Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    पाताल लोक तक गूंजा देवनारायण का पराक्रम: राक्षसों का संहार कर नाग कन्या और दैत्य कन्या से रचाया विवाह

    9 hours ago

    भोपा की ढाणी बेगस स्थित श्री देवनारायण मंदिर  देवधाम के महा फड़ वाचक  बिरदी चंद कुमावत ने साझा की देव अवतार की अद्भुत गाथा

    जयपुर/बेगस। लोक देवता देवनारायण के जीवन से जुड़ी अलौकिक घटनाएं आज भी समाज के लिए श्रद्धा और विस्मय का केंद्र हैं। बेगस स्थित भोपा की ढाणी में प्रतिष्ठित देवधाम श्री देवनारायण मंदिर के महा फड़ वाचक भोपा जी बिरदी चंद कुमावत ने देवनारायण के पाताल लोक प्रस्थान और वहां हुए उनके विवाह प्रसंगों पर प्रकाश डाला है। यह गाथा बताती है कि किस तरह नारायण ने राक्षसी शक्तियों का अंत कर धर्म की स्थापना की और भोपा संस्कृति को उसके प्रतीक चिन्ह प्रदान किए।

    गढ़ गाजणा का युद्ध और 64 जोगणियों का आह्वान

     बिरदी चंद कुमावत के अनुसार, देवनारायण का राक्षसों के साथ भीषण युद्ध गढ़ गाजणा के द्वार पर हुआ था। वहां स्थिति ऐसी थी कि एक राक्षस को मारने पर उसके रक्त की बूंदों से कई नए राक्षस जन्म ले रहे थे। इस संकट को भांपते हुए नारायण ने अपने दाहिने पैर से 64 जोगणियों और 52 भैरुओं को प्रकट किया। उन्होंने आदेश दिया कि राक्षसों के रक्त की एक भी बूंद धरती पर नहीं गिरनी चाहिए। जोगणियों ने रक्त का पान किया और नारायण ने राक्षसों का समूल नाश कर दिया।

    पाताल लोक प्रस्थान और शेषनाग से मिलन

    युद्ध के अंत में गज दन्त और नीम दन्त नामक दो राक्षस साढ़ू माता की घोड़ी लेकर पाताल लोक की खाई में छिप गए। उनका पीछा करते हुए नारायण भी पाताल लोक जा पहुंचे। वहां पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग आराम कर रहे थे, जो घोड़े के टापों की आवाज से जागृत हुए। नारायण ने जब राक्षसों के बारे में पूछा, तो शेषनाग ने एक शर्त रखी। उन्होंने अपनी कुंवारी नाग कन्या के विवाह का प्रस्ताव नारायण के सम्मुख रखा।

    नाग कन्या से विवाह और भोपा समाज को 'सेली' की सौगात

    लोक मान्यताओं के अनुसार, देवनारायण ने नाग कन्या के साथ विवाह स्वीकार किया। विवाह का पहला फेरा पूरा करने के बाद उन्होंने अपनी चंवरी से उठकर एक फटकार मारी, जिससे 'सेली' (काली डोरी) का निर्माण हुआ। नारायण ने यह सेली जोगी भोपा को प्रदान की। यही कारण है कि आज भी देवनारायण की फड़ बांचने वाले भोपे अपने गले में काली डोरी (सेली) धारण करते हैं, जो उनके आध्यात्मिक पद का प्रतीक है।

    दैत्य कन्या चीमटी बाई से विवाह और फड़ का लकड़ी प्रतीक

    शेषनाग से रास्ता जानकर नारायण पुनः गढ़ गाजणा पहुंचे और दैत्यराज पर प्रहार किया। भयभीत होकर गज दन्त और नीम दन्त ने साढ़ू माता की काली घोड़ी वापस कर दी और अपनी राजकुमारी चीमटी बाई (दैत्य कन्या) से विवाह का प्रस्ताव रखा। नारायण ने दूसरा विवाह चीमटी बाई से किया। इस अवसर पर दूसरे फेरे के बाद उन्होंने फटकार मारकर एक लकड़ी तैयार की और भोपा को दी। यह लकड़ी आज भी फड़ बांचते समय दृश्यों को दर्शाने (परिचय देने) के काम आती है।

    आस्था का केंद्र: देवधाम बेगस

     बिरदी चंद कुमावत ने बताया कि देवनारायण के ये प्रसंग केवल कथाएं नहीं हैं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित परंपराएं हैं जिन्हें भोपा समाज सदियों से सहेज रहा है। बेगस स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां भक्त नारायण के इन चमत्कारों और उनके द्वारा दी गई सीखों को याद करते हैं। 'जय देव धणी' और 'जय सवाई भोज' के उद्घोष के साथ श्रद्धालु यहां अपनी मन्नतें मांगते हैं।

     

    Click here to Read More
    Previous Article
    साहित्य के अनुष्ठान से दशा व दिशा मिलती है -डॉ मंजू बाघमार
    Next Article
    देवनारायण का पाताल विजय अभियान: राक्षसों का संहार कर नाग कन्या और दैत्य पुत्री से रचाया विवाह

    Related धर्म और अध्यात्म Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment