Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    मालवा से मेवाड़: देवनारायण ने फिर बसाया अपना खोया हुआ साम्राज्य, खेड़ा चौसला में रखी नई नींव

    1 day ago

     

    भीलवाड़ा/गोठा। लोकदेवता देवनारायण का मालवा से अपनी पैतृक भूमि की ओर लौटने का सफर ऐतिहासिक रहा। भांगी और अपने काफिले के साथ वे मंगरोप पहुंचे, जहां साडू और हीरा दासी ने 11 साल पहले अपने संघर्ष के दिन बिताए थे। इस यात्रा ने न केवल उनके वंश की मर्यादा को पुनर्जीवित किया, बल्कि कलयुग के लिए कई परंपराओं को भी जन्म दिया।

    मंगरोप में विवाह की रस्में और बिला-बिली का चमत्कार

    मंगरोप वही स्थान है जहां कभी साडू ने दही मथा था। यहां पहुंचते ही साडू ने देवनारायण को स्मरण कराया कि अपनी भूमि की सीमा में प्रवेश से पूर्व उन्हें पीपलदे के साथ विवाह के शेष फेरे पूरे करने होंगे। लोक मान्यताओं के अनुसार, यदि देवनारायण ऐसा नहीं करते तो भविष्य में केवल तीन फेरों की ही प्रथा रह जाती। पीपलदे के साथ फेरे पूर्ण कर उन्हें वामांग (बायां अंग) स्थान दिया गया।

    इस अवसर पर धार के राजा ने अपनी पुत्री को दहेज दिया। वहां उपस्थित जनसमूह ने श्रद्धा अनुसार मुहरें दान कीं। इसी बीच एक निर्धन भील ने भक्ति भाव से वन का एक फल (बिला) भेंट किया। देवनारायण ने अन्य कीमती वस्तुओं को छोड़कर उस फल को स्वीकार किया और बताया कि इसमें भविष्य की संतान 'बिला-बिली' का वास है। इसे रुई में सुरक्षित रखा गया, जिससे आगे चलकर उनके पुत्र-पुत्री का जन्म हुआ।

    माण्डल के तालाब का उद्धार और पूर्वजों का तर्पण

    काफिला आगे बढ़कर माण्डल पहुंचा। यहां जब देवनारायण का घोड़ा 'नीलागर' तालाब का पानी पीने से हिचक गया, तब छोछू भाट ने इसके पीछे का रहस्य बताया। उन्होंने जानकारी दी कि इस तालाब में उनके पूर्वज माण्डल घोड़े सहित समाधि ले चुके थे और बिसलदेव के भय से तब से इसका पूजन (नांगल) नहीं हुआ था।

    देवनारायण ने अपने पूर्वजों के सम्मान में वहां रुकने का निर्णय लिया। उन्होंने न केवल तालाब का शुद्धिकरण करवाया, बल्कि वहां विशाल यज्ञ, हवन और ब्राह्मण भोज का आयोजन किया। 100 गायों का दान कर उन्होंने इस स्थान को अभिशप्त होने से मुक्त किया।

    उजड़े हुए गोठा की चिंता और साडू का डर

    जब साडू और हीरा दासी ने माण्डल से अपने पुराने गांव गोठा की ओर देखा, तो वहां पसरा सन्नाटा और उजाड़ देख वे भावुक हो गईं। उन्हें डर था कि जिस स्थान पर अब भूत-प्रेतों का डेरा है और जहां राण के राजा का आतंक है, वहां पुन: बसना असंभव होगा। साडू ने रास्ते में आने वाले गांवों 'कावंल्या' और 'जीवंल्या' में रुकने का प्रस्ताव दिया, जो कभी उनके परिवार की दासियों के नाम पर बसे थे।

    स्वाभिमान का संकल्प: खेड़ा चौसला की स्थापना

    देवनारायण ने अपनी मां की आशंकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वे अपनी दासियों के बसाए गांवों में शरण नहीं लेंगे। उन्होंने घोषणा की कि उनका काफिला अब सीधे गोठा की भूमि पर ही रुकेगा। उन्होंने साडू को आश्वस्त किया कि राण के राजा या किसी भी विपरीत शक्ति से निपटने का उत्तरदायित्व उनका है।

    गोठा पहुंचकर देवनारायण ने एक नए युग की शुरुआत की। उन्होंने अपनी कुलभूमि पर 'खेड़ा चौसला' नामक नए गांव की स्थापना की। इस गांव की नींव पूर्णिमा (पूनम) के शुभ दिन रखी गई, जो समृद्धि और विजय का प्रतीक बनी। यह स्थान आज भी देवनारायण के अनुयायियों के लिए अटूट श्रद्धा का केंद्र है।

     

    Click here to Read More
    Previous Article
    झारखंड के सारंडा जंगल में बड़ा ऑपरेशन: 1 करोड़ के इनामी अनल दा समेत 15 माओवादी ढेर
    Next Article
    यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी वाटिका, जयपुर में न्यू स्कूल–पार्सन्स, न्यूयॉर्क सिटी के प्रतिनिधिमंडल का भ्रमण

    Related राजस्थान Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment