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    12 वें लोक उत्सव का शुभारंभ उत्साह और आत्मीयता के साथ हुआ

    2 months ago

    तिलोनिया, किशनगढ़. 

    तिलोनिया स्थित बेयरफुट कॉलेज में 12 वें लोक उत्सव का शुभारंभ उत्साह और आत्मीयता के साथ हुआ। यह आयोजन भारत की समृद्ध और जीवंत लोक परंपराओं को समर्पित है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकारों, विचारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और समुदाय के लोगों की उपस्थिति में पहले दिन का कार्यक्रम स्मरण, संवाद और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सशक्त संगम बना।

    कार्यक्रम की शुरुआत लोकप्रिय कठपुतली पात्र *जोखिम चाचा और मुँहफट* ने की। अपने व्यंग्य और सहज संवाद शैली के माध्यम से उन्होंने वातावरण को जीवंत बना दिया और दर्शकों को लोक संस्कृति की आत्मा से जोड़ा।

    प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता *अरुणा रॉय* ने सभा को संबोधित करते हुए इस 12 वें लोक उत्सव को महान लोक-संस्कृति मर्मज्ञ *कोमल कोठारी* की स्मृति को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि कोमल कोठारी ने पश्चिमी राजस्थान के लोक कलाकारों के बीच रहकर उनकी संगीत परंपराओं को समझा और उन्हें सम्मानजनक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका कार्य समुदायों के बीच सेतु निर्माण का उदाहरण है, जिसने लोक संस्कृति को किसी संकीर्ण पहचान से मुक्त कर व्यापक सांस्कृतिक अस्मिता के रूप में स्थापित किया।

    यह उत्सव रंगकर्मी *त्रिपुरारी शर्मा* और प्रख्यात लोक वादक *साकर खान* की स्मृति को भी समर्पित किया गया। अरुणा रॉय ने त्रिपुरारी शर्मा से जुड़ा एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि वे हम सभी को एक यात्रा पर इस शर्त पर ले जाने के लिए राजी कि सभी उनके नाटक में अभिनय करेंगे, यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामूहिक भागीदारी की मिसाल थी। वहीं साकर खान को उन्होंने कामायचा वाद्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय दिया।

    कार्यक्रम का औपचारिक आरंभ *बहु-धार्मिक* प्रार्थना से हुआ, जिसे *संगीता शिवकुमार, असीन खान लंगा* और *एंजेलिन* ने प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति विविधता में एकता का प्रतीक बनी और पूरे उत्सव के लिए समावेशी स्वर स्थापित किया।

    इसके बाद एक प्रभावशाली जुगलबंदी प्रस्तुत की गई, जिसमें *सुमना चंद्रशेखर* ने घटम, *सादिक खान* ने ढोलक और *जाकिर खान* ने खड़ताल पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। उत्तर और दक्षिण भारत की ताल परंपराओं के इस संगम ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

     *ताल वाद्य कचेरी* का परिचय देते हुए अरुणा रॉय ने बताया कि भारत की ताल परंपराएँ कितनी विविध और समृद्ध हैं। उन्होंने कहा कि अक्सर ताल वाद्यों को केवल संगत के रूप में देखा जाता है, जबकि उनमें स्वयं में अद्भुत अभिव्यक्ति और सामर्थ्य है। इस कचेरी में विभिन्न कलाकारों ने मिलकर ऐसी प्रस्तुति दी, जिसने भौगोलिक और शैलीगत सीमाओं को पार करते हुए ताल को एक स्वतंत्र और सशक्त भाषा के रूप में स्थापित किया।

    उत्सव की निरंतरता को आगे बढ़ाते हुए *लंगा समुदाय* के बच्चों ने प्रस्तुति दी। उनकी भागीदारी ने यह संदेश दिया कि लोक परंपराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती हैं और नई पीढ़ी इन्हें आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभा रही है।

    पहले दिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा *संगीत अभिव्यक्ति की चुनौतियों* पर आयोजित चर्चा रही। सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह ने कहा कि महिलाओं के पास गीतों का एक विशाल भंडार है, ऐसे गीत जो महिलाओं द्वारा रचे गए और महिलाओं के अनुभवों से जन्मे हैं। ये गीत कागज़ पर दर्ज नहीं होते, बल्कि स्मृति में संजोए जाते हैं और पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। वे जीवन के श्रम, पीड़ा, प्रेम और संघर्ष की सजीव अभिव्यक्तियाँ हैं।

    चर्चा में यह भी सामने आया कि प्रतिरोध के गीत अक्सर रोज़मर्रा की परिस्थितियों से जन्म लेते हैं। महिलाएँ अपने जीवन के अनुभवों को गीतों में ढालती हैं, जिससे वे अपनी बात कहने और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का माध्यम बनते हैं। ये गीत इतिहास, स्मृति और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज़ हैं।

    “ *Women in the Musical Tradition”* शीर्षक से विशेष प्रस्तुति आयोजित की गई। इसमें कर्नाटक संगीत की प्रतिष्ठित गायिका संगीता शिवकुमार, वायलिन वादक हरिता एन, मृदंगम वादक अश्विनी एस और घटम वादक सुमना चंद्रशेखर के साथ राजस्थान की लोक गायिकाएं दरिया बाई, हनीफा बाई और मांगी बाई एक ही मंच पर एक साथ गायन की। यह प्रस्तुति स्त्री स्वर की विविधता, शक्ति और सांस्कृतिक निरंतरता को रेखांकित करती है साथ ही शास्त्रीय संगीत एवं लोक गायन का सामंजस्य देखने को मिला।

     

     *12 वें लोक उत्सव का पहला दिन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि लोक परंपराएँ अतीत की स्मृतियाँ भर नहीं, बल्कि वर्तमान की धड़कन और समाज की चेतना हैं। यह उत्सव संस्कृति, समुदाय और प्रतिरोध के संगम का एक सशक्त मंच बनकर उभरा है।* 

     

     *कल (27 फरवरी) होंगे ये प्रमुख कार्यक्रम* 

    लोक उत्सव के दूसरे दिन, 27 फरवरी को प्रातः 9:30 बजे एम्फीथिएटर में खामायती की विशेष प्रस्तुति एवं व्याख्यान-प्रदर्शन आयोजित होगा, जो कोमल दा की स्मृति को समर्पित रहेगा। इसके बाद 11 बजे से “बाजरा-लघु संवाद” सत्र में कलाकारों और श्रोताओं के बीच खुला संवाद होगा, जिसमें लोक परंपराओं, संरक्षण और समकालीन चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी।

    दोपहर 3 बजे से 4:30 बजे तक दलाई लामा हॉल में “द स्ट्रेंजर्स’ कॉयर” की संगीत कार्यशाला आयोजित होगी। इस कार्यशाला में प्रतिभागी लोक कलाकारों के साथ सामूहिक गायन का अनुभव प्राप्त करेंगे, जिससे संगीत के माध्यम से साझी भागीदारी और संवाद को बल मिलेगा।

    सायं 6 बजे एम्फीथिएटर में कार्यक्रम की शुरुआत भपंग वादन से होगी, जो राजस्थान की विशिष्ट लोक ध्वनि परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बाद 6:30 बजे से लंगा कलाकारों द्वारा “कथा-गाथा” की प्रस्तुति दी जाएगी, जिसमें लोक कथाओं और ऐतिहासिक स्मृतियों को गायन के माध्यम से जीवंत किया जाएगा।

    अजमेर स्थित सोफिया कॉलेज में भी 27 फरवरी को विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन और संध्या प्रस्तुति आयोजित की जाएगी, जिसमें “Women in the Musical Tradition” शीर्षक से शास्त्रीय और लोक संगीत का साझा मंचन होगा।

     

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