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    पर्यावरण संरक्षण सरकार की ही नहीं हैं, हर नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी: प्रो. शर्मा

    1 hour ago

    राजस्थान विश्वविद्यालय में विश्व पर्यावरण दिवस पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित; देश भर के 200 से अधिक शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों ने किया मंथन

    ​जयपुर, विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के 'इन्दिरा गांधी मानव पारिस्थितिकी, पर्यावरण एवं जनसंख्या अध्ययन केंद्र' (पर्यावरण विज्ञान विभाग) के तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस वर्ष सम्मेलन का मुख्य विषय "पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन एवं जलवायु कार्रवाई के माध्यम से सतत भविष्य" रखा गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए लगभग 200 शिक्षकों, वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और पर्यावरण संकट से निपटने के उपायों पर गहन विचार-विमर्श किया।

    ​सामूहिक प्रयासों से ही थमेगा पर्यावरण क्षरण

    ​सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. बी. एल. शर्मा थे। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि पर्यावरण का संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है।

    ​"जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों को हम केवल सामूहिक प्रयासों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बल पर ही रोक सकते हैं। हम सभी को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी।"

    — प्रो. बी. एल. शर्मा, पूर्व कुलपति

    ​कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सरगुजा विश्वविद्यालय (छत्तीसगढ़) के विज्ञान संकाय के डीन प्रो. मधुर मोहन रंगा ने कहा कि सतत विकास (Sustainable Development) के लिए पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण और उसका पुनरुद्धार आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। उन्होंने युवाओं और शोधकर्ताओं से नए अनुसंधान और नवाचारों को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

    ​अर्ध-शुष्क क्षेत्रों पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा

    ​सम्मेलन के संयोजक एवं विभाग के निदेशक डॉ. सुरेन्द्र सिंह चौहान ने अपने वक्तव्य में आगाह किया कि जलवायु परिवर्तन आज पूरी मानवता के लिए एक गंभीर वैश्विक संकट बन चुका है। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़ और हीट वेव (लू) जैसे दुष्परिणाम अब साफ दिखने लगे हैं।

    ​डॉ. चौहान ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि राजस्थान जैसे अर्ध-शुष्क (Semi-Arid) प्रदेशों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और भी अधिक घातक हो सकते हैं, जिसका सीधा असर हमारे जल संसाधनों, कृषि उत्पादन और जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है। उन्होंने समाधान के रूप में वृक्षारोपण, जल संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और सतत जीवनशैली को अपनाने पर बल दिया।

    ​शोध पत्रों के माध्यम से सार्थक चर्चा और संकल्प

    ​सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी सत्रों में जैव विविधता, जल प्रबंधन और राजस्थान की विशिष्ट पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़े शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. प्रेमा एस्थर सोलोमन ने सम्मेलन की विस्तृत रूपरेखा सामने रखी, जबकि दूसरे आयोजन सचिव डॉ. पंकज कुमार जैन ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।

    ​समापन सत्र के मुख्य अतिथि पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के प्राणीशास्त्र एवं पर्यावरण विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. जगबीर सिंह कीर्ती रहे, जिन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान और नीति-निर्माण के बेहतर समन्वय को जरूरी बताया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. सुरेन्द्र सिंह चौहान ने सम्मेलन के निष्कर्षों को साझा किया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के विशेष 'लोगो' का विमोचन किया गया और सभी ने पर्यावरण संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया।

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