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    भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के करीब, अमेरिका से वार्ता में देरी के बीच नई दिशा की तलाश

    2 days ago

    भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत निर्णायक चरण में पहुंच गई है। भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, दोनों पक्ष इस महीने के भीतर समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। यदि यह करार संपन्न होता है, तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा, जो वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में देश की भूमिका को और मजबूत करेगा।

    यह प्रगति ऐसे समय में सामने आई है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताएं अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाई हैं। ऐसे में भारत नए और भरोसेमंद बाजारों की तलाश में यूरोपीय संघ के साथ अपने आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई देने की कोशिश कर रहा है।

    भारत-EU व्यापार संबंधों का बढ़ता महत्व

    वर्ष 2024 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 120 अरब यूरो तक पहुंच गया था, जिससे EU भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया। यह समझौता न केवल व्यापारिक आंकड़ों को और बढ़ावा देगा, बल्कि दोनों पक्षों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में वैकल्पिक सहयोग विकसित करने का अवसर भी देगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत और यूरोप दोनों के लिए रणनीतिक रूप से अहम है, क्योंकि इससे वे कुछ हद तक एशिया और पूर्वी यूरोप पर अत्यधिक निर्भरता को संतुलित कर सकेंगे।

    उच्च स्तरीय दौरे से बढ़ी उम्मीदें

    इस महीने के अंत में यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग के शीर्ष नेतृत्व का भारत दौरा प्रस्तावित है, जिसके दौरान भारत-EU शिखर सम्मेलन आयोजित होगा। माना जा रहा है कि इस दौरान समझौते पर अंतिम राजनीतिक सहमति बन सकती है। दोनों पक्ष यह भी देख रहे हैं कि क्या नेताओं की इस बैठक से पहले ही समझौते की घोषणा संभव हो सके।

    किन मुद्दों पर बनी हुई है चुनौती

    हालांकि बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी सहमति बनना बाकी है। इनमें प्रमुख रूप से:

    • ऑटोमोबाइल सेक्टर:
      यूरोपीय संघ चाहता है कि भारत यूरोप से आने वाली कारों पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती करे। वर्तमान में भारत में कुछ कारों पर आयात शुल्क काफी अधिक है, जिसे लेकर घरेलू उद्योग चिंतित है।

    • स्टील और पर्यावरण नियम:
      भारत को आशंका है कि यूरोपीय संघ के पर्यावरण आधारित नियमों और कार्बन शुल्क से उसके स्टील निर्यात पर असर पड़ सकता है।

    • कृषि क्षेत्र:
      भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को किसी भी व्यापार समझौते में शामिल नहीं करेगा। सरकार का कहना है कि इससे करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका जुड़ी हुई है।

    भारत की प्राथमिकताएं क्या हैं

    भारत इस समझौते के जरिए अपने श्रम-प्रधान उद्योगों को यूरोपीय बाजार में बेहतर पहुंच दिलाना चाहता है। इसके अलावा, भारत ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में अपने मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने पर जोर दे रहा है।

    सरकार की कोशिश है कि इस समझौते से सेवाओं के व्यापार, डिजिटल सहयोग, निवेश और हरित प्रौद्योगिकियों में भी नए अवसर पैदा हों।

    निवेश और तकनीकी सहयोग की संभावनाएं

    यह समझौता केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इसके तहत यूरोपीय कंपनियों के भारत में निवेश को बढ़ावा मिलने की संभावना है, खासकर विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ‘मेक इन इंडिया’ और हरित ऊर्जा लक्ष्यों को भी बल मिल सकता है। साथ ही, भारत को उन्नत तकनीक और कौशल हस्तांतरण का लाभ मिल सकता है।

    वैश्विक व्यापार पर संभावित असर

    यदि यह समझौता लागू होता है, तो यह वैश्विक व्यापार संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। बढ़ते संरक्षणवाद के दौर में भारत-EU समझौता मुक्त व्यापार का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

    कुछ यूरोपीय नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता अन्य देशों के साथ भविष्य की व्यापार वार्ताओं के लिए भी एक मॉडल के रूप में काम कर सकता है, भले ही इसकी शर्तें कुछ अन्य समझौतों की तुलना में कम व्यापक हों।

    आगे की राह

    हालांकि दोनों पक्ष आशावादी हैं, लेकिन अंतिम समझौते से पहले कई तकनीकी और नीतिगत बिंदुओं पर सहमति आवश्यक है। आने वाले कुछ सप्ताह निर्णायक माने जा रहे हैं।

    यदि यह समझौता सफल होता है, तो यह न केवल भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक सहयोग को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति को भी और सशक्त करेगा।

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