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    अब और अदृश्य नहीं: जाति जनगणना में DNT समुदायों के लिए अलग कॉलम की मांग, सुप्रीम कोर्ट में PIL

    1 month ago

    जाति जनगणना में अलग कॉलम की मांग करोड़ों घुमंतू लोगों की पहचान का सवाल है- पारस बंजारा 

    जयपुर, आगामी 2026-27 की जनगणना में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (DNTs) की अलग से गणना सुनिश्चित करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है (डायरी नंबर – 15389/2026)। इस याचिका में भारत सरकार को आवश्यक निर्देश देने की मांग की गई है।

    DNT राइट्स एक्शन ग्रुप से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता पारस बंजारा के अनुसार, डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां ऐसे समुदाय हैं जिन्हें औपनिवेशिक काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत “वंशानुगत अपराधी” के रूप में चिन्हित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त कर दिया गया, लेकिन इन समुदायों के प्रति कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी जारी है। अनुमान है कि भारत में 10–12 करोड़ लोग डीएनटी समुदायों से आते हैं, फिर भी स्वतंत्रता के बाद किसी भी जनगणना में इनकी अलग से गणना नहीं की गई। इन समुदायों की गणना का अंतिम प्रयास 1931 की जनगणना में हुआ था।

    अलग गणना क्यों जरूरी है:

    क्योंकि डीएनटी समुदायों की अलग से गणना नहीं होती:

    इन समुदायों की आबादी का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं है।

    सरकारी योजनाएं और नीतियां इन तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पातीं।

    कई डीएनटी समुदाय अलग-अलग राज्यों में SC, ST, OBC या बिना किसी श्रेणी के रूप में असंगत तरीके से वर्गीकृत हैं।

    डीएनटी के लिए SEED योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पहचान और प्रमाणन की कमी के कारण गंभीर समस्याएं आती हैं।

    अलग गणना से सरकार को होगा लाभ:

    डीएनटी समुदायों की वास्तविक आबादी और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का पता चलेगा।

    लक्षित कल्याणकारी नीतियां बनाई जा सकेंगी।

    शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और आजीविका योजनाओं तक न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित होगी।

    समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय के संवैधानिक अधिकार मजबूत होंगे।

    सरकारी समितियों / आयोगों की सिफारिशें:

    कई सरकारी संस्थाओं और आयोगों ने डीएनटी की अलग गणना की सिफारिश की है, जिनमें शामिल हैं:

    राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (2000)

    डीएनटी पर तकनीकी सलाहकार समूह (2006)

    रेणके आयोग (2008)

    इदाते आयोग (2017)

    इन बार-बार की सिफारिशों के बावजूद जनगणना में आज तक डीएनटी के लिए अलग श्रेणी शामिल नहीं की गई है।

    याचिका में क्या मांग की गई है:

    याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह भारत सरकार को निर्देश दे कि :

    जनगणना प्रश्नावली में डीएनटी के लिए अलग श्रेणी/कॉलम शामिल किया जाए।

    2026-27 की जनगणना के दौरान डीएनटी समुदायों की सही गणना सुनिश्चित की जाए।

    एकत्रित डेटा का उपयोग नीति निर्माण और लक्षित कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए किया जाए।

    याचिकाकर्ता:

    यह जनहित याचिका निम्नलिखित लोगों द्वारा दायर की गई है:

    दक्षिणकुमार बजरंगी – फिल्म निर्माता, रंगकर्मी और डीएनटी अधिकार कार्यकर्ता

    रोहिणी छारी – बेडिया समुदाय के साथ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता

    परश राम गरासिया – डीएनटी समुदायों के साथ काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता

    यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है:

    जनगणना में अलग गणना केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया नहीं है। यह उन करोड़ों ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे नागरिकों के लिए पहचान, गरिमा और न्याय की दिशा में एक संवैधानिक कदम है, जो सात दशकों से अधिक समय से सरकारी आंकड़ों में अदृश्य बने हुए हैं।

    इस मुद्दे पर बोलते हुए पारस बंजारा ने कहा, “यदि आगामी जनगणना में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों की अलग से गणना नहीं की गई, तो ये समुदाय आगे भी अदृश्य और न्याय से वंचित बने रहेंगे। जनगणना के माध्यम से सही पहचान मिलना, भारत के करोड़ों डीएनटी लोगों के लिए गरिमा, अधिकार और समान विकास सुनिश्चित करने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।”

     

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