Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    श्रम संकट से जूझ रहा रूस, भारत और श्रीलंका की ओर बढ़ा श्रमिकों की तलाश

    3 months ago

    रूस इस समय अपने सबसे गंभीर श्रम संकट के दौर से गुजर रहा है। जनसंख्या के तेजी से बूढ़े होने, युवाओं की कमी और यूक्रेन युद्ध के प्रभाव ने वहां के श्रम बाजार पर गहरा दबाव डाला है। दशकों तक मध्य एशियाई देशों से आने वाले प्रवासी श्रमिकों पर निर्भर रहने के बाद अब रूस भारत, श्रीलंका और अन्य दक्षिण एशियाई देशों की ओर रुख कर रहा है, ताकि अपने खाली होते कार्यबल को भर सके।

    रूसी सरकारी आकलन के अनुसार, देश को इस दशक के अंत तक करीब 1.1 करोड़ अतिरिक्त श्रमिकों की आवश्यकता होगी। यह मुद्दा हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान भी प्रमुखता से उठा था। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच अस्थायी श्रम प्रवासन की प्रक्रियाओं को सरल बनाने से जुड़ा एक समझौता भी किया गया, जिससे भारतीय कामगारों के लिए रूस में काम करना अपेक्षाकृत आसान हो सके।

    भारतीय श्रमिकों की संख्या में तेज वृद्धि

    आंकड़ों से स्पष्ट है कि रूस में भारतीय श्रमिकों की उपस्थिति बीते कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2021 में जहां भारतीय नागरिकों को जारी किए गए कार्य परमिट की संख्या करीब 5,000 थी, वहीं पिछले वर्ष यह आंकड़ा बढ़कर 56,000 से अधिक हो गया। कुल मिलाकर, 2025 में रूस ने विदेशी नागरिकों को करीब 2.4 लाख कार्य परमिट जारी किए, जो कम से कम पिछले आठ वर्षों में सबसे अधिक है।

    हालांकि, पहले जहां मध्य एशिया के देशों से श्रमिकों की संख्या अधिक रहती थी, अब वृद्धि का बड़ा हिस्सा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन जैसे अपेक्षाकृत दूर के देशों से आ रहा है। यह बदलाव रूसी श्रम बाजार में एक बड़े संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है।

    नगर सेवाओं से लेकर निर्माण क्षेत्र तक

    वर्तमान में भारतीय और अन्य दक्षिण एशियाई श्रमिक रूस के बड़े शहरों में कई तरह के कार्यों में लगे हुए हैं। नगर निगम से जुड़े कामों, जैसे बर्फ हटाने और सफाई सेवाओं से लेकर निर्माण स्थलों, रेस्तरां और होटल उद्योग तक, विदेशी श्रमिकों की मांग लगातार बढ़ रही है।

    श्रम बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि रूस में बेरोजगारी दर करीब 2 प्रतिशत के आसपास है, जो वैश्विक स्तर पर बेहद कम मानी जाती है। ऐसे में यदि बाहर से श्रमिक नहीं आए, तो आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं और विकास की गति और धीमी पड़ने का खतरा है।

    दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय समस्या

    रूस लंबे समय से जनसांख्यिकीय संकट का सामना कर रहा है। 1990 के दशक में जन्म दर में आई भारी गिरावट का असर अब साफ दिखने लगा है। अनुमान है कि देश की लगभग एक-चौथाई आबादी सेवानिवृत्ति की उम्र के करीब है। युवाओं की संख्या में लगातार कमी आने से श्रम बाजार पर दबाव और बढ़ रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह कोई अस्थायी समस्या नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक स्थिति है, जिससे रूसी अर्थव्यवस्था को आने वाले दशकों तक जूझना पड़ेगा। ऐसे में विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता रूस की मजबूरी बनती जा रही है।

    युद्ध और प्रवासन नीतियों का असर

    यूक्रेन युद्ध ने भी इस संकट को और गहरा कर दिया है। बड़ी संख्या में कार्यशील उम्र के लोग या तो सैन्य उद्योगों में चले गए हैं या देश छोड़कर बाहर बस गए हैं। इसके अलावा, सुरक्षा कारणों से रूस ने हाल के वर्षों में कुछ क्षेत्रों में वीज़ा-मुक्त प्रवासन के नियम भी सख्त किए हैं, जिससे पारंपरिक स्रोतों से श्रमिकों की आवक कम हुई है।

    इन परिस्थितियों में रूस अब ऐसे श्रमिकों को प्राथमिकता दे रहा है, जो वीज़ा और अनुबंध के तहत लंबे समय तक एक ही नियोक्ता के साथ काम करें। अधिकारियों का मानना है कि इससे कार्यबल में स्थिरता बनी रहेगी।

    प्रशिक्षण और भाषा पर जोर

    रूस में काम करने वाले कई भारतीय श्रमिकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं। भारत के कुछ शहरों में वेल्डिंग, निर्माण और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के लिए प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं, जहां उम्मीदवारों को चयन से पहले प्रशिक्षित और परखा जाता है। इसके अलावा, होटल और सेवा क्षेत्र के लिए रूसी भाषा की बुनियादी ट्रेनिंग भी दी जा रही है।

    भर्ती एजेंसियों के अनुसार, एशियाई देशों से आने वाले श्रमिकों को नियुक्त करना लागत के लिहाज से भी अपेक्षाकृत किफायती होता है, जिससे रूसी कंपनियों की रुचि और बढ़ रही है।

    उद्योगों पर सीधा असर

    श्रमिकों की कमी का असर रूस के बड़े औद्योगिक क्षेत्रों पर साफ नजर आ रहा है। खनन, जहाज निर्माण और भारी उद्योग से जुड़ी कई कंपनियां अपने पूर्ण उत्पादन स्तर पर काम नहीं कर पा रही हैं। अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि कुशल श्रमिकों की कमी इस समय उद्योग जगत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

    आगे की तस्वीर

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। जनसंख्या की उम्र बढ़ने और युवाओं की घटती संख्या के चलते यह समस्या जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। ऐसे में भारत और श्रीलंका जैसे जनसंख्या-समृद्ध देशों के लिए यह अवसर भी हो सकता है, बशर्ते श्रमिकों की सुरक्षा, अधिकारों और कार्य परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए।

     

    कुल मिलाकर, रूस का भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों की ओर बढ़ता झुकाव वैश्विक श्रम बाजार में बदलते संतुलन को दर्शाता है, जहां जनसांख्यिकी और भू-राजनीति मिलकर नई आर्थिक वास्तविकताएं गढ़ रही हैं।

    Click here to Read More
    Previous Article
    भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में इलेक्ट्रिक वाहनों को राहत नहीं, टेस्ला के लिए बढ़ी चुनौतियां
    Next Article
    Russia Looks to India and Sri Lanka to Ease Deepening Labour Shortage

    Related देश Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment