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    शेयर बाजार में भारी बिकवाली: निफ्टी 25,200 के नीचे फिसला, बाजार टूटने के पीछे तीन बड़े कारण

    2 months ago

    शुक्रवार का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजार के लिए बेहद उतार-चढ़ाव भरा और निवेशकों के लिए चिंता बढ़ाने वाला साबित हुआ। दिन चढ़ने के साथ बिकवाली का दबाव इतना बढ़ा कि निफ्टी 50 कुछ ही मिनटों में 100 अंकों से ज्यादा टूटकर 25,200 के अहम स्तर के नीचे चला गया। सेंसेक्स भी इस गिरावट से अछूता नहीं रहा और कारोबार के दौरान लगभग 1,000 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। बाजार बंद होते-होते निवेशकों की धारणा पूरी तरह “रिस्क-ऑफ” मोड में दिखाई दी।

    विश्लेषकों के मुताबिक यह गिरावट किसी एक वजह से नहीं, बल्कि घरेलू और वैश्विक स्तर पर एक साथ बने नकारात्मक माहौल का नतीजा है। व्यापक बाजार यानी मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव साफ दिखा। स्मॉलकैप 250 इंडेक्स करीब 1.10% और मिडकैप 150 इंडेक्स लगभग 1.14% नीचे बंद हुआ। रियल्टी, ऑटो और मेटल जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा दबाव में रहे, जबकि आईटी और मीडिया शेयरों में भी कमजोरी बनी रही।

    सबसे अहम बात यह रही कि निफ्टी ने लगातार दूसरे हफ्ते गिरावट दर्ज की और फरवरी 2026 में यह तीसरा महीना बन गया जब बाजार में कमजोरी बनी हुई है। खास तौर पर आईटी सेक्टर के लिए यह महीना ऐतिहासिक रूप से सबसे खराब रहा, जहां फरवरी 2026 को सितंबर 2008 के बाद का सबसे कमजोर महीना माना जा रहा है। इस पृष्ठभूमि में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर बाजार आज क्यों टूटा और आगे की दिशा क्या हो सकती है।

    बाजार में आई इस तेज गिरावट की पहली बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय सूचकांक प्रदाता MSCI की फरवरी 2026 की तिमाही समीक्षा रही। इस समीक्षा के तहत कई बड़े बदलाव किए गए, जिनका असर सीधे-सीधे विदेशी निवेश प्रवाह पर पड़ा। अनुमान है कि इस रीबैलेंसिंग के कारण भारतीय शेयर बाजार से करीब 260 मिलियन डॉलर की शुद्ध निकासी हुई। MSCI ने अपनी ग्लोबल स्टैंडर्ड इंडेक्स सूची में कुछ नए शेयर जोड़े, जबकि कुछ शेयरों को बाहर किया। ऐसे बदलावों के दौरान इंडेक्स-ट्रैकिंग फंड्स को मजबूरी में अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करना पड़ता है, जिससे अचानक बिकवाली का दबाव बनता है। शुक्रवार को बाजार में दिखी तेज गिरावट में इस फैक्टर की भूमिका काफी अहम रही।

    दूसरी बड़ी वजह तकनीकी स्तरों का टूटना और व्यापक आधार पर बिकवाली रही। निफ्टी ने अपने कई अहम सपोर्ट लेवल तोड़ दिए, जिससे शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स और एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग के जरिए बिकवाली और तेज हो गई। रियल्टी सेक्टर में करीब 2.3% की गिरावट देखी गई, जो यह दर्शाती है कि ब्याज दरों और मांग को लेकर निवेशक फिलहाल सतर्क हैं। ऑटो और कैपिटल गुड्स जैसे सेक्टरों में भी दबाव बना रहा। आईटी सेक्टर की हालत सबसे ज्यादा खराब रही, जहां यह फरवरी का महीना पिछले करीब दो दशकों में सबसे कमजोर साबित हुआ। विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक मांग को लेकर अनिश्चितता और डॉलर-रुपया विनिमय दर में उतार-चढ़ाव ने आईटी शेयरों पर अतिरिक्त दबाव डाला।

