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    मेहन्दू और भूणा के मिलन तथा देवनारायण से उनकी भेंट की विस्तृत कहानी: षड्यंत्र की बिसात, राजा बिसलदेव की चाल

    18 hours ago

    कहानी तब शुरू होती है जब अजमेर के राजा बिसलदेव के मन में मेहन्दू के प्रति ईर्ष्या और भय की ज्वाला धधकने लगती है। कारण था मेहन्दू द्वारा बिजौरी को आभूषण भेंट करना। बिसलदेव को लगने लगा कि सवाई भोज का यह प्रतापी पुत्र उनके सिंहासन के लिए कांटा बन सकता है।

    मेहन्दू को अपने रास्ते से हटाने के लिए बिसलदेव ने राण के राव के साथ मिलकर एक खूनी साजिश रची। बिसलदेव ने राव को पत्र लिखा कि मेहन्दू मेरी आंखों में खटक रहा है, इसे खत्म करना होगा। प्रत्युत्तर में राव ने भी अपनी चिंता जताई कि उनके पास रह रहा भूणा भी किसी 'काले नाग' से कम नहीं है, जो बड़ा होकर अपने पिता (बगड़ावतों) की मृत्यु का बदला ले सकता है। दोनों ने मिलकर योजना बनाई कि मेहन्दू को शिकार के बहाने 'रोहड्यां के बीहड़' में भेजा जाए, जहाँ उसका अंत किया जा सके।

    शिकार का झांसा और अपनों का सामना

    बिसलदेव ने मेहन्दू को यह कहकर फुसलाया कि मेवाड़ की धरती पर शेरों का आतंक बढ़ गया है और प्रजा की रक्षा केवल वही कर सकते हैं। वीर मेहन्दू अपने ५०० घुड़सवारों के साथ शिकार के लिए निकल पड़े। दूसरी ओर, राव ने भूणा को मेहन्दू के खिलाफ उकसाया। भूणा को यह नहीं पता था कि जिस व्यक्ति को वह 'अतिक्रमणकारी' समझकर मारने जा रहा है, वह असल में उसका सगा भाई है।

    जब भूणा ने युद्ध का संदेश भेजा, तो दूरदर्शी मेहन्दू भांप गए कि यह बाबासा (बिसलदेव) की कोई गहरी चाल है। उन्होंने युद्ध के बदले प्रेम का संदेश भेजा और कहा— "मैं तो अपने भाई से गले मिलने और साथ मिलकर माता की पूजा करने का इंतजार कर रहा हूं।"

    रक्त का बोध: जब भूणा को पता चला सच

    भूणा के मन में दुविधा थी। तब उनके सारथी और सलाहकार बन्ना चारण ने सत्य का पर्दा हटाया। बन्ना ने बताया कि जिसे वह अपना पिता (राव) समझ रहे हैं, उन्होंने ही बगड़ावतों का विनाश किया था। भूणा असल में सवाई भोज के वंशज और मेहन्दू के भाई हैं। साक्ष्य के तौर पर उनकी कटी हुई अंगुली का रहस्य बताया गया, जिसे राव ने अपना खून मिलाकर उन्हें गोद लेने का नाटक किया था।

    सत्य जानकर भूणा का हृदय परिवर्तन हो गया। वह तुरंत मेहन्दू से मिलने पहुंचे। वर्षों बाद जब दो भाई गले मिले, तो रोहड्यां का जंगल इस मिलन का साक्षी बना। मेहन्दू ने भूणा को परिवार के गौरव, लूटे गए खजाने और कैद में पड़ी 'बोर घोड़ी' की दुर्दशा के बारे में बताया।

    खेड़ा चौसला में पुनर्मिलन और राजतिलक

    अपनों की पहचान होने के बाद मेहन्दू सीधे 'खेड़ा चौसला' पहुंचे। यहाँ उनका सामना देवनारायण से हुआ। यह मिलन केवल दो भाइयों का नहीं, बल्कि एक बिखरे हुए साम्राज्य की शक्ति के एकत्रीकरण का प्रतीक था।

     * सम्मान और सत्ता: मेहन्दू बड़े भाई थे, इसलिए साडू माता ने ममता और न्याय का परिचय देते हुए उन्हें राजगद्दी सौंपी और उनका राजतिलक किया।

     * संगठन की शक्ति: परिवार को और मजबूत करने के लिए तेजा के पुत्र मदनो को भी बुलावा भेजा गया।

     * संकल्प: भाइयों ने मिलकर शपथ ली कि वे अपने पूर्वजों के सम्मान को वापस लौटाएंगे और अन्याय के विरुद्ध लड़ेंगे।

     

    यह वृत्तांत हमें सिखाता है कि राजनीति और षड्यंत्र चाहे कितने भी गहरे क्यों न हों, रक्त के रिश्ते और सत्य की शक्ति अंततः विजयी होती है। मेहन्दू और भूणा का मिलाप राजस्थान की लोक संस्कृति में 'भ्रातृ प्रेम' की एक अमर मिसाल है।

     

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