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    भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते से बदल सकती है बाजार की तस्वीर, कपड़ा उद्योग से लेकर स्कॉच व्हिस्की तक मिलेगा बड़ा लाभ

    1 hour ago

    युगचरण न्यूज़ / 15-07-2026

    भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच लागू हुए मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement-FTA) को दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इस समझौते के लागू होने के साथ ही भारत के निर्यातकों, उद्योगों और उपभोक्ताओं के लिए नए अवसर खुलने की उम्मीद जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे अधिक लाभ वस्त्र उद्योग, रेडीमेड गारमेंट्स, समुद्री उत्पाद, ऑटोमोबाइल, फुटवियर और कई अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों को मिल सकता है। वहीं दूसरी ओर ब्रिटेन से आयात होने वाले कई उत्पाद, विशेषकर स्कॉच व्हिस्की, आने वाले वर्षों में भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती है।

    हालांकि व्यापार विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस समझौते का वास्तविक प्रभाव धीरे-धीरे सामने आएगा। केवल शुल्क (टैरिफ) कम होने से व्यापार में स्वतः वृद्धि नहीं होगी, बल्कि उद्योगों को नए नियमों के अनुरूप अपनी रणनीति भी बदलनी होगी।

    कई वर्षों की बातचीत के बाद लागू हुआ समझौता

    भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत वर्ष 2022 में शुरू हुई थी। लंबी वार्ताओं के बाद दोनों देशों ने इस समझौते को अंतिम रूप दिया और अब यह आधिकारिक रूप से लागू हो चुका है।

    यह समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके तहत भारत से ब्रिटेन जाने वाले लगभग 99 प्रतिशत उत्पादों पर लगने वाले शुल्क को समाप्त या काफी कम किया गया है। वहीं भारत में आने वाले लगभग 90 प्रतिशत ब्रिटिश उत्पादों पर भी आयात शुल्क में राहत दी गई है।

    ब्रिटिश सरकार का अनुमान है कि इस समझौते से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में सकारात्मक बढ़ावा मिलेगा और द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

    भारतीय वस्त्र उद्योग को मिल सकता है सबसे बड़ा फायदा

    भारत का वस्त्र एवं होम टेक्सटाइल उद्योग इस समझौते से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले क्षेत्रों में शामिल माना जा रहा है।

    अब तक भारतीय उत्पादों पर ब्रिटेन में लगभग 12 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता था, जबकि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को विशेष व्यापार योजनाओं के तहत शुल्क में छूट मिलती थी। इस कारण भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ता था।

    अब शुल्क कम होने के बाद भारतीय निर्यातकों को ब्रिटिश बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिलेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय कपड़ा उद्योग, रेडीमेड गारमेंट्स, बेडशीट, तौलिया, कालीन और घरेलू वस्त्रों की मांग में वृद्धि हो सकती है।

    रेडीमेड गारमेंट्स क्षेत्र के लिए सुनहरा अवसर

    बाजार विश्लेषकों का कहना है कि ब्रिटेन में रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) के आयात में चीन की हिस्सेदारी पिछले कुछ वर्षों से लगातार घट रही है। बढ़ती उत्पादन लागत और वैश्विक कंपनियों द्वारा वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश के कारण भारत के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं।

    विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भारत ब्रिटेन के रेडीमेड परिधान बाजार में अपनी हिस्सेदारी लगभग दोगुनी कर सकता है।

    इसके अलावा बांग्लादेश में हाल के वर्षों में उत्पन्न सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का भी कुछ लाभ भारतीय निर्यातकों को मिल सकता है।

    स्कॉच व्हिस्की हो सकती है सस्ती

    इस व्यापार समझौते का एक बड़ा प्रभाव ब्रिटेन से आयात होने वाली स्कॉच व्हिस्की पर भी देखने को मिल सकता है।

    समझौते के तहत स्कॉच व्हिस्की पर भारत में लगने वाला आयात शुल्क तत्काल प्रभाव से 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके बाद अगले दस वर्षों में इसे चरणबद्ध तरीके से 40 प्रतिशत तक लाने की योजना है।

    आयातकों का मानना है कि इससे ब्रिटिश शराब कंपनियों को भारत में अधिक प्रतिस्पर्धी बाजार मिलेगा। हालांकि खुदरा कीमतों में वास्तविक कमी आने में कुछ समय लग सकता है क्योंकि कंपनियां पहले नई व्यापार व्यवस्था के अनुसार अपनी आपूर्ति श्रृंखला, दस्तावेजी प्रक्रियाओं और आयात प्रणाली को व्यवस्थित करेंगी।

