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    संयुक्त राष्ट्र के आरोपों पर चीन का खंडन, जबरन श्रम संबंधी चिंताओं को बताया निराधार

    13 hours ago

    चीन ने संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों द्वारा लगाए गए जबरन श्रम से जुड़े आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें पूरी तरह निराधार बताया है। बीजिंग ने स्पष्ट कहा है कि इन आरोपों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है और इन्हें चीन की छवि को नुकसान पहुंचाने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।

    यह प्रतिक्रिया उस समय आई है जब संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों और अन्य मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक समूह ने चीन के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर शिनजियांग और तिब्बत में अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े श्रम कार्यक्रमों पर गंभीर सवाल उठाए थे। विशेषज्ञों ने दावा किया था कि इन क्षेत्रों में राज्य प्रायोजित योजनाओं के तहत लोगों को काम के लिए स्थानांतरित किया जा रहा है, जिससे जबरन श्रम जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है।

    चीन का सख्त रुख

    शुक्रवार को नियमित प्रेस वार्ता के दौरान चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ तथाकथित विशेषज्ञों की टिप्पणियां पूरी तरह से गढ़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि चीन ऐसे बयानों को स्वीकार नहीं कर सकता, जो तथ्यों से परे हों और जिनका उद्देश्य देश के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाना हो।

    चीन का कहना है कि संबंधित क्षेत्रों में चलाई जा रही योजनाएं गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन के लिए बनाई गई हैं। सरकार के अनुसार, इन कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के लोगों को बेहतर आय के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे उनका जीवन स्तर सुधर सके।

    संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की रिपोर्ट

    संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों ने एक संयुक्त बयान में कहा था कि उन्हें लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही हैं, जिनमें दावा किया गया है कि कुछ समुदायों को सरकारी नीतियों के तहत रोजगार के लिए मजबूर किया जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि तथाकथित “श्रम हस्तांतरण” योजनाओं के माध्यम से लोगों को उनके निवास स्थान से दूर काम करने के लिए भेजा जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2024 में बड़ी संख्या में लोगों को इन योजनाओं के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में स्थानांतरित किया गया। उनका यह भी कहना था कि ऐसे कार्यक्रमों के संचालन और निगरानी में पारदर्शिता की कमी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंताएं बढ़ी हैं।

    हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के ये विशेष प्रतिवेदक स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं और वे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक नीति या रुख का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उनका कार्य मानवाधिकार परिषद को अपने निष्कर्षों से अवगत कराना होता है।

    विकास बनाम आरोप

    चीन ने दोहराया कि शिनजियांग और तिब्बत जैसे क्षेत्रों में विकास और प्रगति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। सरकार का कहना है कि बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार हुआ है और गरीबी के स्तर में कमी आई है। चीन के अनुसार, रोजगार से जुड़ी योजनाओं में भागीदारी स्वैच्छिक है और इसका उद्देश्य लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।

    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और निवेशकों की नजर

    इस मुद्दे पर चीन और पश्चिमी देशों के बीच पहले भी मतभेद सामने आते रहे हैं। मानवाधिकार से जुड़े आरोपों को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा होती रही है, जबकि चीन इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल मानता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के विवादों का असर कूटनीतिक संबंधों के साथ-साथ वैश्विक व्यापार और निवेश माहौल पर भी पड़ सकता है। हालांकि, चीन की ओर से बार-बार यह संकेत दिया गया है कि वह अपने विकास मॉडल और नीतियों पर कायम रहेगा।

    आगे की राह

    चीन ने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों से अपील की है कि वे तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ तरीके से अपने दायित्वों का निर्वहन करें। बीजिंग का कहना है कि किसी भी देश के विकास प्रयासों को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय जमीनी वास्तविकताओं को समझा जाना चाहिए।

    वहीं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले पर नजर बनाए हुए है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मुद्दे पर चीन और संयुक्त राष्ट्र के बीच संवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या इन चिंताओं को दूर करने के लिए कोई साझा रास्ता निकल पाता है।

     

    फिलहाल, चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह जबरन श्रम से जुड़े सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता है और अपने विकास तथा रोजगार कार्यक्रमों को सामाजिक-आर्थिक सुधार की दिशा में एक आवश्यक कदम मानता है।

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