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    इंद्रिय से विषयों के संबंध का आधार बनता है षड्विधसन्निकर्ष : प्रो० बीना अग्रवाल

    1 hour ago

    भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्‌ एवं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित सप्त दिवसीय वैशेषिकदर्शनाधारित कार्यशाला के छठे दिन विषय विशेषज्ञ के रूप में राज० वि० वि० जयपुर परिसर की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो० बीना अग्रवाल उपस्थित रहीं। आपने बताया कि जब भी किसी विषय का प्रत्यक्ष किया जाता है तो जिस विषय को द्रष्टा देखता है उस विषय के साथ उसकी नेत्रेन्द्रिय का जो संपर्क होता है उसीको वैशेषिक दर्शन में सन्निकर्ष नाम से जाना जाता है, यह सन्निकर्ष छ: प्रकार का माना गया है- संयोग,‌ संयुक्त समवाय, संयुक्त समवेत समवाय, समवाय, समवेत समवाय एवं विशेषण विशेष्य भाव‌ सन्निकर्ष। घट, घटरूप, घटरूपत्व, शब्द, शब्दत्व नीलघट आदि के लौकिक उदाहरण से आपने षड्विध सन्निकर्ष को समझाया।

    कार्यक्रम की सहसंयोजक डॉ० रानी दाधीच ने बताया कि प्रतिभागियों ने समझा कि पदार्थो में रहने वाले गुण अनेक संबंधों से रहते है। व्याप्य-व्यापक, धर्म-धर्मी, आदि संबंधी देशिक व कालिक व्याप्यवृत्तित्व-अव्याप्यवृत्तित्व सम्बन्ध भी प्रतिभागियों ने सूक्ष्मतया समझा।

    कार्यशाला के संयोजक डॉ० सच्चिदानंद स्नेही ने बताया कि किसी भी पदार्थ का जब प्रत्यक्ष करते हैं तो वहां चार प्रक्रियाएं स्वत: समकाल में ही हो जाती हैं। क्रिया, क्रिया से संयोग, पूर्वदेश से विभाग, उत्तरदेश की प्राप्ति इन चारों की प्राप्ति से ही ‘यह घट है’, ‘यह पट है’ इस प्रकार का धारावाहिक ज्ञान उत्पन्न होता है जिससे प्रत्यक्ष होता है।

    द्वितीय सत्र के विशेषज्ञ प्रो० श्री कृष्ण शर्मा ने बताया कि वह अपने आप को सौभाग्यशाली मानते हैं कि पाश्चात्य तर्कशास्त्र एवं भारतीय तर्कशास्त्र के उद्भट विद्वान प्रो० पाही के साथ चर्चाओं तथा चिंतन सत्रों के माध्यम से उनका मंतव्य नजदीक से जानने तथा समझने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रो० शर्मा ने बताया कि प्रो० पाही प्रगतिशील विचारधारा के विद्वान है, आधुनिक समय में उनके भिन्न दृष्टिकोणों को समाज में प्रचारित व प्रसारित करने की दृष्टि से इस प्रकार की पद्धतिमूलक कार्यशाला अत्यंत सराहनीय कदम है। भासर्वज्ञ एवं रघुनाथ शिरोमणि के ग्रंथों का पुरजोर समर्थन प्रो० पाही के ग्रंथ में दृष्टिगोचर होता है प्रोफेसर पाही की दृष्टि से पृथकत्व, परत्व, अपरत्व आदि गुणों के अस्तित्व तथा अनस्तित्व का सू क्ष्म विवेचन आपने अपने उद्बोधन में स्पष्ट किया।

    कार्यशाला के संयोजक डॉ० सच्चिदानंद स्नेही ने बताया कि छठे दिन के दो सत्रों में व्याख्यान तथा दो सत्रों में प्रतिभागियों द्वारा शोधपत्रों की प्रस्तुति दी गई, कार्यशाला में सीखे गए विषयों का प्रतिपादन प्रतिभागियों द्वारा किया गया, यह आउटकम बेस्ड लर्निंग का अनुपम उदाहरण है। लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली के आचार्य महानंद झा तथा जयपुर परिसर के सह निदेशक (प्रशासन) प्रोफेसर शीशराम डॉ० चेतन कुमार, डॉ० राजेश अधिकारी सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।

     

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