Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    धर्मयुद्ध: जब देवनारायण के प्रताप से डगमगा उठा बिसलदेव का सिंहासन

    2 days ago

    अजमेर/खेड़ा चौसला। मालवा से वापसी के पश्चात भगवान देवनारायण द्वारा 'खेड़ा चौसला' गांव बसाने की सूचना ने तत्कालीन अजमेर की सियासत में हलचल पैदा कर दी। यह संघर्ष केवल भूमि का नहीं, बल्कि स्वाभिमान और दैवीय शक्ति के प्रदर्शन का गवाह बना, जिसमें अंततः अहंकार की हार और धर्म की विजय हुई।

    बिसलदेव का रोष और अनुचित मांग

    इतिहास के पन्नों के अनुसार, जब अजमेर के राजा बिसलदेव को यह ज्ञात हुआ कि देवनारायण ने उनकी अनुमति के बिना नया गांव बसा लिया है, तो वे क्रोधित हो उठे। उन्होंने संदेशवाहक के जरिए देवनारायण को अपमानजनक संदेश भेजा। बिसलदेव का तर्क था कि देवनारायण उनके संरक्षण में बड़े हुए हैं, अतः उन्हें गांव बसाने का अधिकार नहीं था। साथ ही, उन्होंने मेहन्दू के पालन-पोषण और बटूर की थानेदारी के दौरान हुए खर्च की वसूली की भी अनुचित मांग रख दी।

    अजमेर आगमन: नीलागर की टाप और कांपता राजमहल

    बिसलदेव की चुनौती को स्वीकार करते हुए देवनारायण अपने विश्वस्त साथी छोछू भाट के साथ अजमेर की ओर कूच कर गए। लोक कथाओं के अनुसार, जैसे ही उनके शक्तिशाली अश्व 'नीलागर' ने अजमेर की धरा पर कदम रखा, पूरा शहर और राजमहल भूकंप की भांति कांपने लगा। देवनारायण ने अपनी शक्ति का परिचय देते हुए महल का ऊपरी कंगूरा ध्वस्त कर दिया, जिससे बिसलदेव के मन में भय का संचार हुआ।

    भैंसासुर दानव का वध और जोगणियों का आह्वान

    देवनारायण की शक्ति से घबराकर बिसलदेव ने अपने सबसे क्रूर अस्त्र 'भैंसासुर दानव' को उन्हें समाप्त करने के लिए भेजा। 11 वर्षीय बालक का रूप धरे देवनारायण और उस विशालकाय दानव के बीच भीषण युद्ध हुआ। देवनारायण ने अपनी तलवार के एक ही प्रहार से भैंसासुर का अंत कर दिया।

    किंतु, चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई थी। भैंसासुर के रक्त की बूंदें भूमि पर गिरते ही नए दानव उत्पन्न होने लगे। इस विकट परिस्थिति में देवनारायण ने अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग किया:

     * उन्होंने अपने बाएं पैर के झटके से 64 जोगणियों और 52 भैरुओं को प्रकट किया।

     * जोगणियों को आदेश दिया गया कि दानवों के रक्त की एक भी बूंद जमीन पर न गिरने पाए।

     * खप्परों में रक्त झेलते ही दानवों का पुनर्जन्म रुक गया और देवनारायण ने समस्त असुर सेना का संहार कर दिया।

    गरड़ा घोड़ा और पत्थर के खंभे का विच्छेदन

    अपनी हार स्वीकार करने के बजाय बिसलदेव ने एक और चाल चली। उन्होंने देवनारायण को 'गरड़ा' नामक एक आदमखोर घोड़ा भेंट किया, जो किसी को भी अपनी पीठ पर नहीं बैठने देता था। देवनारायण ने न केवल उस अश्व को वश में किया, बल्कि उस पर सवार होकर एक विशाल पत्थर के खंभे को तलवार के वार से दो टुकड़ों में काट दिया।

    अहंकार का अंत और क्षमा याचना

    देवनारायण का यह अतुलनीय साहस और बल देखकर बिसलदेव का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्हें आभास हो गया कि वे किसी साधारण बालक से नहीं बल्कि साक्षात ईश्वर के अवतार से टकरा रहे हैं। भयभीत राजा दौड़ते हुए देवनारायण के चरणों में गिर पड़े और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। अंततः, बिसलदेव ने उन्हें अपार धन-संपत्ति भेंट की और ससम्मान विदा किया।

    निष्कर्ष: यह घटना सिद्ध करती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों के सामने बड़े से बड़ा सत्ता बल भी नतमस्तक हो जाता है। आज भी राजस्थान की लोक संस्कृति में यह प्रसंग देवनारायण की महिमा के रूप में गाया जाता है।

     

    Click here to Read More
    Previous Article
    आबादी क्षेत्र में ही होगा उप जिला अस्पताल,बगरू का निर्माण - चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री
    Next Article
    अमेरिका पर ईरान की चेतावनी: जवाबी कार्रवाई सीमित नहीं होगी, मध्य पूर्व संघर्ष क्यों खतरनाक मोड़ पर

    Related धर्म और अध्यात्म Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment