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    डावोस में ट्रंप की फिसलन: ग्रीनलैंड–आइसलैंड को लेकर बयान, सैन्य कार्रवाई से अमेरिका ने बनाई दूरी

    11 hours ago

    विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में आ गए। इस बार मामला आर्कटिक क्षेत्र और ग्रीनलैंड से जुड़ा रहा, जहां ट्रंप ने न केवल सैन्य हस्तक्षेप की संभावनाओं से पीछे हटने के संकेत दिए, बल्कि अपने भाषण में ग्रीनलैंड और आइसलैंड को लेकर की गई गड़बड़ी ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा।

    सैन्य विकल्प से पीछे हटता अमेरिका

    डावोस में दिए गए अपने संबोधन और बाद की टिप्पणियों में राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई का सहारा नहीं लेगा। यह रुख उनके पहले के कड़े बयानों से अलग माना जा रहा है, जिनमें ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए कठोर कदमों की बात कही गई थी।

    ट्रंप ने इस बदलाव को एक “सकारात्मक समझौते” के रूप में पेश किया और कहा कि इससे अमेरिका की सुरक्षा और खनिज संसाधनों से जुड़े हित सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि यह समझ NATO के महासचिव मार्क रुटे के साथ बातचीत के बाद बनी है और इसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है।

    नाटो और ग्रीनलैंड की स्थिति

    नाटो प्रमुख मार्क रुटे ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर औपचारिक चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नाटो आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर अपने प्रयास जारी रखेगा, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक शक्तियों की नजर इस इलाके पर बढ़ रही है।

    नाटो के एक प्रवक्ता के अनुसार, डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिका के बीच आगे बातचीत होगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस क्षेत्र में किसी भी बाहरी शक्ति की आर्थिक या सैन्य मौजूदगी न बढ़े। आर्कटिक क्षेत्र को लेकर रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों को भी इस संदर्भ में अहम माना जा रहा है।

    टैरिफ और यूरोपीय देशों को राहत

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने एक और अहम घोषणा की। उन्होंने कहा कि डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों पर लगाए जाने वाले प्रस्तावित आयात शुल्कों को फिलहाल हटाया जाएगा। ये शुल्क उन देशों पर विचाराधीन थे जिन्होंने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई थी।

    डेनमार्क में इस फैसले को राहत के रूप में देखा जा रहा है। वहां के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सैन्य कार्रवाई और व्यापारिक टकराव से दूरी बनाने के संकेत सकारात्मक हैं और इससे तनाव कम होने की उम्मीद है।

    डावोस भाषण में ग्रीनलैंड–आइसलैंड की उलझन

    डावोस में ट्रंप के भाषण का एक और पहलू चर्चा में रहा। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान कई बार ग्रीनलैंड के बजाय आइसलैंड का उल्लेख कर दिया। इस गलती को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

    हालांकि, व्हाइट हाउस की ओर से सफाई दी गई कि राष्ट्रपति के लिखित वक्तव्य में ग्रीनलैंड का ही उल्लेख था और किसी भ्रम की बात नहीं है। प्रशासन का कहना है कि राष्ट्रपति का इशारा उसी क्षेत्र की ओर था, जिसे अमेरिका रणनीतिक दृष्टि से अहम मानता है।

    ग्रीनलैंड और आइसलैंड: नाम मिलते-जुलते, हकीकत अलग

    विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीनलैंड और आइसलैंड के नामों को लेकर अक्सर भ्रम होता है, लेकिन दोनों क्षेत्र भौगोलिक और सामाजिक रूप से काफी अलग हैं। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जिसका अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढका हुआ है और यहां आबादी बेहद कम है।

    वहीं आइसलैंड आकार में छोटा है, लेकिन वहां जनसंख्या अपेक्षाकृत अधिक है और इसका भू-दृश्य हरित पहाड़ियों, ज्वालामुखियों और झरनों से भरा हुआ है। दोनों ही क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक में स्थित हैं, लेकिन उनकी जलवायु, जनसंख्या और राजनीतिक स्थिति एक-दूसरे से काफी भिन्न है।

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति में असर

    विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह रुख अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच तनाव को कुछ हद तक कम कर सकता है। ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य भाषा से पीछे हटना नाटो के भीतर एकता बनाए रखने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

    हालांकि, यह भी साफ है कि आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों और सुरक्षा को लेकर प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में और तेज हो सकती है। ऐसे में अमेरिका, यूरोप और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती रहेगा।

    डावोस में हुआ यह घटनाक्रम दिखाता है कि वैश्विक मंचों पर दिए गए बयान केवल शब्द नहीं होते, बल्कि वे कूटनीतिक रिश्तों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

     
     
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