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    अमेरिका में H-1B से OPT तक बदल रहे वीजा नियम, भारतीय छात्रों और पेशेवरों पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव

    1 hour ago

    Yugcharan News / 26-08-2026

    अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीति में लगातार किए जा रहे बदलावों का असर भारतीय छात्रों, आईटी पेशेवरों और अमेरिका में रोजगार की तलाश कर रहे विदेशी नागरिकों पर पड़ सकता है। H-1B वीजा से लेकर F-1 छात्र वीजा, Optional Practical Training (OPT) और संभावित ग्रीन कार्ड नियमों तक कई स्तरों पर शुल्क, वेतन मानकों और रहने की अवधि में बदलाव की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ उपाय लागू होने की प्रक्रिया में हैं, जबकि कुछ अभी प्रस्ताव या विचार के स्तर पर हैं।

    इन बदलावों का महत्व भारत के लिए इसलिए भी अधिक है क्योंकि भारतीय नागरिक लंबे समय से अमेरिकी उच्च शिक्षा और तकनीकी रोजगार व्यवस्था में सबसे बड़े विदेशी समूहों में शामिल रहे हैं। खासतौर पर आईटी क्षेत्र में भारतीय पेशेवरों की बड़ी मौजूदगी है और बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के बाद OPT के माध्यम से काम का अनुभव हासिल करते हैं तथा आगे H-1B वीजा का रास्ता तलाशते हैं।

    H-1B वीजा पर शुल्क का बढ़ता दबाव

    अमेरिकी प्रशासन की नई नीतियों में H-1B व्यवस्था सबसे अधिक चर्चा में है। जानकारी के अनुसार, सितंबर से कुछ विशेष परिस्थितियों में H-1B और L-1 वीजा एक्सटेंशन पर अतिरिक्त शुल्क का प्रावधान प्रभावी होने वाला है।

    जिन अमेरिकी कंपनियों में कम से कम 50 कर्मचारी हैं और जिनके कर्मचारियों में H-1B या L-1 धारकों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक है, उन्हें प्रत्येक H-1B एक्सटेंशन आवेदन पर 4,000 डॉलर और प्रत्येक L-1 एक्सटेंशन पर 4,500 डॉलर का शुल्क देना पड़ सकता है। यह शुल्क पहले से मौजूद व्यवस्था का विस्तारित रूप है। अंतर यह है कि पहले इसका प्रभाव मुख्य रूप से नए कर्मचारियों की नियुक्ति या नौकरी बदलने जैसी परिस्थितियों तक सीमित था, जबकि अब वीजा विस्तार भी इसके दायरे में आ सकता है।

    भारतीय आईटी कंपनियों के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन कंपनियों के अमेरिकी परिचालन में ऐसे कर्मचारी बड़ी संख्या में होते हैं जिन्हें कई वर्षों की परियोजनाओं के लिए अमेरिका भेजा जाता है और समय-समय पर उनके वीजा का विस्तार कराना पड़ता है। ऐसे में प्रत्येक एक्सटेंशन पर अतिरिक्त शुल्क कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ा सकता है।

    चार साल की सीमा से F-1 छात्रों की चिंता बढ़ी

    अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों के लिए F-1 वीजा व्यवस्था में भी प्रस्तावित बदलाव महत्वपूर्ण है। पहले छात्रों की वैध उपस्थिति को सामान्य तौर पर उनके अध्ययन कार्यक्रम की अवधि से जोड़ा जाता था। नई व्यवस्था में प्रवेश की अवधि को अधिक स्पष्ट और निश्चित बनाने की दिशा में बदलाव किया जा रहा है, जिसमें अधिकतम चार वर्ष की अवधि का प्रावधान बताया गया है।

    इसका असर उन छात्रों पर पड़ सकता है जिनके पाठ्यक्रम चार वर्ष से अधिक लंबे हैं। डॉक्टरेट, मेडिकल और कुछ अन्य लंबे अकादमिक कार्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त अवधि की आवश्यकता होने पर अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा यानी USCIS से विस्तार के लिए आवेदन करना पड़ सकता है।

    इसके अलावा, पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में रहने की सामान्य ग्रेस अवधि को 60 दिनों से घटाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव भी छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह होगा कि डिग्री पूरी होने के बाद छात्रों के पास आगे की कानूनी स्थिति तय करने के लिए पहले की तुलना में कम समय रहेगा।

