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    केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर में पश्चिम क्षेत्रीय रूपक महोत्सव 2026 का भव्य शुभारम्भ

    8 hours ago

    11 विश्वविद्यालयों के 200 से अधिक छात्र-छात्राएँ ले रहे हैं भाग

    जयपुर। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर में पश्चिम क्षेत्रीय रूपक महोत्सव–2026 का भव्य शुभारम्भ दिनांक 28 जनवरी 2026 को प्रातः 10:30 बजे हुआ। समारोह के मुख्यातिथि पियाल भट्टाचार्य, चिदाकाश कलालय, दिव्य कला केन्द्र, कोलकाता रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्रीशदेव पुजारी, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, संस्कृत भारती उपस्थित रहे। सारस्वत अतिथि प्रो. हरेकृष्ण शतपथी, पूर्व कुलपति, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरूपति रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जयपुर परिसर के निदेशक प्रो. लोकमान्य मिश्र ने की।

    कार्यक्रम के संयोजक एवं सह-निदेशक (शैक्षणिक) प्रो. बोधकुमार झा ने रूपक महोत्सव का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए बताया कि पश्चिम क्षेत्रीय रूपक महोत्सव में 11 विश्वविद्यालयों एवं संस्कृत महाविद्यालयों के 200 से अधिक छात्र-छात्राएँ भाग ले रहे हैं। इस महोत्सव में भोपाल, लखनऊ, नासिक, जयपुर, रामटेक, मैनपुरी, वृन्दावन, दिल्ली, पलवल (बघौला), भीलवाड़ा सहित अनेक संस्थानों की सहभागिता रही है। सारस्वत अतिथि प्रो. हरेकृष्ण शतपथी ने अपने उद्बोधन में कहा कि नाट्य-रागादि स्वस्थ परम्पराओं की पुनर्स्थापना करते हैं तथा समाज के सर्वांगीण मंगल की कामना को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी के प्रति आभार भी प्रकट किया। जयपुर परिसर के निदेशक प्रो. लोकमान्य मिश्र ने अतिथियों का अभिनन्दन करते हुए कहा कि संस्कृत नाट्य-प्रस्तुतियाँ हमारी सांस्कृतिक चेतना की संवाहक हैं तथा विद्यार्थियों में सृजनात्मकता और अनुशासन का विकास करती हैं। विशिष्ट अतिथि श्रीशदेव पुजारी ने संस्कृत के विविध उन्नयन कार्यों की जानकारी देते हुए भारत के विश्वगुरुत्व में संस्कृत के गहन योगदान को रेखांकित किया।

    मुख्यातिथि पियाल भट्टाचार्य ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों को उदाहरणों सहित स्पष्ट किया। इस अवसर पर चिदाकाश कलालय द्वारा प्रस्तुत पूर्वरंग की भव्य प्रस्तुति ने दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित किया, जो उनके मार्गदर्शन में अत्यन्त प्रभावशाली रही।

    *पहले दिन इन नाटकों की हुई प्रस्तुति*

    “दृष्टि” – कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक नागपुर द्वारा मानव जीवन में विवेक, संवेदना एवं आत्मबोध के महत्व को सशक्त संवादों और भावपूर्ण अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।

    “विवाहविजय” श्री एकरसानन्द आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, मैनपुरी

    नाटक में विवाह संस्कार की पवित्रता एवं सामाजिक मूल्यों का सजीव चित्रण किया गया।

    “संक्षिप्त मुद्राराक्षस” – केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर राजनीतिक कूटनीति और राष्ट्रहित पर आधारित इस रूपक में आचार्य चाणक्य के रणनीतिक कौशल का प्रभावी मंचन किया गया।

    “माघगाथा” श्रीमती लाडदेवी पंचोली संस्कृत महाविद्यालय, बरून्दनी, जिला–भीलवाड़ा ने कवि माघ की काव्य-परम्परा और संस्कृत साहित्य की गरिमा को ललित भावाभिनय माध्यम से प्रस्तुत किया ।

    “सा विद्या या विमुक्तये” – हरियाणा संस्कृत विद्यापीठ, बघौला, जिला–पलवल ने इस नाटक में शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य—ज्ञान द्वारा मुक्ति को दार्शनिक भावभूमि के साथ प्रभावी ढंग से प्रतिपादित किया । “नलदमयन्तीयम्” – केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नासिक परिसर की प्रस्तुति में महाभारत की नल-दमयन्ती कथा पर आधारित रूपक में प्रेम, त्याग, धैर्य एवं धर्म का मार्मिक चित्रण किया गया। उद्घाटन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन सह-निदेशक (प्रशासन) प्रो. शीशराम ने किया। इस अवसर पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय, पूर्व निदेशक प्रो. वाई. एस. रमेश, प्रो. शिवानी वी., प्रो. विष्णुकांत पाण्डेय, प्रो. श्रीधर मिश्र, प्रो. कृष्णा शर्मा, डॉ. कैलाश सैनी, रूपक महोत्सव सह संयोजक डॉ राकेश जैन डॉ. नमिता मित्तल, डॉ. विनोद कुमार, दीपक भारद्वाज मनोज मिश्रा,डॉ.रेखा शर्मा,नरेश सिंह ,सहित विश्वविद्यालय के अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन शिवनारायण महर्षि एवं संस्कृति चतुर्वेदी ने किया।

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