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    ईरान उथल-पुथल के सबसे ख़ूनी दौर में: पाँच हज़ार से ज़्यादा मौतें, इंटरनेट बंद और समुद्र में बढ़ती जंगी हलचल

    6 hours ago

     

    ईरान एक बार फिर इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ संख्या सिर्फ़ आँकड़ा नहीं रहती, बल्कि व्यवस्था की सच्चाई बन जाती है। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान अब तक कम से कम 5,002 लोगों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा ईरान के लिए सिर्फ़ डरावना नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है क्योंकि यह हालात 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सबसे ख़ूनी बताए जा रहे हैं।

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सड़कों पर लहू, डिजिटल दुनिया में सन्नाटा और समुद्र में युद्धपोत तीनों मिलकर एक ऐसी तस्वीर बना रहे हैं, जो सिर्फ़ ईरान नहीं, पूरी दुनिया को बेचैन कर रही है।

    मौतों का गणित और सच्चाई की दीवार

    अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मारे गए लोगों में:

    • 4,716 प्रदर्शनकारी
    • 203 सरकारी समर्थक
    • 43 बच्चे
    • 40 ऐसे नागरिक, जिनका प्रदर्शन से सीधा लेना-देना नहीं था

    इसके अलावा 26,800 से ज़्यादा लोग हिरासत में लिए जा चुके हैं। यह आंकड़े इसलिए भी अहम हैं क्योंकि ईरान में 8 जनवरी के बाद से अब तक का सबसे व्यापक इंटरनेट बंद लागू है। इसका अर्थ साफ़ है जो सामने आ रहा है, वह शायद पूरी सच्चाई भी नहीं।

    ईरानी सरकार ने पहली बार आधिकारिक तौर पर 3,117 मौतों की बात मानी है, लेकिन मृतकों को “नागरिक”, “सुरक्षा बल” और “आतंकवादी” जैसी श्रेणियों में बाँट दिया गया। यही वह बिंदु है, जहाँ सरकारी बयान और ज़मीनी हकीकत अलग-अलग दिशाओं में जाती दिखती है।

    मीडिया पर पहरा, शब्दों की लड़ाई

    ईरान के भीतर पत्रकारों पर कड़ी पाबंदियाँ हैं। सरकारी टेलीविज़न प्रदर्शनकारियों को लगातार “दंगाई” बताता है और इसके पीछे अमेरिका व इज़राइल का हाथ होने का आरोप लगाता है—बिना किसी ठोस प्रमाण के।

    इतिहास गवाह है कि जब किसी देश में शब्दों पर नियंत्रण लगाया जाता है, तो हिंसा अक्सर आंकड़ों से तेज़ फैलती है

    चेतावनियाँ और सख़्त प्रतिक्रियाएँ

    अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट में दो स्पष्ट “लाल रेखाएँ” खींची हैं:

    1. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या
    2. सामूहिक फाँसी की आशंका

    ईरान में कुछ बंदियों को “मोहरब” यानी ईश्वर का दुश्मन घोषित किया गया है एक ऐसा आरोप जिसकी सज़ा मौत है। यह शब्द 1988 की सामूहिक फाँसियों के दौरान भी इस्तेमाल हुआ था।

    ट्रंप का दावा है कि उनके दबाव में 800 बंदियों की फाँसी रोकी गई, लेकिन ईरान के शीर्ष अभियोजक ने इसे पूरी तरह झूठ बताया। यह टकराव दर्शाता है कि सच अब अदालत में नहीं, बयानों में लड़ा जा रहा है।

    समुद्र में बढ़ती बेचैनी: युद्धपोतों का संदेश

    सड़कों से हटकर नज़र समुद्र पर जाती है, जहाँ अमेरिकी नौसेना ने अपने प्रमुख संसाधन आगे बढ़ा दिए हैं। एयरक्राफ़्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन और उसका स्ट्राइक समूह अब हिंद महासागर में तैनात है।

    “हमारी बहुत बड़ी नौसेना उस दिशा में जा रही है, उम्मीद है इस्तेमाल नहीं करनी पड़ेगी।”

    लेकिन अंतरराष्ट्रीय इतिहास यही बताता है कि जब युद्धपोत आगे बढ़ते हैं, तो केवल चेतावनी नहीं दी जाती विकल्प खुले रखे जाते हैं।

    क्या संघर्ष की ज़मीन तैयार हो रही है?

    न्यूयॉर्क स्थित शोध संस्थान सौफान सेंटर का मानना है कि यह सैन्य जमावड़ा दर्शाता है कि सैन्य कार्रवाई की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है, भले ही अब तक सीधे हमले से बचा गया हो।

    एक ओर ईरान के भीतर व्यवस्था अपने नागरिकों से जूझ रही है, दूसरी ओर बाहरी ताक़तें रणनीतिक मोहरे आगे बढ़ा रही हैं।

    यह केवल ईरान की कहानी नहीं है

    यह संकट सिर्फ़ ईरान बनाम प्रदर्शनकारी नहीं है। यह संघर्ष है:

    • सत्ता बनाम समाज
    • नियंत्रण बनाम सूचना
    • और चेतावनी बनाम युद्ध

    1979 की क्रांति से जन्मी व्यवस्था आज सबसे गंभीर वैधता संकट से गुजरती दिख रही है। जब किसी देश में इंटरनेट बंद हो, सड़कों पर खून बहे और समुद्र में युद्धपोत तैरें तो समझ लेना चाहिए कि मामला स्थानीय नहीं रहा।

    दुनिया फिलहाल देख रही है। सवाल सिर्फ़ यह है देखते-देखते वह कितनी दूर तक शामिल हो जाएगी?

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