    बताया गया है कि यह नियम 15 सितंबर से प्रभावी होने की दिशा में है, हालांकि इसकी अंतिम स्थिति आगे होने वाले प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम पर निर्भर कर सकती है।

    1 लाख डॉलर वाला H-1B शुल्क अभी कानूनी विवाद में

    H-1B व्यवस्था से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद 1 लाख डॉलर के शुल्क को लेकर है। वर्ष 2025 में जारी राष्ट्रपति की घोषणा के तहत अमेरिका के बाहर से नए H-1B कर्मचारियों को नियुक्त कर लाने की स्थिति में 100,000 डॉलर का शुल्क लगाया गया था।

    हालांकि, इस प्रावधान को लेकर कानूनी चुनौती सामने आई। बोस्टन की एक संघीय अदालत ने इस वर्ष जून में राष्ट्रपति की घोषणा को खारिज करते हुए तर्क दिया कि इस तरह का शुल्क कर के समान है और कर लगाने का अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है। अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है।

    इस शुल्क का संभावित असर भारतीय नागरिकों पर अधिक पड़ने की बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि H-1B लाभार्थियों में भारतीयों की हिस्सेदारी काफी अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में H-1B कर्मचारियों में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत रही।

    फिलहाल इस शुल्क का भविष्य अदालत और प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर है। ऐसे में इसे लागू व्यवस्था के बजाय विवादित और अनिश्चित स्थिति वाले प्रावधान के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

    नए H-1B आवेदन पर 1,03,265 डॉलर का प्रस्ताव

    अमेरिकी प्रशासन ने H-1B वीजा के वार्षिक कैप के तहत आने वाले नए आवेदनों पर 103,265 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी सामने रखा है। वार्षिक कैप के तहत सामान्य तौर पर 85,000 वीजा उपलब्ध होते हैं, जिनमें अमेरिकी मास्टर डिग्री या उससे उच्च योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों के लिए 20,000 स्थान शामिल हैं।

    यह प्रस्ताव अगस्त के अंत में फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया गया है और इसके बाद सार्वजनिक टिप्पणियों की प्रक्रिया चल रही है। अंतिम नियम बनने से पहले इसमें बदलाव की संभावना भी बनी रहती है।

    यदि ऐसा शुल्क अंतिम रूप से लागू होता है तो विदेशी कर्मचारियों को प्रायोजित करने वाली कंपनियों की लागत में भारी वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, किसी कंपनी को 100 नए H-1B कर्मचारियों के लिए आवेदन करना हो तो केवल प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क ही करोड़ों रुपये के बराबर हो सकता है।

    इसका असर कंपनियों के भर्ती निर्णयों पर पड़ने की आशंका है। कुछ नियोक्ता विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के बजाय अमेरिका में उपलब्ध श्रमबल से भर्ती को प्राथमिकता दे सकते हैं, जबकि कुछ कंपनियां अपने वैश्विक संचालन की रणनीति में बदलाव पर विचार कर सकती हैं।

    वेतन सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव

    H-1B के अलावा विदेशी कर्मचारियों से जुड़े अन्य रोजगार वीजा पर भी न्यूनतम वेतन मानकों में बदलाव प्रस्तावित है। अमेरिकी श्रम विभाग ने H-1B, H-1B1, E-3 और PERM से संबंधित तथाकथित prevailing wage व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव रखा है।

    मौजूदा व्यवस्था में नौकरियों को अनुभव और कौशल के आधार पर अलग-अलग वेतन स्तरों में रखा जाता है। प्रस्तावित बदलावों के तहत इन स्तरों पर निर्धारित न्यूनतम वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। शुरुआती स्तर की नौकरियों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक होने की संभावना बताई जा रही है।

    भारतीय पेशेवरों के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी शुरुआती और मध्य स्तर की तकनीकी नौकरियों में अमेरिकी कंपनियों के लिए काम करते हैं। यदि नियोक्ताओं को ऐसे कर्मचारियों के लिए काफी अधिक वेतन देना पड़ेगा, तो विदेशी कर्मचारियों की भर्ती की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है।

    OPT पर 1 लाख डॉलर का प्रस्ताव सबसे बड़ी चिंता

    भारतीय छात्रों के लिए सबसे गंभीर प्रस्तावों में से एक OPT से जुड़ा है। Optional Practical Training ऐसा कार्यक्रम है जिसके माध्यम से F-1 छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी शैक्षणिक योग्यता से संबंधित क्षेत्र में अमेरिका में काम का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

    यह व्यवस्था लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अमेरिकी शिक्षा और रोजगार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी रही है। कई छात्र OPT के दौरान अनुभव हासिल करने के बाद H-1B वीजा के लिए प्रयास करते हैं।

    अमेरिकी प्रशासन द्वारा OPT के लिए 100,000 डॉलर शुल्क पर विचार किए जाने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच चिंता बढ़ाई है। अभी यह प्रस्ताव अंतिम रूप से प्रकाशित नहीं हुआ है और इसलिए इसे लागू नियम नहीं माना जा सकता।

    भारतीय छात्रों पर इसका प्रभाव संभावित रूप से बड़ा हो सकता है। अमेरिकी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या 3.63 लाख से अधिक रही। यदि OPT के लिए इतना बड़ा शुल्क लागू होता है, तो बड़ी संख्या में छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद अमेरिका में काम करने का विकल्प आर्थिक रूप से कठिन हो सकता है।

    ग्रीन कार्ड के लिए भी संभावित बॉन्ड

    आव्रजन नीति में संभावित बदलाव केवल छात्रों और H-1B कर्मचारियों तक सीमित नहीं हैं। कुछ श्रेणियों के आव्रजन वीजा आवेदकों से 100,000 डॉलर तक का रिफंडेबल बॉन्ड लेने के प्रस्ताव पर भी विचार किया जा रहा है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत बाहर से अमेरिका में स्थायी रूप से आने वाले कुछ आवेदकों को यह राशि जमा करनी पड़ सकती है। बताया गया है कि निर्धारित शर्तों के अनुसार बाद में यह बॉन्ड वापस किया जा सकता है। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी फेडरल रजिस्टर में अंतिम नियम के रूप में प्रकाशित नहीं हुआ है और इसकी वास्तविक रूपरेखा आगे स्पष्ट होगी।

    भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए क्या मायने रखता है?

    इन सभी बदलावों को एक साथ देखने पर अमेरिका में पढ़ाई और रोजगार के पारंपरिक रास्ते पर अतिरिक्त वित्तीय और प्रशासनिक दबाव दिखाई देता है। पहले जहां अमेरिकी विश्वविद्यालय में प्रवेश, F-1 वीजा, OPT और उसके बाद H-1B के माध्यम से करियर बनाने का रास्ता भारतीय छात्रों के बीच लोकप्रिय था, वहीं बढ़ते शुल्क और सख्त नियम इस प्रक्रिया को अधिक महंगा और जटिल बना सकते हैं।

    हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि सभी प्रस्तावित नियम लागू नहीं हुए हैं। कुछ पहले से प्रभावी हैं, कुछ अदालतों में चुनौती का सामना कर रहे हैं और कुछ अभी सार्वजनिक टिप्पणियों या प्रशासनिक समीक्षा के चरण में हैं। इसलिए छात्रों और पेशेवरों को किसी भी निर्णय से पहले अमेरिकी सरकारी एजेंसियों की नवीनतम आधिकारिक जानकारी की जांच करनी चाहिए।

    अमेरिका की बदलती आव्रजन नीति का असर केवल व्यक्तिगत आवेदकों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारतीय आईटी कंपनियों, अमेरिकी विश्वविद्यालयों, वैश्विक कंपनियों और दोनों देशों के बीच प्रतिभा के आवागमन पर भी असर पड़ सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित शुल्क और वेतन नियम किस रूप में अंतिम रूप लेते हैं और अदालतों से जुड़े मामलों में क्या फैसले सामने आते हैं।

     

    फिलहाल भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि अमेरिका जाने या वहां काम जारी रखने की योजना बनाने से पहले H-1B, F-1, OPT और अन्य आव्रजन नियमों की वर्तमान स्थिति को ध्यान से समझना जरूरी है। बदलती नीतियों के बीच किसी पुराने नियम या अनुमान के आधार पर फैसला लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

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