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    राजस्थान विश्वविद्यालय का भूमि घोटाला: विरासत की नीलामी या प्रशासनिक षड्यंत्र?

    3 months ago

    प्रोफेसर अशोक कुमार 

    पूर्व कुलपति 

    कानपुर, गोरखपुर विश्वविद्यालय, पूर्व विभागाध्यक्ष राजस्थान विश्वविद्यालय 

     

     शिक्षा के मंदिर पर 'राजस्व' का ग्रहण

    जयपुर की पहचान यहाँ के गुलाबी पत्थरों और ऐतिहासिक स्मारकों से ही नहीं, बल्कि यहाँ के उन शिक्षण संस्थानों से भी है जिन्होंने आधुनिक राजस्थान की नींव रखी। महाराजा और महारानी महाविद्यालय केवल दो कॉलेज नहीं, बल्कि एक जीवित विरासत हैं। लेकिन हाल ही में सामने आए तथ्यों ने राजस्थान विश्वविद्यालय के इतिहास में एक 'काला अध्याय' लिख दिया है। इन कॉलेजों की अरबों रुपये मूल्य की भूमि का स्वामित्व चुपचाप जयपुर विकास प्राधिकरण और नगर निगम को हस्तांतरित कर दिया गया। यह घटना न केवल विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर प्रहार है, बल्कि प्रदेश के शैक्षणिक भविष्य के साथ एक क्रूर मजाक भी है।

    प्रकरण का विवरण: क्या है पूरा मामला?

    दस्तावेजों और आधिकारिक सूचनाओं के अनुसार, महाराजा कॉलेज की 48 बीघा 10 बिस्वा और महारानी कॉलेज की लगभग 30 बीघा (कुल 99 बीघा से अधिक का परिसर) भूमि का मालिकाना हक राजस्व रिकॉर्ड में बदल दिया गया है। 'अपना खाता' पोर्टल के डिजिटल रिकॉर्ड बताते हैं कि यह नामांतरण संख्या 49 और 50 के माध्यम से मई-जून 2025 में ही पूर्ण कर लिया गया था।

    आश्चर्य की बात यह है कि जिस विश्वविद्यालय प्रशासन को अपनी एक-एक इंच जमीन की रक्षा करनी चाहिए थी, उसे इस बात की भनक तक नहीं लगी—या फिर शायद भनक लगने दी गई और जानबूझकर चुप्पी साधी गई। डॉ. भूपेंद्र सिंह शेखावत (अध्यक्ष, श्री बिशन सिंह शेखावत शोध एवं शिक्षण संस्थान, जो की राजस्थान विश्वविद्यालय में एक जनसंपर्क अधिकारी के रूप में अपनी प्रशंसनीय सेवाएं इस विश्वविद्यालय को दे चुके हैं, पूरे देश में पहली बार राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए लागू की गई इंश्योरेंस योजना जैसे अनेक अभिनव कार्य इन्हीं की पहल पर प्रारंभ हुऐ, ) ने इस पर गंभीर सवाल उठाए थे कि जब यह प्रक्रिया 7 महीने पहले ही पूरी हो चुकी थी, तो कुलपति कार्यालय ने इसे सिंडिकेट से क्यों छुपाया?

    कानूनी और तकनीकी खामियां: अधिनियमों की धज्जियां

    इस पूरे हस्तांतरण में कानूनी प्रक्रियाओं को ताक पर रख दिया गया है। 

     

    भूमि का स्वरूप: राजस्व विभाग ने संभवतः इस भूमि को 'सिवायचक' (राजकीय बंजर भूमि) मानकर हस्तांतरित किया है। जबकि वास्तविकता यह है कि यह भूमि पूर्व जयपुर रियासत द्वारा विशेष रूप से 'शिक्षा' हेतु हस्तांतरित की गई 'हेरिटेज संपत्ति' है।

    मौका निरीक्षण का अभाव: किसी भी भूमि के नामांतरण से पूर्व भौतिक सत्यापन अनिवार्य है। इन परिसरों में दशकों से भवन बने हुए हैं, हजारों छात्र पढ़ रहे हैं, फिर राजस्व अधिकारियों ने इसे खाली या हस्तांतरण योग्य कैसे मान लिया?

    अधिनियम का उल्लंघन: राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 86(2) स्पष्ट करती है कि यदि कोई नामांतरण गलत तरीके से हुआ है, तो 3 माह के भीतर उसका पुनरावलोकन कर उसे खारिज किया जा सकता है। लेकिन यहाँ प्रशासन ने समय निकलने का इंतजार किया ताकि स्थिति 'यथावत' हो जाए।

    विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका: रहस्यमयी चुप्पी के मायने

    किसी भी स्वायत्त विश्वविद्यालय का सर्वोच्च निर्णयकारी अंग उसकी 'सिंडिकेट' होती है। विश्वविद्यालय की संपत्ति का एक हिस्सा भी यदि किसी अन्य संस्था को दिया जाता है, तो सिंडिकेट की अनुमति अनिवार्य है। यहाँ तो पूरे के पूरे कॉलेज की जमीन ही छिन गई।

    कुलपति की भूमिका यहाँ संदेह के घेरे में है। यदि कुलपति को इसकी जानकारी थी, जैसा कि व्हाट्सएप संदेशों और चर्चाओं से संकेत मिलता है, तो उन्होंने सिंडिकेट की आपात बैठक क्यों नहीं बुलाई? क्या विश्वविद्यालय प्रशासन पर किसी राजनीतिक या भू-माफिया दबाव का साया था? यह उदासीनता न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि विश्वविद्यालय के प्रति 'विश्वासघात' की श्रेणी में आती है।

    आर्थिक और अकादमिक परिणाम: भविष्य पर संकट

    इस भूमि की बाजार दर आज की तारीख में अरबों रुपये में है। लेकिन नुकसान केवल आर्थिक नहीं है:

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार, किसी भी संस्थान को ग्रांट या फंड तभी मिलता है जब भूमि उसके नाम पर दर्ज हो। स्वामित्व छिनने के बाद महाराजा और महारानी कॉलेज भविष्य में किसी भी केंद्रीय सहायता से वंचित हो सकते हैं।

    विकास कार्यों पर रोक: यदि कल विश्वविद्यालय को नए लैब, डिजिटल लाइब्रेरी या हॉस्टल बनाने हों, तो उसे जेडीए या नगर निगम के सामने हाथ फैलाने होंगे।

    निजीकरण का डर: अंदेशा यह भी है कि जेडीए इस प्राइम लोकेशन की जमीन का उपयोग 'कमर्शियल' उद्देश्यों या 'सार्वजनिक-निजी भागीदारी' मॉडल के लिए कर सकता है, जिससे शिक्षा महंगी और दुर्गम हो जाएगी।

    जन-आंदोलन की आवश्यकता: अब नहीं तो यह लड़ाई केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकती।

    सिंडिकेट की विशेष बैठक: कुलपति को तत्काल प्रभाव से बैठक बुलाकर इस निर्णय के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करना चाहिए और इसे राजभवन भेजना चाहिए।

    डिजिटल विरोध: विश्वविद्यालय के हजारों शिक्षकों, कर्मचारियों और पूर्व छात्रों को मुख्यमंत्री और राज्यपाल को ईमेल के जरिए अपनी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए।

     सोशल मीडिया का मोर्चा: “आर यू परिसर बचाओ “जैसे अभियानों के माध्यम से आम जनमानस को यह बताना होगा कि कैसे उनकी विरासत को चुपचाप बेचा जा रहा है।

    निष्कर्ष: अस्मिता का प्रश्न

    महाराजा और महारानी कॉलेज राजस्थान की अस्मिता हैं। यदि आज हम इस 'प्रशासनिक सर्जिकल स्ट्राइक' पर मौन रहे, तो कल विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर भी सुरक्षित नहीं रहेगा। यह समय है कि राज्य सरकार अपनी गलती सुधारे और कुलाधिपति (राज्यपाल) महोदय हस्तक्षेप कर इस अवैध नामांतरण को निरस्त करवाएं। शिक्षा के मंदिरों को राजस्व और संपत्ति के खेल से दूर रखना ही एक सभ्य समाज की पहचान है।

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