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    यह मंच राजनीति के लिए नहीं है : कांग्रेस बैठक से दूरी पर शशि थरूर का संतुलित रुख़ और उसके गहरे राजनीतिक अर्

    4 days ago

     

    भारतीय राजनीति में अक्सर चुप्पी को कमजोरी समझ लिया जाता है। लेकिन कुछ नेताओं के लिए चुप रहना भी एक सोची-समझी राजनीतिक भाषा होती है। कांग्रेस के सांसद शशि थरूर का हालिया रुख़ इसी श्रेणी में आता है जहाँ उन्होंने सवालों का जवाब दिया, लेकिन उस तरीके से, जिसने सवाल पूछने वालों को भी रुककर सोचने पर मजबूर कर दिया।

    दिल्ली में हुई एक अहम कांग्रेस बैठक में उनकी अनुपस्थिति पर जब सार्वजनिक मंच से सवाल उठे, तो थरूर ने साफ कर दिया यह चर्चा का सही स्थान नहीं है।

     

    साहित्य के मंच से राजनीति को अलग रखने की स्पष्ट कोशिश

    केरल साहित्य उत्सव में बोलते हुए थरूर ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे पार्टी के आंतरिक मामलों को सार्वजनिक बहस का हिस्सा नहीं बनाएंगे।
    उनका रुख़ सीधा था, लेकिन टकराव से दूर —

     

    “मैं यहाँ किसी प्रकार की राजनीतिक घोषणा करने नहीं आया हूँ। यह साहित्य का मंच है। जो भी विषय हैं, वे मुझे अपनी पार्टी के नेतृत्व से सीधे उठाने चाहिए, न कि सार्वजनिक मंच पर।”

     

    आज के समय में, जब हर मंच राजनीतिक बयानबाज़ी में बदल जाता है, वहाँ यह कहना कि हर बात हर जगह नहीं कही जानी चाहिए अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।

     

    अनुपस्थिति का प्रश्न इतना बड़ा क्यों बना?

    असल मुद्दा केरल विधानसभा चुनावों की तैयारी से जुड़ा था। इसी सिलसिले में दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक रखी गई थी, जिसमें राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से चर्चा होनी थी।

    केरल से कांग्रेस के सबसे पहचाने जाने वाले चेहरों में शुमार थरूर का इस बैठक में न होना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया।
    थरूर ने स्पष्ट किया कि उनकी पहले से तय व्यस्तता थी और इसकी जानकारी उन्होंने पार्टी नेतृत्व को पहले ही दे दी थी।

    लेकिन राजनीति में तथ्य से ज़्यादा तेज़ी से धारणाएँ फैलती हैं और यही यहाँ भी हुआ।

     

    तभेद नहीं, दृष्टिकोण

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा और ऑपरेशन सिंदूर पर थरूर के विचारों को लेकर भी चर्चा हुई।
    उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने संसद में पार्टी के आधिकारिक रुख़ का उल्लंघन नहीं किया है।

    पहलगाम की घटना के बाद लिखे गए अपने लेख का ज़िक्र करते हुए थरूर ने कहा कि उनका मानना था कि ऐसे हमले को बिना जवाब छोड़ा नहीं जा सकता और ठोस कार्रवाई आवश्यक थी

    यह वही बिंदु है, जहाँ पार्टी अनुशासन और राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन साधना सबसे कठिन हो जाता है।

    कभी-कभी राजनीति में सबसे असरदार संदेश वही होता है, जो संयम और विवेक के साथ दिया जाए और यह पूरा प्रसंग उसी की एक मिसाल बनकर सामने आता है।

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