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    12वें लोक उत्सव का तीसरा दिन: संस्कृति, संघर्ष और समानता का जीवंत उत्सव

    2 months ago

    “लोक उत्सव जैसे मंच संस्कृति को जीवित रखने और महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने का माध्यम हैं।”-अरुणा रॉय*

    *“कलाकार जनता की आवाज़ की अभिव्यक्ति हैं, इसलिए सरकारें उनसे डरती हैं।” -सोहेल हाशमी*

    *“कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कलाकारों के जीवन, गरिमा और आजीविका का प्रश्न है।”- निखिल डे*

    28 फरवरी 2026, तिलोनिया, अजमेर

    तिलोनिया स्थित बेयरफुट में आयोजित 12वें लोक उत्सव 2026 का तीसरा दिन रंग, राग और प्रतिरोध की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया। पिछले दो दिनों में जहाँ उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराओं का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला और संविधान, सामूहिकता व संवाद के मूल्य केंद्र में रहे, वहीं तीसरे दिन लोक परंपरा ने अपने संघर्षशील और जीवंत स्वरूप को पूरी ऊर्जा के साथ प्रस्तुत किया।

    *लोक सुरों में गूँजी समानता और सांस्कृतिक स्वाभिमान की आवाज़*

    सुबह अम्मा का बगीचा कालबेलिया कलाकारों की मधुर और ऊर्जावान प्रस्तुति से गूंज उठा। मुरली और डफली की थाप पर होली और फाग के गीतों ने वातावरण को उत्सवमय बना दिया। दर्शक केवल श्रोता नहीं रहे, बल्कि इस सांस्कृतिक लय का हिस्सा बन गए।

    इस अवसर पर अरुणा रॉय ने कहा कि लोक उत्सव जैसे मंच हमारी सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखने के साथ-साथ उसे साझा करने और संरक्षित करने का माध्यम हैं। उन्होंने विशेष रूप से इस वर्ष बड़ी संख्या में महिला कलाकारों की भागीदारी को एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक परिवर्तन बताया। उनके अनुसार, प्रदर्शन के सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की उपस्थिति केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की दिशा में भी एक सशक्त कदम है।

    इसके बाद सुरनैय्या लंगाओं की प्रस्तुति ने श्रोताओं को राजस्थान की गहरी लोकधुनों से जोड़ा। सुरनाई की गूंज और पारंपरिक गायन शैली ने लोक संगीत की समृद्ध विरासत का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। कालबेलिया कलाकारों की पुनः प्रस्तुति ने ऊर्जा को बनाए रखा, जिसके बाद गोपाल राम और उनके दल ने सामूहिक चंग वादन से होली और फाग के गीतों को नई ऊँचाई दी। छह कलाकारों द्वारा चंग, एक मंजीरा और एक बांसुरी के साथ प्रस्तुत सामूहिक लय ने लोक संगीत की सामूहिकता और एकजुटता को साकार किया।

    डेरू नर्तकों ने अपनी सटीक, संतुलित और अनुशासित प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया। वरिष्ठ कलाकार घेवर खान और अनवर खान द्वारा डेरू नर्तकों का सम्मान किया जाना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद और परंपरा के सम्मान का प्रतीक बना। इसके पश्चात चकरी नृत्य की प्रस्तुति ने उत्सव को ऊर्जावान गति प्रदान की।

    इस अवसर पर प्रख्यात लोक कलाकार अनवर खान मांगनियार ने भी लोक उत्सव में शिरकत की और अपनी सशक्त एवं भावपूर्ण प्रस्तुति से पूरे परिसर को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि लोक कलाकार केवल प्रस्तुति देने वाले कलाकार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के जीवंत संरक्षक हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि प्रस्तुति के बाद भी अधिकांश कलाकार आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा से जूझते रहते हैं, और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कला के साथ-साथ कलाकार का जीवन भी सम्मान और स्थिरता के साथ आगे बढ़े।

    *तालियों से आगे: सम्मान, सुरक्षा और पहचान की लड़ाई*

    दोपहर में आयोजित “लोक एवं पारंपरिक कलाकार समुदायों के अधिकार, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा” विषयक कार्यशाला ने उत्सव को एक गंभीर और विचारोत्तेजक आयाम प्रदान किया। निखिल डे ने लोक और पारंपरिक कलाकारों के सामने उपस्थित चुनौतियों, सीमित संस्थागत सहयोग, सामाजिक सुरक्षा के अभाव और आर्थिक अस्थिरता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने रेखांकित किया कि सदियों से सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने वाले ये समुदाय आज भी बुनियादी सुरक्षा से वंचित हैं।

    कलाकारों ने खुलकर अपनी समस्याएँ साझा करते हुए भूमि अधिकार, पेंशन और रोजगार की गारंटी जैसी मूलभूत माँगों को प्रमुखता से रखा। यह स्पष्ट हुआ कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन, गरिमा और आजीविका से जुड़ा बुनियादी प्रश्न है।

    सोहेल हाशमी ने अपने संबोधन में कहा कि कलाकार जनता की आवाज़ की अभिव्यक्ति हैं, इसलिए सरकारें उनसे डरती हैं। उन्होंने कहा कि लोक कलाकार केवल मनोरंजनकर्ता नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और प्रतिरोध की जीवंत आवाज़ हैं। उन्हें केवल मंच और तालियों की नहीं, बल्कि अधिकार, सुरक्षा और संस्थागत संरक्षण की आवश्यकता है। सत्र के दौरान गूँजे प्रतिरोध के गीतों ने इस विचार को और सशक्त किया कि लोक परंपरा मात्र उत्सवधर्मिता नहीं, बल्कि न्याय, समानता और सम्मान की निरंतर आकांक्षा है।

    लोक कलाकारों के साथ लंबे समय से कार्य कर रहे *कुलदीप कोठारी* ने विभिन्न सत्रों का संचालन करते हुए संवाद को सुसंगत दिशा दी। इसी के साथ *श्वेता राव* और *पारस बंजारा* ने भी अलग-अलग सत्रों का प्रभावी संचालन किया। पूरे आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिभागियों, कलाकारों, शोधकर्ताओं औ र सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भागीदारी की। सभी ने गंभीरता से इस बात पर चिंतन किया कि लोक कलाओं को संरक्षित करते हुए कलाकारों के जीवन स्तर को कैसे बेहतर बनाया जाए और उन्हें सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

    12वें लोक उत्सव का तीसरा दिन इस बात का प्रमाण बना कि यह मंच संस्कृति और संविधान, परंपरा और परिवर्तन, कला और अधिकार इन सभी के बीच सेतु का कार्य कर रहा है। बड़ी संख्या में महिला कलाकारों की भागीदारी और देशव्यापी सहभागिता ने इस वर्ष के उत्सव को एक नई दिशा और व्यापक आयाम प्रदान किया है।

    लोक उत्सव आगे भी इसी ऊर्जा, समावेशिता और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ संस्कृति को जनसरोकारों से जोड़ते हुए अपनी यात्रा जारी रखेगा।

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