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    वैज्ञानिकों की सलाह: भारत के ‘प्रोजेक्ट चीता’ में विदेशी चीतों का आयात अब रोका जाए

    1 month ago

    Yugcharan News / 10 March 2026

    भारत में चल रहे महत्वाकांक्षी वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम प्रोजेक्ट चीता को लेकर वैज्ञानिकों और संरक्षण विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है। कई वन्यजीव वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों का मानना है कि देश में अफ्रीकी चीतों को लाने की प्रक्रिया अब रोक दी जानी चाहिए। विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत में इन बड़े मांसाहारी जीवों के लिए पर्याप्त और उपयुक्त प्राकृतिक आवास की कमी है, इसलिए हाल ही में लाए गए चीतों का बैच संभवतः अंतिम होना चाहिए।

    पिछले महीने अफ्रीकी देश बोत्सवाना से नौ जंगली चीतों को भारत लाया गया था। इस प्रक्रिया के तहत उन्हें पहले बोत्सवाना के सवाना क्षेत्र में पकड़कर सुरक्षित रूप से बेहोश किया गया, फिर कुछ सप्ताह तक क्वारंटीन में रखा गया। इसके बाद भारतीय वायुसेना के विशेष विमान के जरिए लगभग दस घंटे की उड़ान में उन्हें भारत लाया गया।

    भारत पहुंचने के बाद इन चीतों को ग्वालियर एयरबेस तक लाया गया, जहां से हेलीकॉप्टरों के माध्यम से मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बने विशेष क्वारंटीन बाड़ों में स्थानांतरित किया गया।

    यह पूरी प्रक्रिया भारत सरकार की बहुचर्चित और बहु-करोड़ रुपये की वन्यजीव संरक्षण परियोजना प्रोजेक्ट चीता के तहत की गई थी।


    प्रोजेक्ट चीता का उद्देश्य

    भारत में चीतों को पुनः बसाने का विचार कई दशकों से वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के बीच चर्चा का विषय रहा है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, भारत में एशियाई चीता कभी बड़ी संख्या में पाया जाता था, लेकिन शिकार और आवास के नष्ट होने के कारण 1952 में इसे देश में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया गया।

    इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 2022 में भारत सरकार ने प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य अफ्रीकी चीतों को भारत में लाकर उन्हें ऐतिहासिक आवास क्षेत्रों में बसाना और वैश्विक स्तर पर इस प्रजाति के संरक्षण में योगदान देना बताया गया था।

    यह परियोजना उस समय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन, 17 सितंबर 2022 को मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में पहले बैच के चीतों को छोड़ा था।

    सरकार और परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह कार्यक्रम दुनिया के सबसे बड़े वन्यजीव पुनर्वास प्रयासों में से एक है।


    वैज्ञानिकों की नई चिंता

    हालांकि हाल के वर्षों में इस परियोजना के परिणामों और चुनौतियों को लेकर वैज्ञानिकों के बीच बहस तेज हुई है। कई वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में उपलब्ध प्राकृतिक आवास और पारिस्थितिक परिस्थितियाँ बड़ी संख्या में चीतों को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकतीं।

    संरक्षण जीवविज्ञान से जुड़े कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, कूनो नेशनल पार्क और अन्य संभावित क्षेत्रों में भूमि और शिकार प्रजातियों की उपलब्धता सीमित है। यदि चीतों की संख्या तेजी से बढ़ती है तो उन्हें पर्याप्त क्षेत्र और भोजन उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि चीतों को बार-बार विदेश से लाने की बजाय पहले से मौजूद आबादी को स्थिर करने और उनके प्राकृतिक प्रजनन पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण होगा।


    हाल में लाए गए चीतों को बताया जा रहा ‘अंतिम बैच’

    संरक्षण समुदाय के कुछ सदस्यों का सुझाव है कि बोत्सवाना से हाल ही में लाए गए नौ चीतों का समूह शायद अंतिम आयात होना चाहिए। उनका तर्क है कि अब परियोजना का ध्यान नए चीतों को लाने के बजाय पहले से मौजूद चीतों के संरक्षण, स्वास्थ्य और प्रजनन पर केंद्रित होना चाहिए।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि चीतों की स्थानीय आबादी सफलतापूर्वक बढ़ती है, तो इससे परियोजना के दीर्घकालिक लक्ष्यों को बेहतर तरीके से हासिल किया जा सकता है।


