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    भगवान विष्णु अवतार देवनारायण: राजस्थान से लेकर देशभर में फैला है आस्था का साम्राज्य, जानिए कहाँ-कहाँ हैं प्रमुख मंदिर

    13 hours ago

    राजस्थान से हरियाणा और मध्य प्रदेश तक गूंजता है 'जय देव' का उद्घोष, औषधियों के देवता के रूप में पूजती है दुनिया

    विशेष रिपोर्ट/ भीलवाड़ा. भारतीय लोक संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना में देवनारायण का स्थान एक ऐसे महापुरुष और लोक देवता के रूप में है, जिन्हें स्वयं विष्णु का स्वरूप माना जाता है। विक्रम संवत 968 में अवतार लेने वाले देवनारायण ने न केवल समाज को संगठित किया, बल्कि आयुर्वेद और गौ-सेवा के माध्यम से लोक कल्याण की नई परिभाषा लिखी। आज उनके मंदिर केवल राजस्थान की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली सहित पूरे भारत में फैले हुए हैं।

    1. मालासेरी डूंगरी: जहाँ कमल के फूल से अवतरित हुए भगवान

    भीलवाड़ा जिले के आसींद तहसील में स्थित मालासेरी डूंगरी को देवनारायण की अंतरराष्ट्रीय जन्मस्थली माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, साढ़ू माता की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु ने इसी स्थान पर कमल के फूल के रूप में अवतार लिया था। यहाँ चट्टान फट गई थी और साक्षात नारायण प्रकट हुए थे। यह स्थान आज करोड़ों भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है।

    2. सवाई भोज मंदिर (आसींद): शौर्य और भक्ति की गाथा

    आसींद में खारी नदी के तट पर स्थित सवाई भोज मंदिर देवनारायण के पिता और 24 बगड़ावतों के पराक्रम की याद दिलाता है। यहाँ देवनारायण के साथ उनके परिवार और घोड़े 'लीलाधर' की पूजा की जाती है। इस मंदिर की वास्तुकला और यहाँ का आध्यात्मिक परिवेश भक्तों को एक अलग ही शांति का अनुभव कराता है।

    3. देवधाम जोधपुरिया (टोंक): आस्था का महाकुंभ

    टोंक जिले की निवाई तहसील में स्थित देवधाम जोधपुरिया भारतभर के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ है। यहाँ माशी बांध के किनारे स्थित यह मंदिर अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भाद्रपद शुक्ल सप्तमी पर आयोजित होने वाला मेला राजस्थान के सबसे बड़े ग्रामीण मेलों में से एक है, जहाँ देशभर से लाखों श्रद्धालु पैदल यात्रा कर पहुँचते हैं।

    4. देवमाली (ब्यावर): त्याग और तपस्या की तपोस्थली

    ब्यावर (अजमेर) के पास स्थित देवमाली गाँव को देवनारायण का निवास स्थान माना जाता है। इस गाँव की विशेषता यह है कि यहाँ के लोग आज भी कच्चा घर बनाकर रहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि देवनारायण ने यहाँ पक्के घरों का त्याग करने का उपदेश दिया था। यहाँ के मंदिर में ईंटों की पूजा की जाती है, जो सादगी और भक्ति का प्रतीक है।

    5. पुष्कर (अजमेर): पवित्र सरोवर और नारायण का संबंध

    अजमेर के पुष्कर तीर्थ से देवनारायण का गहरा नाता रहा है। कथाओं के अनुसार, देवनारायण ने पुष्कर सरोवर के तट पर कई महत्वपूर्ण कार्य किए और यहाँ के गऊ घाट पर विशेष पूजा-अर्चना की थी। पुष्कर क्षेत्र में स्थित देवनारायण मंदिर को प्राचीनता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

    6. मध्य प्रदेश में विस्तार: मालवा और निमाड़ की श्रद्धा

    राजस्थान के बाद मध्य प्रदेश वह राज्य है जहाँ देवनारायण के सबसे अधिक अनुयायी हैं। उज्जैन, मंदसौर, नीमच और इंदौर जैसे शहरों में देवनारायण के भव्य मंदिर स्थापित हैं। मालवा क्षेत्र में तो देवनारायण की 'फड़' बांचने की परंपरा सदियों पुरानी है, जहाँ भोपा-भोपी रातभर नारायण की गाथा सुनाते हैं।

    7. हरियाणा और दिल्ली: राजधानी क्षेत्र में बढ़ती मान्यता

    गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों जैसे हरियाणा के गुरुग्राम, फरीदाबाद और नई दिल्ली के दक्षिणी हिस्सों में देवनारायण के कई नवनिर्मित और भव्य मंदिर हैं। ये मंदिर न केवल पूजा के केंद्र हैं, बल्कि समाज के शैक्षणिक और सामाजिक संवाद के मंच भी बन चुके हैं।

    8. गुजरात में आस्था: द्वारका से सटे इलाकों में प्रभाव

    विष्णु अवतार होने के कारण गुजरात के यादव और गुर्जर समाज में भी देवनारायण के प्रति गहरी आस्था है। बनासकांठा और कच्छ के कुछ क्षेत्रों में देवनारायण के मंदिर मिलते हैं, जहाँ उन्हें कृष्ण के समान ही पूजा जाता है।

    9. औषधियों के देवता: नीम और ईंटों का अनोखा पूजन

    देवनारायण के मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहाँ अधिकांश स्थानों पर मूर्ति के स्थान पर ईंटों की पूजा की जाती है। उन्हें 'नीम का देवता' भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने नीम के पत्तों और गोमूत्र से असाध्य रोगों का इलाज किया था। आज भी उनके मंदिरों में नीम के पत्ते प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं।

    10. सामाजिक समरसता के प्रतीक: हर वर्ग की अटूट श्रद्धा

    देवनारायण ने अपने जीवनकाल में ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाया था। यही कारण है कि उनके मंदिरों के द्वार हर जाति और वर्ग के लिए खुले हैं। राजस्थान से शुरू हुई यह धार्मिक लहर अब पूरे भारत में एक सांस्कृतिक सेतु का काम कर रही है, जो लोगों को गौ-रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और मानवता की सेवा से जोड़ती है। देवनारायण के मंदिर केवल पत्थर के ढांचे नहीं, बल्कि उस महान परंपरा के साक्षी हैं जहाँ ईश्वर ने जन-सामान्य के बीच रहकर धर्म की स्थापना की। मालासेरी से लेकर देश के कोने-कोने तक फैले ये मंदिर आज भी 'जय देवनारायण' के उद्घोष के साथ नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ रहे हैं।

     

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