Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    न्याय और पराक्रम का उद्घोष: सावर विजय और बुंली घोड़ी की ससम्मान वापसी

    3 months ago

    विशेष कवर स्टोरी: लोकगाथा का वीर रस से ओतप्रोत अध्याय

    देवनारायण परंपरा की गौरवशाली गाथा में एक नया अध्याय तब जुड़ता है जब देवनारायण ने न केवल अपने परिवार की खोई हुई धरोहर को वापस प्राप्त किया, बल्कि अन्यायियों को उनके कर्मों का दंड भी दिया। यह कहानी वीरता, रणनीति और सटीक न्याय की अनूठी मिसाल है।

    मैदान-ए-जंग: दिया का मानमर्दन और ऐतिहासिक प्रतिज्ञा

    सावर के टिमक्या तालाब के तट पर देवनारायण और ठाकुर दिया का सामना हुआ। देवनारायण ने अपने प्रहार से दिया के अहंकार को चूर-चूर कर दिया। अपने भाले के एक ही सटीक वार से उन्होंने दिया के दांत तोड़ दिए, जिससे वह असहाय होकर घोड़े से गिर पड़ा। यहाँ देवनारायण ने अपनी महानता का परिचय देते हुए कहा कि वे निहत्थे और घायल पर वार नहीं करेंगे। उन्होंने दिया को चेतावनी दी कि उसका अंतिम हिसाब 'राताकोट' के रणक्षेत्र में होगा और बुंली घोड़ी को अपने संरक्षण में ले लिया।

    सांखली घाटी का रण: उत्तम कंवर का पतन

    जब दिया का पुत्र उत्तम कंवर शिकार से लौटा और उसे पूरी घटना का पता चला, तो वह रक्त रंजित प्रतिशोध की भावना से देवनारायण का पीछा करने लगा। सांखली घाटी के दुर्गम मोड़ पर उसने देवनारायण का मार्ग रोका। दोनों योद्धाओं के बीच भीषण संघर्ष हुआ। इस युद्ध में अधर्म का साथ देने वाले उत्तम कंवर को पराजय का सामना करना पड़ा और वह वीरगति को प्राप्त हुआ। देवनारायण ने विजय के शंखनाद के साथ अपनी यात्रा जारी रखी।

    खेड़ा चौसला में विजय उत्सव और राज्याभिषेक

    जैसे ही देवनारायण और छोछू भाट बुंली घोड़ी को लेकर पैतृक निवास खेड़ा चौसला पहुँचे, पूरे क्षेत्र में हर्ष की लहर दौड़ गई। साडू माता ने ममता और गर्व के साथ घोड़ी की आरती उतारी, वहीं पीपलदे ने विजय के प्रतीक स्वरूप देवनारायण का पूजन किया। इस गौरवमयी उपलब्धि के बाद साडू माता ने देवनारायण को 'राज का स्वामी' घोषित कर दिया, लेकिन न्याय की गरिमा बनाए रखने के लिए फैसला सुनाने का अधिकार मेहन्दू को सौंपा।

    रायमल पटेल का अहंकार और नीलागर का स्वाभिमान

    एक समय जब क्षेत्र में चारे का संकट गहराया, तब देवनारायण का प्रिय नीलागर घोड़ा चांपानेरी के पटेल रायमल के खेतों में प्रवेश कर गया। पटेल ने उद्दंडता दिखाते हुए घोड़े को बंदी बना लिया। इसकी सूचना मिलते ही देवनारायण ने स्वयं जाकर अपने अश्व को मुक्त कराया और रायमल पटेल को बंदी बनाकर अपने दरबार में पेश किया।

    अनोखा दंड और न्याय की मिसाल

    न्याय सभा में भांगी ने रायमल पटेल की गलती के लिए एक ऐतिहासिक सजा सुनाई। पटेल को नीलागर घोड़े के पैरों में 'गुड़बेल' के साथ बांधने का आदेश दिया गया। जैसे-जैसे घोड़ा अपने कदम बढ़ाता, अहंकारी पटेल को भी जमीन पर ठोकरें खानी पड़तीं। यह सजा इस बात का प्रतीक थी कि शक्ति का दुरुपयोग करने वाले को अंततः पैरों की धूल बनना पड़ता है।

     

    Click here to Read More
    Previous Article
    कलश यात्रा निकाली गई, विराट हिंदू सम्मेलन आयोजित
    Next Article
    पुस्तकालय सोच को दिशा, सपनों को उड़ान और व्यक्तित्व को गहराई देगा- प्रोफ़ेसर जनक सिंह मीणा

    Related देश Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment