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    ऑनलाइन उपलब्धता के आधार पर देश में कहीं भी IP मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी पीठ करेगी क्षेत्राधिकार के नियमों की समीक्षा

    1 hour ago

     

    Yugcharan News / 26-08-2026

    नई दिल्ली। इंटरनेट और ई-कॉमर्स के बढ़ते प्रभाव के बीच बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) से जुड़े मुकदमों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र यानी Territorial Jurisdiction को लेकर महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि कोई उत्पाद, विज्ञापन या ऑनलाइन सामग्री देश के किसी भी हिस्से में इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध है, किसी कंपनी को उस स्थान की अदालत में बौद्धिक संपदा से संबंधित मुकदमा दायर करने का अधिकार स्वतः नहीं मिल सकता।

    न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने इस महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर विचार करते हुए तीन सवालों को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने का फैसला किया है। अदालत का मानना है कि इंटरनेट की व्यापक पहुंच को इस तरह से क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का आधार नहीं बनाया जा सकता कि कोई कॉरपोरेट पक्ष देश में लगभग किसी भी स्थान पर मुकदमा दायर करने लगे।

    यह मामला हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) बनाम क्विक लिविंग (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड से संबंधित है। विवाद एक विज्ञापन अभियान को लेकर सामने आया था, जिसे HUL ने अपने उत्पादों से जुड़ा बताते हुए चुनौती दी थी।

    इंटरनेट की पहुंच और अदालत के क्षेत्राधिकार पर अहम सवाल

    दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि यदि कोई विज्ञापन या उत्पाद इंटरनेट पर उपलब्ध है और देश के अलग-अलग हिस्सों में उपभोक्ता उसे देख सकते हैं या खरीद सकते हैं, तो क्या इसके आधार पर किसी कंपनी को उन सभी स्थानों की अदालतों में मुकदमा दायर करने का अधिकार मिल जाएगा।

    न्यायमूर्ति भंभानी ने इस संभावना को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने संकेत दिया कि इंटरनेट की मौजूदगी को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का इतना व्यापक आधार नहीं बनाया जाना चाहिए कि अदालतों के क्षेत्राधिकार की मूल अवधारणा ही कमजोर पड़ जाए।

    अदालत के अनुसार, इंटरनेट के विकास और दुनिया के किसी भी हिस्से से ऑनलाइन उपलब्ध वस्तुओं तक पहुंच के कारण क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से संबंधित स्थापित कानूनी सिद्धांतों को इतना अस्पष्ट नहीं किया जा सकता कि कोई कॉरपोरेशन देश में लगभग किसी भी स्थान पर मुकदमा शुरू कर सके।

    इस मुद्दे का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आज कंपनियां अपने उत्पादों और विज्ञापनों को वेबसाइटों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स माध्यमों के जरिए पूरे देश में उपलब्ध कराती हैं।

    HUL ने किस आधार पर दिल्ली में मामला उठाया?

    विवाद की शुरुआत HUL द्वारा क्विक लिविंग के विज्ञापन अभियान “War on What’s Hidden” को लेकर दायर किए गए मुकदमे से हुई। HUL ने इस अभियान को अपने Vim और Surf Excel जैसे उत्पादों से संबंधित बताते हुए आपत्ति जताई थी।

    कंपनी का आरोप था कि विज्ञापन अभियान में किए गए दावे उचित आधार के बिना थे और उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले हो सकते थे। इसी आधार पर HUL ने अभियान को रोकने के लिए अदालत से राहत की मांग की।

    हालांकि, क्विक लिविंग ने दिल्ली हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के अधिकार क्षेत्र पर ही आपत्ति उठाई। कंपनी की ओर से यह तर्क दिया गया कि मामले की सुनवाई दिल्ली में नहीं होनी चाहिए क्योंकि दोनों कंपनियों के पंजीकृत कार्यालय मुंबई में हैं।

    क्विक लिविंग के अनुसार, HUL द्वारा विवादित बताए गए होर्डिंग का विशेष रूप से उल्लेख मुंबई से संबंधित था। ऐसे में केवल इंटरनेट पर उपलब्धता के आधार पर दिल्ली को मुकदमे की सुनवाई के लिए उपयुक्त क्षेत्राधिकार नहीं माना जा सकता।

    दूसरी ओर, HUL ने दिल्ली में अपने कॉरपोरेट कार्यालय का हवाला दिया। कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि संबंधित विज्ञापन अभियान YouTube, Instagram और क्विक लिविंग की वेबसाइट पर उपलब्ध था और दिल्ली में भी इसे आसानी से देखा जा सकता था।

    कंपनी ने यह तर्क भी दिया कि दिल्ली के उपभोक्ता ऑनलाइन माध्यमों से संबंधित उत्पादों को खरीद सकते थे। इसलिए HUL के अनुसार विवाद का एक हिस्सा दिल्ली में उत्पन्न हुआ था और दिल्ली हाईकोर्ट के पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र मौजूद था।

    अलग-अलग फैसलों से पैदा हुआ कानूनी मतभेद

    दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में बौद्धिक संपदा से जुड़े क्षेत्राधिकार के पुराने फैसलों का अध्ययन किया। अदालत को अलग-अलग न्यायिक निर्णयों में दृष्टिकोण का अंतर दिखाई दिया।

    कुछ फैसलों में यह दृष्टिकोण सामने आया है कि केवल वेबसाइट की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। यह दिखाना जरूरी हो सकता है कि संबंधित वेबसाइट या व्यावसायिक गतिविधि ने किसी विशेष क्षेत्र के उपभोक्ताओं को वास्तव में लक्षित किया था।

    वहीं, कुछ अन्य न्यायिक दृष्टिकोणों में ऑनलाइन व्यावसायिक लेन-देन को क्षेत्राधिकार स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यदि किसी क्षेत्र में उपभोक्ता वेबसाइट के जरिए लेन-देन पूरा कर सकता है, तो इससे उस क्षेत्र में मुकदमा दायर करने का आधार बनने की संभावना पर विचार किया गया है।

    इन्हीं अलग-अलग दृष्टिकोणों के कारण दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि इस विषय पर अधिक स्पष्ट और निर्णायक कानूनी स्थिति आवश्यक है।

    तीन महत्वपूर्ण सवाल बड़ी पीठ के सामने

    न्यायमूर्ति भंभानी ने इस मामले से जुड़े तीन प्रमुख सवाल बड़ी पीठ को विचार के लिए भेजे हैं।

    पहला सवाल यह है कि बौद्धिक संपदा से जुड़े मुकदमों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र केवल सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 20, ट्रेड मार्क्स एक्ट की धारा 134 या कॉपीराइट एक्ट की धारा 62 के आधार पर तय होगा, अथवा इन सभी प्रावधानों को एक साथ पढ़कर क्षेत्राधिकार निर्धारित किया जाना चाहिए।

    दूसरा महत्वपूर्ण सवाल कॉरपोरेट कंपनियों के पंजीकृत या मुख्य कार्यालय से संबंधित है। बड़ी पीठ यह देखेगी कि यदि मुकदमे से जुड़ी कार्रवाई का कोई हिस्सा उस स्थान पर हुआ है जहां कंपनी का प्रधान या पंजीकृत कार्यालय स्थित है, तो क्या कंपनी को अनिवार्य रूप से उसी स्थान पर मुकदमा दायर करना होगा।

    तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ऑनलाइन लेन-देन से जुड़ा है। बड़ी पीठ को यह तय करना होगा कि ऑनलाइन कारोबार और इंटरनेट आधारित गतिविधियों से जुड़े IP विवादों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का कौन-सा नियम लागू होना चाहिए, खासकर तब जब पहले के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों में अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हों।

    कंपनियों के लिए व्यापक प्रभाव

    यह मामला देश में डिजिटल कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इंटरनेट के माध्यम से व्यापार करने वाली कंपनियों के उत्पाद और सेवाएं अक्सर एक साथ कई राज्यों में उपलब्ध होते हैं।

    यदि केवल किसी वेबसाइट की पहुंच को क्षेत्राधिकार का आधार मान लिया जाए, तो किसी कंपनी के खिलाफ देश के लगभग किसी भी हिस्से में मुकदमा शुरू किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप कंपनियों को अलग-अलग राज्यों और शहरों में मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है, भले ही विवाद से उनका वास्तविक व्यावसायिक संबंध किसी दूसरे स्थान से हो।

    अदालत की टिप्पणी इसी चिंता की ओर संकेत करती है। न्यायिक प्रक्रिया में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी मामले की सुनवाई उस अदालत में हो जिसका विवाद से पर्याप्त और वास्तविक संबंध हो।

    डिजिटल माध्यमों के कारण यह निर्धारण पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है। एक विज्ञापन मुंबई में तैयार हो सकता है, कंपनी का कार्यालय किसी दूसरे शहर में हो सकता है, सर्वर किसी तीसरे स्थान पर हो सकता है और विज्ञापन पूरे देश में सोशल मीडिया के जरिए उपलब्ध हो सकता है।

    ऐसे में केवल ऑनलाइन पहुंच को आधार बनाकर अदालत का क्षेत्राधिकार निर्धारित करने से कई व्यावहारिक और कानूनी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

    अंतरिम राहत पर फिलहाल कोई आदेश नहीं

    दिल्ली हाईकोर्ट ने HUL की ओर से मांगी गई अंतरिम राहत पर फिलहाल कोई निर्देश नहीं दिया। यानी अदालत ने इस चरण पर विज्ञापन अभियान के संबंध में अंतरिम रोक लगाने का आदेश पारित नहीं किया।

    मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने के बाद अब इस बात पर अधिक स्पष्टता मिलने की उम्मीद है कि इंटरनेट आधारित IP विवादों में अदालत का क्षेत्राधिकार किस आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

    अदालत की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि आदेश को एक सप्ताह के भीतर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश इस मामले में बड़ी पीठ के गठन पर विचार करेंगे।

    दोनों पक्षों की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने की पैरवी

    HUL की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमित सिब्बल और स्वाति सुकुमार पेश हुए। उनकी सहायता Saikrishna & Associates की टीम ने की, जिसमें अधिवक्ता सैकृष्ण राजगोपाल, सिद्धार्थ चोपड़ा, नितिन शर्मा, स्नेहा जैन, विवेक अय्यागरी, अभिनव भल्ला, सक्षम ढींगरा और स्मृति नायर शामिल थे।

    वहीं, क्विक लिविंग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लल्ल ने पक्ष रखा। उन्हें Fidus Law Chambers की टीम ने सहयोग दिया। टीम में श्वेताश्री मजूमदार, पृथ्वी सिंह, जाह्नवी चड्ढा, रोहन कृष्ण सेठ, देवयानी नाथ, कृतिन भसीन, रित्विक मरवाहा, वंशिका सिंह और अनन्या मेहता शामिल थीं।

    डिजिटल युग में IP कानून के लिए महत्वपूर्ण मोड़

    दिल्ली हाईकोर्ट का यह संदर्भ ऐसे समय में आया है जब भारत में ऑनलाइन कारोबार, सोशल मीडिया विज्ञापन और डिजिटल मार्केटिंग तेजी से बढ़ रहे हैं। कंपनियां अपने ट्रेडमार्क, कॉपीराइट, ब्रांड पहचान और विज्ञापन अभियानों की सुरक्षा के लिए अदालतों का रुख करती हैं।

    ऐसे मामलों में यह तय करना कि मुकदमा किस अदालत में दायर किया जा सकता है, स्वयं एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बन चुका है।

    बड़ी पीठ के समक्ष अब इस विषय पर स्पष्ट कानूनी दिशा तय करने का अवसर होगा। यदि अदालत ऑनलाइन लेन-देन और डिजिटल उपलब्धता के लिए स्पष्ट मानदंड निर्धारित करती है, तो इससे भविष्य में IP मुकदमों के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।

    फिलहाल, दिल्ली हाईकोर्ट का यह रुख एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर इशारा करता है—इंटरनेट की देशव्यापी पहुंच अपने आप में किसी भी अदालत को बौद्धिक संपदा विवाद की सुनवाई का अधिकार नहीं दे सकती। वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि, विवाद से संबंधित कारण और संबंधित क्षेत्र से उसका ठोस संबंध भी महत्वपूर्ण होंगे।

    अब इस मामले में बड़ी पीठ के गठन और उसके निर्णय पर कानूनी क्षेत्र की नजर रहेगी। उसका फैसला न केवल HUL और क्विक लिविंग के बीच मौजूदा विवाद को प्रभावित कर सकता है, बल्कि भविष्य में देशभर में ऑनलाइन कारोबार करने वाली कंपनियों द्वारा दायर किए जाने वाले बौद्धिक संपदा मुकदमों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।

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