    भारत में जन्मे चीतों से बढ़ी उम्मीद

    प्रोजेक्ट चीता के समर्थकों के लिए एक सकारात्मक संकेत यह रहा है कि कूनो नेशनल पार्क में कुछ चीतों ने सफलतापूर्वक शावकों को जन्म दिया है। पिछले वर्ष भारत में जन्मे पहले चीता शावक की खबर ने इस परियोजना के समर्थकों को उत्साहित किया था।

    वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, भारत में जन्मे इन शावकों से यह संकेत मिलता है कि चीतों ने नए वातावरण में कुछ हद तक अनुकूलन शुरू कर दिया है।

    हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी वन्यजीव पुनर्वास कार्यक्रम की सफलता का आकलन लंबे समय में ही किया जा सकता है। इसमें कई वर्षों तक निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और पारिस्थितिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।


    आवास की चुनौती

    चीतों के संरक्षण से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त आवास की उपलब्धता मानी जाती है। चीता दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले भूमि स्तनधारियों में से एक है और उसे बड़े खुले घास के मैदानों और पर्याप्त शिकार की आवश्यकता होती है।

    भारत में तेजी से बढ़ती मानव आबादी, कृषि विस्तार और विकास परियोजनाओं के कारण प्राकृतिक घासभूमि का क्षेत्र सीमित होता जा रहा है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि चीतों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित क्षेत्र नहीं होगा तो उनके दीर्घकालिक अस्तित्व पर असर पड़ सकता है।

    कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि भारत में घासभूमि संरक्षण पर अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह पारिस्थितिकी तंत्र कई दुर्लभ प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण है।


    परियोजना के समर्थकों का पक्ष

    दूसरी ओर, परियोजना से जुड़े कुछ अधिकारी और संरक्षण विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रोजेक्ट चीता अभी शुरुआती चरण में है और इसे जल्दबाजी में आंकना उचित नहीं होगा।

    उनका कहना है कि किसी भी प्रजाति को नए क्षेत्र में बसाने की प्रक्रिया जटिल और लंबी होती है। इसमें कई वर्षों तक अनुकूलन, प्रजनन और पारिस्थितिक संतुलन स्थापित होने में समय लगता है।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, परियोजना के तहत लगातार वैज्ञानिक निगरानी की जा रही है और चीतों के स्वास्थ्य, गतिविधियों तथा व्यवहार पर डेटा एकत्र किया जा रहा है।


    वैश्विक संरक्षण प्रयासों से जुड़ाव

    प्रोजेक्ट चीता को वैश्विक संरक्षण प्रयासों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। अफ्रीकी चीतों की संख्या भी कई क्षेत्रों में घट रही है और उनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक माना जाता है।

    भारत का यह कार्यक्रम दुनिया के उन कुछ प्रयासों में शामिल है जिसमें किसी बड़े मांसाहारी जीव को उसके ऐतिहासिक आवास क्षेत्र में फिर से बसाने की कोशिश की जा रही है।

    हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों में वैज्ञानिक मूल्यांकन, स्थानीय पारिस्थितिकी और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी होता है।


    आगे की दिशा

    वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में प्रोजेक्ट चीता की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत में उपलब्ध आवास को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।

    यदि पर्याप्त घासभूमि, शिकार प्रजातियाँ और सुरक्षित क्षेत्र विकसित किए जाते हैं तो चीता आबादी के स्थिर होने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं दूसरी ओर यदि आवास की कमी बनी रहती है तो परियोजना को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

    फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय और नीति निर्माता दोनों इस परियोजना की प्रगति पर करीबी नजर रखे हुए हैं। हाल ही में आए सुझाव इस बात की ओर संकेत करते हैं कि भविष्य की रणनीति में चीतों के आयात से अधिक उनके संरक्षण और प्राकृतिक विस्तार पर ध्यान देना पड़ सकता है।

     

    इस बीच कूनो नेशनल पार्क और अन्य संभावित क्षेत्रों में चल रहे संरक्षण प्रयासों से यह तय होगा कि भारत में चीतों की वापसी का यह प्रयोग आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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