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    आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विवाह आयु और जनसंख्या संतुलन पर रखे विचार

    3 months ago

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जनसंख्या, परिवार व्यवस्था, रोजगार और सामाजिक संतुलन से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे। यह कार्यक्रम आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े लोग शामिल हुए।

    कार्यक्रम के दौरान संवाद सत्र में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देते हुए भागवत ने कहा कि देश में जनसंख्या असंतुलन के पीछे तीन प्रमुख कारण सामने आते हैं। उनके अनुसार इनमें धार्मिक रूपांतरण, अवैध घुसपैठ और जन्म दर में लगातार गिरावट शामिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन मुद्दों को केवल आंकड़ों तक सीमित न रखकर व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।

    विवाह की आयु और परिवार संरचना पर दृष्टिकोण

    विवाह की उपयुक्त आयु को लेकर पूछे गए सवाल पर मोहन भागवत ने कहा कि चिकित्सा विशेषज्ञों की राय में 19 से 25 वर्ष की आयु के बीच विवाह करने से माता-पिता और बच्चों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि एक से अधिक संतान होने से परिवार में संतुलन बना रहता है और बच्चों में सामाजिक समन्वय बेहतर होता है।

    भागवत ने कहा कि तीन संतान वाला परिवार दीर्घकाल में पारिवारिक स्थिरता में सहायक हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह और संतान से जुड़े निर्णय पूरी तरह व्यक्तिगत होते हैं और इन्हें किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने इसे सामाजिक विमर्श का विषय बताया, न कि बाध्यता का।

    घटती जन्म दर पर चिंता

    जनसंख्या के आंकड़ों पर बात करते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि जनसंख्या विशेषज्ञों के अनुसार यदि कुल प्रजनन दर एक निश्चित स्तर से नीचे चली जाती है, तो समाज के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इनमें वृद्ध आबादी का बढ़ना और कार्यशील जनसंख्या में कमी जैसे मुद्दे शामिल हैं।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान में देश की औसत प्रजनन दर उस स्तर के करीब पहुंच रही है, जिसे संतुलन के लिए आवश्यक माना जाता है। हालांकि, कुछ राज्यों में जन्म दर अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर फिलहाल संतुलन बना हुआ है।

    भागवत ने जनसंख्या नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि 2.1 की प्रजनन दर को जब व्यवहारिक रूप से देखा जाता है, तो यह तीन संतान की अवधारणा की ओर संकेत करती है। उन्होंने फिर दोहराया कि यह वैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित चर्चा है, न कि किसी प्रकार का निर्देश।

    धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन

    धार्मिक रूपांतरण के मुद्दे पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि देश में आस्था की स्वतंत्रता संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई है। लेकिन यदि किसी प्रकार के दबाव, प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से धर्म परिवर्तन कराया जाता है, तो वह सामाजिक संतुलन के लिए उचित नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग स्वेच्छा से अपनी मूल आस्था की ओर लौटना चाहते हैं, उनके लिए मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह पूरी तरह स्वैच्छिक प्रक्रिया होनी चाहिए और इसमें किसी प्रकार का दबाव नहीं होना चाहिए।

    घुसपैठ और रोजगार से जुड़े मुद्दे

    घुसपैठ के विषय पर भागवत ने कहा कि यह एक गंभीर प्रशासनिक विषय है, जिस पर सरकार को निरंतर और व्यापक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि विभिन्न सत्यापन अभियानों के माध्यम से कुछ मामलों में गैर-नागरिकों की पहचान की गई है और उसके अनुरूप कार्रवाई की जा रही है।

    उन्होंने यह भी कहा कि संघ से जुड़े स्वयंसेवक कई बार संदिग्ध मामलों की जानकारी प्रशासन को देते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय संबंधित सरकारी एजेंसियों द्वारा ही लिया जाता है।

    रोजगार के संदर्भ में उन्होंने कहा कि समाज में कार्य के प्रति प्राथमिकताएं बदलने से कुछ क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी उत्पन्न हो गई है। ऐसे में यह आवश्यक है कि रोजगार के अवसर सबसे पहले देश के नागरिकों को मिलें, चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय से हों।

    अर्थव्यवस्था, तकनीक और रोजगार

    मोहन भागवत ने तकनीकी विकास और रोजगार के संबंध पर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि नई तकनीकों, जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, का विरोध नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन उनका उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि रोजगार के अवसर बढ़ें, न कि घटें।

    उन्होंने “जनता द्वारा उत्पादन” की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि केवल बड़े पैमाने पर उत्पादन पर निर्भरता से सामाजिक असंतुलन पैदा हो सकता है। उनके अनुसार बेरोजगारी सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है।

    अर्थव्यवस्था के मूल्यांकन को लेकर उन्होंने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) समाज के वास्तविक योगदान को पूरी तरह नहीं दर्शाता। विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन इसमें शामिल नहीं होता। उन्होंने गुणात्मक और मात्रात्मक, दोनों प्रकार के योगदान को महत्व देने की आवश्यकता बताई।

    समापन संदेश

    कार्यक्रम के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि जनसंख्या, परिवार, रोजगार और सामाजिक स्थिरता जैसे विषय आपस में जुड़े हुए हैं। इन पर संतुलित, संवेदनशील और जिम्मेदार चर्चा की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे इन मुद्दों पर पूर्वाग्रह के बजाय तथ्य और संवाद के आधार पर विचार करें।

     

    यह कार्यक्रम आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों की श्रृंखला का हिस्सा था, जिसमें सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों पर संवाद को केंद्र में रखा गया।

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