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    यातना, यौन हिंसा और अराजकता: भारत से शेख़ हसीना का पहला विस्फोटक संबोधन, बांग्लादेश की अंतरिम सत्ता पर सीधा हमला

    4 days ago

    कभी-कभी निर्वासन में दिया गया भाषण सत्ता में रहते हुए दिए गए दर्जनों भाषणों से ज़्यादा भारी पड़ता है। भारत से दिया गया बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का ताज़ा संबोधन उसी श्रेणी में आता है जहाँ शब्द सिर्फ़ आरोप नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक तंत्र पर अभियोग जैसे सुनाई दिए।

    अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में शेख़ हसीना ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश आज यातना, यौन हिंसा, अल्पसंख्यकों पर हमलों और क़ानूनहीनता के दौर से गुजर रहा है। उनका सीधा निशाना अंतरिम प्रशासन के प्रमुख मुहम्मद यूनुस थे, जिन पर उन्होंने निष्पक्ष चुनाव कराने में विफल रहने का आरोप लगाया।

     

    लोकतंत्र बचाओ: एक भाषण, कई संदेश

    यह संबोधन बांग्लादेश के आम चुनाव से ठीक पहले आया है, जो बारह फ़रवरी को प्रस्तावित हैं। लेकिन इस चुनाव में शेख़ हसीना की पार्टी आवामी लीग  को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है।
    यानी चुनाव हो रहा है, लेकिन सबसे बड़ी विपक्षी ताक़त मैदान से बाहर है।

    इसी पृष्ठभूमि में हसीना का संदेश और भी तीखा हो जाता है। उन्होंने बांग्लादेश के नागरिकों से अंतरिम सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की अपील की और कहा कि यह प्रशासन न तो लोकतांत्रिक है और न ही जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम।

     

    अल्पसंख्यक, महिलाएँ और डर का माहौल

    अपने संबोधन में हसीना ने सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन की बात नहीं की, बल्कि ज़मीनी हालात पर ज़ोर दिया। उनका कहना था कि देश में धार्मिक अल्पसंख्यक, महिलाएँ और कमज़ोर तबके सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं।

    उन्होंने मांग की कि इन वर्गों की सुरक्षा के लिए “अटूट और ठोस गारंटी” दी जाए। यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश से हिंसा और अव्यवस्था की लगातार ख़बरें सामने आ रही हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा केवल मानवाधिकार का नहीं, बल्कि चुनावी वैधता का भी है क्योंकि डर के माहौल में कोई भी चुनाव निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

     

    संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग

    शेख़ हसीना यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से भी अपील की कि उनकी सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश में जो घटनाक्रम हुआ है, उसकी नई और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच कराई जाए।

    यह मांग बताती है कि हसीना अब इस लड़ाई को सिर्फ़ राष्ट्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना चाहती हैं।
    यह रणनीति पहले भी कई निर्वासित नेताओं ने अपनाई है जब घरेलू संस्थानों पर भरोसा टूट जाता है, तब अंतरराष्ट्रीय निगरानी की मांग तेज़ हो जाती है।

     

    यह सिर्फ़ भाषण नहीं, राजनीतिक दांव है

    शेख़ हसीना का यह संबोधन भावनात्मक ज़रूर है, लेकिन पूरी तरह राजनीतिक गणना से भरा हुआ भी है। उन्होंने एक तरफ़ हिंसा खत्म करने की अपील की, दूसरी तरफ़ जनता से अंतरिम सत्ता के ख़िलाफ़ खड़े होने का आह्वान किया। यह संतुलन आसान नहीं होता क्योंकि हर तीखा बयान देश को और अस्थिर भी कर सकता है।

     

    बड़ा सवाल: बांग्लादेश किस मोड़ पर है?

    यह पूरा घटनाक्रम एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है| क्या बिना प्रमुख विपक्ष के चुनाव लोकतांत्रिक कहे जा सकते हैं?
    और क्या अंतरिम सरकार के तहत हुआ चुनाव बांग्लादेश को स्थिरता देगा या और विभाजन?

    शेख़ हसीना के शब्दों में यह संघर्ष सत्ता का नहीं, लोकतंत्र के अस्तित्व का है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि बांग्लादेश इस समय ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर कदम देश को या तो स्थिरता की ओर ले जाएगाया और गहरे संकट की ओर। और शायद यही वजह है कि भारत से दिया गया यह भाषण सिर्फ़ सुना नहीं जा रहा, बल्कि गंभीरता से तौला भी जा रहा है

     

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