रखे गए हैं। भारत जैसे बहुभाषी देश में, बड़े भाषा मॉडल्स की बहुभाषी क्षमता को एक बड़ी ताकत माना जा रहा है। तकनीकी कंपनियों का कहना है कि एआई की मदद से शिक्षा को अधिक सुलभ और व्यक्तिगत बनाया जा सकता है, खासकर ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में। भारत में पहले से ही शिक्षकों और छात्रों के बीच एआई आधारित टूल्स का उपयोग बढ़ रहा है, जिसे भविष्य की शिक्षा प्रणाली का संकेत माना जा रहा है।

    आर्थिक दृष्टि से भी यह सम्मेलन महत्वपूर्ण है। भारत में एआई और डेटा सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश की घोषणाएं पहले ही हो चुकी हैं। इन परियोजनाओं से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि भारत को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में एक अहम स्थान भी मिल सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि एआई के कारण कई पारंपरिक नौकरियों पर खतरा मंडरा सकता है, खासकर व्हाइट-कॉलर सेक्टर में।

    आने वाले दिनों में इस सम्मेलन से निकलने वाले निष्कर्ष और घोषणाएं यह तय करेंगी कि एआई का वैश्विक शासन किस दिशा में जाएगा। क्या यह तकनीक कुछ कंपनियों और देशों तक सीमित रहेगी, या फिर इसे एक साझा वैश्विक संसाधन के रूप में विकसित किया जाएगा—यह सवाल अभी खुला है। भारत इस बहस में खुद को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है, जो नवाचार और सुरक्षा, विकास और नैतिकता के बीच संतुलन बना सके।

     

    निष्कर्षतः, दिल्ली में हो रहा एआई इम्पैक्ट समिट 2026 केवल एक तकनीकी सम्मेलन नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित करने वाला एक अहम पड़ाव है। यहां लिए गए निर्णय और चर्चाएं आने वाले वर्षों में यह तय कर सकती हैं कि एआई मानवता के लिए वरदान बनेगा या नई चुनौतियों का स्रोत।

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