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    दिल्ली को मिली राहत: दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची से बाहर हुई राष्ट्रीय राजधानी, कोलकाता और मुंबई की स्थिति में भी सुधार

    2 months ago

    YUGCHARAN | 16/02/2026

    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लिए यह खबर राहत देने वाली है कि वह पहली बार इस मौसम में दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची से बाहर हो गई है। स्विट्ज़रलैंड स्थित वायु गुणवत्ता निगरानी संस्था IQAir** की 15 फरवरी को जारी रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली अब इस वैश्विक सूची में 12वें स्थान पर है। इसी सूची में Kolkata 13वें स्थान पर दर्ज की गई है, जबकि Mumbai की रैंकिंग भी पहले की तुलना में बेहतर मानी जा रही है। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब दिल्ली-एनसीआर लंबे समय से गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है और हर साल सर्दियों में हालात बेहद खराब हो जाते हैं।

    दिल्ली का दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की शीर्ष 10 सूची से बाहर होना न केवल प्रतीकात्मक महत्व रखता है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि हाल के दिनों में वायु गुणवत्ता में कुछ हद तक सुधार दर्ज किया गया है। IQAir द्वारा तैयार की गई यह रैंकिंग अमेरिकी वायु गुणवत्ता सूचकांक (US AQI) प्रणाली पर आधारित है, जिसमें प्रदूषण के स्तर को छह श्रेणियों—अच्छा, संतोषजनक, मध्यम, खराब, बहुत खराब और गंभीर—में बांटा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, 15 फरवरी को शाम 4 बजे से 5 बजे के बीच दर्ज किए गए आंकड़ों के आधार पर दिल्ली का AQI 143 रहा, जिसे ‘मध्यम से खराब’ श्रेणी में रखा जाता है।

    हालांकि, यह सुधार अभी पूरी तरह स्थायी नहीं माना जा सकता। Central Pollution Control Board (CPCB) द्वारा जारी दैनिक वायु गुणवत्ता बुलेटिन के अनुसार, 15 फरवरी को दिल्ली का औसत AQI 216 दर्ज किया गया था, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। CPCB के पूर्वानुमान के मुताबिक, 16 और 17 फरवरी को भी वायु गुणवत्ता ‘खराब’ श्रेणी में बनी रह सकती है, जबकि 18 फरवरी को इसके ‘बहुत खराब’ श्रेणी में पहुंचने की संभावना जताई गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली की हवा में आया यह सुधार फिलहाल अस्थायी है और मौसम व स्थानीय परिस्थितियों पर काफी हद तक निर्भर करता है।

    इस रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति भी सामने आई है। सूची में पहला स्थान Kuwait City को मिला है, जहां AQI 509 दर्ज किया गया। यह स्तर ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है और वहां PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों की मात्रा अत्यधिक पाई गई है, जिसका मुख्य कारण धूल भरी हवाएं और औद्योगिक उत्सर्जन बताया गया है। दूसरे और तीसरे स्थान पर क्रमशः तेल अवीव-याफो और यरुशलम जैसे शहर रहे, जहां भी वायु गुणवत्ता बेहद खराब दर्ज की गई।

    दिल्ली के संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के दिनों में हवा की गति बढ़ने, तापमान में बदलाव और कुछ हद तक स्थानीय प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण के कारण वायु गुणवत्ता में अस्थायी सुधार देखने को मिला है। इसके अलावा, निर्माण गतिविधियों पर निगरानी, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के कुछ प्रावधानों के प्रभाव को भी इस सुधार से जोड़ा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि जब तक प्रदूषण के स्थायी स्रोतों—जैसे वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक धुआं, पराली जलाने की समस्या और धूल नियंत्रण—पर दीर्घकालिक समाधान नहीं किया जाता, तब तक इस तरह के सुधार लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होंगे।

    दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए यह खबर कुछ हद तक सुकून देने वाली जरूर है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि AQI 143 या 216 जैसे स्तर भी स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं माने जा सकते। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और श्वसन संबंधी बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए यह स्थिति अब भी जोखिम भरी है। डॉक्टरों का सुझाव है कि ऐसे दिनों में बाहरी गतिविधियों को सीमित रखना, मास्क का उपयोग करना और घरों के भीतर वायु शुद्धिकरण के उपाय अपनाना आवश्यक है।

    कोलकाता की बात करें तो, वहां भी वायु गुणवत्ता में हल्का सुधार दर्ज किया गया है, जिसके चलते शहर 13वें स्थान पर पहुंचा है। हालांकि, कोलकाता में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में वाहनों की बढ़ती संख्या, औद्योगिक गतिविधियां और निर्माण कार्य शामिल हैं। मुंबई में समुद्री हवाओं के कारण प्रदूषण का स्तर अपेक्षाकृत नियंत्रित रहता है, लेकिन सर्दियों के महीनों में वहां भी AQI में बढ़ोतरी देखी जाती है। हालिया रिपोर्ट में मुंबई की स्थिति दिल्ली और कोलकाता की तुलना में बेहतर बताई गई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि महानगरों में प्रदूषण एक साझा चुनौती बन चुका है।

    नीतिगत स्तर पर, पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि दिल्ली के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची से बाहर होने को अंतिम उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय, इसे एक चेतावनी और अवसर दोनों के रूप में लेना होगा। चेतावनी इसलिए कि हालात किसी भी समय फिर से बिगड़ सकते हैं, और अवसर इसलिए कि इस सुधार को स्थायी बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना, इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को प्रोत्साहित करना, हरित क्षेत्र बढ़ाना और निर्माण गतिविधियों में धूल नियंत्रण के सख्त नियम लागू करना ऐसे कुछ उपाय हैं, जिन पर लगातार काम करने की जरूरत है।

    आने वाले दिनों में मौसम की स्थिति दिल्ली की वायु गुणवत्ता में अहम भूमिका निभाएगी। यदि हवा की गति कम हुई या तापमान में गिरावट आई, तो प्रदूषण के स्तर में फिर से बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में प्रशासन के लिए यह जरूरी होगा कि वह पहले से तैयार रहे और आवश्यकता पड़ने पर सख्त प्रतिबंध लागू करे। वहीं, नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना जन सहयोग के प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास सफल नहीं हो सकते।

     

    निष्कर्षतः, दिल्ली का दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची से बाहर होना एक सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन यह अभी मंजिल नहीं बल्कि एक पड़ाव है। जब तक वायु गुणवत्ता पूरे वर्ष संतोषजनक या अच्छी श्रेणी में नहीं पहुंचती, तब तक राहत की सांस लेना जल्दबाजी होगी। इस दिशा में सरकार, विशेषज्ञों और आम जनता—तीनों की साझा जिम्मेदारी बनती है कि वे मिलकर इस सुधार को स्थायी रूप दें और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा सुनिश्चित करें।

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