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    इट्स नॉट जस्ट अबाउट पेन एंड पेपर: फ्यूचर थॉट लीडर्स को आकार देता 'वंडर ऑफ़ वर्ड्स’

    3 months ago

    -डिजिटल दुनिया की बनावटी हकीकत से परे अपनी 'इनर वॉइस' को प्रायोरिटाइज़ करे - वंडर ऑफ़ वर्ड्स, जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी

     

    -बहती नदी की तरह विकसित होना ही जीवन का सार है- जेईसीआरसी वंडर ऑफ़ वर्ड्स

     

    -पब्लिशिंग से लेकर स्क्रीन राइटिंग तक; भाषाई गर्व को ग्लोबल पर्सपेक्टिव देने की अनूठी पहल- वाओ, जेईसीआरसी

     

    -जयपुर,

     

    शब्दों की जादुई दुनियाँ को एक बार फ़िर हक़ीक़त में बदलते हुए, ज़िंदगी और शब्दों के ख़ूबसूरत रिश्ते को बयां करते हुए, जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी में “वंडर्स ऑफ़ वर्ड्स (वाओ)” के 13वे एडिशन का आग़ाज़ हुआ। आज़ के यंग राइटर्स और क्रिएटिव माइंड्स को फ्यूचर थॉट लीडर्स के रूप में शेप करते, “इट्स नॉट जस्ट अबाउट अ पेन एंड अ पेपर” की थीम पर आधारित यह तीन दिवसीय लिटरेरी फेस्ट स्टूडेंट्स को केवल कंटेंट कंज़्यूम करना ही नहीं बल्कि उसे इंपैक्टफ़ुल तरीक़े से क्रिएट करना भी सिखा रहा है।

     

    मायथोलॉजी को मॉडर्न कॉन्शियसनेस से जोड़ते हुए, अर्जुन, शक्ति, गंगा, और मोहिनी जैसी बेस्टसेलिंग पुस्तकों की रिनाउंड राइटर, अनुजा चंद्रमौली ने अपने सेशन में नारी शक्ति के नए आयाम को उजागर करते हुए साझा किया कि कैसे स्कूल के दिनों की एक साधारण-सी प्रेरणा ने उनके भीतर की लेखिका को जगाया। फ़ेमिनिज़्म और पौराणिक कथाओं को एक नए, निडर नज़रिए से 'रिक्लेम' करते हुए उन्होंने बताया कि देवियाँ अब मौन प्रतीक नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर बोलती चेतनाएँ हैं। साइकॉलजी में गोल्ड मेडलिस्ट रहीं अनुजा ने ‘वाइटवॉश्ड’ और 'सेनिटाइज़्ड' नरेटिव्स को चुनौती देते हुए देवियों को मानवीय, प्रखर और निर्णयक्षम रूप में प्रस्तुत किया। उनका संदेश स्पष्ट था- त्याग नहीं, संतुलन; चुप्पी नहीं, स्वर; और सैक्रिफ़ाइस नहीं, सैटिसफ़ैक्शन ही नई नारी शक्ति का भविष्य है।

     

    इमोशनल अटैचमेंट और सेल्फ़-डिस्कवरी के अनछुए पहलुओं को उजागर करते हुए, नेशनल बेस्टसेलिंग ऑथर स्तुति चांगले ने साझा किया कि लेखन हमारी वल्नरेबिलिटीज़ और करेज को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मनुष्य एक फ़्लोइंग रिवर की तरह निरंतर इवॉल्व होता है, इसलिए सामाजिक दबावों को दरकिनार कर अपनी इनर वॉइस को प्रायोरिटाइज़ करना और बाउंडरीज़ तय करना अनिवार्य है। स्तुति के अनुसार, असली सुकून डिजिटल दुनिया की डॉक्टर्ड रिएलिटी में नहीं बल्कि हमारे ‘इट गोज़ ऑन’ वाले रवैये में है। अंततः, सफलता दूसरों से कम्पीट करने में नहीं, बल्कि खुद को हर दिन अपडेट करने और अपनी ऑथेंटीसिटी को सेलिब्रेट करने में है।

     

    इसी क्रम में इतिहास और कल्पना के अद्भुत संगम को उजागर करते हुए, लेखक और स्टोरीटेलर गौरव मोहंती ने स्पष्ट किया कि इंसान कोई 'सॉलिड' नहीं बल्कि 'गैस' की तरह है, जो ज़रूरत पड़ने पर किसी भी करियर या सांचे में खुद को फिट कर सकता है। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि 'रिस्क एपेटाइट' उम्र के साथ कम होता जाता है, इसलिए यही सही समय है अपनी बाउंड्रीज़ को पुश करने का। गौरव के अनुसार, सफलता का असली मंत्र 'कंसिस्टेंसी' है क्योंकि कंसिस्टेंसी ही क्लैरिटी को 'करेंसी' में बदलती है। उन्होंने यह भी समझाया कि हमें अपनी डिस्ट्रैक्शंस को 'स्टार्व' करना होगा और सोशल मीडिया जैसे टूल्स को अपना 'मास्टर' नहीं बल्कि 'सर्वेंट' बनाना होगा। उनके लिए ग्रेटनेस का पैमाना जीवन को हफ़्तों में नहीं बल्कि घंटों में मापना है।

     

    इन आईडियोलॉजिकल सेशंस को और भी वाइब्रेंट बनाने के लिए, ऑथर साइनिंग इवेंट, आर्टिस्टिक ओपन माइक, जेईसीआरसी स्कूल ऑफ़ हॉस्पिटैलिटी के फ़ूड स्टॉल्स, क्रिएटिव वर्कशॉप्स, फ़ोटो बूथ्स और बुक आउटलेट जैसे क्युरेटेड एक्सपीरिएंस शामिल किए गए। साथ ही रीडिंग कल्चर को प्रमोट करते हुए 'रीडर्स पिकनिक' का आयोजन किया, जहाँ छात्रों को शब्दों के संसार और आइडियाज़ से जुड़ने का एक नया नज़रिया मिला।

     

    आगामी दिनों में लिटरेचर और विज़न को एक साथ जोड़ते हुए, दिव्य प्रकाश दुबे 'तड़का टेल्स' के ज़रिए डिजिटल स्टोरीटेलिंग के मॉडर्न अंदाज़ पेश करेंगे, वहीं विवेक आत्रे 'द इनर कम्पास' सेशन के साथ यूथ को जीवन की सही दिशा के लिए प्रेरित करेंगे। इनके साथ ही प्रियदर्शन पराग, कोरल दासगुप्ता, स्वेता समोटा और अर्श वोरा जैसे मंझे हुए थॉट-लीडर्स, पब्लिशिंग की दुनिया से लेकर स्क्रीन राइटिंग तक के प्रैक्टिकल गुर साझा करेंगे।

     

    युवाओं को अपनी भाषाई विरासत और संस्कृति से दोबारा जोड़ने के विज़न को बताते हुए वाओ की कन्वेनर पी शिवानी सिंह (हैड ऑफ़ एल&डी, आईपीआर सेल) और क्रिएटिव हैड आकांक्षा शर्मा (प्रोफ़ेशनल डेवलपमेंट ऑफ़िसर) ने कहा कि इस फ़ेस्ट का उद्देश्य स्टूडेंट्स में अपनी जड़ों के प्रति 'एसेंस ऑफ बिलॉन्गिंग' को जगाना है। उनके अनुसार, यह मंच महज़ एक इवेंट नहीं बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम है जहाँ स्टूडेंट्स अपनी ओरिजनल वॉइस को तलाश कर अपनी भाषा के गौरव को ग्लोबल पर्सपेक्टिव दे रहे हैं।

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