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    चेतना का विज्ञान: गीता के सिद्धांतों से आत्म-साक्षात्कार की ओर

    2 months ago

    आंतरिक रूपांतरण: साधक के लिए अनिवार्य गुण

    अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले और विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता का अनुकरण करने वाले जिज्ञासुओं के लिए केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रगति के लिए मानवीय चरित्र में कुछ विशिष्ट गुणों का संचय अनिवार्य माना गया है। इसमें शांति, आत्मसंयम और त्याग को आधारशिला माना गया है। जो साधक अपने भीतर धैर्य, मन की स्थिरता और अटूट श्रद्धा को विकसित करता है, वही ज्ञान की गहराइयों को स्पर्श करने में सक्षम होता है। ये गुण न केवल मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि व्यक्ति को बाहरी कोलाहल के बीच भी अडिग रहने की शक्ति प्रदान करते हैं।

    त्रि-अवस्थाओं का साक्षी: आत्मा का स्वरूप

    मानव अनुभव मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं के इर्द-गिर्द घूमता है— जागृति (जाग्रत), स्वप्न और सुषुप्ति (गहरी नींद)। सामान्यतः व्यक्ति इन अवस्थाओं में होने वाली मानसिक उथल-पुथल और विचारों के प्रवाह को ही अपना अस्तित्व मान लेता है। हालांकि, दार्शनिक दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि इन परिवर्तनशील मनोवृत्तियों के पीछे एक स्थिर तत्व विद्यमान है।

     * जागृति: बाहरी जगत के साथ अंतःक्रिया की अवस्था।

     * स्वप्न: अंतर्मन की कल्पनाओं और दमित इच्छाओं का संसार।

     * सुषुप्ति: वह शून्यता जहाँ न विचार हैं, न द्वंद्व।

    इन तीनों ही स्थितियों में जो तत्व स्वयं निर्लिप्त रहकर, बिना किसी विकार के एक मूक साक्षी और दर्शक के रूप में बराबर विद्यमान रहता है, वही 'आत्मा' है।

    विचारों का नाटक और निर्लिप्त दृष्टा

    मनुष्य के विचार किसी रंगमंच पर चल रहे नाटक की भांति हैं, जो निरंतर बदलते रहते हैं। कभी हर्ष, कभी शोक, तो कभी भय के दृश्य इस मानसिक पटल पर उभरते हैं। आत्मा इस नाटक का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह प्रकाश है जिसमें यह पूरा नाटक दिखाई देता है। आत्मा की यह निर्लिप्तता ही उसे संसार के बंधनों से मुक्त रखती है। जब साधक स्वयं को इन परिवर्तनशील विचारों से अलग कर उस 'साक्षी भाव' में स्थित कर लेता है, तब उसे वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव होता है।

     स्थिरता ही परम उपलब्धि

    अतः, इस आत्म-तत्व को पहचानने का अर्थ है स्वयं को कर्ता भाव से मुक्त कर दृष्टा भाव में स्थापित करना। जीवन के संघर्षों के बीच मन की शांति बनाए रखना और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न खोना ही उस परम चेतना की ओर बढ़ने का पहला कदम है। श्रद्धा का संचय ही वह ईंधन है, जो इस लंबी आध्यात्मिक यात्रा को सुगम और अर्थपूर्ण बनाता है।

     

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