    व्यापारिक कंपनियां कर रही हैं तैयारी

    समझौता लागू होने के बाद कई भारतीय और ब्रिटिश कंपनियों ने अपनी व्यापारिक रणनीतियों में बदलाव शुरू कर दिया है।

    कई भारतीय निर्यातक ब्रिटिश कंपनियों के साथ दीर्घकालिक व्यापार योजनाओं पर काम कर रहे हैं। वहीं आयातक कंपनियां नए सीमा शुल्क नियमों, मूल प्रमाणपत्र (Certificate of Origin), लॉजिस्टिक्स और कस्टम प्रक्रियाओं को लेकर तैयारी कर रही हैं ताकि उन्हें शुल्क में मिलने वाली छूट का पूरा लाभ मिल सके।

    व्यापार जगत का मानना है कि शुरुआती चरण में तैयारी पर अधिक ध्यान रहेगा और वास्तविक व्यापारिक विस्तार अगले कुछ वर्षों में दिखाई देगा।

    विशेषज्ञ बोले— बदलाव होगा, लेकिन धीरे-धीरे

    व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते को लेकर अत्यधिक उत्साहित होने के बजाय इसके व्यावहारिक प्रभावों को समझना जरूरी है।

    भारत के कई उत्पाद पहले भी ब्रिटेन में कम शुल्क या शुल्क-मुक्त व्यवस्था के तहत प्रवेश कर रहे थे। ऐसे में हर क्षेत्र को समान लाभ नहीं मिलेगा।

    विशेषज्ञों के अनुसार असली सफलता इस बात से तय होगी कि जिन उत्पादों पर पहले 4 से 16 प्रतिशत तक शुल्क लगता था, क्या अब उनके निर्यात ऑर्डर बढ़ते हैं, निर्यात मात्रा में वृद्धि होती है और कंपनियों का लाभ बढ़ता है।

    इन संकेतकों के आधार पर अगले एक से तीन वर्षों में इस समझौते की वास्तविक सफलता का आकलन किया जा सकेगा।

    अभी भी कई चुनौतियां मौजूद

    हालांकि शुल्क में कमी के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।

    ब्रिटेन ने कुछ उत्पादों, विशेष रूप से स्टील आयात पर सुरक्षा संबंधी सीमाएं लागू रखी हैं। इसके अलावा प्रस्तावित कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भी भारतीय निर्यातकों के लिए अतिरिक्त लागत का कारण बन सकता है।

    यदि कार्बन उत्सर्जन से जुड़े नए शुल्क लागू होते हैं, तो कुछ क्षेत्रों में एफटीए से मिलने वाले लाभ का असर कम हो सकता है।

    छोटे उद्योगों के सामने जागरूकता की चुनौती

    भारत में पहले हुए कई मुक्त व्यापार समझौतों का पूरा लाभ छोटे और मध्यम उद्योग नहीं उठा सके क्योंकि उन्हें नियमों और दस्तावेजी प्रक्रियाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं थी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी एफटीए का लाभ तभी मिलता है जब निर्यातक निर्धारित नियमों के अनुसार आवश्यक प्रमाणपत्र तैयार करें और विदेशी खरीदारों को शुल्क में हुई कमी की जानकारी दें।

    यदि उद्योगों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला तो केवल समझौता लागू होने से निर्यात में स्वतः वृद्धि नहीं होगी।

    सरकार और उद्योग संगठनों की होगी अहम भूमिका

    विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, निर्यात संवर्धन परिषदों और उद्योग संगठनों को मिलकर छोटे और मध्यम उद्यमों को नए नियमों की जानकारी देनी होगी।

    निर्यातकों को यह समझाना आवश्यक होगा कि किस प्रकार वे मूल प्रमाणपत्र प्राप्त करें, नए दस्तावेज तैयार करें और शुल्क में मिली छूट का लाभ उठाकर अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद बेच सकें।

    यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो भारतीय निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।

    उपभोक्ताओं को भी मिलेगा फायदा

    इस समझौते का लाभ केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प, बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद और प्रतिस्पर्धी कीमतों का लाभ मिल सकता है।

    यदि व्यापारिक गतिविधियां अपेक्षा के अनुरूप बढ़ती हैं, तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार की वार्षिक वृद्धि दर वर्तमान 10–12 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

     

    कुल मिलाकर भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक नई शुरुआत माना जा रहा है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव तत्काल दिखाई देने के बजाय आने वाले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे सामने आएगा। यदि उद्योग नए नियमों के अनुसार स्वयं को ढालने में सफल रहते हैं और सरकार आवश्यक सहयोग प्रदान करती है, तो यह समझौता भारतीय निर्यात, निवेश और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकता है।

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