Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    पिलोदा का पतन: देवनारायण के प्रतिशोध की ज्वाला में भस्म हुआ गढ़, राजा रतन सिंह को मिला कुम्हार का जीवन

    3 months ago

    गोठां/पिलोदा। बगड़ावतों के वंशज देवनारायण और राण के शासकों के बीच चल रहा संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। ताज़ा घटनाक्रम में देवनारायण ने अपने भाइयों के साथ मिलकर पिलोदा के अभेद्य दुर्ग पर भीषण आक्रमण किया और उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। इस युद्ध ने न केवल पिलोदा की सैन्य शक्ति को समाप्त किया, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई में देवनारायण का पलड़ा भारी कर दिया है।

    जय मंगला हाथी की वापसी और युद्ध की भूमिका

    इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब भूणा पिलोदा से जय मंगला और गज मंगला हाथियों सहित बगड़ावतों का लूटा हुआ धन वापस लेकर राण पहुँचे। भूणा ने चालाकी से छोछू भाट के साथ यह सारा साजो-सामान और हाथी गोठां भिजवा दिए। 11 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब जय मंगला हाथी गोठां की धरती पर पहुँचा, तो माता साडू ने हर्षोल्लास के साथ उसकी आरती उतारी।

    इसी बीच, भूणा ने देवनारायण को एक गुप्त पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने रणनैतिक सलाह दी कि राण को जीतने से पहले पिलोदा को फतह करना अनिवार्य है। पत्र में स्पष्ट किया गया कि पिलोदा राण का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है।

    रणक्षेत्र में देवनारायण का पराक्रम

    पत्र मिलते ही देवनारायण ने मेदू और मदन सिंह के साथ पिलोदा कूच की घोषणा की। सुरक्षा की दृष्टि से भांगी को गोठां की रखवाली की जिम्मेदारी सौंपी गई, हालांकि वे स्वयं युद्ध में जाने को आतुर थे। पिलोदा की सीमा पर जब देवनारायण का सामना वहां के चरवाहों से हुआ, तो उनकी उदंडता ने युद्ध की चिंगारी को भड़का दिया।

    पिलोदा के राजा रतन सिंह अपनी सत्तर हजार की विशाल सेना लेकर मैदान में उतरे। उन्होंने देवनारायण की आयु का उपहास उड़ाते हुए उन्हें वापस लौट जाने की चेतावनी दी। प्रत्युत्तर में देवनारायण ने रतन सिंह की मूल पहचान पर प्रहार करते हुए उन्हें शस्त्र त्याग कर मिट्टी के बर्तन बनाने की सलाह दी।

    अग्नि की भेंट चढ़ा पिलोदा

    युद्ध शुरू होते ही मेदू के रण-कौशल ने पिलोदा की सेना के छक्के छुड़ा दिए। देखते ही देखते मेदू ने पूरे पिलोदा नगर को आग के हवाले कर दिया। देवनारायण की शक्ति के आगे रतन सिंह की सत्तर हजार की फौज ताश के पत्तों की तरह ढह गई।

    देवनारायण ने इस युद्ध में रतन सिंह का वध करने के बजाय उन्हें एक अनोखा दंड दिया। उन्होंने रतन सिंह को युद्ध का त्याग कर उनके पुश्तैनी कार्य 'मिट्टी के बर्तन' बनाने का आदेश दिया। दंड स्वरूप उन्हें घोड़े के स्थान पर गधा और शस्त्रों के स्थान पर मिट्टी चाक थमा दिया गया।

    राण के दरबार में खलबली

    पिलोदा से उठता हुआ धुंआ जब राण के महलों तक पहुँचा, तो वहां के राव असमंजस में पड़ गए। भूणा ने व्यंग्यात्मक लहजे में राव को भ्रमित करते हुए कहा कि वहां दावत की तैयारियां चल रही हैं। लेकिन जल्द ही संदेशवाहक ने पिलोदा के सर्वनाश की पुष्टि कर दी।

    जब राव ने भूणा से इस स्थिति का न्याय करने को कहा, तो भूणा ने स्पष्ट कर दिया कि अब न्याय केवल 'भाले की नोक' से होगा। भूणा के कड़े तेवर देखकर राव भयभीत होकर अपने महलों की ओर पलायन कर गए।

    प्रमुख बिंदु:

     * ऐतिहासिक वापसी: 11 साल बाद बगड़ावतों का वैभव (हाथी) वापस लौटा।

     * रणनीतिक जीत: राण पर सीधे हमले से पहले पिलोदा को नष्ट कर देवनारायण ने अपना प्रभाव जमाया।

     * बदला हुआ स्वरूप: राजा रतन सिंह को सत्ता से बेदखल कर कुम्हार के कार्य में लगाया गया।

     * विरासत की रक्षा: गोठां में साडू माता और पीपलदे ने विजयी वीरों का स्वागत किया।

     

    Click here to Read More
    Previous Article
    45वीं छात्रकला पुदर्शनी के पुरस्कारों की घोषणा
    Next Article
    राजस्थान में विज्ञान और तकनीक को लगेंगे पंख: विज्ञान भारती और मुख्य सचिव के बीच उच्च स्तरीय बैठक संपन्न

    Related धर्म और अध्यात्म Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment