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    कनाडा का बदला रुख: भारत पर हिंसक गतिविधियों के आरोपों से पीछे हटा ओटावा, मार्क कार्नी की भारत यात्रा से पहले बयान

    2 months ago

    YUGCHARAN / 27/02/2026

    कनाडा और भारत के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों से जारी तनाव के बीच अब एक अहम और निर्णायक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। कनाडा सरकार ने पहली बार सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि उसे इस समय भारत के किसी भी तरह की हिंसक आपराधिक गतिविधियों या कनाडाई धरती पर खतरों से जुड़े होने के कोई प्रमाण नहीं दिखते। यह बयान ऐसे समय आया है जब कनाडा के प्रधानमंत्री Mark Carney भारत की आधिकारिक यात्रा पर आने वाले हैं और उनकी मुलाकात भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi से प्रस्तावित है।

    कनाडा के एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि मौजूदा आकलन के अनुसार भारत से जुड़ी वह गतिविधियां, जिनको लेकर पहले गंभीर आरोप लगाए गए थे, अब जारी नहीं हैं। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि “हम पूरे भरोसे के साथ कह सकते हैं कि इस तरह की गतिविधियां फिलहाल नहीं हो रहीं।” यह बयान 2023 में कनाडा द्वारा लगाए गए उन आरोपों से बिल्कुल अलग है, जब ओटावा ने नई दिल्ली पर एक सिख अलगाववादी नेता की हत्या में संलिप्त होने का आरोप लगाया था।

    दरअसल, जून 2023 में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के सरे शहर में सिख अलगाववादी Hardeep Singh Nijjar की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री Justin Trudeau ने उस समय सार्वजनिक रूप से भारत सरकार पर इस हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था। भारत ने इन आरोपों को न केवल सिरे से खारिज किया था, बल्कि उन्हें “बेतुका” और “राजनीति से प्रेरित” बताया था। भारत का कहना रहा है कि वह किसी भी तरह की अंतरराष्ट्रीय दमनकारी गतिविधियों में शामिल नहीं है।

    निज्जर को भारत सरकार ने वर्ष 2020 में आतंकवादी घोषित किया था। हालांकि, उनकी हत्या के बाद से भारत-कनाडा संबंधों में भारी गिरावट देखी गई। दोनों देशों के बीच राजनयिक तनाव बढ़ा, व्यापारिक वार्ताएं प्रभावित हुईं और आपसी विश्वास को गहरा आघात पहुंचा। इस मामले में चार भारतीय नागरिकों को कनाडा में गिरफ्तार किया गया है और वे फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं, जिनका मुकदमा अभी चलना बाकी है।

    अब, प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में कनाडा एक नई दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है। अमेरिका के साथ व्यापारिक दबाव और शुल्क विवादों के बीच कनाडा अपनी आर्थिक और कूटनीतिक निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहा है। इसी रणनीति के तहत भारत जैसे बड़े उभरते बाजार और रणनीतिक साझेदार के साथ रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने के प्रयास तेज किए गए हैं।

    कनाडा सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि भारत के साथ विदेशी हस्तक्षेप और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर लगातार बातचीत हो रही है। इन बातचीतों को उन्होंने “मजबूत और गंभीर” बताया। अधिकारियों के अनुसार, कनाडा ने अपने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए हैं। एक अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर हमें लगता कि भारत सरकार किसी भी तरह से हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप कर रही है, तो शायद यह यात्रा ही नहीं होती।”

    प्रधानमंत्री कार्नी की भारत यात्रा को इसी बदले हुए माहौल का प्रतीक माना जा रहा है। वे मुंबई और नई दिल्ली का दौरा करेंगे, जहां उनकी प्रधानमंत्री मोदी से विस्तृत बातचीत होगी। कार्नी कार्यालय के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य फोकस निवेश, व्यापार और आर्थिक सहयोग पर रहेगा। यह यात्रा उस व्यापक लक्ष्य से जुड़ी है, जिसके तहत कनाडा अगले दशक में अमेरिका के बाहर अपने निर्यात को दोगुना करना चाहता है।

    हालांकि, कनाडा के इस बदले रुख से वहां का सिख समुदाय पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। सिख समुदाय के कुछ संगठनों और नेताओं ने सरकार के आकलन को “हकीकत से दूर” बताया है। कनाडा स्थित World Sikh Organisation के प्रवक्ता बलप्रीत सिंह का कहना है कि उन्हें अब भी भारत से जुड़े खतरों का सामना करना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि ट्रांसनेशनल दमन अभी भी जारी है और सरकार इस खतरे को गंभीरता से नहीं ले रही।

    वैंकूवर के एक प्रमुख सिख कार्यकर्ता मोनिंदर सिंह ने हाल ही में दावा किया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें उनकी जान को “विश्वसनीय खतरे” की चेतावनी दी है। इस तरह के बयान कनाडा सरकार के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। बलप्रीत सिंह ने कहा कि ऐसा महसूस होता है जैसे सरकार आर्थिक हितों को “कानून के शासन” और नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर रख रही है।

    इन आलोचनाओं के बावजूद, कनाडा सरकार का मानना है कि भारत के साथ उच्चतम स्तर पर संवाद बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सुलझाने का सबसे प्रभावी तरीका है। अधिकारियों का तर्क है कि दूरी बनाने के बजाय बातचीत और सहयोग से ही गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है और आपसी विश्वास को फिर से स्थापित किया जा सकता है।

    भारत की ओर से भी संकेत मिले हैं कि वह कनाडा के साथ रिश्तों में सुधार के पक्ष में है, बशर्ते कि आपसी सम्मान और तथ्यों के आधार पर संवाद हो। पिछले वर्ष अल्बर्टा के कनानास्किस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और मार्क कार्नी की मुलाकात को भी रिश्तों में नरमी की शुरुआत के रूप में देखा गया था। इसके बाद कनाडा की विदेश मंत्री Anita Anand की भारत यात्रा ने इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया।

    कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत और कनाडा दोनों के लिए यह रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जबकि कनाडा तकनीक, शिक्षा, ऊर्जा और कृषि जैसे क्षेत्रों में भारत का अहम साझेदार बन सकता है। व्यापक व्यापार समझौते की संभावना को भी दोनों देश लंबे समय से तलाश रहे हैं।

     

    अंततः, कनाडा का यह नया बयान केवल एक आकलन नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच रिश्तों को “रीसेट” करने की दिशा में एक राजनीतिक संकेत भी है। यह साफ है कि बीते वर्षों की कड़वाहट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन संवाद, यात्रा और बदले हुए सुर इस ओर इशारा करते हैं कि ओटावा और नई दिल्ली अब टकराव की बजाय सहयोग का रास्ता अपनाना चाहते हैं। आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा इस नए अध्याय की दिशा और गहराई तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

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