    तीसरी और शायद सबसे प्रभावी वजह कमजोर वैश्विक संकेत रहे। एशियाई बाजारों में भी गिरावट का माहौल था, जिसका असर भारतीय बाजार पर साफ दिखाई दिया। अमेरिकी बाजारों से भी मजबूत संकेत नहीं मिले। वॉल स्ट्रीट पर निवेशकों की नजर हाल ही में आए कॉरपोरेट नतीजों पर थी, लेकिन टेक सेक्टर की दिग्गज कंपनी Nvidia Corp. के नतीजे बाजार की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके। भले ही कंपनी ने भविष्य को लेकर सकारात्मक अनुमान पेश किया हो, लेकिन निवेशक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेक्टर में तेज ग्रोथ की रफ्तार को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखे। इसका नतीजा यह हुआ कि नैस्डैक और अन्य अमेरिकी सूचकांकों में कमजोरी आई, जिसने वैश्विक बाजारों में नकारात्मक धारणा को और मजबूत किया।

    इसके अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई की गतिविधियों ने भी बाजार पर दबाव डाला। गुरुवार को एफपीआई ने करीब 3,466 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिक्री की। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने कुछ हद तक इस बिकवाली को संतुलित करने की कोशिश की और वे लगातार तीसरे दिन शुद्ध खरीदार बने रहे। इसके बावजूद विदेशी निवेशकों की सतर्कता ने बाजार की दिशा पर नकारात्मक असर डाला। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर एफपीआई सबसे पहले जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालते हैं, और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।

    बाजार विशेषज्ञ गौरव उदानी के अनुसार, “आज का बाजार पूरी तरह क्लासिक रिस्क-ऑफ स्थिति को दर्शाता है। कमजोर वैश्विक संकेत और मुनाफावसूली ने निवेशकों की धारणा को सतर्क बना दिया। तकनीकी तौर पर निफ्टी ने अहम सपोर्ट तोड़े हैं, जिससे मोमेंटम-आधारित बिकवाली बढ़ी है। अगर निफ्टी 25,100 के नीचे बंद होता है, तो आगे और गिरावट देखने को मिल सकती है।” उनका मानना है कि यह गिरावट किसी बड़े संरचनात्मक संकट का संकेत नहीं है, लेकिन फिलहाल सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।

    निवेशकों के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए। बाजार की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि अल्पकाल में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अमेरिका-ईरान वार्ता जैसे मुद्दे निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर रहे हैं। घरेलू स्तर पर भी आगामी आर्थिक आंकड़े और कंपनियों की कमाई बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    हालांकि दीर्घकालिक निवेशकों के लिए विशेषज्ञों की सलाह यही है कि वे घबराहट में फैसले न लें। मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों में चरणबद्ध तरीके से निवेश करना इस तरह के समय में बेहतर रणनीति हो सकती है। बाजार का इतिहास गवाह है कि हर बड़ी गिरावट के बाद रिकवरी का दौर भी आता है, लेकिन इसके लिए धैर्य और अनुशासन जरूरी है।

    कुल मिलाकर, शुक्रवार को बाजार में आई यह गिरावट कई कारकों के एक साथ असर का नतीजा रही। MSCI रीबैलेंसिंग, तकनीकी स्तरों का टूटना, कमजोर वैश्विक संकेत और विदेशी निवेशकों की बिकवाली—इन सभी ने मिलकर बाजार को नीचे धकेला। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर वैश्विक घटनाक्रमों और घरेलू आर्थिक संकेतों पर टिकी रहेगी, जो यह तय करेंगे कि यह गिरावट कितनी गहरी जाती है या यहीं से स्थिरता की शुरुआत होती है।

     
     
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